Saturday, May 9, 2009

तड़प, भाग-28

मैं जो भी करूँगा वह ठीक ही करूँगा... अब मुझसे ज्यादा तुम्हारे हित की बात और कौन कर सकता है, मैं तुम्हें सुख देने के लोए ही इस जहाँ में आया हूँ... तुम मेरी जान हो shaili... इनकार मत करो , accha नहीं लगेगा मुझे....
शैली- बिना विवाह किए ऐसे सम्बन्ध ग़लत कहलाते हैं, पहले मांग भरो फ़िर कुछ करने दूंगी...
राजेश-हम जब मांग भरते हैं तो सिन्दूर का सहारा नहीं लेते बल्कि खून से मांग सजाते हैं... पढाई पूरी करने के बाद मैं तुमसे धूमधाम से शादी कर लूँगा... एक बहुत बड़े समारोह में ये सब होगा... अगर तुम जिद करती रहीं तो यह काम मैं अकेले में भी कर सकता हूँ लेकिन मेरी नजर में यह अशुभ होगा ... मैं दिल से प्यार करता हूँ और शादी भी करूँगा तो इसी तरह शान से करूँगा...
शैली- तुम्हारी नजर में मेरी खुशी का कोई मतलब नहीं है ? अगर मैं कुछ कह रही हूँ तो उसका कोई महत्व नहीं ? क्या मोहब्बत और भावनाओं का कोई अर्थ नहीं , जिस्म ही सब कुछ होता है क्या ?
राजेश- मैंने ऐसा कब कहा , भूल गईं क्या ? मैं तो इस जिस्म को पहले ही मिटटी का बता चुका हूँ फ़िर इसको तुमसे तुमसे कम या ज्यादा समझने का मतलब ही कहाँ पैदा होता है ?
दीपू- इसका मतलब बहस करने में राजेश भी अव्वल था ?

