Tuesday, August 18, 2009

दिलफेंक पडोसन , भाग-26

उसके फरहा चली गयी, जाने से पहले उसने जी भरके प्यार का इजहार किया... सलीम अपने आपको दुनिया का सबसे किस्मतवाला इंसान समझ रहा था... उसकी रग-रग में फरहा बस चुकी थी...वह उसके प्यार में इतना पागल हो गया की उसने अपना हर पल फरहा के नाम करने की ठान ली... फरहा की बातों ने भी उसका दिल जीत लिया था, उसकी खुशी की खातिर तो वह अपने आपको रखैल भी बनने को तैयार थी, ऐसी त्याग की मूर्ती महबूबा आज के जमाने में भला कहाँ मिलती है ? वह इन्हीं ख्यालों में खोकर सो गया... सुबह उसके जागने से पहले ही फरहा नाश्ता लेकर मौजूद थी... सलीम मुंबई में अकेला ही रहा था, इस कारण उसको हर काम ख़ुद ही करना पड़ता था... फरहा की सेवा से वह निहाल हो गया... उसके जीवन में पत्नी की जो खाली जगह थी उसको फरहा के प्यार ने भर दिया था... अब वह हर समय उसीके ख्यालों में खोया रहता था... उसके सूने जीवन में अचानक बहारें आ गयीं थीं.... जब वह अपने स्कूल के साथी टीचर्स के साथ बात करता तो सब लोग उसकी खुशी का राज पूछते थे...वह क्या कहता बस हंसी में ताल जाया करता था... लेकिन इश्क और कभी छिपाए नहीं छिपते... लोगों को ख़बर मिल ही जाती है... उसकी पूरी सोसाइटी में हंगामा मच चुका था... कुछ मनचले किस्म के लोग अपना हाथ मलते रह गए तो कीया ऐसे भी थे जिन्होंने अभी तक उम्मीद का दामन नहीं छोडा था... इसी सोसाइटी में एक बार में काम करने वाला मेनेजर भी रहता था , वह सोचता था की अगर फरहा बार में डांसर का काम करने लगे तो खूब कमाएगी...वह इसी बहाने उसके उत्तेजक उभारों को मसलने का, उसके साथ हमबिस्तर होने का खवाब देख रहा था... मगर फरहा तो किसी और ही मिट्टी की बनी थी... वह नदी की धारा की तरह प्रवाहित होने में विश्वाश करती थी... उसको ठहरा हुआ पानी अच्छा नहीं लगता था... एक और सज्जन थे , जो सलीम से अपनी तुलना करते थे... उनका मलाल ये था की सलीम से शक्ल -अक्ल , ओहदा और यहाँ तक की पैसे में भी अव्वल होने के बावजूद फरहा ने उनको तवज्जो नहीं दी,, अब सलीम की किस्मत से जलने के अलावा कोई चारा भी नहीं था... अपनी किस्मत कोसते थे और इस जोड़ी को हूर के साथ लंगूर की जोड़ी कहते थे... सलीम और फरहा को दुनिअदारी से कोई मतलब नहीं था... वह इतनी ज्यादा खूबसूरत थी की दूर-दूर के लड़के भी उसकी एक झलक पाने को बेताब रहते थे, कुछ लोग तो उसके घर पर उसके नाना -नानी से मिलने , उनका हाल चाल पूछने सिर्फ़ इसीलिए आने लगे थे क्योंकि वहाँ आने पर उन्हें फरहा के दीदार अच्छी तरह से हो सकते थे... फरहा भी भी इस स्थिति का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करना नहीं भूलती थी... एक फल का व्यापारी जब उसके घर के चक्कर लगाने लगा तो ग्फर्हा ने उसको रोजाना दो किलो सेब लगाने का अदद काम सौंप दिया... यह गिफ्ट लाकर भी वह व्यापारी बड़ा खुश रहता था...एक था सब्जी बेचने वाले का लड़का... उसीकी उम्र का था.... वह जब दूर के किसी रिश्ते का हवाला देकर फरहा के घर आने लगा तो उसको भी रोजाना ताजा -ताजा सब्जी लाने की जिम्मेदारी सौंप दी गयी... उसका एक ही सिद्धांत था- जो जितना पैसा खर्च करेगा वह उसके उतने ही समीप आएगी... यही वजह थी की सलीम के अलावा सबको निराशा ही मिली थी, हांलाकि बाहर के इलाकों में यह हाल नहीं था... जब भी उसका जी चाहता वह तभी रंगरेलियां मनाने के लिए अपने दोस्तों के साथ दूर निकल जाती थी... सलीम को यह पसंद नहीं था की वह और लोगों से मिले जुले लेकिन फरहा तो खुले आसमान में उड़ने वाले पक्षी की तरह थी, उसने पहले भी अपनी ये आदतें सलीम को बतादें थीं... मगर दिल तो आख़िर दिल होता है, सलीम उसको जीजान से चाहने लगा था... वह चाहता था की हर फूल पर मंडराने वाली तितली उसके घर में परदे में रहे , वह सिर्फ़ उसीको चाहे , उसीको सराहे ... ऐसा कहीं होता है क्या? क्या फूल अपनी सुगंध त्याग सकता है ?क्या चंदन अपनी शीतलता छोड़ सकता है क्या ? कभी नहीं... जिसका जो स्वभाव है वह उसे हरगिज नहीं बदल सकता... फ़िर फरहा भला कैसे कुछ बदल सकती थी ... एक दिन सलीम ने अपने मन की बात फरहा से कहदी-
- मैं तुमसे बहुत मोहब्बत करता हूँ, अब ये नहीं चाहता की कोई दूसरा तुम्हें देख भी पाये... बस अपने दिल में बसाकर रखना चाहता हूँ... मैं चाहता हूँ की हवा भी तुम्हें स्पर्श न कर पाये, जब लोग तुमसे मिलते जुलते हैं तो मुझे अच्छा नहीं लगता ...दिल को बड़ी ठेस सी लगती है...
फरहा- यह प्यार नहीं वहम होता है सरकार... प्यार में तो इंसान किसी भी हद से गुजर सकता है... मेरा स्वभाव ही ऐसा है की मैं घर में कैदी की तरह नहीं रह सकती... कभी नहीं....ये बात तुम्हें मैं पहले भी बता चुकी हूँ...

