Saturday, January 16, 2010
मुंशीजी उसे समझाते –समझाते थक गए मगर वह अपना शरीर सौपने के लिए राजी नहीं हुयी तो उन्हें याद आने लगे वे शब्द जो उन्होंने एक पत्रिका में पढ़े थे. शेखी बघारने के लिए उन्होंने खा दिया था कि वे काम शास्त्र के ज्ञाता हैं, असल में वे फुटपाथ पर बिकने वाली पत्रिकाएं छिप-छिपकर पढ़ा करते थे , एक बार उन्होंने पढ़ा था कि
जब “वह” सेक्स से दूर भागने लगती है तो समझो कि इसकी वजह लड़ाई, प्यार का न मिलना, अकेलापन वगैरह हो सकती हैं.
उससे प्यार जताएं, लेकिन जबर्दस्ती न करें.उससे बातें करें और अपने साथ सहज होने का मौका दें
महिला चाहे गृहिणी हो या प्रफेशनल, तमाम परेशानियां उनके लिए एंजॉय करने का स्कोप कम ही छोड़ती हैं. फिर रिसर्च से भी यह बात साबित हो चुकी है कि तनाव में रहने वाली महिलाओं को सेक्स में ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती.इसके अलावा, सेक्स को लेकर नर्वस होना, प्रेग्नेंसी का डर, दर्द वगैरह की वजह से भी वे सेक्स से दूर रहती हैं.
उनके साथ प्यार से पेश आएं और उनके लिए कुछ स्पेशल करें। फोर प्ले पर ध्यान दें. सेंसुअल मसाज या हॉट वॉटर बाथ जादू की तरह काम करेंगे.
उन्होंने छमिया को अपने पास बुलाते हुए कहा-
-मेरे पास तो बैठो ,पहले ही अच्छा था कम से कम मेरे करीब तो थीं. दरअसल प्रेम के खेल को तुम कुछ अलग ही समझ रही हो, ये बिलकुल आसान काम है , डरने जैसी कोई बात ही नहीं है.फिर उसे पत्रिका में लिखी बात याद आ गयी -
उसे लाइट में कपड़े उतारने में दिक्कत होती है और सेक्स के तुरंत बाद कपड़े पहनने की जल्दी. ऐसा तभी हो सकता है, जब वह अपनी बॉडी को लेकर सहज न हों. अचानक वजन का बढ़ना, स्ट्रेच मार्क्स, दाग या पार्टनर के कॉमेंट्स उनमें हीन भावना जगा सकते हैं.
उन्हें किसी हीरोइन या मॉडल की तरह बनने को न कहें. उन्हें बताएं कि साइज जीरो न होने के बावजूद वह आपको खूबसूरत लगती हैं.
सेक्स ड्राइव बढ़ाने में खाने का भी अहम रोल है. 25 साल की एक लड़की ने शादी से पहले वजन घटाने के लिए खूब डाइटिंग की. शादी तक वह स्लिम तो हो गई, लेकिन शादी के बाद सेक्स में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी.कुछ फूड आइटम्स स्टैमिना बढ़ाकर, बॉडी टोन करके और त्वचा को ग्लो देकर सेक्स ड्राइव बढ़ाते हैं.
ध्यान रखें कि आपकी पार्टनर चॉकलेट, ओटमील, वॉलनट जैसी चीजें खूब खाएं. दरअसल, ये मूड लिफ्टर्स होती हैं साथ ही, आलू के चिप्स की जगह उन्हें सलाद दें और कोला की जगह पानी।
घबराहट, तनाव, डिप्रेशन को दूर करने के लिए ली जाने वाली दवाइयां भी महिलाओं की सेक्स में दिलचस्पी कम करती हैं. बर्थ कंट्रोल पिल्स महिलाओं की ऑव्यूलेशन साइकल में बदलाव लाती है और इस वजह से भी फिजिकल इंटीमेसी में उनकी इच्छा पर असर डालती है.