Wednesday, May 6, 2009

तड़प, भाग-25

यह ठीक नहीं रहता , तुम्हें भी तकलीफ हो सकती है और मुझे भी... अगर सचमुच तुम मुझसे प्रेम करने लगे हो तो फ़िर एक काम करो, आज के लिए मुझे घर जाने दो... ठीक होते ही हम एक बार फ़िर अकेले में मिलेंगे...
राजेश- तुम तो ऐसी बात कर रही हो जैसे की मैंने तुम्हें बांधकर रखा है, अगर तुम सचमुच जाना चाहती हो तो जा सकती हो, मैं रोकने वाला कौन होता हूँ....लेकिन एक बात का ध्यान रखना, तुम मेरा दिल दुखाकर जा रही हो, मेरे अरमान जलाकर जा रही हो, अब मैं रात भर सो नहीं जाऊँगा... पेट भरके खा नहीं पाऊंगा, चैन से जी नहीं पाऊंगा...
शैली- इतने भावुक और कमजोर मत बनो... दिल को मजबूत बनाओ ...
राजेश- गला काटकर फ़िर मरहम लगाने की बात करती हो, तुम हसीनों की इस आदत से मैं अच्छी तरह वाकिफ हूँ...मैं तो तुमसे सच्चा प्यार करता हूँ...अगर कोई शक है तो मेरी परिक्षा ले सकती हो...
शैली- मैं अगर तुम पर संदेह करती तो यूँ दिल न्यौछावर नहीं करती... ऐसे अकेले में तुम्हारे साथ नहीं आती... जब भरोसा होता है तभी कोई इतना रिस्क लेता है...
राजेश- अब मैं इससे ज्यादा कोई सफाई नहीं दे सकता , इतना ही कहता हूँ की ऐसे
शैली- तुम्हें ऐसा क्यों लगता है की मैं जानबूझकर यहाँ से जाना चाहती हूँ, तुम जैसे खूबसूरत और जवान मर्द
हर किसीको नहीं मिलते... तुम बेहद सुंदर और सुलझे हुए हो, मैं तुमसे बार- बार और हर बार मिलना चाहूंगी...
राजेश- अच्छा ठीक है , भरोसा है मुझे तुम पर... अब तुम जा सकती हो...
दीपू और शैली गार्डन के छिपे हुए कोने में बैठकर यह चर्चा कर रहे थे... शैली अपने जीवन की बीती हुई कहानी उसे बाता रही थी... दीपू ध्यानपूर्वक सुन रहा था...वह पूछने लगा-
- अच्छा ये तो कहो की उस समय तुम इतनी होशियार कैसे थीं ? मुझे लगता है की तुमने राजेश से झूठ बोलकर उससे आसानी से पीछा छुडा लिया वरना मेरे ख़याल से वह उस दिन तुम्हें छोड़ने वाला नहीं था...जब तुम कह रही हो की वह इतना बड़ा दबंग था तो उसका जलवा होगा गाँव में , कोई उसका क्या कर लेता ? ऐसे लोग सनकी भी होते हैं, अगर उनकी नहीं मानो तो अपराध करने पर भी उतर आते हैं...
शैली- हाँ, सही पहचाना, उस दिन मैंने झूठी क़समें खाईं और क्झूथ के सहारे बचकर चली आयी... मैंने ये सारी कहानी अपनी एक खास सहेली को बतायी तो वह मुझे समझाने लगी...
दीपू- क्या कहा उसने ? क्या वह राजेश से दोस्ती करने के पक्ष में थी ? याफिर वह मना कर रही थी ?
शैली- दरअसल वह थाकुन के जुल्मों को अच्छी तरह से जानती थी , उसकी राय थी की मैं यह बात किसीसे न कहूं और चुपचाप गाँव छोड़कर किसी रिश्तेदारी में दूर चली जाऊं, क्योंकि अगर राजेश कुछ चाह लेता है तो ख़ुद उसके घरवाले भी उसकी इच्छा पूरी करने में जुट जाते हैं , चाहे उन्हें जोर जबरदस्ती ही क्यों न करनी पड़े ?
दीपू- हैरत होती है ऐसी बातें सुनकर , क्या अब भी ऐसी यातना देने वाले लोग यहाँ जिन्दा हैं?

Tuesday, May 5, 2009

राजेश उसके सामने गिदगिदाने लगा था... उसकी आंखों में भी याचना के भाव थे... शैली उसका दयनीय चेहरा देक्खकर पिघल गयी... जी में आया की समर्पण करदे... अपना तन और मन राजेश के हवाले करदे... राजेश का खानदान आसपास के सौ गाँवों में सबसे असर रसूख और पैसे वाला था... उसके पुरखे राजा महाराजा थे... इसी कारण उनकी खूब इज्जत होती थी... अगर वे जबरदस्ती किसी को पकड़ भी लें यतो किसी की मजाल नहीं जो उनसे कुछ कह सके... बचपन में इसी खानदान के एक लड़के ने शैली की इज्जत लूटी थी, लेकिन यह बात अब पुराणी हो चुकी थी, जिस तरह हर बड़ी घटना के बाद छोटी घटना लोगों को याद नहीं रहती वही हाल शैली का भी हुआ था, शैली के साथ हुई बलात्कार की घटना को लोग भूल चुके थे... यहाँ तक की ख़ुद बलात्कारी भी अब तक न जाने कितनी अब्लावा की आबरू लूट चुका था... उसे भी अकेली शैली कैसे याद रहती... इस बड़े गाँव की जैसे हर चीक पर ठाकुरों का वर्चस्व था... राजेश का स्वभाव वैसे उन सबसे अलग था...

