Wednesday, January 14, 2009

रंगीला रतन, भाग-77

लेकिन सिर्फ़ कम करूँगा , ख़त्म नहीं... उससे पहले मैं ख़ुद ही जान दे दूंगा... मेरी जिन्दगी तुमसे शुरू होती है और तुम्हीं पर ख़त्म हो जाती है... मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ तुमसे प्यार करता हूँ, जीशान की गर्ल फ्रेंड के साथ तो सिर्फ़ मस्ती की थी... तुमको भी जो स्वतंत्र छोड़ा था, उसका कारण था की तुम ख़ुद को कमतर न समझो... ये शिकायत न करो की मैं ख़ुद तो खूब मौज करता हूँ और तुम्हें अवसर नहीं देता... ध्यान रखो, मैं तुमको गुलान नहीं समझता... मैंने हमेशा तुमको अपने दिल की देवी माना है, तुम्हारे प्यार की पूजा की है मैंने... मेरा मन पवित्र है...
रंजना उसकी बात सुनकर भावुक हो गयी... अब उसको अपने कड़वे शब्दों पर पछतावा हो रहा था... आम तौर पर वह शान रहने वाली लड़की थी मगर उस दिन न जाने क्या हुआ की वह भड़क गयी, भड़की भी इतनी की एक बार अनियंत्रित होने पर फ़िर संभाल ही नहीं पाई ... रमेश बेहद जज्बाती नजर आ रहा था... उसके चेहरे पर मायूसी के भाव थे.... रंजना अब अपने आपको ही दोष दे रही थी...रामेश कह रहा था-
- तो , अब मैं चलता हूँ, कुछ भूल हुई हो तो माफ़ करना... मैं साफ़ दिल इंसान हूँ... लगाने बुझाने वाला नहीं...
रंजना- क्यों नाराज होते हो रामेश, गलती तो मेरी ही है.... मैंने बिना जाने बूझे तुम पर फायरिंग शुरू करदी... बेहतर होता की मैं पहले युम्हारा पक्ष भी सुन लेती...
रामेश- जो हुआ सो हुआ... मेरी तकदीर ही ऐसी है... सब बाहर के लोग भी सुनाते रहते हैं, आज अगर तुमने भी सूना दिया तो क्या ग़लत किया ? तुम्हारी तो हर बात जीवन भर सुनने के लिए तैयार हूँ, ठीक है ?
रंजना- आज कहीं बाहर घूमकर आते हैं... आज छुट्टी के दिन को यादगार बना देते हैं....
रामेश- ठीक है... जहाँ चाहो , मैं तैयार हूँ, जीशान के पास बहुत अच्छी गाडी है... उसको भी साथ ले लेते हैं... खूब मजा आएगा... अब इनकार मत करना , प्लीज...
रंजना रेडी हो गयी ... उसने जीशान को यह प्लान बता दिया... खंडाला जाने की योजना बनाई गयी... रास्ते में जीशान ने रंजना का सारा भ्रम दूर कर दिया... अब उसको जीशान से कोई मलाल नहीं था... कोई गिला शिकवा भी नहीं था... इस बीच जीशान कई बार माफी भी मांग चुका था... रंजना को वह भले घर का लड़का लगा, रामेश भी अब सामान्य हो चुका था... उसकी समझ में यह नहीं आ रहा था की अब दोबारा वह रंजना और जीशान का टांका कैसे फिट करे... वह जीशान से पक्का वायदा कर चुका था की रंजना को उसके लिए जरूर पतायेगा... अब वह यह सोच -सोचकर परेशान हो रहा था... रंजना उसके मन के भावों को समझ नहीं पा रही थी... जीशान खुश था... वह रंजना को बेहद चाहने लगा था... रंजना की बातों ने उसको दीवाना बना दिया था... आँख खुलते ही वह रंजना के बारे में सोचने लगा था... फ़िर उसने रमेश को लालच देकर किसी भी कीमत पर रंजना से मिलवाने को कहा... उसने रमेश को इस काम के लिए अच्छी खासी रकम भी दी... रमेश को दौलत की बहुत हवस थी... वह अपने प्यार को रमेश की आगोश में सौपने के लिए सहर्ष तैयार हो गया... लेकिन रंजना के पास गया तो वह बखेडा करने पर उतारू हो गयी थी, इसी कारण उसको पहले तो यह काम असंभव लगने लगा , मगर जब रंजना के सामने उसने ब्रहमास्त्र फेकना शुरू किया तो रंजना रीझ गयी... अब उसको अपनी मंजिल काफी करीब नजर आ रही थी....

