Sunday, December 7, 2008

रंगीला रतन, भाग-41

रवि के दिल में लड्डू फूटने लगे... अब तक उसने बड़े होटलों के बारे में सिर्फ़ सुन रखा था... उसकी हैसियत इतनी भी नहीं थी की उनमे ठहरने के विषय में सोच भी सके... वह तो होटल में ठहरने और खाने को फिजूलखर्ची और बड़े लोगों के चोचले समझा करता था... उसका हिसाब लगाने का तरीका भी एकदम अलग था... वह अनुमान लगता की अगर दिन भर रहने और खाने का बड़े होटल में दस हजार रुपये भी लगते हैं तो वहाँ खाने की क्या जरूरत है, वही खाना घर में पूरा परिवार सौ रुपये में ही पेट भरके खा सकता है... शेष पैसे से एक दस किलो रोजाना दूध देने वाली भैंस खरीदी जा सकती है... वह भैंस कई साल तक परिवार को दूध औए घी खिलाएगी... उसके मन में विचार उठा की काश, रंजना बड़े होटल में जाने का विचार त्याफ्दे तो वह उसको अच्छे से अच्छा खाना बनाकर खिला सकता है... जो पैसे वह होटल में क्ल्हार्च क्लारने जा रही है उनसे वह अपने परिवार की गरीबी को कुछ कम कर सकता था... उसने रंजना के चेहरे की तरफ़ देखा भी मगर कुछ कह नही पाया... सोचा , अभी से उस पर अपनी इच्छाएं थोपना ठीक नहीं है...

Saturday, December 6, 2008

रंगीला रतन, भाग-40

उसके माथे पर पसीना उभर आया... वैसी हालत हो गयी जैसे किसी ने उसको रेंज हाथों चोरी करते हुए पकड़ लिया हो... रंजना खुश थी... वह बाहर कुछ खरीदने गयी थी... रवि से पहले जागकर उसने नित्यकर्म किए और फ़िर रवि को सोता हुआ छोड़कर घूमने चली गयी... वह जब बाहर गयी तो रवि ने उसके बारे में न जाने क्या-क्या सोच लिया था... वह उसको ठगनी समझ रहा था... जिस रंजना के एक इशारे पर भी वह जान देने की क़समें खा रहा था, वही रवि अब उस हसीन के विषय में इतनी घटिया बातें सोचने लगा था... इंसानी स्वभाव ऐसा ही होता है... जिस पर भरोसा करता है तो उसको खुदा मान लेता है और नफरत करता है तो देवताओंपर भी इल्जाम लगाने लगता है... रंजना ने उसको परेशान देखा तो पूछ बैठी-
- क्या हुआ रवि, सब कुछ ठीक तो है ? तुम्हारे चेहरे की हवाइयां क्यों उड़ रही है ?
रवि- ऑफ़, कुछ मत पूछो यार,मुझे न जाने क्या हो गया है ... तुमने शायद जादू कर दिया है... मैं ख़ुद नहीं समझ पा रहा हूँ की मैं क्या कर रहा हूँ... जैसे ही मेरी नींद खुली मैंने तुम्हें देखा, तुमको यहाँ न पाकर मेरी साँस ऊपर-नीचे चलनी लगी... मुझ पर पागलपन सवार हो गया... मुझे लगा जैसे की मैं सपना देख रहा था... कभी -कभी भांग के नशे में भी ऐसा महसूस होने लगता है... मैंने समझा की किसी तरह से कल भंगकी गोली तो नहीं खाली... अभी यह सब सोच ही रहा था की इतने में तुम आ गईं... अब मैं प्रसन्न हूँ...
रंजन- शुक्र है , मैं जल्दी आ गयी, वरना तुम पता नही क्या कर बैठते ...
रवि- कहाँ चली गईं थीं सुबह-सुबह ?
रंजना- मैं होटल बुक कराने गयी थी... बाहर देखा तो सब दुकानें बंद हैं... मैं सोच रही थी की अगर तुमने जल्दी दूकान नहीं खोली और यह बात तुम्हारे सेठ को पता चली तो वह नाराज हो जायेगा...