tadap, bhag-24

rajesh uske saamne gidgidane laga tha... uski aankhon me bhi yaachnaa ke bhaav the... shaili uska dayneey chehra dekkhkar pighal gaee... jee me aayaa ki samarpan karde... apna tan aur man rajesh ke havaale karde... rajesh ka khaandaan aaspaas ke sau gaanvon me sabse asar rasookh aur paise vaalaa tha... uske purkhe raajaa mahaaraaajaa the... isi kaaran unki khoob ijjat hoti thi... agar ve jabardasti kisi ko pakad bhi len yto kisi ki majaal nahin jo unse kuch kah sake... bachpan me isi khaandaan ke ek ladke ne shaili ki ijjat looti thi, lekin yah baat ab purani ho chuki thi, jis tarah har badi ghatnaa ke baad chhoti ghatnaa logon ko yaad nahin rahti vahee haal shaili ka bhi huya tha, shaili ke saath huee balaatkaar ki ghatnaa ko log bhool chuke the... yahaan tak ki khud balaatkaaree bhi ab tak na jaane kitni ablaaon ki aabroo loot chuka tha... use bhi akeli shaili kaise yaad rahti... is bade gaanv ki jaise har cheek par thaakuron ka varchasva tha... rajesh ka swabhaaav vaise un sabse alag tha... vah apne khaandaan ki apekshaa kam ugr tha... yah bhi sach tha ki shaili ne rajesh ki kabhi buraaee nahin sunee thi... haan, uske bade bhaaee suresh ka haal alag tha... usne bahut saaree ladkiyon ko apni havas ka shikar banaayaa tha aur vah rangreliyon se kabhi baaj nahin aataa tha... jab shaili khaamosh ho gayee to rajesh ko laga ki uska teer sahee nishaane par jaa laga hai, usne shaili ki mast golaaiyon par haath firaanaa shuru kar diya... shaili apni soch me hi magan thi, magar na jaane kyon, rajesh ki harkat usko jaraa bhi buree nahin lag rahi thin... vah to andar se kamjor hone lagi... rajesh ke man me chingaariyan foot rahi thin... vah shaili ki jawaani ka ras choosne ke liye betaab tha... 