Tuesday, January 13, 2009

रंगीला रतन, भाग-76

फर्क सिर्फ़ इतना है की इसकी जानकारी मुझे देर से हुयी... अब यह जान पाई हूँ की इंसान कितना गिरसकता है... अगर तुम्हारी स्थान पर कोई जिन्दा व्यक्ति होता तो अब तक कभी का चला गया होता...मगर तुम ऐसा नहीं कर सकते... इसके लिए स्वाभिमानी होना भी तो जरूरी है... जो की तुम्हारे पास बिल्कुल नहीं ....
रमेश -तुम चाहे जितना गुस्सा करो, मैं बुरा मानने वाला नहीं हूँ... इस वक्त तुम पर नफरत का भूत सवार है.... अगर मुझे खरी खोटी सुनाने से , मुझे अपमानित करने से तुम्हें तसली मिलती है , तो स्वागत है... मैं बिल्कुल इनकार नहीं करूंगा... भगवान् के लिए यह गुस्सा शांत करो........अनपढ़ ,गंवारों जैसी बातें न करो......हमको दुनिया के साथ चलना है... फिलहाल यह फलसफा सुनाने के लिए नहीं तुम्हारा क्रोध शांत करने के लिए मैं यहाँ पर खडा हूँ...... और कुछ कहना चाहती हो या फ़िर बस ?
शारीक काफी देर से रंजना की बातें सुन रहा था... शराब का नशा उन दोनों पर सवार था... दोनों एक दूसरे में समाने का प्रयत्न कर रहे थे... रंजना उसको अपनी आपबीती सुना रही थी... शारीक धैर्य के साथ यह सब सुन रहा था.... इससे पहले उसे किसी ने इतनी दिलचस्प आपबीती नहीं सुनाई थी... शारीक को चूमते हुए वह बोली-
- रमेश बड़ा जालिम था, वह जानता था की कौन सी बात कब कहनी है... वह बड़ा माहिर खिलाड़ी था... उसने इतनी चिकनी चुपडी बातें कीं की मेरा मन पिघल गया... मेरी इच्छा हुई की एक बार पूरे मामले पर फ़िर से गौर करने में क्या बुराई है? वैसे मैं अभी तक सौ प्रतिशत इस बात से इतीफाक नहीं रखती थी की मेरे साथ जीशान ने रात क्या किया था... बस मुझे धुंधली सी याद थी... मैंने तो रमेश से अनुमान के आधार पर ही ये बातें कहदी थीं... वह लास्ट तक इसी बात पर रुका रहा की उसने कुछ गक्लत नहीं किया... अगर कुछ हुआ भी होगा तो शराब और अन्य ड्रग्स के नशे में हुआ होगा... मैंने कहा -
- अच्छा , ठीक है , अगर तुम बेक़सूर हो तो मुझे जीशान से मिलवाओअगर उसने त्तुम्हें आज दस हजार नहीं दिए होंगे तो मैं मान जाऊंगी... तुम ठहरो, मैं फ्रेश होकर आती हूँ...
रमेश की जान में जान आ गयी ...... उसने मौका मिलते ही एक मैसेज टाइप किया और जीशान को भेज दिया... उसमें उसने सारी कहानी लिखकर भेज दे थी.... जब रंजना नहा धोकर आई तो गुलाब की तरह खिली-खिली नजर आ रही थी...रमेश ने उसके गालों पर कई चुम्बन जड़ दिए...रंजना कुछ पाती उससे पहले ही उसने रंजना के होठों से अपने होठ स्पर्श कर दिए... रंजना का सारा गुस्सा काफूर हो गया...उसके सर का वजन काफी कम हो गया था...अब रमेश ने उसकी गोलाइयों को भी दबा दिया... रंजना उछल पडी ... उसको अब थोड़ा -थोडा आने लगा था... वह शरमाते हुयी बोली-
-रहने भी दो, ये क्या कर रहे हो ?सुबह -सुबह मेरा मूड ख़राब मत करो...
रमेश- और तुमने मुझे जो सुबह -सुबह गालियों का नाश्ता कराया है, उसका क्या होगा ?
रंजना- ठीक है, अभी तो खाना भी बाकी है....
रमेश- तुम मुझसे नाराज मत हुआ करो, अच्छा नहीं लगता ... सचमुच , ऐसा लगता है जैसे की प्राण सूख गए हैं...
रंजना- ऐसा काम बी ही मत किया करो.......
रमेश- ठीक है, अगर चाहती हो की प्यार भी नहीं किया करुँ तो वो भी कम कर दूंगा...








