Thursday, May 6, 2010

प्यार का परिंदा भाग-८५

माँ- ओह मेरी बच्ची मेरी लाडली तुम उस बदनसीब की कितना चाहती हो और वह तुम्हारा ज़रा भी ख़याल नहीं रखता . तुम्हारी ज़रा भी फ़िक्र नहीं है उसे. काश , वह तुम्हारी भावनाओं को समझ सकता. काश वह तुम्हारे दिल में झांककर देख पाटा यही तो होता है यहाँ हम जिसे चाहते हैं वह किसी और को चाहता है और जो हमें चाहता है हम उसे नहीं चाहते .
स्वीटी- ये आप क्या कह रही हैं माँ जी मैं कुछ समझ नहीं पाई.
माँ - रहने दो बेटी . कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें कम समजहना ही सबके लिए बेहतर होता है . मैं जानती हूँ तू भी हम सब लोगों के सतह मुंबई चलना चाहेगी , क्योंकि उसे देखे नबीना तुम्हें तो चैन नहीं आएगा भले ही वो हरजाई है, भले उसको तुम्हारी याद नहीं आयी है लेकिन तुम तो उसे एक पल भी नहीं भुला पाई रात -रात भर जागी हो उसके लिए , मुझसे कुछ छिपा नहीं है बेटी . मैं सब कुछ जानती और समझती हूँ तुम्हारे माँ मेरी पक्की सहेली है . कोई और होती तो इस तरह तुम्हें हमारे घर थोड़े ही भेजती मगर यहाँ तो बिलकुल घर जैसा मामला है . मैं जानती थी, तुम्हारी निगाहों में अजय के लिए प्रेम के भाव देखे थे तभी तो मैंने तुम्हें यहाँ बुला लिया मगर अफ़सोस ... खैर, अब तुम भी हमारे साथ मुंबई चलने की तैयारी कार्लो . देखते हैं क्या होता है . भगवान को जो मंजूर होगा वो तो हर हाल में होकर ही रहेगा.
और इओस तरह स्वीटी भी उनके मुंबई जाने वाले दल में शामिल हो गयी. मुंबई में जो स्वीटी की सहेली थी, वाहन उन्हें अजय के उस होटल का पता चला जिसमे वह चन्दा के साथ ठहरा था . सभी लोग बेहद गोपनीय तरीके से होटल पहुंचे , वे होटल के स्टाफ को भी किसी तरह की जानकारी नहीं देना चाहते थे. सब कुछ साइलेंस रखने के पक्ष में थे ताकि उनकी इज्जत न उछले और अगर अजय केपिता विधायक का चुनाव लादेन तो विपक्ष के लोग उन्हें इस मुद्दे पर घेर न सकें. हर कदम फूक -फूंक कर रखा जा रहा था. आखिरकार विजय प्रताप सिंह का परिवार उस होटल पर पहुच ही गया जहां पर अजय अपनी महबूबा चन्दा के साथ ठहरा था. यह सब इतनी जल्दबाजी में हुआ था की अजय को भनक भी नहीं लगी . उसने अपना सामान इकट्ठा कर लिया था और थोड़ी देर में वे लोग वहाँ से जाने की तैयारी कर ही रहे थे . कार्मे पर दस्तक अजय की माँ ने दी. दरवाजा अजय ने खोला. माँ को देखते ही उसे गहरा शोक्ड लगा. उसे ऐसी आशा नहीं थी फिर अगले ही पल वह माँ के पैरों में झुकता चला गया. माँ ने उसे गले से लगा लिया , जब अजय ने ध्यान से देखा तो उसे सामने पिता , स्वीटी, स्वीटी के पिता आदि दिखाई दिए . अजय को थोड़ी सी आशंका हुई मगर दिल को मजबूत कर लिया , उसने एक हल्की सी मुस्कान स्वीटी की तरफ उछाली और अपने पिता के पैर छू लिए , इसके बाद स्वीटी के पिता खड़े दिखे , अजय ने पैर छूकर आशीर्वाद लिया . उसने स्वीटी को भी गले से लगा लिया. सब लोग होटल के कमरे में जमा हो गए . वक्त की नजाकत को देखते हुए चन्दा ने इंटरकाम से फोन कर कुर्सियां और चाय नाश्ते का आदेश दे दिया था. सब लोगों ने जब अजय के साथ चन्दा को देखा तो उनके होश उड़ गए. चन्दा ने सर झुकाकर सर पर पल्लू ले लिया और सबका अभिवादन करने लगी .किसीकी समझ में नहीं आया की उससे क्या कहा जाए , खामोशी छाई हुई थी . कोई कुछ बोल ही नहीं पा रहा था . मानो सबकी जुबान पर ताला लगा हो . आखिर स्वीटी के पिता ने खामोशी तोडी -
-कैसे हो बेटे ? हम सब लोग तुम्हारे लिए कितने परेशान थे., कहाँ -कहाँ नहीं तलाश किया तुम्हें अगर मुंबई ही आना था तो बताकर आते सब इंतजाम कर दिए जाते .
अजय- जी, माफी चाहता हूँ अंकल जी, आपको कष्ट पहुचाने का मेरा कोई इरादा नहीं था. वैसे मैंने स्वीटी से कह दिया था, इनको सब पता था तभी तो शायद आप लोग यहाँ तक पहुच पाए हो ....
माँ- हम तुम्हें लेने आये हैं बेटा चलो सब लोग तुम्हारा इन्तजार कर रहे हैं.
अजय- कहाँ ? कहाँ चलना है माँ ?
माँ- अपने घर बेटे . अपने घर . तुम्हारे अपने घर. और कहाँ ?