हमारी सोसाइटी में सेक्स को लेकर लड़कियों को कभी खुलने नहीं दिया जाता। ऐसे में उनके मन में सेक्स को लेकर तमाम सवाल व दुविधाएं रहती हैं, जिससे कई बार शादी के लंबे अर्से बाद तक वे अपने हसबैंड के साथ सहज नहीं हो पातीं , जबकि छमिया तो कुंवारी कली थी.उसका डरना स्वाभाविक ही था.उसने सुनी और पढ़ी बातों पर अमल करना शुरू कर दिया. उसने कहा-
-तुम बहुत खूबसूरत हो छमिया, तुम्हें देखकर मुझे बड़ी खुशी मिलती है. जब तुम करीब आती हो तो ऐसा लगता है जैसे मैं स्वर्ग में आ गया हूँ. एक बार मेरी बन जाओ ,अगर तुम्हें उजाले में शर्म आती है तो हम लाईट बंद कर देंगे .
छमिया ने मुंशीजी की तरफ ऐसे देखा जैसे वह उसकी बात से सहमत होने की कोशिश कर रही हो. फिर अपनी आवाज में सख्ती लाते हुए उसने कहा-
-मैं ऐसी –वैसी नहीं हूँ मुनशीजी , भले ही जान निकल जाए मगर मैं तुम्हारे हाथ लगने वाली नहीं हूँ. मैं अपने मोहल्ले की दूसरी लड़कियों जैसी नहीं हूँ. भले ही मेरे माँ –बाप गरीब हैं मगर वे इज्जतदार हैं. हम लोग रूखी –सूखी खाकर भी खुश हैं. मैं जानती हूँ तुम हमें उधार क्यों देते हो, मेरी खातिर ही न, वरना बिना स्वार्थ के तो तुन चीटीं को भी दाना डालने वाले नहीं हो .
मुंशीजी- तुम जो कहो कहती रहो, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता , मैं बस इतना जानता हूँ की जीवन में पैसा भी बहुत अहम रोल निभाता है, अगर तुम ये कमा सकती हो तो कमाती क्यों नहीं हो, लक्ष्मी तुम्हें बुला रही, तुम्हारा द्वार खटखटा रही है और तुम हो की उसे ठुकराए ही जाती हो, ऐसा गज़ब क्यों करती हो, आ जाओ मेरी बांहों में, तुम्हारी सब दरिद्रता दूर कर दूँगा. यकीन मानो मैं तुम्हारे लिए कुछ भी करने को तैयार हूँ.
छमिया ने नखरा दिखाते हुए कहा-
-अच्छा मैं भी तो जानू कि मेरे लिए तुमने अपने मन में क्या- क्या अरमान सजाकर रखे हैं ? क्या चाँद सितारे तोड़ने वाले हो मेरी खातिर ?चलो हटो, ये काम तुम्हारे बस का नहीं है, कोई नया लड़का ही ऐसी बात कह और कर सकता हूँ, जितनी देर मैं तुम्हारे पास खादी हूँ, अगर तुम्हारी जगह पर कोई हम उम्र लड़का होता तो हजारों वादे कर डालता और एक तुम हो कि बस बुड्ढों जैसी बात करने पर तुले हुए हो .मुंशीजी- ऐसा मत कहा करो, दिल को बुरा लगता है, मैं अभी जवान हूँ, जवान लड़कों से अच्छा परफोर्म कर सकता हूँ, मैं प्रेम करने का हर तरीका जानता हूँ, तुम्हें भी प्रणय क्रीडा में निपुण कर दूँगा. मेरा भरोसा करो, एक बार मुझे इस अमृत रस को पीने कि इजाजत दे दो.
छमिया- इस अमृत को तो वही पिएगा मुन्शीजी, जो मेरे दिल का राजा होगा, जो मेरे मन को कब्जे में करेगा , जो मेरा दिल चुराएगा . समझे. ये कोई प्रसाद नहीं है कि इसे हर किसीको बाँट डालूँ,
मुन्शीजी- तो क्या मैं नहीं हूँ तुम्हारे दिल में , मैं तुम्हें अच्छा नहीं लगता ? अगर ये बात सच होती तो अब तक तुम यहाँ नहीं खादी होतीं , चली गयीं होती अपने घर और वहाँ से अब तक कोई न कोई शिकायत करने आ गया होता , तुम भी समझी ?