tadap, भाग-24

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Monday, May 4, 2009

तड़प, भाग-23

राजेश के घर में इस वक्त उन दोनों के सिवाय और कोई मौजूद नहीं था...अकेले में उन दोनों के जिस्म एक दूसरे से सटे हुए थे...इससे उनके बदन बुरी तरह तपने लगे... शैली का कुंवारा बदन आग में झुलस रहा था... अब उसकी इतनी भी हिम्मत नहीं हो रही थी की वह राजेश से मना कर सके... चुपचाप अआहें भरने में व्यस्त शैली का ध्यान तब टूटा जब राजेश ने कहा-
- तुम मेरे लिए बनी हो शैली... इस मद मस्त जवानी को मेरे नाम करदो, फ़िर देखो जन्नत के सुख कैसे मिलते हैं...
शैली- और किसीके नाम करनी होती तो इस तरह तुम्हारे पहलू में क्यों आती ? अब तो तुम्हारी हो ही गयी...
राजेश- देखो, ऐसा ना हो की बाद में बात बदल जाओ... दिल मुझे दिया है तो हमेशा प्यार भी मुझसे ही करना पड़ेगा... मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो अपनी हवस मिटाने के बाद पहचानने से भी इनकार कर देते हैं...मैं ठहरा प्यार का पुजारी... सिर्फ़ प्रेम करना जानता हूँ...
शैली- तुमने स्कूल में देखा होगा , मैं किसी से बात भी करती हूँ क्या ? किसीकी तरफ़ देखती बही नहीं हूँ... एक तुम ही हो जिसके लिए मैं यहाँ तक आ गयी... तुम्हारी हवेली में तो कितनी ही लड़कियां आती हैं, तुम्हें मौज मस्ती की क्या कमी होगी ? मुझे सब मालूम है...
राजेश- अच्छा, ऐसी बात है... तुम्ही बताओ मेरा नाम कभी लफडे में सुना है... भले ही हमारी हवेली में कितनी ही लड़कियां आती हैं, एक से बढ़कर एक औरतें हमारे यहाँ काम करती हैं मगर मुझे तुम्हारे जैसी कोई नहीं लगती...
शैली-तुम्हारे बड़े भाए तो खूब रंगीले हैं, उनके पूरे गाँव में चर्चे हैं... कोई ऐसी औरत नहीं होगी जोतुम्हारी हवेली में आती हो और फ़िर सूखी लौट जाती हो... यहाँ आने वाली ऐसी किसी लड़की नाम बताओ जिसकी इज्जत महफूज हो... बता सकते हो कोई नाम ?
राजेश- तुम मेरे बड़े भाई की बात कर रही हो, उसकी तुल्लना मुझसे नहीं की जा सकती... वह तो रसिया है , रंगीला रतन है... गुलछर्रे उडाना उसका शौक है, मगर तुम मेरे बारे में कोई भी एक ऐसी बात बतादो... भले ही हमारे पास दौलत है, सैकडों बीघा खेत है मगर मैं उसका घमंड नहीं करता...
शैली- तुम्हारे पुरखे राजा महाराजा थे, उनका ही खून तुम्हारी रगों में भी दौड़ रहा है... मुझे नहीं लगता तुम भी उनसे कुछ अलग होंगे...
राजेश - मुझ पर भरोसा करने का कारण बी ही तो नहीं है तुम्हारे पास... कोई एक शिकायत तो कहो...
शैली- दूसरे किसी का क्या कहना ... मैं ख़ुद भुक्तभोगी हूँ... छोड़ने का बोलती हूँ तो और भी जकड लेते हो...मुझे छोडो तो जानूं... मैं इस वक्त अपने घर जाना चाहती हूँ...
राजेश- मजाक कर रही हो, ऐसे हसीं पलों को तुम कैसे छोड़ना चाहोगी ? जरूर तुम झूठ बोल रही हो...
शैली- नहीं , बिल्कुल नहीं.... मैं सच कह रही हूँ, मेरा दम घुट रहा है... अभी- अभी मुझे महिना आ गया है... अब मैं तुम्हारे किसी काम की नही रही.... समझे बुद्धू.... अब कम से कम चार दिन इन्तजार करो...
राजेश - मेरे ऊपर इतना जुल्म मत करो.... अरे मर जाऊँगा मैं... मुझे तुम्हारी इस समय सख्त जरूरत है....
राजेश के शब्दों में याचना थी... उसने महसूस किया की राजेश उत्तेजना के चरम पर पहुच गया था....









Saturday, May 2, 2009

तड़प- भाग-22

शैली जब काफी देर तक राजेश के ही विचारों में ही गुमरही तो दीपू को टोकना पड़ा-
- कहाँ हो ? मैं तुम्हारे पहलू में हूँ और तुम्हारा कहीं अता -पता ही नहीं है... क्या बात है मेरी जान ?
शैली- कुछ पुरानी बातें याद आ गईं, मन बहक गया , जख्म थोड़े से हरे हो गए... इसीलिए तो मैं चुप रहती हूँ...
दीपू-इस चुप्पी को तोड़ डालो , दिल में जो दर्द है उसे बाहर निकालो वरना ये naasoor बन जाएगा,,,
शैली- मैं जब छोटी थी तो मेरे साथ बलात्कार किया गया... जब उसकी शिकायत पुलिस से करनी चाही तो उलटी तोहमतें सहनी पड़ीं, धमकियाँ मिलीं... घरवाले डर गए, गाँव के दबंग लोगों ने उन्हें खूब डांटा -डपटा... आखिरकार चुप ही रहना पड़ा... मैं पढने जाती तो सहपाठी छेड़ते थे, ताने देते थे... जब बड़ी हुई तो राजेश नाम के एक लड़के ने मुझसे प्यार का इजहार किया... पहले-पहले तो मैं नजरअंदाज करती गयी मगर फ़िर जल्द ही मैंने महसूस किया की राजेश मुझे दीवानों की तरह चाहने लगा था, वह मेरा खूब आदर भी करता था... मैं उससे मिलने लगी... यह मुलाक़ात बहुत कम समय के लिए होती थी... कभी गली के किसी नुक्कड़ पर हम एक दूसरे से राजी खुशी पूछ लिया करते थे...