रवि- हाँ, यह बात तो है... मैं ख़ुद भी इसी बात को लेकर परेशान हूँ... मगर ये बंद कैसे ? कोई नेता- वेता मर गया होगा ? यहाँ तो आए दिन यही होता रहता है... अगर किसीने मुह खोला तो गया काम से... नेता लोग भी कमाल करने लगे हैं... ये खुशी में भी पैसे लेकर जाते हैं औए गम में भी ... इनका कोई दीं ईमान नहीं होता ... जो भी ड्रामा करते हैं,दौलत के लिए करते हैं...
रंजना- एक बोर्ड पर लिखा था की किसी नेता को गिरफ्तार कर लिया है , उसीके विरोध में दुकानें बंद की गयी हैं...
रवि- अच्छा, ध्यान आया... विधूडी को पकडा गया होगा... कई दिनों से ऐसी चर्चा चल रही थीं... भ्रष्टाचार का एक माला चल रहा था शायाद उसी में गिरफ्तारी हुई होगी....
रंजना- छोडो भी, क्या रखा है इन बातों में अब काम की बातें करते हैं... मैं होटल गयी थी... अपने लिए कमरा बुक करा आयी हूँ... मेरे खयाल से यह जगह हम दोनों को मोहब्बत के लिहाज से सुरक्षित नहीं थी... यहाँ कोई भी और कभी आ - जा सकता है... कोई हमको यहाँ पर इस हालत में देख लेता तो तुम्हारी बदनामी हो जाती... इसी कारण मैंने पर्सनल कमरा बुक करा लिया है... अब आराम से दोनों प्यार का आनंद उठाएंगे...

Friday, December 5, 2008

मुंबई, दलितों के मसीहा , भारतीय संविधान निर्माता और प्रथम क़ानून मंत्री डॉक्टर बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर के महापरिनिर्वान दिवस के अवसर पर देश के कोने-कोने से आए लाखों भीम सैनिकों ने श्रद्धांजलि देने के लिए दादर स्थित शिवाजी पार्क और चैत्य भूमि पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। बाबा साहेब को नमन करने आए भीम्सैनिकों की इतनी भीड़ एकत्रित हुई मानो, भीम सागर उमड़ पडा हो। यहाँ पर प्रत्येक वर्ष इसी प्रकार लाखों की संख्या में भीम सैनिक इकट्ठे होते हैं। महाराष्ट्र तथा महानगर पालिका ने कड़े इंतजाम किए हैं। महानगर पालिका ने कई चालित शौचालय की व्यवस्था की है। सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त राखी है ताकि किसी प्रकार की कोई अनहोनी न होने पाये। सामाजिक संगठनों व् राजनीतिक दलों ने मुफ्त अल्पाहार और भोजन की व्यवस्था की है। इसी प्रकार किसी के गम होने पर लाउड स्पीकर लगाए गए हैं। कई प्रदेशों के लेखकों -प्रकाशकों ने भी दालिद साहित्य से सम्बंधित बुक स्टाल स्टाल्स लगा रखे हैं । उत्तर प्रदेश सरकार ने 16 वर्ष पूर्व 6 दिसम्बर को अयोध्या में घटी घटना को लेकर प्रदेश में विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिये हैं। इसी क्रम में डीजीपी विक्रम सिंह ने भी हर जिले के पुलिस कप्तान को जिले में पुलिस चौकसी बढ़ाने को कहा है। शासन और डीजीपी के निर्देशों में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि हर जिले में साम्प्रदायिक सौहार्द बनाये रखने के प्रबंध किये जायें और इस मामले में कोई सुस्ती न दिखायी जाये।