छमिया- सही बात है , मैं भी सिर्फ इसलिए रुकी हूँ क्योंकि तुमने आत्महत्या करने कि धमकी दी है , मैं नहीं चाहती कि कोई बुजुर्ग मेरी वजह से मारा जाए,
मुंशीजी- ओहो , मैं कितनी बार समझा चुका हूँ कि मुझे ऐसा मत बोलो, मुंशीजी ही ठीक है, तुम तो मुंशी भी कह सकती हो, खुशी होगी मुझे .मैं तुम्हें जितना सुख दे पाऊंगा उतना दूरसा कोई नहीं दे सकता, जानती हो मैंने पूरा काम शाश्त्र पढ़ा है . पत्नी को बिस्तर पर कैसे खुश रखा जाता है इसका ज्ञान मुझसे ज्यादा किसीको नहीं हो सकता. तुम चाहो तो मैं तुमसे शादी करने के लिए तैयार हूँ. दूकान में से आधा हिसा तुम्हें दूँगा, तुम्हारे लिए अलग से प्लाट खरीदकर बढ़िया दोमंजिला मकान भी बनवा दूँगा. कोई टेंशन नहीं है. तारे –वारे तोड़ने वाली बात सब खोटी होती हैं, तुम जानती हो उनका हकीकत से कोई वास्ता नहीं होता.मगर मैं व्यवहारिक हूँ, कोई झूठा वादा नहीं करता . जो सच है वो सच है. झूठी बात करना मुझे पसंद नहीं , बस सबके सामने इस शादी को गुप्त रखना होगा.
छमिया- इसका मतलब तुम मुझे रखैल बनाकर रखना चाहते हो. सीधे –सीधे क्यों नहीं कह देते, मुझे भी घुमा फिराकर कहने कि आदत नहीं है. साफ़ कहती हूँ, मुंह पर कहती हूँ चाहे अच्छा लगे या बुरा. जूती मारती हूँ ऐसे प्लाट और दूकान पर . समझे ?
Friday, January 15, 2010
मुंशीजी के दिल पर पहाड़ सा टूट पड़ा , जिस कमसिन फूलझडी को वह अपने दिल में बसाना चाहता था , वही उसकी नजरों से ओझल हो रही थी, उसका दिल बैठने लगा. हिम्मत जुटाकर आवाज दी-
-छमिया , सुनलो छबीली . अगर आज गयीं तो मुझे ज़िंदा नहीं पाओगी. पीछे लौटो . आओं एक बार वरना मैं जान दे दूंगा . अब तो बस जान ही जायेगी ....
और फिर अगले ही पल चमात्कार हो गया, छमिया गेट बंद करके अंदर घुसी चली आ रही थी. मुंशीजी की आँखें हैरत से फटने लगीं, तो क्या छमिया सचमुच उससे प्यार करने लगी है , अगर ऐसा नहीं होता तो वह वापस क्यों आती ? और खुद ही गेट बंद करके क्यों आती ? क्या इसका मतलब वह भी जवानी का आनंद चखना चाहती है , वह इन्हीं ख्यालों में उलझा था की छमिया की खनखानाती आवाज आई –
-मरना है तो गंगाजी में जाओ न, मेरे मत्थे ह्त्या क्यों जड़ते हो ? बड़े आये जान देने वाले .
मुंशीजी- जब तक मैं तुम्हारे जोवन का रस नहीं चख लेता तब तक किसी भी हालत में मरने वाला नहीं हूँ, तुम समझती नहीं, किस हद से गुजर चुका हूँ जानती भी हो की नहीं ? अरे मेरे तन-बदन में आग लगी है और तुम मुस्करा रही हो, इसी मुस्कान, बस इसी मुस्कान पर तो मेरी जान अटकी हुई है.
छमिया- आप भी उल्लू बनाने में माहिर हैं मुंशीजी, क्या तुम्हारे छोटे भाई की पत्नी से तन की आग शांत नहीं होती जो मेरे पीछे पड़े हुए हो. मैं भी सब कुछ जानती हूँ तुम्हारे बारे में , तुम्हारा भाई दूकान में सोता है और तुम उनकी पत्नी के साथ गुलछर्रे उड़ाते हो ..