Monday, August 17, 2009

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Saturday, August 15, 2009

दिलफेंक पडोसन, भाग-24

फरहा की बात सुनकर सलीम सुन्न रह गया ... उसको या तो पता चल ही गया था की फरहा बेहद मॉडर्न विचारों की लड़की है

, लेकिन वह इतनी ज्यादा खुलकर बात करेगी इस बारे में उसे कल्पना भी नहीं थी... सलीम उसके चरित्र के बारे में विचार करने लगा... उसकी हर बात पर विचार करने लगा... उसने कहा था की वह उसके लिए अपनी सहेली को भी उसके बिस्तर पर लिटा सकती है साथ ही ख़ुद भी उसकी सहेली के कहने पर सहेली के पति के साथ सो सकती है... इसका मतलब वह उससे सच्चा प्यार करने लगी है... फरहा ने उसकी शंका को कुरेदते हुए कहा-
- ऐसे क्या सोच रहे हो , जब मैं अपनी सहेली राजो को तुम्हारे साथ सुलाने की बात कर रही थी तब तो तुम बहुत खुश हो रहे थे, होठो पर मुस्कान नाच रही थी... मगर जब सहेली मुझसे कुछ मांगेगी तो मैं इनकार कैसे कर सकती हूँ... यह भी तो सोचिये की मुझे उस पर कितना बड़ा बड़ा भरोसा है की वह मेरे कहने पर तुम्हारे साथ हमबिस्तर हो सकती है ... क्या तुम्हारी बीवी तुम्हारे कहने से किसी पराये मर्द के साथ चाहे वह तुम्हारा दोस्त ही क्यों ना हो, हमबिस्तर हो सकती है क्या ?
सलीम- सवाल ही नहीं उठता , भले ही मेरे बिना कहे वह कुछ भी क्यों ना करती हो मगर मेरे कहने से इतना नहीं कर सकती... इसकी छोडिये, मेरे कहने पर वह मेरा सर तो दबा ही नहीं सकती है...
फरहा- इसकी फ़िक्र मत करो... मैं तो इशारे भर से ही सर तो क्या गला भी दबा दूंगी... हा हा हा ....मजाक कर रही हूँ यार... तुम भी ऐसी बात करते हो पुराने जमाने की सी ... अब ये कहो की जब मेरे पाँव दुखने लगें तो तुम क्या करोगे ? क्या मुझे दर्द से कराहता हुआ छोड़ दोगे...
सलीम- नहीं... पहले मैं ख़ुद पैर दबाऊंगा... फ़िर डॉक्टर के पास ले जाऊँगा... एलोपैथिक दवा देने से पहले मैं चाहूँगा की तुम ऐसे ही सेवा पानी से ठीक हो जाओ... क्योकि ज्यादा दर्दनिवारक दवाएं सीधा किडनी पर असर करती हैं...