Monday, January 12, 2009

रंगीला रतन, भाग-75

हो सकता है मुझे बदनाम करने और हम दोनों की दोस्ती को ख़त्म करने के लिए यह चाल चली गयी हो, दौलत वाले लोग बहुत ऊंची पहुच रखते हैं, तुम -हम समझ भी नहीं पायेंगे और बेवजह जुदा हो जायेंगे, हमेशा -हमेशा के लिए, ठंडे दिमाग से एक बार इन सभी विकल्पों पर गौर करके भी देखिये... तस्बीर साफ़ हो जायेगी...
रंजना- तुम मेरे पिता के ख़िलाफ़ अब एक शब्द भी मत कहना ... अब तक तुम मुझे अपने ही परिवार के ख़िलाफ़ भड़काते रहे और मैं भी दीवानी होकर तुम्हारी हर ग़लत बात को मानती रही...तुमने मेरे मन में उन लोगों के लिए जहर भर दिया, जिन्होंने मुझे जन्म दिया... मेरा सही पालन पोषण किया और मुझे उच्च शिक्षा दिला रहे हैं....यहाँ कोई चाल तो तब चलेगा जब किसी को कुछ पता हो.... यहाँ तो सब कुछ तुमने किया है... जीशान को भी तुम्हीं लेकर आए, उसकी गर्ल फ्रेंड से सम्बन्ध बनाने की पहल भी तुमने की.... फ़िर साजिश का सवाल कहाँ आता है ?यहाँ तो हाल ऐसा है की ऐ से जेड तक सब कुछ तुम ही तुम हो... फ़िर मैं कैसे मान लूँ की इसमे किसी साजिश की कोई गुंजाइश भी हो सकती है.... मुझे नहीं लगता ....
रमेश- कभी कभी आंखों देखी और कानों सुनी बात भी ग़लत निकल जाती है... आज अगर तुम मुझे समझ नहीं पाईं तो ऐसे पछताओगी जैसे कुत्ता को मारकर बंजारा पछताया था.... मेरा यकीन करो....
रंजना- ये डायलोग बहुत पुराना हो चुका है, इसका कोई असर होने वाला नहीं है.... मुझे यह ध्यान आते ही बड़ी कोफ्त होने लगती है की किसी ने मेरे जिस्म को स्पर्श किया हा, वह भी मेरे होने वाले पति के सामने ... तुम पति की जिम्मेदारी कैसे निभा पाओगे, न तो मैं तुम्हारे काबिल हूँ और ना ही तुम मेरे काबिल हो... बेफिक्र होकर अब जीशान की गर्ल फ्रेंड के साथ जश्न मनाओ, वह पार्टनर बदलने में तुम्हारा सहयोग करेगी...
रमेश - इस बार मुझे माफ़ कर दीजिये.... आईंदा कभी शिकायत का मौका नहीं दूंगा... अब मैं किसी दोस्त से बात भी नहीं करुगा, ना रहेगा बांस, ना बजेगी बांसुरी .... बी मैं हमेशा तुमसे प्यार करूंगा, तुम्हीं से मिलूँगा, तुम्हीं से बात करूंगा, ठीक है .... ये लो अब तो मैंने अपने कान भी पकड़ लिए हैं.... चलो, मान भी जाओ....
रंजना- तुम अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहे हो रमेश, मैं तुमसे कोई भी रिश्ता रखने की इच्छुक नहीं हूँ.... मैं तुमसे प्यार नहीं करती... कभी कर भी नहीं सकती.... तुम तो क्या , दुनिया के किसी भी मर्द से अब मैं प्यार नैन कर सकती... तुम सबकी औकात जान गयी हूँ मैं...लड़कियों को खिलौना समझते हो, जब तक जी चाहा हेला और जब जी भर गया तो तोड़ कर कचरे के डिब्बे में फेंक दिया या फ़िर नया खिलौना खरीद लिया... प्यार को खेल समझते हो तुम लोग, व्यापार समझते हो , जहाँ फायदा होता है वहाँ प्यार का राग अलापते हो... जब मैंने तुमसे दोस्ती की तो सिर्फ़ तुम्हारा दिल देखा था, प्यार देखा था, तुम्हारा व्यवहार देखा था... दौलत नहीं देखी थी... आज तुम दोस्ती को दौलत के तराजू में टोल रहे हो...
रमेश- मैं फ़िर कहता हूँ की ऐसी कोई बात नहीं है... ये महज एक ग़लत फहमी वाली बात है....
रंजना- अगर हो सके तो मुझे अकेला छोड़ दो , फ़िर कभी मेरा नाम भी जुबान पर मत लाना............
रमेश- मैं मर जाउंगा ,मेरी जान ,,,,,,,,,,,मुझे इस तरह मत ठुकराओ..........
रंजना- जिसका ज़मीर मर गया ,फ़िर वह जिन्दा बचता ही कहाँ है ? तुम तो बहुत पहले मर चुके हो.......