राज्य शासन के प्रवक्ता के अनुसार 16 वर्ष पूर्व छह दिसम्बर को अयोध्या में विवादित धार्मिक ढांचे को ढहाये जाने की घटना को लेकर सरकार बेहद संवेदनशील है। जिसके चलते हर जिले के पुलिस कप्तान से कहा गया है कि वह अपने जिले में 6 दिसम्बर की घटना को लेकर साम्प्रदायिक सौहार्द बनाये रखने के लिए शान्ति कमेटी के लोगों के साथ बैठक करें और जिले के हर मोहल्ले एवं महत्वपूर्ण स्थल के समीप तथा जिले के बस व रेलवे स्टेशन, भीड़ भरे बाजार, मॉल एवं सिनेमाघर तथा होटल आदि के आसपास पुलिस पिकेट एवं सिपाही तैनात करें। जिलें में संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त पाये जाने वाले लोगों पर नजर रखी जाये तथा खुफिया के लोगों के साथ मिलकर जिले की सुरक्षा व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त बनाये रखा जाये।
नेपाल सीमा से सटे जिलों में चौकसी बढ़ाये जाने के निर्देश भी डीजीपी ने इस क्रम में दिये हैं। जिसमें उन्होंने कहा है कि नेपाल से जिले में आये हर व्यक्ति का पूरा ब्यौरा रखा जाये और सीमावर्ती सभी जिलों मे होटल आदि में कौन रुका है? इसकी भी जानकारी की जाये। 6 दिसम्बर के दिन और इसके पूर्व राज्य में कोई अप्रिय घटना न होने पाये इसके लिए डीजीपी ने सभी जिलों में पुलिस सतर्कता बढ़ाने और गश्त एवं चेकिंग पर जोर देने की सलाह जिलों के पुलिस अफसरों को दी है।

दलितों के मसीहा ,महामानव डॉक्टर भीमराव आंबेडकर को शत-शत नमन

डाक्टर भीमराव रामजी आंबेडकर ( 14 अप्रैल , 1891 -- 6 दिसंबर , 1956 ) एक भारतीय विधिवेत्ता थे। वे एक बहुजन राजनीतिक नेता, और एक बौद्ध पुनरुत्थानवादी होने के साथ साथ, भारतीय संविधान के मुख्य वास्तुकार भी थे। उन्हें दलितों के मसीहा ,महामानव , बाबासाहेब के नाम से भी जाना जाता है। इनका जन्म एक गरीब अस्पृश्य परिवार मे हुआ था। बाबासाहेब अम्बेडकर ने अपना सारा जीवन हिंदू धर्म की चतुवर्ण प्रणाली, और भारतीय समाज मे सर्वत्र व्याप्त जाति व्यवस्था के विरुद्ध सन्घर्ष मे बिता दिया। हिंदू धर्म मे मानव समाज को चार वर्णों मे वर्गीकृत किया है। उन्हें बौद्ध महाशक्तियों के दलित आंदोलन को प्रारंभ करने का श्रेय भी जाता है। बाबासाहेब अम्बेडकर को भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया है जो भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है साथ ही यह सिर्फ् उन व्यक्तियों को प्रदान किया जाता है जिन्होने भारतीय समाज की सेवा मे महत्वपूर्ण योगदान दिया हो।
कई सामाजिक और वित्तीय बाधाएं पार कर, अम्बेडकर उन कुछ पहले अछूतों मे से एक बन गये जिन्होने भारत में कॉलेज की शिक्षा प्राप्त की। अम्बेडकर ने कानून की उपाधि प्राप्त करने के साथ ही विधि, अर्थशास्त्र व राजनीति विज्ञान मे अपने अध्ययन और अनुसंधान के कारण कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से कई डॉक्टरेट डिग्रियां भी अर्जित कीं। अम्बेडकर वापस अपने देश एक प्रसिद्ध विद्वान के रूप मे लौट आए और इसके बाद कुछ साल तक उन्होने वकालत का अभ्यास किया। इसके बाद उन्होने कुछ पत्रिकाओं का प्रकाशन किया जिनके द्वारा उन्होने भारतीय अस्पृश्यो के राजनैतिक अधिकारों और सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत की।

शिक्षागायकवाड शासक ने संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय मे जाकर अध्ययन के लिये अम्बेडकर का चयन किया गया साथ ही इसके लिये एक 11.5 डॉलर प्रति माह की छात्रवृत्ति भी प्रदान की। न्यूयॉर्क शहर में आने के बाद, अम्बेडकर को राजनीति विज्ञान विभाग के स्नातक अध्ययन कार्यक्रम में प्रवेश दे दिया गया। शयनशाला मे कुछ दिन रहने के बाद, वे भारतीय छात्रों द्वारा चलाये जा रहे एक आवास क्लब मे रहने चले गए और उन्होने अपने एक पारसी मित्र नवल भातेना के साथ एक कमरा ले लिया। 