Wednesday, May 5, 2010

परिंदा , भाग -८४

उसने मुझे तुम्हारी अनुपस्थिति में बहुत साथ दिया. अगर वह साथ नहीं देती तो बहुत गडबड मामला हो जाता , मुझे उसी से संबल मिला. उसीने मेरा हौसला बढ़ाया और तुम तक पहुचने का रास्ता बताया .
चन्दा- हम दोनों तहेदिल से उसका शुक्रिया अदा करते हैं , क्या वह जानती है की आप मुझे चाहते हैं, मेरे सतह जीवन बिताना चाहते हैं ?
अजय- हां, अच्छी तरह से , मैं बता चूका हूँ उसे. तभी तो उसने मेरी मदद की है , या यूं कहिये की उसे दया आ गयी मेरे ऊपर. वह बहुत सुलझी हई और बड़े दिल की लड़की है. वह मुझे ज़रा बी ही दुखी नहीं देख सकती.
वे दोनों बात;लाते रहे, जुदाई के समय की बातें करते रहे , और एक दुसरे से अपना हाल कहते रहे , और उधर गाँव में जब पूरी तरह से पता चल गया की अजय घर , गाँव या किसी रिश्तेदारी में वह मौजूद नहीं था, जब हर जगह की तलाशी ले ली गयी तो भी अजय के घरवालों को कोई कामयाबी नहीं मिली. अखबारों में विज्ञापन देने से भी कोई लाभ नहीं हुआ, दूरदर्शन पर भी गुमशुदगी की खबर दी गयी, आखिरकार उसे आस -पास के शहरों में ढूँढा गया ,स्वीटी के घरवालों ने उससे भी कड़ी पूछताछ की , अजय के घर छोसने के पहले वही उसके साथ मौजूद थी, इसलिए उससे बातचीत की गयी , बातचीत के आधार पर पता चला की स्वीटी ने ही उसे मुंबई जाने के लिए कहा था , इतना ही नहीं अपनी एक सहेली का रेफरेंस भी दिया था. बस इतनी सूचना ही काफी थी.
अजय के माता -पिता ने मुंबई जाने की तैयारी कर ली, स्वीटी और उसके पिता भी साथ हो लिए . साथ में और भी बहुत से लोग थे. सबने मुंबई का रास्ता पकड़ लिया. स्वीटी का दिल जोर -जोर से धड़क रहा था , उसने जिस अजय के सपने देखे थे , आज वही अजय उससे बहुत दूर चला गया था, उसे अजय के साथ बिताए पलों की यादें सताने लगीं , यही वो अजय था जब बचपन में उसके साथ गुडिया गुड्डों का खेल खेलता था, चोर सिपाही खेलता था और अगर कोई लड़का उसके साथ जोड़ी बनाकर खेलना चाहता तो वह साफ़ इनकार कर दिया करता था, झगडा कर लिया करता था, मारपीट पर उतारू हो जाता था, वह किसी दुसरे से उसे टच भी नहीं होने देता था. आज वही अजय कितना बदल गया है. सब लोग बचपन से ही उसकी और अजय की जोड़ी की तारीफ़ करते नहीं थकते था. वही अजय चन्दा के प्यार में दीवाना हो गया था, पता न्महीं उसने चन्दा में ऐसा क्या देखा था जो उसमे नहीं है, हो सकता है कुछ खास हो, होगा तभी तो वह उसके बिना एक पल भी नहीं जी सकता , काश, वह भी अपने दिल की भावनाएं बता सकती, अपने दिल चीरकर किसीको दिखा सटी, काश, कोई सुए भी भी उसके दिल का हाल कहने का अवसर देता , काश , अजय एकबार उसके दिल की धड़कने सूनी की कोशिश करता. वह कुछ भी देक्ल्ह सकती है मगर अजय को परेशान नहीं देख सकती.अजय की माँ ने भी तो उससे यही सवाल किया था-
- बेटी , क्या तुम मेरे अजय को पसंद नहीं करती ?
स्वीटी- ये आपने क्या पूछ लिया ? ये कैसा सवाल है माँ जी , मैं उसे पसंद नहीं करती ? मैं अजय पर अपनी जान न्यौछावर करती हूँ, वह मेरी धडकन में समाया है, रग-रग में समाया है माँ जी, ऐसा न कहिये प्लीज .
माँ- फिर तुमने उसे मुंबई क्यों जाने दिया ? चन्दा से उसे मिलाने में उसकी मदद क्यों कर रही हो ? सच कहो बेटी .
स्वीटी- क्योकी , मैं अजय से बहुत प्रेम करती हूँ माँ जी, उसका दुःख नहीं देख सकती, वह चन्दा से मिलने के लिए तड़प रहा था, जल बिन मछली की तरह छटपटा रहा था, अगर मैं उसकी हेल्प नहीं करती तो वह टूट जाता , जो मुझसे कैसे बर्दाश्त होता , मैं अजय को परेशान हाल नहीं देख सकती माँ जी, मैंने सोचा की अगर उसे चन्दा से मिलने में ही खुशी होती है तो उसे खुश कर देती हूँ, यही सोचकर मैंने उसकी मदद के, उसे बताया की चन्दा मुंबई गयी है, यह बात मुझे नौटंकी के मैनेजर रंजन नेबतायी थी, तब मैंने अपनी एक सहेली से बात की और अजय को उसका पता देकर मुंबई जाने को कहा, वहाँ वह कुशल है. कोई दिक्कत नहीं है .