Sunday, January 11, 2009

रंगीला रतन, भाग-74

ऐसी एकाध बात हो तो कुछ कहूं भी, तुम्हारे माथे पर तो ऐसी सैकडों कलंक हैं... मुझे तुमसे घिन आने लगी है... मन में यह विचार आते ही मुझे बड़ा अजीब लगता है की मैं तुम जैसे लड़के को अपना मित्र , अपना प्यार समझती रही... क्या सोचकर मैंने तुम्हें अपना तन -मन अर्पित कर दिया .... ओह रमेश, तुमने ये क्या किया, क्यों किया ? मैंने तुमको क्या समझा था, और तुम क्या निकले ? कम से कम वफ़ा नहीं कर सकते थे तो बेवफाई भी तो नहीं करनी चाहिए थी.... मेरे दिल को तोड़कर तुम्हें क्या मिला ? तुम जैसे घटिया आदमी से अपना नाम जोड़ने के ख़याल से ही मुझे नफरत होने लगती है....जानवर भी अपने शत्रु और मित्र को पहचानते हैं....मगर तुम तो उससे भी गए गुजरे निकले...तुमने कभी किसी कुत्ते को अपने मित्र से गद्दारी करते देखा है ? जब वे भी इतनी समझ रखते हैं तो हम तो आख़िर इंसान हैं, हमको अपनी मर्यादा का ख़याल रखना चाहिए।
रमेश - अगर तुम्हें लगता है की मैंने अपराध किया है तो मैं क्षमा मांगने के लिए तैयार हूँ, मेरा भगवान् जानता है की मैंने जान बूझकर कुछ नही किया ,,,जो भी हुआ ,अनजाने में हुआ है.... तुम तो जानते हो ,उस समय हम लोगों ने कितनी पी ली थी.... तुम , हम और यहाँ तक की जीशान भी बहुत नशे में था... वह ख़ुद भी शर्मिन्दा है... बेचारा माफी मांगना चाहता है... जो हुआ उसे भूल जाओ, हमको आपस में इस तरह तकरार नहीं करनी चाहिए... तुम तो जानती ही हो की हमारी मंजिल कहाँ हैं ? हमको एक जन्म तो क्या सात जन्मों तक साथ-साथ रहना है... हमें प्यार की एक नई इबारत लिखनी है... तुम्हीं ने तो कहा था की कोई भी बाद्गआ हमारे प्यार की दीवार नहीं बन सकती... ध्यान है, हमने कितनी कसमें खाईं थी, कितने वायदे किए थे... क्या तुम उन सबको भूल जाओगी ?
रंजना- ये प्यार मोहब्बत के कसमे वादे , जज्बाती इरादे आदि को उस समय कैसे भूल गए तुम ? क्या उस समय तुम्हें कुछ याद नहीं था... ?उस वक्त तुम्हारे मन में ये भाव नहीं आए ?
रमेश - तुम किसकी बात कर रही हो ? कौन से वक्त की ? मेरी समझ में भी तो कुछ आना चाहिए...