फरहा- और ऐसा तुम किसलिए करोगे ? इसीलिए ना क्योंकि मुझसे मोहब्बत करते हो... अगर हम लोगों के बीच प्यार नहीं रहेगा तो समझो कोई किसीके बारे में नहीं सोचेगा... सब लोग प्यार में ही अपना सब कुछ लुटाने के लिए टायर रहते हैं... मैं भी सोच रहा हूँ की तुम्हारे लिए एक फ्लेट बुक करवा डालूँ... अगर इस घर पर वह हक़ जताने लगी तो हम दोनों उस पर रह तो सकते हैं... कोई टेंशन तो नहीं रहेगी... किसी दिन चलना मेरे साथ नई बिल्डिंग बन रही है , भाव भी फिलहाल अच्छा ही है... मेरी जान पहचान के लोग भी हैं...तुम्हारे और मेरे नाम से बुक करा देंगे॥ दोनों का नाम रहेगा तो अच्छा है...
फरहा- मैं चाहती हूँ की फ्लेट तुम अपने नाम से ही खरीदो... लेकिन यह भी तो तुम्हारे नाम से ही होगा...तुमने इस पर लोन भी लिया होगा... लोन लिया होगा तो डिपार्टमेंट से सब्सिडी भी मिलती होगी... अगर दूसरा फ्लेट भी लोन से खरीदोगे तो तकलीफ नहीं होगी... सब्सिडी का लफडा नहीं होगा क्या ?
सलीम- हाँ यार... मैंने तो कभी यह सोचा ही नहीं था... तो ठीक है... अब ऐसा करते हैं की तुम्हारे नाम से ही बुक कर देते हैं...यही ठीक रहेगा...कल का कल ये काम करा देंगे...
फरहा- मेरे इन्कमटेक्स के पेपर नहीं हैं, मुझे कौन देगा लोन ? कुछ भी फैसला करने से पहले यह भी तो सोचो...
सलीम- ये पेपर बनवाने कोई बड़ी बात नहीं है... थोड़ी देर में ही यह सब हो जाएगा... चार दिन में सब हो जाता है मुंबई में... मैं एक सी ऐ को जानता हूँ... तुम इस बात की ज़रा भी फ़िक्र मत करो....
फरहा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा... जो वह सोच रही थी वह तो सलीम पहले से ही सोचकर बैठा था...उसके दिल में आया की झूम झूमकर खूब नाचे... उसे सलीम जैसे आशिक की कबसे तलाश थी... यह सोसायटी उसके लिए कितनी लकी है,, कदम रखते ही उसको मनमाफिक यार मिल गया था... खाने -पीने की रोजाना की टेंशन ख़त्म, कपड़े की दिक्कत नहीं... लाईट, फोन की परेशानी नही... और क्या चाहिए इंसान को जिन्दगी में ? फ्लेट का वादा हो ही गया... सोने के गहने भी बन गए... अब उसे सलीम की अगली पगार का इन्तजार करना चाहिए , ऐसा ना हो की उकता जाए और उससे विमुख हो जाए, अपना हर्ष छिपाने के लिए वह सलीम से लिपटकर मोहब्बत का इजहार करने लगी... धीरे -धीरे दो जिस्म आपस में मिलकर गरमी पैदा करने लगे... उन दोनों ने उत्तेजना के सागर को पार करते हुए मन के हर मनसूबे को पूरा किया... दोनों ही खुश थे... सलीम को जवान जिस्म की चाहत थी और फरहा को दौलत की चमक अच्छी लगती थी... अपने -अपने हिसाब से उन दोनों को ही इच्छित चीजें मिल गयी थीं...