विचार मंच


कसाव को फंसी होने दीजिए
बचाने के लिए कांग्रेस है न
-मुकेश कुमार मासूम
देश में आतंकवाद के जड़ें दिनों दिन मजबूत होते जा रही हैं। सरकार करने के लिए बस इतना ही करती है कि जहां कहीं बम कांड की घटना होती है वहाँ पर जांच पड़ताल का कार्य तेज कर दिया जाता है, कुछ नियम बदल दिए जाते हैं। बहुत हुआ तो एकाध अधिकारी का तबादला कर दिया जाता है, बम विस्फोट में मरे लोगों के आश्रितों को कुछ मुआवजा दी दिया जाता है, कुछ मंत्री दौरा करते हैं, पुलिस अधिकारी प्रेस कांफ्रेंस करते हैं। जांच कमेटी गठित होती है , और और सब लोग अगले बम कांड होने का इन्तजार करने लगते हैं। १३ फरवरी को पुणे में बम विस्फोट हुआ , उसमे ५ विदेशी सहित १७ लोग से ज्यादा मारे गए । कई घायल हुए। गृह मंत्री आर आर पाटिल ने खुद सदन को बताया कि आरोपियों की शिनाख्त कर ली गयी है। मगर क्या हुआ । आज इतने महीनों के बाद भी कुछ नहीं हुआ । सरकार कहती रही कि इस बम कांड में इंडियन मुजाहिदीन का हाथ है लेकिन सिर्फ कहने भर से क्या हुआ ? पुलिस सिर्फ यही कहती रही कि 'जांच सही दिशा में चल रही है ' । २६ नवंबर २००८ को क्या हुआ ? महज दस लोगों की फ़ौज ने मुंबई पर हमला कर दिया। यानी कि देश पर हमला कर दिया। सारा ख़ुफ़िया तंत्र , सारी पुलिस, नेवी अधिकारी सब देखते रह गए और दस लोग मुंबई को तहस -नहस कर गए। उनमे से ९ आतंकवादी मारे गए और अब दसवा जीवित बचा है - कसाव। आमिर अजमल कसाव की सुरक्षा पर ट्रायल के दौरान महाराष्ट्र सरकार ने ३१ करोड रुपये खर्च किये । भारत जैसे गरीब देश के लिए खर्च की रकम का यह आंकडा मामूली नहीं हो सकता। आज उसी कसाव को विशेष अदालत सजा सुनाएगी , बहुत संभव है उसे फांसी की सजा ही दी जाए , और यह सब पुलिस अधिकारियों के अथक परिश्रम , सबूत , गवाह आदि के बल पर और सरकारी वकील के तर्कों की बदौलत संभव हो सकेगा। मगर सजा सुनाये जाने के बाद भी क्या किलिंग मशीन कसाव को फांसी पर इतनी आसानी से चढाया जा सकता है ? इसे लेकर देश में संशय का माहौल है । सब जानते हैं कि अभी तक ५० ऐसे खतरनाक अपराधी हैं, जिन्हें वर्षों पहले फांसी की सजा तो सुनाई जा चुकी है मगर अभी तक फांसी का फंदा उसनके गले से बहुत दूर है। क्योंकि उन्होंने राष्ट्रपति के पास दया याचिका कर रखी है। अब तर्क की बात ये है कि जब पहले से ही खूंखार अपराधी सजा भुगतने के लिए वोटिंग लिस्ट में हैं तो इस नए मामले का क्या होगा ? संसद अर्थात देश के सबसे बड़ी पंचायत पर हमला हुआ।उस आरोप में अफजल गुरु नामक अपराधी को गिरफ्तार किया गया। सर्वोच्च अदालत ने उसको फांसी की सजा सुनाई , लेकिन आज भी वह ज़िंदा है। उसने मर्सी पिटीशन जो डाल रखी है, जिसका क्रमांक २८ है । जाहिर सी बात है कि जब तक पहले ५० अपराधियों को फांसी नहीं दी जाती , अथवा उनका कोई फैसला नहीं होता तब तक कसाव भी सरकारी मेहमान नवाजी का लुत्फ़ उठा सकता है और ईद के दिन तो नॉन वेज भी खा सकता है। भारत सरकार पहले भी मौलाना मसूद अजहर , उम्र शेख और मुस्ताक जरगर जैसे खतरनाक अपराधियों को छोड़ चुकी है । अब तो आम आदमी को यह पक्का भरोसा हो गया है कि कोई भी दुश्मन हमारे यहाँ आकर तबाही मचा सकता है, हमारे जवानों पर गोलियाँ बरसाकर उन्हें शहीद कर सकता है मगर सजा उसे कुछ नहीं मिलेगी । अगर सजा का ऐलान हो भी गया तो कांग्रेस है न। बचा लेगी ।आखिर 'धर्मनिरपेक्षता ' का सवाल जो है । और बिना ऐसे सवालों के वोट नहीं मिला करते । सत्ता चाहिए तो वोट भी चाहिए ही। और वोट के लिए दया का दिखावा भी जरूरी है।