मुन्शीजी- तो क्या मुफ्त में मजे उडाता हूँ, ये सारी दौलत किसके लिए है ?मगर अब उसमे दम नहीं रहा , कहाँ वह बूढ़ी खाल और कहाँ तुम करारा माल . तुम्हारे साथ प्यार करने में अलग ही मजा आएगा.
छमिया- जब वह कड़क थी तो मजा आता होगा ?
मुंशीजी- हाँ, तब की बात अलग थी, तब तो वह ऐसी लगती थी जैसे की इलाहाबादी अमरुद, वो गदराया बदन, वो कसी हुई जवानी , मगर तुमसे ज्यादा अच्छा नहीं. जिस तरह तुम्हारा आकर्षक सीना है वह मैंने बहुत कम देखा है, मैं इन गोलाइयों का बड़ा शौकीन हूँ, इन्हें छूने और मसलकर प्यार करने की बड़ी इच्छा है. आओ ना करीब आकार बैठो, मैं तुम्हारी सभी तकलीफों को दूर कर दूंगा.
छमिया- मैंने सुना है अपनी जवानी में तुम बड़े रंगीन मिजाज थे, यहाँ तक की जब तुम्हारे भाई की शादी हुई तो उसे तो शराब पिलाकर तुमने अलग सुला दिया था और दुल्हन के साथ तुम्हीं ने सुहागरात मनाई थी ? सच है ये ?
मुन्शीजी- हाँ, छमिया. मैं तुमसे कोई बात नहीं छिपाऊंगा. यह भी सच है की तुम्हारे मोहल्ले में दो चार को छोड़कर सभी महिलाओं के साथ मैं मौज मस्ती कर चुका हूँ, मगर जबसे तुम पर नजर पडी है, यहीं पर आकार ठहर गयी है, तुम्हारे सिवाय कोई निगाह में चढता ही नहीं है.
छमिया- मेरा सपना छोड़ दो मुंशीजी, मैं तुम्हारे हाथ आने वाली नहीं हूँ, मैं जानती थी की तुम ऐसे ही कमीने हो इसीलिए मैंने कभी खुद कोई चीज तुमसे उधार नहीं ली, वरना उधार के बदले इज्जत की मांग कर बैठते. है न ?
मुंशीजी- तुम कुछ भी बोलो छमिया, मैं बुरा नहीं मानता. मुझे हर बात अच्छी लगती है. तुम भले ही जूतों से मार लो लेकिन एक बार, ऐ छमिया. बस एक बार इस यौवन का आनंद उठाने दो. मुझे मस्ती के रंग में रंग जाने दो.
Tuesday, January 12, 2010
छमिया के सवाल
रसिया के जवाब
भाग-०१
प्रेम ,रोमांस, रहस्य , सस्पेंस , शिक्षा , और मनोरंजन से भरपूर मर्मस्पर्शी धारावाहिक कहानी . एक अंक पढ़ने के बाद आप जिसका हर अंक पढ़ना चाहेंगे
उसका मादक यौवन बड़ा रसीला था. सीने के उभार तो ऐसे थे जिन्हें कोई एक बार देखले तो दीवाना हो जाए, होठों से जैसे शराब के जाम छलकते थे, आँखें ऐसी जिनमें सागर भी डूबने को मचल उठे, ज़ुल्फ़ ऐसी कि घटाएं भी शर्मा जाएँ और जवानी ऐसी कि स्वर्ग की अप्सरा भी पनाह मांगे, जुबान ऐसी कि शहद की मिठास भी फीकी पड़ जाए. उस अलबेली हसीना का नाम था छबीली . लेकिन मौहल्ले के ज्यादातर लोग उसको छमिया कहकर ही पुकारते थे. उम्र कि कमसिन ही थी मगर हर समय उसके इर्द गिर्द भँवरे मंडराते ही रहते थे. नौजवान तो नौजवान , बूढ़े भी उसकी एक झलक पाने को बेताब रहते थे. वह अजूबा थी. रईस लोगों ने छमिया के करीब आने के लिए उसके किसान पिता को मुंह माँगा कर्ज दे रखा था, वह भी कम ब्याज पर . मुंशी रामलाल तो अपने सगे भाई पर भी ब्याज कि रकम नहीं छोड़ते थे मगर छमिया के पिता से