स्वीटी- ये आप क्या कह रही हैं माँ जी मैं कुछ समझ नहीं पाई.
माँ - रहने दो बेटी . कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें कम समजहना ही सबके लिए बेहतर होता है . मैं जानती हूँ तू भी हम सब लोगों के सतह मुंबई चलना चाहेगी , क्योंकि उसे देखे नबीना तुम्हें तो चैन नहीं आएगा भले ही वो हरजाई है, भले उसको तुम्हारी याद नहीं आयी है लेकिन तुम तो उसे एक पल भी नहीं भुला पाई रात -रात भर जागी हो उसके लिए , मुझसे कुछ छिपा नहीं है बेटी . मैं सब कुछ जानती और समझती हूँ तुम्हारे माँ मेरी पक्की सहेली है . कोई और होती तो इस तरह तुम्हें हमारे घर थोड़े ही भेजती मगर यहाँ तो बिलकुल घर जैसा मामला है . मैं जानती थी, तुम्हारी निगाहों में अजय के लिए प्रेम के भाव देखे थे तभी तो मैंने तुम्हें यहाँ बुला लिया मगर अफ़सोस ... खैर, अब तुम भी हमारे साथ मुंबई चलने की तैयारी कार्लो . देखते हैं क्या होता है . भगवान को जो मंजूर होगा वो तो हर हाल में होकर ही रहेगा.
और इओस तरह स्वीटी भी उनके मुंबई जाने वाले दल में शामिल हो गयी. मुंबई में जो स्वीटी की सहेली थी, वाहन उन्हें अजय के उस होटल का पता चला जिसमे वह चन्दा के साथ ठहरा था . सभी लोग बेहद गोपनीय तरीके से होटल पहुंचे , वे होटल के स्टाफ को भी किसी तरह की जानकारी नहीं देना चाहते थे. सब कुछ साइलेंस रखने के पक्ष में थे ताकि उनकी इज्जत न उछले और अगर अजय केपिता विधायक का चुनाव लादेन तो विपक्ष के लोग उन्हें इस मुद्दे पर घेर न सकें. हर कदम फूक -फूंक कर रखा जा रहा था. आखिरकार विजय प्रताप सिंह का परिवार उस होटल पर पहुच ही गया जहां पर अजय अपनी महबूबा चन्दा के साथ ठहरा था. यह सब इतनी जल्दबाजी में हुआ था की अजय को भनक भी नहीं लगी . उसने अपना सामान इकट्ठा कर लिया था और थोड़ी देर में वे लोग वहाँ से जाने की तैयारी कर ही रहे थे . कार्मे पर दस्तक अजय की माँ ने दी. दरवाजा अजय ने खोला. माँ को देखते ही उसे गहरा शोक्ड लगा. उसे ऐसी आशा नहीं थी फिर अगले ही पल वह माँ के पैरों में झुकता चला गया. माँ ने उसे गले से लगा लिया , जब अजय ने ध्यान से देखा तो उसे सामने पिता , स्वीटी, स्वीटी के पिता आदि दिखाई दिए . अजय को थोड़ी सी आशंका हुई मगर दिल को मजबूत कर लिया , उसने एक हल्की सी मुस्कान स्वीटी की तरफ उछाली और अपने पिता के पैर छू लिए , इसके बाद स्वीटी के पिता खड़े दिखे , अजय ने पैर छूकर आशीर्वाद लिया . उसने स्वीटी को भी गले से लगा लिया. सब लोग होटल के कमरे में जमा हो गए . वक्त की नजाकत को देखते हुए चन्दा ने इंटरकाम से फोन कर कुर्सियां और चाय नाश्ते का आदेश दे दिया था. सब लोगों ने जब अजय के साथ चन्दा को देखा तो उनके होश उड़ गए. चन्दा ने सर झुकाकर सर पर पल्लू ले लिया और सबका अभिवादन करने लगी .किसीकी समझ में नहीं आया की उससे क्या कहा जाए , खामोशी छाई हुई थी . कोई कुछ बोल ही नहीं पा रहा था . मानो सबकी जुबान पर ताला लगा हो . आखिर स्वीटी के पिता ने खामोशी तोडी -
-कैसे हो बेटे ? हम सब लोग तुम्हारे लिए कितने परेशान थे., कहाँ -कहाँ नहीं तलाश किया तुम्हें अगर मुंबई ही आना था तो बताकर आते सब इंतजाम कर दिए जाते .
अजय- जी, माफी चाहता हूँ अंकल जी, आपको कष्ट पहुचाने का मेरा कोई इरादा नहीं था. वैसे मैंने स्वीटी से कह दिया था, इनको सब पता था तभी तो शायद आप लोग यहाँ तक पहुच पाए हो ....
माँ- हम तुम्हें लेने आये हैं बेटा चलो सब लोग तुम्हारा इन्तजार कर रहे हैं.
अजय- कहाँ ? कहाँ चलना है माँ ?
माँ- अपने घर बेटे . अपने घर . तुम्हारे अपने घर. और कहाँ ?