रंजना- सब समझते हो तुम ...मैं उस समय की बात कर रही हूँ, जब तुमने दस हजार के लालच में कुझे अपने दोस्त जीशान की हवस की शिकार बनवा दिया... अगर वह सौ जन्म भी लेता तो भी मैं उसको इस से हाथ नहीं लगाने देती.... यह जीवन मैंने तुम्हारे नाम कर दिया था रमेश, मैं सिर्फ़ तुम्हारी बनकर रहना चाहती थी ,और तुमने मेरे साथ इतनी बड़ी दगाबाजी की.... आख़िर क्यों ? मेरे प्यार में कुछ कमी रह गयी थी,जो तुम उस जीशान की गर्ल फ्रेंड के साथ मेरे ही सामने सेक्स कर रहे थे... उस वक्त मेरी क्या हालत हो रही थी, क्या तुम अनुमान लगा सकते हो ? अरे तुम क्या अनुमान लगाओगे, तुम्हें तो दूसरी लड़की के साथ मौज मस्ती करने का अवसर मिल गया... दस हजार नकाफ्द मिल गए,,, और क्या चाहिए ? मेरा क्या है ? अगर मैं नाराज हो भी गयी तो तुम्हारी बला से ... तुम्हें इस्ससे क्या फर्क पड़ने वाला है ? तुम तो बस हवस के पुजारी हो, प्यार की तुम्हें क्या जानकारी है? तुम जैसे लोगों के लिए यह प्यार सिर्फ़ एक जाल या दाने की तरह होता है, इसकी आड़ में शिकार को फंसाया और फ़िर हलाल कर दिया .... मेरे साथ भी इससे ज्यादा कुछ नही हुआ...
रमेश- इस बात का कोई सबूत है ? अब हमारे प्यार को तुमने इतना कमजोर बना दिया है की कोई भी झूठी कहानी गढ़कर उसको जब चाहे ख़त्म कर सकता है ? मुझे ख़ुद को निर्दोष सिद्ध करने का एक अवसर तो दो ... क्या झूठे आरोपों से तुम अपने प्यार का गला घोंट सकती हो ? क्या कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका का नुक्सान चाह सकता है, वो भी उस स्थिति में जबकि वह उसको टूट टूटकर चाहता हो... उस पर अपनी जान छिड़कता हो.... मैं तो तुम्हें इससे भी बढ़कर चाहता हूँ, आने दिल से जानकर देखो, ग़लत है क्या ?
रंजना- मैं तुम्हें एक नहीं हजार अवसर देती , अगर मेरा दिल यह मानने को तैयार हो जाता... अरे जब तुम मेरे सामने दूसरी लड़की के साथ अपनी जिस्मानी प्यास बुझा सकते हो तो मैं समजता हूँ की तुम किसी भी हद तक जा सकते हो ....
रमेश- यह तुम्हारे पिता की कोई चाल भी तो हो सकती है ?