दिलफेंक पडोसन, भाग-23

सलीम- मुझे लगता है , तुम्हारी सहेली भी कोई गज़ब की चीज रही होगी... जब उसकी चर्चा सुनने से ही उससे मिलने का मन कर रहा है तो सामने आएगी तब क्या हाल होगा? कभी बुलाइए , हमें मिलवाइए उस महान हस्ती से...सच कहता हूँ ऐसे लोगों से मिलकर खूब आनंद आता है, कुछ अपनी कहते हैं और बहुत कुछ उसकी सुनते हैं...
फरहा- सुनाने में तो वह खूब माहिर है... जमकर सुनती है... और तो और कुछ झूठ का तड़का भी लगाती है, एक बार अगर उसकी जुबान खुली तो फ़िर रुकने का नाम नहीं लेती... अगर तुम उसके साथ सोना भी चाहो तो उसे कोई आपत्ति नहीं , बस मेरी सहमती होनी चाहिए... अगर मैंने इतना भर कह दिया की चलो जाओ , इस्नके साथ हमबिस्तर हो जाओ... बहुत मरता है तुम पर... वरना बेचारे का दिल टूट जाएगा , तो इतनी सी बात पर भावुक हो जायेगी और तुम्हें खूब सुख देगी...
सलीम- मेरे लिए तो तुम ही काफी हो, मुझे शारीरिक सुख की क्या कमी है ? सिर्फ़ जिस्न्मानी सम्बन्ध ही मेरे लिए ज्यादा मायने नहीं रखते , मेरे ख़याल में इसके लिए आपसी मोहब्बत भी जरूरी है... अगर प्यार नहीं तो शारीरिक सम्बन्ध बोझ बन जाते हैं, अभिशाप बन जाते हैं... वह सम्बन्ध बलात्कार की तरह होता है... प्यार एक जूनून है, बीमारी है सेक्स सकी दवा... इस बात को कई विदेशी हस्तियों ने भी साबित किया है...डॉक्टरों ने मान लिया है कि प्यार एक बीमारी
है और इसका इलाज सेक्स है...यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल की डॉ. लेसेल डॉसन ने एक रिसर्च के आधार पर यह नतीजा निकाला है...उनका कहना है कि प्यार नामक यह बीमारी तब ज़्यादा महसूस होती है जब लोगों को अपना प्यार ज़ाहिर करने का मौका नहीं miltaa ... इसकी वजह से गुस्सा, फ्रस्ट्रेशन और यहां तक कि मानसिक रोग भी हो सकते हैं...डॉ. डॉसन के मुताबिक एक अमीर आदमी को एक नौकर से प्यार हो गया, लेकिन उन्हें यह प्यार ज़ाहिर करने की इजाज़त नहीं थी, तो लव सिकनेस साफ नज़र ...डॉ. डॉसन के नतीजे एक किताब में छपे हैं, जिसका नाम है - लव सिकनेस ऐंड जेंडर इन अर्ली मॉडर्न इंग्लिश ....डॉ. डॉसन ने कहा कि सेक्स के ज़रिए प्यार करने वालों के शरीर से नुकसानदायक तत्व बाहर निकल जाते हैं यही नुकसानदायक तत्व बीमारियों की वजह बनते हैं...
फरहा- तुहें ये सब बातें कहाँ से सीखने को मिलती हैं... ये सब तथ्यपरक बातें होती हैं...