Tuesday, May 4, 2010

परिंदा , भाग-८३
अजय-ये देखो न, हम तो आखिर मिल ही गए हैं, अब हारी थकी बातें करने का कोई मतलब नहीं है. मगर तुमने सताया बहुत है.मुझे बताये बिना ही चली
आयीं,मुझसे सूचना देना भी मुनासिब नहीं समझा. आखिर ऐसी क्या दिक्कत थी ?ऐसा कौन सा भूचाल आया जो तुमने ये सब किया ? और क्यों किया ?
क्या तुम्हें मेरी ज़रा भी याद नहीं आयी ? मेरे बारे में कुछ तो सोचा होता , कुछ भी नहीं सोचा .
चन्दा - मैं वक्त के हालात से मजबूर थी, इसीलिए आपके पास होकर भी बड़ी दूर थी. बस इससे आगे मुझसे कुछ न पूछिए , मैं कुछ नहीं बता पाउंगी . प्लीज...
अजय-किसीके हाथों मेरे तक खबर तो भेजनी थी, मुझे बताना तो चाहिए था कि ऐसी -ऐसी परेशानी है, तब हम दोनों मिलकर उसका हल भी निकाल लेते. मगर ये क्या हुआ
कि अपने अजय को अकेला छोड़कर चली आयी, तुमने सोचा होगा मैं तुम्हें ढूंढ नहीं पाऊंगा, मैंने इन सागर जैसी आँखों में अपने लिए प्रेम देख लिया था, अगर तुम
मुझे नकार देती तब मैं तुम्हारा पीछा नहीं करता, मगर किसी दहशत कीवजह से मैं तुम्हें अपने से दूर नहीं कर सकता. किसी भी हालत में नहीं .
चन्दा- ओह, अजय बाबू, जो हुआ सो हुआ , मुझे माफ कर दीजिए . इस वक्त आपने बहुत पी ली है, सो जाइए ... अब हम सुबह मिलेंगे और खूब जी भरके बात करेंगे.
अजय - इतनी मुश्किलों से मिली हो और चाहती हो कि इतनी आसानी से निकल जाओ. आज तो हम खुशी मनाएंगे , जश्न होगा. हम रात भर पियेंगे , नाचेंगे ,गायेंगे , खुशियाँ मनाएंगे
और खूम मस्ती करेंगे. खूब मजा लेंगे . धमाल होगा . आज हम कितने खुश हाँ, ये हम किसे बताएं ? किसके साथ शेयर करें इस खुशी को ? हम जानते हैं , तुम
हमारे माता-पिता के बारे में कछु कहना नहीं चाहती , मग नादाँ तो हम भी नहीं, ब्याह नहीं हुआ तो बरात तो बहुत की हैं. सब कुछ अनुमान लगा लिया है हमने .
सचन्दा- ठीक है, जो उचित समझो. मगर आप आराम कर लीजिए. अगर चाहो तो ये जश्न हम कल मनाएंगे . आपने शायद बहुत पी रखी है ...