Friday, January 9, 2009

रंगीला रतन , भाग-72

रमेश- ये क्या कह रही हो ? मौज मस्ती को इतना सीरेय्स्ली लेना ठीक नहीं है ... इसमें परेशान होने की बात नहीं है... आज कल का जो दौ चल आहा है, उसमें ये सब बिल्कुल छोटी बातें हैं,इन्हं नजरअंदाज करना ठीक नहीं है....
रंजना- अच्छा, तुम्हारी निगाह में किसी की इज्जत से खिलवाड़ करना बहुत ह्होती बात है ? अगर कोई अपनी प्रेमिका की दलाली करता है और फ़िर कहता है की ये मौज मस्ती है तो क्या यह मामूली बात है ?
रमेश- दलाली ? कैसी दलाली ? ये शर्मनाक इल्जाम तुम्हें मुझ पर नहीं लगाना चाहिए... तुम हद से आगे जा रही हो...मैं तुमसे प्यार करता हूँ, अपनी जान से भी ज्यादा चाहता हूँ.... मैं इतनी गिरी हुई बात सोच भी नहीं सकता...
उसकी बातों ने रंजनाका खून गर्म का दिया... उसने अपने शरीर से चादर हटाकर एक तरफ़ फेंक दी, हाथ मुह धोकर कपड़े पहने, फ़िर एक गिलाश पानी पीने के बाद गुस्से से बोली-
-तुम और प्यार ? तुम्हें और शाम .... छि--- छ---घिन आती है मुझे ... तुम्हारे मुख से निकलकर ये शब्द भी अपवित्र हो रहे हैं...अगर मैं जानती की तुम इतने गिरे हुए इंसान हो तो तुमसे कभी प्यार नहीं करती... तुम्हारी खातिर मैंने क्या कुछ नहीं किया ? मैंने अपने माँ बाप से बगावतकी... अच्छे अच्छे घरों के रिश्तों को ठुकरा दिया... सिर्फ़ तुम्हारी खातिर मैंने duniya की बदनामी सही, अपनों के ताने सहे .... और तुम ? तुम ओ इंसान की शक्ल में शैतान निकले... अच्छा होता की मैं तुम्हारी बजाय किसी जानवर से प्यार कर लेती... कम से कम वह मुझे दूसर भेदियों के सामने तो नहीं परोसता....
रमेश- आख़िर मैं इस गुस्से की वजह जान सकता हूँ ? क्यों मुझे इस तरह अपमानित किया जा रहा है ?
रंजना - इतना सब कने के बाद भी तुम वजह जानना चाहते हो ? मुझे आँख मिलाकर बात करो...
रमेश- समझ गया , अब तुम्हारा भी इस गरीब से मन भा गया है.... सब लोग यही कटे हैं... तुम अमीरों की यही तो अदा है... जब चाहोगे ,तभी मन चाहा आरोप लगाकर फ़िर हम जैसे गरीबों की मोहब्बत का मजाक उड़ा दोगे...
रंजना- खामोश हो जाओ रमेश , मुझे इसतरह भावनात्मक तरह स ब्लेकमेल करने की कोशिश मत करो... मैं जान गयी हूँ की तुम्हारा असली चेहरा क्या है ? पहले तो तुमने मुझे ये कहा की तुम्हारा कोई दोस्त सिर्फ़ यहाँ थोड़ी देर के लिए आने वाला है और फ़िर बाद में तुमने मुझे नशीला दवा खिलाकर बेहोशी की हालत में पहुचा दिया... जीशान बता रहा था की तुमने मेरे जिस्म के बदले में उससे दस हजार का सौदा किया था....
रमेश- अच्छा,तुम उस जीशान की बातों पर तो भरोसा कर रही हो, जिससे तुम पहले बार मिलीं, और मुझे झूठा ठहराने पर आमादा हो... यही है तुम्हारा प्यार ?
रंजना- मैं तुम्हारे मुह से प्यार का नाम भी नही सुनना चाहती हूँ..... तुम मेरी आंखों के सामने से दफा हो जाओ, फ़िर कभी इधर दिखाई मत देना.....