कभी ब्याज कि बात तक नहीं की. न मांगने पर भी वे हजार दो हजार रुपयों का कर्ज दे दिया करते थे. उनकी बड़ी दूकान थी , वहाँ पर हर चीज मिलती थी, मगर छमिया के लिए किसी चीज का कोई मोल नहीं था. छमिया जब भी दूकान पर जाती तो मुंशी रामलाल उसे बडी हसरत से निहारते , बड़े चाव से बुलाते. खाने –पीने की किसी भी चीज पर मानो छमिया का जन्मसिद्ध अधिकार था. वह कुछ भी लेकर जा सकती थी, उन चीजों के पास न तो उससे नकद लिए जाते थे और न ही उसके पिता के एकाउंट में ही लिखे जाते थे. वह हमेशा मुस्कराते हुए दूकान में प्रवेश करती थी और मुंशीजी के सीने पर बिजलियाँ गिराकर चली जाती थी. राम्लाम नाम के ही मुंशी थे, वरना वे इस दूकान के मालिक थे. उनकी कोई संतान नहीं थी. उनकी शादी भी कम उम्र में ही हो गयी थी और फिर जल्द ही उनकी पत्नी का देहांत भी हो गया, इसके बाद उन्होंने फिर कभी विवाह नहीं किया. अपनी ही दूकान में उन्होंने अपने छोटे भाई को भी रख लिया था, देखा जाए तो सब संपत्ति उसके भाई के लिए ही थी. मगर उम्र के ५० बसंत देख चके मुंशी रामलाल के दिल में अब कुछ-कुछ होने लगा था. छमिया ने उनके मस्तिष्क में भूचाल सा मचा दिया, चाहकर भी वे अपने दिल से उस चंचल सूरत को निकाल नहीं पा रहे थे. उस दिन जब छमिया अपनी किसी गिरी हेई चीज को उठाने के लिए नीचे झुकी थी तो उसके यौवन उभार देखकर मुंशीजी का कलेजा मुंह को आ गया, मन में चिंगारी सी उठने लगीं, जी में आया कि आगे बढ़कर छमिया को अपने गले से लगा ले , उसकी अदाओं ने मुंशीजी को दीवा बना डाला था , सोचने लगते कि इस दौलत का आखिर क्या होगा. उन्होंने अथाह संपत्ति कमाकर रखी थी. इतनी दौलत में से अगर कुछ हजार या लाख खर्च भी हो जाएँ तो क्या फर्क पड़ता है. मगर छमिया जैसी हूर परी अगर उनके जीवन में आ जाती है तो जी ते जी स्वर्ग पाने जैसा सुख मिल सकता है. यह मानव तन पाने का सौभाग्य सफल हो सकता है, वरना ऐसे ही आये और ऐसे ही चल पड़े जैसी स्थिति हो जायेगी, फिर उनको ख्याल आता है अपनी उम्र का . वे ५० के और छमिया मुश्किल से १६ साल कि. कितना अंतर है उम्र में. फिर वे गीत गुनगुनाने लगते. ना उम्र कि सीमा हो , ना जन्म का हो बंधन , जब प्यार करें दो दिल तो देखे केवल मन. यही रीत बनाकर तुम मेरी रीत अमर कर दो. होठों से छू लो तुम , मेरे गीत अमर कर दो. और फिर अगले ही पल उनको लवगुरु कि याद आयी, लव गुरु उर्फ बटुकनाथ चौधरी ने जैसे अपनी छात्रा के साथ विवाह रचाकर मिसाल पेश कि, वैसे वे भी तो कर सकते थे. आखी अब भी वे पूरी तरह फिट हैं और छमिया को बेड पर पूरा सुख दे सकते हैं.फिर उन्होंने आईने में अपना अक्ष देखा , लवगुरु से तो ठीक ही दीखते थे. जब उस रोज छमिया ने कोई सामान नहीं लिया तो मुंशीजी ने पूछा-
-क्या बात है छम्मो , आज कुछ नहीं खाओगी.
छमिया- नहीं . आज कुछ भी खाने का मूड नहीं है.