सलीम- अखबार और मैगजीन में ये सब बात लिखी हुई होती हैं... मैं गौर करता रहता हूँ... वैसे भी टीचर हूँ तो जानकारी के हिसाब से भी ध्यान रखना पड़ता है... तो कब मिलवा रही हो राजो से ?
फरहा- जब चाहो तब, वह भी यहीं रहती है, मगर सोच लेना उसका पति पहलवान है...
सलीम- पहलवान ? तो क्या हुआ ? मुझे थोड़े ही उससे कुश्ती लड़नी है ? राजो से मिलेंगे और बस , वह अपने घर... हम अपने घर... क्या उसका पति हर आदमी से लड़ता रहता है...
फरहा- हर आदमी से तो नहीं लेकिन अगर उसे पता चला की राजो और तुम कुछ अलग ही गुल खिला रहे हो तो तुम दोनों की ही खैर नहीं... बहुत ताकतवर है... मैंने उसे कुश्ती करते हुए देखा है...
सलीम- ठीक है, फ़िर मुझे डरा समझो... मैंने नहीं मिलना ... पहले जान उसके बाद जहाँ,... ठीक है ?
फरहा- अरे वाह ... डरपोक कहीं के... इतनी जल्दी हवा खुश्क हो गयी... मैं तो ऐसे ही कह रही थी... चलो मिलवा देती हूँ किसी दिन... लेकिन ऐसा ना हो की उससे मिलकर तुम मुझे ही भूल जाओ...
सलीम- नहीं यार... ऐसा कैसे हो सकता है... तुम तो मेरी जान हो, जिन्दगी हो ... जीने का मकसद हो... तुम हो तो सब कुछ है और तुम नहीं तो कुछ भी नहीं... ऐसी ना जाने कितनी फरहा ई और आएँगी मगर तुम्हारा स्थान कोई नहीं ले सकती... तुम स्पेशल हो यार... आओ॥ पहले मैं तुम्हें थोडा सा प्यार देदूं... बहुत देर से तरस रही हो ...
फरहा- सिर्फ़ मैं ही नहीं तड़प तो तुम भी रहे हो... तुम्हारी आंखों में जो लाल -लाल डोरे तैर रहे हैं... वे सारी कहानी बयान कर रहे हैंं... इनको लोग वासना के धागे बोलते हैं ... ये एक तरह से मर्दों की उत्तेजना को मापने वाले मीटर होते हैं... इनसे फ़ौरन पता चल जाता है की आपके मन में क्या -क्या चल रहा है ?
सलीम- अच्छा जी... लगता है तुम्हारी सहेली राजो ने तुम्हें बहुत कुछ ट्रेनिंग दे दी है...कभी मिलेंगे तो हम भी उसे अपना गुरु बनायेंगे, हम भी कुछ टिप्स सीखना चाहेंगे...
फरहा- कुछ क्यों , सब कुछ सीखिए ना... मना किसने किया है ? मैं चिढ़ने वाली या डरने वाली नहीं हूँ... अगर तुम्हारी इच्छा हो रही है तो कल उसे यहाँ बुला लुंगी... फ़िर भले ही रात भर उसके साथ मौज लेना मुझे कोई एतराज नहीं... और हाँ, वह भी मेरा कहना मान जायेगी...
सलीम- अगर इसके बदले वह तुहें भी अपने पति के साथ सुलाने लगी तो ?
फरहा- तो क्या ? सो जाउंगी मैं भी...क्या फर्ज पड़ता है ? वह मेरी ख़ास दोस्त है... जब वह मेरे लिए इतना कर सकती है तो मैं क्यों नहीं कर सकती?