1916 में, उन्हे उनके एक शोध के लिए पी. एच.डी. से सम्मानित किया गया। इस शोध को अंततः उन्होंने पुस्तक "इवोल्युशन ओफ प्रोविन्शिअल फिनान्स इन ब्रिटिश इंडिया" के रूप में प्रकाशित किया। हालाँकि उनकी पहला प्रकाशित काम, एक लेख जिसका शीर्षक, भारत में जाति : उनकी प्रणाली , उतपत्ति और विकास है। अपनी डाक्टरेट की डिग्री लेकर अम्बेडकर लंदन चले गये जहाँ उन्होने ग्रे'स इन और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में कानून का अध्ययन और अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट शोध की तैयारी के लिये अपना नाम लिखवा लिया। अगले वर्ष छात्रवृत्ति की समाप्ति के चलते मजबूरन उन्हें अपना अध्ययन अस्थायी तौर बीच मे ही छोड़ कर भारत वापस लौटना पडा़ ये विश्व युद्ध प्रथम का काल था।
बड़ौदा राज्य के सेना सचिव के रूप में काम करते हुये अपने जीवन मे अचानक फिर से आये भेदभाव से अम्बेडकर उदास हो गये, और अपनी नौकरी छोड़ एक निजी ट्यूटर और लेखाकार के रूप में काम करने लगे। यहाँ तक कि अपनी परामर्श व्यवसाय भी शुरू किया जो उनकी सामाजिक स्थिति के कारण विफल रहा। अपने एक अंग्रेज जानकार बंबई के पूर्व राज्यपाल लॉर्ड सिडनेम, के कारण उन्हें बंबई के सिडनेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनोमिक्स मे राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर के रूप में नौकरी मिल गयी। 1920 में कोल्हापुर के महाराजा अपने पारसी मित्र के सहयोग और अपनी बचत के कारण वो एक बार फिर से इंग्लैंड वापस जाने में सक्षम हो गये। 1923 में उन्होंने अपना शोध प्रोब्लेम्स ऑफ द रुपी (रुपये की समस्यायें) पूरा कर लिया। उन्हें लंदन विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ साईंस की उपाधि प्रदान की गयी। और उनकी कानून का अध्ययन पूरा होने के, साथ ही साथ उन्हें ब्रिटिश बार मे बैरिस्टर के रूप में प्रवेश मिल गया। भारत वापस लौटते हुये अम्बेडकर तीन महीने जर्मनी में रुके, जहाँ उन्होने अपना अर्थशास्त्र का अध्ययन, बॉन विश्वविद्यालय में जारी रखा। उन्हे औपचारिक रूप से 8 जून 1927 को कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा पी एच.डी.प्रदान की गयी।
प्रारंभिक जीवनभीमराव रामजी आंबेडकर का जन्म ब्रिटिशों द्वारा केन्द्रीय प्रांत ( अब मध्य प्रदेश में ) मे स्थापित नगर व सैन्य छावनी महू में हुआ था। वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई मुरबाद्कर के 14 वें व अंतिम बच्चे थे। उनका परिवार मराठी था और वो अंबावडे नगर जो आधुनिक महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले मे है से संबंधित था। वे हिंदू महार जाति से संबंध रखते थे, जो अछूत कहे जाते थे और उनके साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरा भेदभाव किया जाता था। अम्बेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे, और उनके पिता,भारतीय सेना की महू छावनी में सेवा में थे और यहां काम करते हुये वो सूबेदार के पद तक पहुँचे थे। उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में औपचारिक शिक्षा की डिग्री प्राप्त की थी। उन्होने अपने बच्चों को स्कूल में पढने और कड़ी मेहनत करने के लिये हमेशा प्रोत्साहित किया।