Monday, January 11, 2010
मोहब्बत , भाग –अंतिम
और वह मन ही मन राज को चाहने लगी थी, अपना समझने लगी थी लेकिन राज ऐसा निर्मोही था कि उस पर ध्यान ही नहीं देता था, वह समाजसेवा में ही मस्त था, पढ़ने के बाद जो समय मिलता , उसमे वह समाज कि भलाई के कार्य किया करता था, उसके पास प्यार –मोहब्बत जैसी फालतू चीजों के लिए वक्त ही कहाँ था, जब कभी स्वीटी का मुकाबला राज से होता तो वह इस तरह नादाँ बनकर निकल जाया करता था जैसे कि वह उसे जानता ही न हो. पड़ोसी होने के कारण जान पहचान तो थी लेकिन राज बेरुखी भरा व्यवहार ही करता था. इससे स्वीटी के मन कि बेचनी बढ़ जाया करती थी, उसके मन का क्षोभ बढ़ता जा रहा था, उसे गम इस बात का था कि राज उसके सौंदर्य का अपमान कर रहा था, उसके जैसी बला कि सुन्दर लड़की कि तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखना हुस्न का अपमान नहीं तो और क्या था ? वह दुखी होकर राज को सबक सिखाने के बारे में सोचने लगती, उसका घमंडी मन आहात हो चुका था. वह पहले से ही जिद्दी थी मगर राज के रूखेपन ने उस आग को और भी हवा दे दी थी, तभी तो उसने अपनी सहेलियों से मिलकर राज को मजा चखाने कि योजना बनाई थी. यह उसके षड़यंत्र का ही हिस्सा था कि पहले राज को अपने यौवन के जाल में उलझाया जाए और फिर उसका दिल तोड़कर उसे हमेशा के लिए तदपने के लिए छोड़ दिया जाए. इसी पर अमल करके पहले उसने राज के साथ अंतरंग रिश्ते बनाए और फिर तुरंत रंग बदलकर उस पर जबर्दस्ती करने का आरोप लगाने लगी. राज सचमुच डिस्टर्ब हो गया , लेकिन फिर भी उसने स्वीटी पर एक भी आरोप नहीं लगाया, वह खुद झुकता रहा
-मैं बहुत नादाँ हूँ , बिना सोचे –समझे ही तुम्हें अपने दिल में बसा बैठा, तुमको अपनी बना बैठा, अपने दिल में मोहब्बत का मंदिर बनाकर उसमे तुम्हारी तस्बीर लगा बैठा. मैं क्या जानता था कि मैं तुम्हारे काबिल नहीं हूँ, तुम्हारे दिल को मेरे कारण जो ठेस पंहुची है, मुझे इसका बहुत अफ़सोस है. मैं कोशीश करूँगा कि इस तकलीफ को थोड़ी सी कम कर सकूं. यह संभव भी है कि नहीं, पता नहीं.
स्वीटी- चुप रहिये राज... अब मैं कुछ नहीं सुनना चाहती.
राज- पता नहीं तुम मुझे कभी माफ कर पाओगी भी नहीं ? सारी गलती मेरी ही है, जब तुम मना कर रही थीं तो मुझे छोड़ देना चाहिए था. मैंने ही तुम्हारी हर बात मानने का वादा किया और मैं ही भूल गया, मैं तुमसे प्यार का दावा भी करता रहा और तुम्हारे दिल कि भावनाओं को भी नहीं समझ पाया, लानत है ऐसी मोहब्बत पर. सच कहती हो तुम, मैं बलात्कारी ही हूँ, मुझे सजा होनी ही चाहिए. मेरी शिकायत दर्ज होनी चाहिए. दस-बीस साल जेल की हवा खाऊंगा तो अक्ल आएगी.
स्वीटी- नहीं राज. ऐसा मत कहिये. तुम बहुत अच्छे हो , तुम गुनाहगार नहीं बल्कि देवता हो. मोहब्बत के देवता. म्फब्बत के मसीहा हो तुम, तुमने मेरी आँखें खोल दीं, मोहब्बत कि असली परिभाषा बता दी है तुमने, आज मैंने जाना कि जो मोहब्बत करता है वह अपने चाहने वाले पर आरोप लगा ही नहीं सकता, उसके अपने महबूब में कुछ नेगेटिव दिखता ही नहीं, दिखेगा भी कैसे ? वह तो हर समय महबूब की मोहब्बत में खोया रहता है, मुझे माफ कर दीजिए, मैं तुम्हारी मोहब्बत की परिक्षा ले आरही थी, मैंने ही तुम्हें जिस्मानी संबंधों के लिए उकसाया और फिर तुम्हें भड़काने के लिए ऐसे गंभीर आरोप लगाए , मगर तुम तो मोहब्बत के सच्चे मसीहा निकले .... समाप्त ...