Thursday, January 8, 2009

रंगीला रतन, भाग ७१

रंजना-अच्छा , तुम मेरी बातों में दिलचस्पी ले रहे हो, इसका मतलब तुम्हें बोरिंग बिल्कुल नही हो रही ?
शारीक - तुम्हारी किसी बात से मैं बोर कैसे हो सकता हूँ, मेरे जीवन में अब तुम्हारा एक ख़ास स्थान हो गया है... मैं दिल से तुमको अपना माँ चुका हूँ... अपने मन में तुम्हारी तस्बीर बसा चुका हूँ, अब तो मेरे मरने के बाद भी कोई इसको नहीं हटा सकता... दिल का मामला है यार.... और जब ये दिल ही तुम्हारा हो गया तो फ़िर बचता ही क्या है ? अगर कुछ बच्चा होगा तो वो भी तुम्हारा...अब रमेश के बारे में बताइये...
रंजना- कोई बात नहीं, मैं तुम्हारी यह इच्छा जरूर पूरी करुँगी.... उस रात मैंने जीशान के समक्ष समर्पण कर दिया... उसने अपने मन के मुताबिक मेरे जिस्म का इस्तेमाल किया... वह भी तुम्हारी तरह नया लड़का था, उत्साही और जोशीला था, अब यी बात अलग है की वह तुम्हारी तरह शक्ति नहीं रखता था... मुझ पर जब नशा चढ़ने लगा तो मैं अचेत हो गयी, मुझे बाद में पता चला की रमेश और जीशान ने बारी बारी से मेरे जिस्म के साथ खिलवाड़ की... जाब अगले दिन मेरी आँख खुली तो मैं बहुत परेशान थी, मेरा सर दर्द कर रहा था... आंखों में जलन हो रही थी.... पूरा शरीर टूट रहा था... रमेश उसके पास ही बैठा था... वह अभी अभी आया था... आते ही कहने लगा-
- लो , यह नीबू पानी है , इसे पीने से तुमको काफी राहत मिलेगी... मैं अक्सर ऐसा ही करता हूँ....
रंजना- अच्छा, ये मुझे न जाने क्या हो गया है ? पहले तो मुझे इतनी तकलीफ कभी नहीं हुआ था, मुझे लगता है जैसे की मेराजिस्म से खून निचोड़ लिया गया है.... ऐसा न जाने क्या हो गया है? शायद मैंने रात बहुत ज्यादा पी ली थी... ओफोह, मुझे रात की कोई बात याद नहीं आ रही है.... अब शराब से हाथ भी नहीं लगाउंगी... प्लीज , तुम भी कभी जिद मत करना... तुम मेरे पीछे ऐसे पड़ गए हो की मानते ही नही ?
रमेश- सोरी मेरी जान , अगर ऐसी बात है तो अब कभी नहीं कहूँगा... चलो जल्दी फ्रेश हो जाओ,जीशान हम लोग का इन्तजार कर रहा है.... वह बहुत खुश है तुमसे ,,, तुम्हारी हर अदा ने उसको दीवाना बना दिया है...
रंजना- हाँ, याद आया , वह रात भी तो यहाँ आया था, शायद उसने मुझे ऑफर भी किया था... बस कुछ -कुछ याद आ रही है... पता नहीं , उसने क्या कहा था ? शायद वह मेरे शरीर से स्पर्श भी कर रहा था... रमेश, कहीं उसने मेरी इज्जत तो नही लूटी न ? चलो, मैं भले ही मदहोश थी मगर तुम तो होश में थे....
रमेश- हाँ, डीयर , मैं बिल्कुल होश में था.... मुझे सब कुछ मालूम है... तुम किसी ग़लत फहमी की शिकार मत होना... तुम मेरी जान हो, भला कुछ ग़लत मैं कैसे होने दूंगा? वो तो तुमने ही जीशान को स्वीकृति दी थी, मैं उसकी दोस्त की प्यास को शांत कर रहा था, तुम और जीशान मौज मस्ती में मगन थे.... अब तुम्हारी खुशियों की खातिर मैं इनकार कैसे करता ? वैसे पार्टनर बदलना अब नोर्मल काम हो गया है....
रंजना- अच्छा, याद आया ... अब ध्यान आया ? मैं तुमसे बहुत नाराज हूँ रमेश, तुमने मुझे जीशान के साथ सोने के लिए विवश किया... तुम्ही ने ऐसा माहोल तैयार किया की मैं किसी भी हालत में इनकार नहीं कर पाऊँ, एक तरफ़ तुम मुझे शादी करने की बात करते हो, दूसरी तरफ़ अपनी होने वाली पत्नी को महज कुछ रुपयों की खातिर ही अपने किसी दोस्त के सामने परोस देते हो.....