अजय- हम होश में हैं, आप टेंशन न लें, ये लेडीज सर्विस वाले बार कहाँ ओरीजनल शराब पिलाते हैं ? ये तो बस उल्लू बनाते हैं. उल्लू ... पानी मिला देते हैं . शॉप पर
असली माल मिलता है. मेरी पास पडी होगी बोतल. मस्त एकदम...
और चन्दा ने उसकी बात मानली. उस रात उन दोनों ने खूब आनंद लिया, खूब खुशियाँ बांटी . अजय की फरमाइश पर चन्दा ने 'हुस्न हाजिर है मोहब्बत की सजा
पाने को, कोई पत्त्थर से न मारे मेरे दीवाने को. कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवानेको' गाना चलाया गया. चन्दा ने इस गीत पर सजीव अभिनय कर अजय को भाव विभोर
कर दिया. भले ही चन्दा कमजोर हो गयी थी, मगर उसके नृत्य और अभिनय का कोई सानी नहीं था. अजय ने जबसे होश संभाला , तब से लेलेकर अब तक उसे कभी
इतनी खुशी हासिल नहीं हुई, जितनी कि आज मिली थी. आनंद के सागर में डूबकर वह चन्दा के साथ ठुमके लगा रहा था, उसे बार -बार अपनी बांहों में भर लिया करता था . चन्दा भी हँसते -हँसते लोट -पोट हो गयी. कई साल के बाद वह खूब खुलकर हंसी थी, काम के दवाब और भाग दौड भरी जिंदगी में जैसे वहहंसना मुस्कराना ही भूल चुकी थी. आज जब अजय ने उसे हंसी की यह सौगात बक्शी तो वह अपने सारे गम भूल गयी . अजय ने उसकी कमर में हाह डालकर कपल डांस करते हुए कहा-
-जानती हो हमें एक दुसरे से मिलाने में सबसे बड़ा योगदान किसका है ? स्वीटी का , अगर स्वीटी मुझे सपोर्ट नहीं करती तो हम दोनों आज शायद मिल भी नहीं पाते , और मैं तो शायद कभी नहीं मिल पाता , क्योंकि तुम्हारे जाने के बाद तो जैसे मैं पागल हो गया था, एकदम निराश . मुझे उस अँधेरे से निकालने में स्वीतिऊ का बहुत बड़ा योगदान है, यहाँ तक कि उसीने यह पता लगाया कि तुम मुबई में मिल सकती हो.
चन्दा- अच्छा , तुम विधायक जी की बेटी की बात कर रहे हो, अपनी बचपन की दोस्त की , बहुत भली लड़की है वो, सच कहूँ तो तुम्हारी और उसकी जोड़ी बहुत जमती है.
अजय- हाँ , अच्छी तो है, बड़ी कृपा है उसकी .