कल से पढिये एक और धारावाहिक कहानी.
Sunday, January 10, 2010
मोहब्बत , भाग-७४
मगर चाहकर भी कोई तरकीब निकल नहीं पा रही थी, मन में यही भाव उठते थे की अब वह जरूर किसी बड़ी उलझन में फंस गया है, उसे यह बात भी अच्छी तरह से पता थी की एक क़त्ल की सजा भी फांसी ही होती है और दो क़त्ल की सजा भी वही , इसलिए उसके मन में इच्छा जाग्रत हुई की क्यों न वह दूसरी बार भी स्वीटी के साथ मधुर शारीरिक सम्बन्ध बनाए , हो सकता है इस बार उसे अच्छा लगे और उसकी शिकायत प्रशंसा में बदल जाए, और अगर वह उसकी शिकायत भी दर्ज कराती है तो बाद में भी उतनी ही सजा होगी जितनी की अब होगी. तभी तो उसने दो पैग और तैयार किये , स्वीटी की तरफ गिलास बढाता हुआ बोला-
- आई एम् सोरी यार, मैं कुछ समझ नहीं पाया था, मेरी मति मारी गयी थी, चलो गम गलत करते हैं, थोड़ा सा इंजॉय करते हैं. शायद तुम्हें भी इसकी आवश्यकता है. ले लो.
स्वीटी- नहीं मैं अब नहीं पीना चाहती. मुझसे सहन नहीं हो पायेगा.
राज- उस रात तो तुम पैग पर पैग चढाये जा रही थीं, अब अचानक क्या हो गया, मुझे पिलाना सिखाकर तुम खुद क्यों पीना भूल रही हो. जब दांत थे तो चना नहीं और चने अब हैं तब दांत नहीं हैं. एक पैग ली लीजिए , अच्छा फील होगा.
स्वीटी- मैं कुछ भी समझ नहीं पा रही हूँ, मैं तुमसे क्यों बात कर रही हूँ, क्यों लड़ रही हूँ और लड़ने के बाद भी यहाँ पर रुकी क्यों हूँ, यह सब मेरी समझ से परे है.
राज- इसीलिए तो कहता हूँ, इसे पीलो , थोड़ी देर में ही मजा आने लगेगा .
कुछ समय तक तो स्वीटी राज की तरफ देखती , ठीक ऐसे जैसे की अजनबी की तरफ देख रही हो. फिर उसने हाथ में प्याला थाम लिया. यह राज की उम्मीद से परे था. उसे लगा की स्वीटी थक गयी है, पहली बार उसने शारीरिक सम्बन्ध बनाए हैं इसलिए हो सकता है की वह थक गयी हो और तभी इस तरह के बयान दे रही हो. उसने फैसला किया की वह उसे सिर्फ हंसायेगा, मौज मस्ती कराएगा और फिर उसको घर छोड़ आएगा. स्वीटी ने अगेन चीयर्स बोलने ने बाद पीना शुरू कर दिया. जब उसने पैग खत्म किया तो राज ने सिगरेट सुलगाकर उसके हाथ में दे दी . अब वह धुएं के छल्ले उड़ा रही थी, राज के मन में वही द्रश्य बार- बार उमड़-घुमड़ रहे थे जब उसने स्वीटी के होठों से होठ सटाकर एक दीर्घ चुम्बन लिया था तो वह कैसे कसमसा गयी थी , कितने जोश और जज्बात भरे क्षण थे वे, वह कितना खुश था. स्वीटी का नग्न जिस्म उसके दिलो-दिमाग पर बिजली सी गिरा रहे थे. वह उन क्षणों को बेकार समझ रहा था जो उसने अब तक स्वीटी के साथ नहीं बिताए ये. स्वीटी जब सांस लेती तो उसका सीना ऊपर नीचे होता था, राज की आँखों में वासना की चमक उभर उठती थी, वह आहिस्ता –आहिस्ता उन यौवन के उभारों को दबाने लगता था, उनको चूसने की कोशिश करने लगता था, बड़ा ही रोमांटिक मंजर था . राज के साथ-साथ खुद स्वीटी भी मदमस्त थी. हांलाकि उसे राज ने अपने कब्जे में कर रखा था मगर वह अपने आपको छुडाने का महज नाटक रही थी, वह सिर्फ मोहब्बत के पक्ष में ही नहीं थी बल्कि जिस्म की पूरी गर्मी को शांत करना चाहती थी. राज उस नई दुनिया से परिचित तो नहीं था लेकिन उसे वह जग सबसे न्यारा और प्यारा जरूर लग रहा था. स्वीटी का बदन बेहद खूबसूरत था, फिल्मों की कई बड़ी नायिकाएं भी इतना सुन्दर जिस्म नहीं रखती होंगी जितना की स्वीटी का था, राज का जिस्म मजबूत और मनमोहक था, ऐसा लगता जैसे उसने जिम में अथक परिश्रम करके उसे बनाया हो, यही एक कारण था की स्वीटी का दिल उस पर आ गया.