कबीर पंथ से संबंधित इस परिवार मे, रामजी सकपाल, अपने बच्चों को हिंदू ग्रंथों को पढ़ने के लिए, विशेष रूप से महाभारत और रामायण प्रोत्साहित किया करते थे। उन्होने सेना मे अपनी हैसियत का उपयोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से शिक्षा दिलाने मे किया, क्योंकि अपनी जाति के कारण उन्हें इसके लिये सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा था। स्कूली पढा़ई में सक्षम होने के बावजूद अम्बेडकर और अन्य अस्पृश्य बच्चों को विद्यालय मे अलग बिठाया जाता था और अध्यापकों द्वारा ना तो ध्यान ही दिया जाता था ना ही कोई सहायता दी जाती थी। उनको कक्षा के अन्दर बैठने की अनुमति नहीं थी साथ ही प्यास लगने प‍र कोई उँची जाति का व्यक्ति उँचाई से पानी उनके हाथों पर पानी डालता था क्योकि उनको ना तो पानी ना ही पानी का पात्र को स्पर्श करने की अनुमति थी क्योकि लोगों के मुताबिक ऐसा करने से पात्र और पानी दोनो अपवित्र हो जाते थे। आमतौर पर यह काम स्कूल के चपरासी द्वारा किया जाता था जिसकी अनुपस्थिति मे बालक अम्बेडकर को बिना पानी के ही रहना पड़ता था। 1894 मे रामजी सकपाल सेवानिवृत्त हो जाने के बाद सपरिवार सतारा चले गए और इसके दो साल बाद, अम्बेडकर की मां की मृत्यु हो गई। बच्चों की देखभाल उनकी चाची ने कठिन परिस्थितियों में रहते हुये की। रामजी सकपाल के केवल तीन बेटे, बलराम, आनंदराव और भीमराव और दो बेटियाँ मंजुला और तुलासा ही इन कठिन हालातों मे जीवित बच पाये। अपने भाइयों और बहनों मे केवल अम्बेडकर ही स्कूल की परीक्षा में सफल हुए और इसके बाद बडे़ स्कूल मे जाने में सफल हुये। अपने एक देशस्त ब्राह्मण शिक्षक महादेव अम्बेडकर जो उनसे विशेष स्नेह रखते थे के कहने पर अम्बेडकर ने अपने नाम से सकपाल हटाकर अम्बेडकर जोड़ लिया जो उनके गांव के नाम "अंबावडे" पर आधारित था।
रामजी सकपाल ने 1898 मे पुनर्विवाह कर लिया और परिवार के साथ मुंबई (तब बंबई )चले आये। यहाँ अम्बेडकर एल्फिंस्टोन रोड पर स्थित गवर्न्मेंट हाई स्कूल के पहले अछूत छात्र बने। पढा़ई में अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के बावजूद, अम्बेडकर लगातार अपने विरुद्ध हो रहे इस अलगाव और, भेदभाव से व्यथित रहे। 1907 में मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद अम्बेडकर ने बंबई विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और इस तरह वो भारत में कॉलेज में प्रवेश लेने वाले पहले अस्पृश्य बन गये। उनकी इस सफलता से उनके पूरे समाज मे एक खुशी की लहर दौड़ गयी , और बाद में एक सार्वजनिक समारोह उनका सम्मान किया गया इसी समारोह में उनके एक शिक्षक कृषणजी अर्जुन केलूसकर ने उन्हें महात्मा बुद्ध की जीवनी भेंट की, श्री केलूसकर, एक मराठा जाति के विद्वान थे। अम्बेडकर की सगाई एक साल पहले हिंदू रीति के अनुसार दापोली की, एक नौ वर्षीय लड़की, रमाबाई से तय की गयी थी। 1908 में, उन्होंने एलिफिंस्टोन कॉलेज में प्रवेश लिया और बड़ौदा के गायकवाड शासक सहयाजी राव तृतीय से संयुक्त राज्य अमेरिका मे उच्च अध्धयन के लिये एक पच्चीस रुपये प्रति माह का वजीफा़ प्राप्त किया। 