Monday, May 3, 2010

parinda , bhag-82

परिंदा , भाग - ८२
अजय को पहले लगा था कि उसको कुछ भ्रम हुआ है , मगर जब चन्दा की आवाज को उसने गौर से सुना तो यह समझते देर नहीं
लगी कि गाने वाली कोई और नहीं बल्कि चन्दा ही थी , उसकी अपनी चन्दा , इस आवाज को वह कैसे भूल सकता था ? इसी आवाज
की जादू से तो वह जी रहा था. इस जादुई आवाज को भूलना उसके वश में नहीं था. वह बेचैन होने लगा . बेताबी के कारण उसकी आँखों
में लाल -लाल डोरे तैरने लगे थे. वह आवाज की दिशा में जल दी जल्द आगे बढ़ना चाहता था . वह उस आवाज की मालकिन से मिलने के लिए बेताब था
फिर अचानक उसके कदम रुक गए. उसने वेटर को इशारा किया , उससे एक हजार के नोटों की माला मंगवाई और उस गायिका को बुलाने का
इशारा किया जिसकी आवाज चन्दा जैसी थी. कुछ समय बाद एक महिला सादी पहने , हाथ में माइक लिए हाजिर हुई . अजय के हाथ में नोटों की
माला थी , वह उसे अपलक निहारता रहा, ऐसा लगा जैसे वक्त की रफ़्तार रुक गयी हो, सब कुछ थम सा गया. उसके सामने चन्दा खड़ी थी, दुबली, पतली
चन्दा. उसके चेहरे से रौनक गायब थी. ऐसा लगता तह जैसे कि वह बस अजय को देखने के लिए ही जीवित थी. उसके होठ थर -थर काँप रहे थे और
अजय के हाथ. उसने नोटों की माला चन्दा के गले में पह्नादी , और अपनी बाँहें फैलादी, इस बार चुकी नहीं चन्दा. उसकी बांहों में समा गयी, दोनों की आँखों में
आंसू थे. सब लोग इस नज़ारे को ऐसे दकेह रहे थे जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो. क्योंकि बार के लिए तो यह एक आम नजारा था. वहाँ पर लोग आते थे, अपनी
चाहने वालियों से मिलते थे , उन्हें पैसे देते थे, उनके साथ ठुमके भी लगाते थे और जो रंगीन किस्म के लोग होते थे वे अपनी पसंद की हसीनाओं को
मनमाफिक रकम चुकाकर लोज में ले जाया करते थे, ताकि बिना खौफ रातें रंगीन कर सकें. इसलिए किसीने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया . अजय ने चन्दा का हाथ
थाम लिया और उसे बार के बाहर ले आया. अब वह वक्त को बर्बाद करने के मूड में नहीं था. बार के बाहर उसके दोस्त की गाड़ी खड़ी थी . वह दोस्त को छोड़कर
अपने ह्पोतल चला आया. चन्दा भी उसकी हालत देखकर हैरान थी. दूध दही का सेवन करने वाला अजय शराब के नशे में धुत था. वह अंदर तक तडपकर रह गयी
यह समझते देर नहीं लगी कि अजय की ऐसी हालत के लिए कोई और नहीं बल्कि वह खुद जिम्मेदार है . उसने अजय को अपने सीने से लगा लिया और
अपने आँचल से उसके चेहरे को पौंछने लगी. अजय ने कहा-
- कहाँ खो गयी थीं तुम ? मैंने तुम्हें कहाँ नहीं ढूंढा ? कित्नमा परेशान था मैं तुम्हारे बिना ? क्या तुमने मेरा एक बार भी ख्याल नहीं किया ?
चन्दा- हर पल , हर घड़ी मैं बस तुम्हारे बारे में ही सोचती रही, रात को अगर नींद आ जाती तो तुम्हारे सपने घेर लिया करते थे. मैं चाहती थी कि मेरी वजह से
आपके माता -पिता को बहुत तकलीफ हो रही थीं, मैं उनकी बहुत इज्जत करती हूँ इसलिए अपने आपको दुःख देने यहाँ चली आयी , सोचा था कि यहाँ आकार
आपको भूलने की कोशिश करुगी,तब तक शायद आप भी मुझे भूल जायेंगे. मगर न आप मुझे भूल पाए और न ही मैं आपको .
अजय- अगर तुम मुझे नहीं मिलती तो मैं मर जाता चंदाबाई , मुझे दुनिया से तुम्हारे अलावा और कुछ नहीं चाहिए .
चंदाबाई- ऐसा न कहें अजय बाबू, आपको कुछ भी हुआ तो मैं एक पल भी ज़िंदा नहीं रह पाउंगी. अब मैं आपके साथ हूँ . हमारे प्यार को कोई हरा नहीं
सकता, अगर हम इस जन्म में नहीं मिल पाए तो कोई बात नैन अगले जन्म में हमें एक दुसरे से मिलने से कोई नहीं रोक पायेंगे. हम मरकर भी मिलेंगे .