Saturday, January 9, 2010
मोहब्बत के मसीहा , भाग-७३
राज की तड़प सुनकर स्वीटी मन ही मन बहुत खुश हो रही थी, यही द्रश्य तो वह चाहती थी, उसका मकसद यही तो था. वह राज को खून के आनसो रोते देखना चाहती थी, अपने मकसद में वह काफे हद तक कामयाब भी हो रही थी, मानव स्वभाव ऐसा ही होता है, जब प्यार करते हैं तो बहुत प्यार करते हैं और नफरत की तो हद पार कर देते हैं, बेचारा राज तो ऐसे भंवर में उलझा था की उसे कुछ भी समझ में नहीं आता था, वह यही सोचता की आखिर उससे भूल कहाँ हुई, पहले तो स्वीटी इसलिए नाराज होती थी की वह सेक्स के प्रति उदासीनता बरतता था और वही स्वीटी अब इसलिए नाराज होने का दावा कर रही थी उसने जिस्मानी सम्बन्ध क्यों बनाए , मगर उसकी क्या गलती थी, उससे तो स्वीटी ने ही ऐसा करने के लिए कहा था, फिर के व्यवहार में अचानक बदलाव क्यों आ गया ? आखिर ऐसी क्या परेशानी थी जो बातचीत से हल नहीं हो सकती. क्या स्वीटी का स्वभाव ही ऐसा है , और अगर यही सच है तो क्या ऐसी लड़की के साथ सारा जीवन बिताया जा सकता है . क्या ऐसी लड़की को अपना जीवन साथी बनाया जा सकता है ? अब वह कुछ अलग अत्रीके से सोचने लगा और स्वीटी अपने चेहरे पर उदासी का नकाब ओढकर बैठी रही . राज ने उसे आख़िरी बार समझाने की कोशिश की, उसके करीब गया, और कंधी पर सर रखकर बोला-
- क्या तुम एक बार , सिर्फ एक बार मुझे माफ नहीं कर सकतीं ?
स्वीटी- तुम तो कहते हो की मैंने कोई गलती ही नहीं की है, तो फिर गलती किस बात की ? माफी तो मुझे मांगनी चाहिए.
राज- तुम माफी क्यों मांगोगी ? मैं हूँ ना ... मैं कर लूँगा ये सब. बस एक बार मुझे माफ करदो. सिर्फ एक बार , फिर मैं तुम्हें जीवन भर प्यार कर लूँगा, तुम्हारे क़दमों में हर खुशी डालूँगा , हर सुख दूँगा. कोई भी तकलीफ नहीं होने दूँगा. मेरा दावा है.
स्वीटी- मैं तुम्हारे व्यवहार से दुखी हूँ, मुझे एकांत चाहिए प्लीज.
राज की समझ में नहीं आरहा था की वह क्या करे , दिल जोर-जोर से धड़कने लगा ,. उसको अनहोनी की आशंका सताने लगी, सोचने लगा की अब वह ऐसा क्या करे की जिससे स्वीटी अपने पुराने रंग ढंग में लौट आये
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