Friday, August 14, 2009

दिलफेंक पडोसन, , भाग-22

तुम्हारा दिमाग भन्ना जाएगा... सच कहती हूँ... क्या तुम सुनना चाहोगे ?
सलीम- नेकी और पूछ-पूछ ,जल्दी से कहो मैं तो उतावला हो रहा हूँ... बहुत देर से तो मैं ही बक-बक कर रहा था ... अब तुम कुछ कहने की इच्छा जताई है तो फ़टाफ़ट कहो मेरी जान... तुम्हारे शब्द मेरे कानों में रस सा घोलते हैं॥
फरहा- एक बार मैंने एक लड़के को एक बकरी से लिपटते हुए देखा था... यह दो साल पहले की बात है... बकरी जब जोर -जोर से चिल्लाने लगी तो उसने उसका मुह बंद कर लिया... मैं हैरत में थी...
सलीम- कहाँ का किस्सा है ये ? तुम कहाँ थीं उस वक्त ?
फरहा- मैं गाँव गयी थी, गरमी का समय था... मैं अपनी एक सहेली के साथ घर से दूर खेतों की तरफ़ जा रही थी... मेरी सहेली कह रही थी की वहां पेड़ की छाया मिलेगी , हवा भी चल रही होगी इसलिए गरमी से छुटकारा मिल जाएगा...मैं उसके साथ चलदी...मौसम बहुत गर्म था और लू चल रही थीं... जब हम खेतों पर पहुचे वहां एक हेंडपंप पर रुके , मेरी सहेली राजो थी, वह हेंडपंप चलने लगी मैं पीने लगी... बहुत प्यास लगी थी , होठों से हवा ऐसे टकरा रही थी जैसे जंग के दौरान सीने से गोलियाँ आर-पार निकलती हैं...
सलीम- अच्छा... फ़िर क्या हुआ ? क्या वह महाशय वहीं पर मौजूद था ?
फरहा- हाँ यार, मेरी निगाह सामने वाली झौपडी पर गयी... उसमे दरवाजा नहीं था... वहाँ से एक बकरी के चिल्लाने की आवाज आ रही थी... मैंने उत्सुकता वश उस तरफ़ देख लिया... फ़िर तो समझो गज़ब हो गया... एक लड़का बकरी को अपने कब्जे में कर उस पर हावी हो रहा था, वह पसीने से तरबतर था, बकरी खूब शोर मचाने लगी तो उसने उसके मुख पर अपनी हथेली रखदी... मैंने राजो से उस तरफ देखने को कहा... हम दोनों इस द्रश्य को देखकर उत्तेजक हो रही थीं... राजो ने मैंने सीने पर चिकोटी काटली , यह पहला स्पर्श था...
सलीम- आह...तब तो खूब मजा आया होगा... मैं होता तो और भी आनंद आता ... मैं रह गया उस सुख से...
फरहा- हाँ तब तो जिस सुहागरात का आनंद हम यहाँ उठा रहे हैं , वह बहुत पहले ही जंगल में मना ली गयी होती... उस दिन मैंने पहली बार किसी मर्द को एक जानवर के साथ सम्बन्ध बनते हुए देखा था...
सलीम- हाँ यार यह तो बहुत डेंजर बात है, हैरत वाली बात है... मैंने ऐसा कभी सोचा भी नहीं था...
फरहा- हाँ ,,, और उस समय एक स्थिति ऐसी भी आयी की बकरी गिर पडी लेकिन उसने बकरी तो तभी छोड़ा जब वह संतुष्ट हो गया... इसके बाद उसने अपना निचला वस्त्र पहना और लाठी लेकर चला गया... मैं उसका चेहरा ठीक से नहीं देख पायी थी... जब वह निकला तो हम दोनों एक पेड़ के पीछे छिप गए थे , इसलिए उसकी नजर हम पर नहीं पडी... जब वह चला गया तो मैंने रजो से कहा-
-यह बकरी के साथ क्या कर रहा था ? बहुत चिल्ला रही थी बेचारी ...दुःख हो रहा होगा ना ?
राजो- हाँ, दुःख तो होगा ही... कहाँ वह इतना मजबूत लड़का और कहाँ यह बकरी ? तू तो ऐसे पूछ रही है जैसे तू कुछ जानती ही ना हो... यह वाही कर रहा था जो लड़की रात को लड़की के साथ करता है...
फरहा- मैं क्या जानूं री... मैं क्या रोज देखती हूँ ? आज न जाने कैसे यह सीन देखने को मिल गया...
राजो- हम तो अक्सर देखते रहते हैं... कितनी ही ऐसी लड़किया हैं जो अपने यार के साथ जंगल में मंगल मनाने के लिए आती हैं...जो ज्यादा सती सावित्री बनतीं हैं उन्हीं के रंग ज्यादा दीखते हैं...
फरहा- ठीक कहती हो, मगर मुझे तो बहुत डर लगता है, किसी लड़के से बात भी करने की इच्छा नहीं होती... कुछ हो गया तो ? लेने के देने पड़जायेंगे , बदनामी होगी वह अलग...
राजो- बात में दम है... मगर मन का क्या करोगी, इस सीन को देखकर मेरे बदन में आग लगी हुई है... देखो ना यह सीना कितना धक्-धक् कर रहा है... सच कहती हूँ अगर मेरा वश चले तो तुझसे लिपट जाऊं...इससे क्या होगा की एक तो कुछ होने का डर नहीं और किसी तरह की कोई बदनामी भी नहीं...
फरहा- तो सहेली है मेरी... तुझे लिपटने से किसने रोका है, आ ना तेरे मन में जो भी हसरत पल रही हैंउन्हें पूरी तरह से निकाल ले... हो सकता है मेरे तरसते मन को भी इससे कुछ तसल्ली मिल जाए...
राजो- कुछ की बात करती है, इससे तो खुश हो जायेगी, तेरा गाँव में दिल नहीं लग रहा ना, फ़िर तो तू शहर में जाने का नाम भी नहीं लेगी... तुझे इतना मजा आ जायेगा...