Sunday, May 2, 2010

परिंदा , भाग-८१

काम छूटने के बाद चंदाबाई को आटे दाल के भाव याद आने लगे. जिन लड़कियों के अच्छे खासे जुगाड थे, वे तो अलग -अलग शहरों में चले गयीं, कोई देल्ही जाकर सेटल हो गयी तो कोई अहमदाबाद , कोई उतार प्रदेश तो कोई देश की सीमा को ही फलांग गयी. दुबई चली गयी. लेकिन चन्दा जैसी सीढी सादी लड़कियों का कोई सहारा नहीं था , बेचारी को कहीं काम नहीं मिला. डांस के जलवे दिखाकर तो उसे अच्छी खासी टिप भी मिल जाया करती थी मगर जब लेडीज बार बंद हो गए तो उसे मजबूरन वेटर का काम करना पड़ा. लेकिन इस नए काम में वो बरकत कहाँ ? धीरे -धीरे वह चिंता में घुलने लगी. उम्र तो ज्यादा थी ही, तनाव के कारण वह और भी दुबली पतली हो गयी. रही सही कसार अजय की याद ने पूरी कर दी, उसको अब हर वक्त सिर्फ और सिर्फ अजय की सूरत ही दिखाई देती थी, उसे अजय का स्पर्श , होठों का चुम्बन और उसके साथ बिताए रोमांटिक पल याद आने लगते थे, कई -कई रात वह भूखे ही सोने लगी. इस कारण उसकी कोमल काया कुम्हलाने लगी थी. उसे दुनिया में अजय के सिवाय और कोई अच्छा ही नहीं लगता था, मगर वह क्या करे , यह बात उसकी समझ से परे थी, अजय की माँ से उसने वादा किया था इसलिए वहाँ जाने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी. उसे बस अजय चाहिए था, और वही उससे दूर था , बहुत दूर , लेकिन उसे यह भी नहीं मालूम कि उसका ऐसा सोचना कितना गलत था, क्योंकि अजय तो उसीके शहर में मौजूद था , वह उसीकी तलाश में तो मुंबई भाग आया था , कई बार तो ऐसे भी अवसर आये जब दोनों एक ही ट्रेन में सवार हुए मगर एक दुसरे से अनभिग्य , आमना-सामना ही नहीं हो सका.जब मुकद्दर खराब होता है तो ऐसा ही होता है. इस समय चन्दा को सबसे ज्यादा गीले शिकवे अपने नसीब से ही तो थे . वह सोचती कि काश , कोई ऐसा चमत्कार हो जाए कि उसका जय उसे मिल जाए. वह क्या जानती थी कि उसे चाहने वाला अजय तो पहले से ही उसकी खोज में मुंबई आ चुका था और उसकी खातिर दर्-दर् की ठोकरें खा रहा था.
चन्दा कि जुदाई ने उसे पागल जैसा बना दिया , वह शाम को अपने होटल से निकलता और लेडीज सर्विस वाले बारों में जाकर बैठ जाता था, उसे एक उम्मीद यह भी थी कि हो सकता है चन्दा उसे किसी बार में काम करती या गाती हुई मिल जाए, क्योंकि जब मुंबई में लेडीज डांस वाले बारों पर प्रतिबन्ध लगा तो बार मालिकों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर लड़कियों से गाने गंवाने शुरू कर दिए. जिन लड़कियों की आवाज थोड़ी बहुत अच्छी थी, उन्हें आसानी से काम मिल गया. अजय चंदा के गम में शराब पीने लगा था और उसने भी इस बात को देखा था , कहीं -कहीं तो अदालत के आदेश की तौहीन कर बार मालिक बाकायदा डांस भी करवा रहे थे. एक दिन अजय सूरज बार में बैठा ग़मगीन गीत सुन रहा था. तभी उसकी नजर किसी जानी पहचानी शक्शियत पर पडी. उसने अपनी आँखें मसलकर देखा तो कहीं कुछ नजर नहीं आया. वह जान गया कि पीने के चक्कर में जरूर कोई गडबड हुई है .
वैसे भी आजकल उसे हर जगह , हर समय चन्दा ही चन्दा दिखाई देती थी. उसने एक लार्ग पैग और चढ़ा लिया, अभी वह चखना हाथ में लेना ही चाहता था कि उसके कान में एक मधुर आवाज सुनाई दी . इस आवाज को वह कैसे भूल सकता था , यह आवाज तो उसकी आत्मा की गहराइयों तक समा चुकी थी. हाँ, यह चन्दा ही तो थी. वही चन्दा , जिसके पया में पागल होकर वह गाँव से मुंबई आया था. वही गीत गा रही -हुस्न हाजिर है, मोहब्बत की सजा पाने को, कोई पत्थर से नम मारे मेरे दीवाने को. अजय बेचैन हो गया, उसकी आँखों में चमक आ गयी. एक लार्ग पैग का ओरद्र देने के बाद उसने चारों तरफ निगाहें दौडाई , कुछ फायदा नहीं हुआ क्योंकि उस बार में लाईट बहुत कम जल रही थीं, एक लड़की उसकी टेबल पर ही बैठी थी. मगर वह उस पर कोई तवज्जो नहीं दी रहा था, हाँ, शिष्टाचार वश उसे दो बार दस- दस रुपये की टिप जरूर दी चुका था.