1912 में उन्होंने राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में अपनी डिग्री प्राप्त की, और बड़ौदा राज्य सरकार की नौकरी को तैयार हो गये। उनकी पत्नी ने अपने पहले बेटे यशवंत को इसी वर्ष जन्म दिया। अम्बेडकर अपने परिवार के साथ बडौ़दा चले आये पर जल्द ही उन्हें अपने पिता की बीमारी के चलते बंबई वापस लौटना पडा़, जिनकी मृत्यु 2 फरवरी 1913 को हो गयी। छुआछूत के खिलाफ संघर्षभारत सरकार अधिनियम 1919, तैयार कर रही साउथबोरोह समिति के समक्ष, भारत के एक प्रमुख विद्वान के तौर पर अम्बेडकर को गवाही देने के लिये आमंत्रित किया गया। इस सुनवाई के दौरान, अम्बेडकर ने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिये पृथक निर्वाचिका(separate electorates) और आरक्षण देने की वकालत की। 1920 में, बंबई में, उन्होंने साप्ताहिक मूकनायक के प्रकाशन की शुरूआत की। यह प्रकाशन जल्द ही पाठकों मे लोकप्रिय हो गया, तब्, अम्बेडकर ने इसका इस्तेमाल रूढ़िवादी हिंदू राजनेताओं व जातीय भेदभाव से लड़ने के प्रति भारतीय राजनैतिक समुदाय की अनिच्छा की आलोचना करने के लिये किया। उनके दलित वर्ग के एक सम्मेलन के दौरान दिये गये भाषण ने कोल्हापुर राज्य के स्थानीय शासक शाहू चतुर्थ को बहुत प्रभावित किया, जिनका अम्बेडकर के साथ भोजन करना रूढ़िवादी समाज मे हलचल मचा गया। अम्बेडकर ने अपनी वकालत अच्छी तरह जमा ली, और बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना भी की जिसका उद्देश्य दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये काम करना था। सन् 1926 में, वो बंबई विधान परिषद के एक मनोनीत सदस्य बन गये। सन 1927 में डॉ. अम्बेडकर ने छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों और जुलूसों के द्वारा, पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी लोगों के लिये खुलवाने के साथ ही उन्होनें अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये भी संघर्ष किया। उन्होंने महड में अस्पृश्य समुदाय को भी शहर की पानी की मुख्य टंकी से पानी लेने का अधिकार दिलाने कि लिये सत्याग्रह चलाया।
1 जनवरी 1927 को डॉ अम्बेडकर ने द्वितीय आंग्ल - मराठा युद्ध, की कोरेगाँव की लडा़ई के दौरान मारे गये भारतीय सैनिकों के सम्मान में कोरेगाँव विजय स्मारक मे एक समारोह आयोजित किया। यहाँ महार समुदाय से संबंधित सैनिकों के नाम संगमरमर के एक शिलालेख पर खुदवाये। 1927 में, उन्होंने अपना दूसरी पत्रिका बहिष्कृत भारत शुरू की, और उसके बाद रीक्रिश्टेन्ड जनता की। उन्हें बाँबे प्रेसीडेंसी समिति मे सभी यूरोपीय सदस्यों वाले साइमन आयोग 1928 में काम करने के लिए नियुक्त किया गया। इस आयोग के विरोध मे भारत भर में विरोध प्रदर्शन हुये, और जबकि इसकी रिपोर्ट को ज्यादातर भारतीयों द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया, डॉ अम्बेडकर ने अलग से भविष्य के संवैधानिक सुधारों के लिये सिफारिशों लिखीं।
पूना संधिअब तक डॉ अम्बेडकर आज तक की सबसे बडी़ अछूत राजनीतिक हस्ती बन चुके थे। उन्होंने मुख्यधारा के महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों की जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति उनकी कथित उदासीनता की कटु आलोचना की। अम्बेडकर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके नेता मोहनदास (महात्मा) गांधी की आलोचना की, उन्होने उन पर अस्पृश्य समुदाय को एक करुणा की वस्तु के रूप मे प्रस्तुत करने का आरोप लगाया। अम्बेडकर ब्रिटिश शासन की विफलताओं से भी असंतुष्ट थे, उन्होने अस्पृश्य समुदाय के लिये एक ऐसी अलग राजनैतिक पहचान की वकालत की जिसमे कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों का ही कोई दखल ना हो। 