Wednesday, January 7, 2009

रंगीला रतन, भाग-70

उसके मन में क्षोभ के भाव थे... रमेश के प्रति उसकी नफरत भरती जा रही थी... जीशान ने उसके बारे में जो रहस्यद्घातन किया था, वह सहन करने के लायाक नही था... वह रमेश के सामने ही जीशान के प्रति प्यार का इजहार कर उसे जलाने की साजिश बनाने लगी... जीशान खुश था... वह अपनी ही दुनिया में मस्त मगन होकर कह रहा था-
- रमेश बड़ा खुशनसीब है, जो तुम जैसी खूबसूरत उअर समझदार दोस्त मिली है, काश, तुम मुझसे प्यार करती ?
रंजना- तो क्या करते तुम ? अगर मैं तुमसे मोहब्बर करने लागून तो तुम ये रोजाना लडकियां बदलने का चलन बंद कर दोगे ? क्या फ़िर ड्रग्स लेना बंद कर सकते हैं ?
जीशान- हाँ क्यों नहीं ? मगर क्या ये सम्भव है क्या ? रमेश को बुरा नहीं लगेगा ?
रंजना- मैं रमेश की दोस्त हूँ, सिर्फ़ दोस्त , कोई बंधुआ मजदूर नहीं हूँ, पत्नी भी नहीं, जिससे की इसका कोई सामाजिक या राजनितिक अधिकार बनता हो..... मैं अपनी मर्जी की मालिक हूँ... अगर इसको मेरी इतनी ही फ़िक्र होती तो यह धोखे से मुझे तुम्हारे सामने क्यों परोसता , पहले सारी चीजें क्लियर करनी चाहिए थीं...
जीशान- ओह, तो क्या तुम दुखी हो ? मेरा साथ तुम्हें खुश नहीं रख पा रहा है क्या ?
रंजना- मैंने ये कब कहा ? मुझे तो बड़ा आनंद मिल रहा है ....आह, इतना सुख तो इससे पहले मैंने कभी नहीं भोगा... तुम बहुत अच्छे हो जीशान, कम से कम अपने दोस्त की इच्छाओं का ख़याल तो रखते हो...
जीशान की गर्ल फ्रेंड के साथ शारीरिक सुख भोग रहा रमेश इन बातों को सुन सुन कर बोर हो रहा था... वह चाहता था की रंजना सारी बातों को भूलकर उससे अपना प्रेम बनाए रखे, मगर वह ऐसा करने के बजाय बहकी-बहकी बातें कर रही थी... उसने सोचा की इस समय रंजना की किसी भी बात का जवाब देना खतरे से खाली नहीं होगा ... वह अपनी पार्टनर से बेहद कामुक बातें करने लगा... वह काफी जोर-जोर से बोल रहा था, ताकि जीशान और रंजना का ध्यान भी उधर ही हो जाए.... उधर शारीक इन बातों को सुनकर बेहद उत्तेजित होने लगा,रंजना की स्टाइल बिल्कुल अलग थी , वह जिस अंदाज में बात कहती थी, उससे यूँ लगता था जैसे वह घटना प्रत्यक्ष ही घाट रही हो... शारीक चुपचाप उसकी बातें सुन रहा था... शराब का दौर जारी ही था... जब वह गर्म होने लगा तो रंजना से बोला-
-मैं महसूस कर सकता हूँ की आप किन किन मानसिक तकलीफों से गुजरी हो , यकीन मानो, मैं ऐसा नहीं हूँ ... इंसान तो इंसान मैं किसी चीटी को भी परेशान नहीं कर सकता... मैं किसी के जज्बातों से नहीं खेल सकता भले ही कुछ भी हो जाए... मेरी तरफ़ से हमेशा निश्चिंत रहना.... अब तो मुझे तुमसे प्यार भी हो गया है...
रंजना- मेरा अतीत जानने के बाद भी तुम ऐसा कह रहे हो ?
शारीक- जी हाँ, अब मैं कहने की बेहतर स्थिति में हूँ, जानने समझने और सोचने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुचा हूँ की तुम अत्यन्त भावुक हो.... हो सकता है, तुम्हारी इसी खासियत का लोग गैर फायदा उठाते हों...
रंजना- ओह, ग्रेट यार, तुम तो मेरी उम्मीद से भी ज्यादा अच्छे निकले... तुम सचमुच दोस्ती के लायक हो, प्यार के लायक हो.... अब मैं हमेशा तुमसे प्रेम करती रहूंगी ...
शारीक -मैं चाहूँगा की तुम अपनी बात पूरी करो, यह बताओ की फ़िर जीशान और रमेश ने क्या किया?