Saturday, May 1, 2010

parinda , b haag-80

उसने यह सोचकर ठंडी आह भरी कि कम से कम उसने यह एक काम तो अच्छा किया, जब अजय उसके होठों से अपने होठ स्पर्श कर रहा था तो स्वीटी को सुख की अनुभूति हो रही थी, जी चाहता था कि वे पल हमेशा ऐसे ही अमर बने रहें, यूं ही वह भवरे की तरह उसका रस चूसता रहे. जब भंवरा फूल के चारों तरफ घूमकर मधुर ध्वनि निकालता है और फूल पर बैठकर उसका रसास्वादन करता है तो पेड़ खुशी से झूमने लगता है . वह खुद भी तो इसी तरह से झूम रही थी, अपने मौन रहने की वजह से उसने ऐसे सुख को खो दिया था, वह चाहती तो रोजाना अजय के साथ प्रणय क्रीडा करके आनंद लूट सकती थी, मगर सही समय पर चुप रही , इसीका फायदा तो जमाने ने उठाया था, जब अजय की मम्मी उसके पास आयी तो वह चन्दा पर ऐसे आरोप लगा रही थी मानो उसने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो. जबकि उसने न तो कुछ कहा था और न ही कुछ किया ही था . अजय ने ही उसको प्रेम का प्रस्ताव दिया था. और उस बेचारी ने तो लोक लिहाज के कारण उसे मना ही किया था , उसे उंच -नीच भी समझाई थी, वह क्या करे अगर अजय उस पर फ़िदा था और जान छोदकने लगा था, उसकी गलती तो तब होती जब वह अजय को पहल करके प्यार के लिए बहलाती, फुसलाती . इसके विपरीत वह तो उसे कैरियर पर ध्यान देने के लिए प्रेरित कर रही थी. फिर भी उसी को दोष दिया गया, उस पर ताने कसे गयी, और वह खामोश होकर सुनती रही.लेकिन कैसे हो पाया ये सब ? वह शांत कैसे रही ? क्या वह भी अजय से प्रेम करने लगी थी ? क्या बिना प्यार के ही वह अजय की माँ द्वारा कही गयी खरी खोटी सुनती गयी ? अगर अजय की माँ के अलावा कोई दूसरी महिला उस पर गंभीर आरोप लगाती तो वह इस तरह सुन सकती थी ? उसके खामोश रहने की पीछे आखिर कौन सी भावना थी ? वह अपने आप से ही सवाल करने लगी , अगर उसे अजय से प्यार नहीं तो वह उसे रात दिन क्यों याद करती है ? ख़्वाबों -ख्यालों में क्यों उसे हर समय अजय याद आता रहता है ? फिर उसके दिल से आवाज आई -' तुम भी अजय से मोहब्बत करने लगी हो, उस पर जान देने लगी हो , अजय जितनी मोहब्बत तुमसे करता है, तुम भी उसे उतनी ही मोहब्बत करती हो " । फिर अगला सवाल उभरा-' अगर ये सच है तो फिर तुम इस सच को स्वीकार क्यों नहीं करतीं, क्यों अजय से दूर भागती फिर रही हो ? क्यों मोहब्बत का सिला मोहब्बत से नहीं देतीं ? तुम्हें भय किस बात का है ?तुम्हारे पास खोने के लिए ऐसा क्या है, जिसकी खातिर अपने जीवन के सबसे अहम् और सुखद पलों को निराशा में बदल रही हो ? ऐसी कौन सी बात है जिसे तुम स्वीकार नहीं कर सकती ? अगर अजय तुमसे मोहब्बत करता है तो यह अच्छी बात है और इसे स्वीकार करने में ज़रा भी हिचक नहीं होनी चाहिए '... चन्दा के दिल से जवाब आ गया, जवाब हाँ में था, हाँ उसे भी अजय से प्यार है और वे लोग बड़े खुशनसीब होते हैं जिनको कोई सच्चा चाहने वाला नसीब होता है । किस्मत से आये इस मौके को गंवाना उसने उचित नहीं समझा । मगर अब क्या किया जा सकता है ? मुंबई में कोर्ट के आदेश पर लेडीज बार बंद हो गए , जो डांस करने वाली लड़कियां थीं वे बेरोजगार होने लगीं। मुंबई शहर में जीवन यापन करना कितना कठिन और मांगा होता है इसका ओमान चन्दा को तब और ज्यादा हुआ जब उसका काम छूट गया .