8 अगस्त 1930, को एक शोषित वर्ग के सम्मेलन के दौरान अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा, जिसके अनुसार शोषित वर्ग की सुरक्षा उसके सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतंत्र होने मे है।
हमें अपना रास्ता स्वयँ बनाना होगा और स्वयँ ... राजनीतिक शक्ति शोषितो की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज मे उनका उचित स्थान पाने मे निहित है। उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा.... उनको शिक्षित होना चाहिए .... एक बड़ी आवश्यकता उनकी हीनता की भावना को झकझोरने, और उनके अंदर उस दैवीय असंतोष की स्थापना करने की है जो सभी उँचाइयों का स्रोत है।
इस भाषण में अम्बेडकर ने कांग्रेस और गांधी द्वारा चलाये गये नमक सत्याग्रह की शुरूआत की आलोचना की। अम्बेडकर की आलोचनाओं और उनके राजनीतिक काम ने उसको रूढ़िवादी हिंदुओं के साथ ही कांग्रेस के कई नेताओं मे भी बहुत अलोकप्रिय बना दिया, यह वही नेता थे जो पहले छुआछूत की निंदा करते थे और इसके उन्मूलन के लिये जिन्होने देश भर में काम किया था। इसका मुख्य कारण था कि ये "उदार" राजनेता आमतौर पर अछूतों को पूर्ण समानता देने का मुद्दा पूरी तरह नहीं उठाते थे। अम्बेडकर की अस्पृश्य समुदाय मे बढ़ती लोकप्रियता और जन समर्थन के चलते उनको 1931 मे लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में, भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। यहाँ उनकी अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने के मुद्दे पर तीखी बहस हुई। धर्म और जाति के आधार पर पृथक निर्वाचिका देने के प्रबल विरोधी गांधी ने आशंका जताई, कि अछूतों को दी गयी पृथक निर्वाचिका, हिंदू समाज की भावी पीढी़ को हमेशा के लिये विभाजित कर देगी।
1932 मे जब ब्रिटिशों ने अम्बेडकर के साथ सहमति व्यक्त करते हुये अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की घोषणा की, तब गांधी ने इसके विरोध मे पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में आमरण अनशन शुरु कर दिया। गाँधी ने रूढ़िवादी हिंदू समाज से सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता को खत्म करने तथा, हिंदुओं की राजनीतिक और सामाजिक एकता की बात की। गांधी के अनशन को देश भर की जनता से घोर समर्थन मिला और रूढ़िवादी हिंदू नेताओं, कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं जैसे पवलंकर बालू और मदन मोहन मालवीय ने अम्बेडकर और उनके समर्थकों के साथ यरवदा मे संयुक्त बैठकें कीं। अनशन के कारण गांधी की मृत्यु होने की स्थिति मे, होने वाले सामाजिक प्रतिशोध के कारण होने वाली अछूतों की हत्याओं के डर से और गाँधी जी के समर्थकों के भारी दवाब के चलते अंबेडकर ने अपनी पृथक निर्वाचिका की माँग वापस ले ली। इसके एवज मे अछूतों को सीटों के आरक्षण की बात स्वीकार कर ली जो अंततः अछूतों के अधिक प्रतिनिधित्व मे परिलक्षित हुई। गाँधी ने इस पर अपना अनशन समाप्त कर दिया। बाद मे अम्बेडकर ने गाँधी जी की आलोचना करते हुये उनके इस अनशन को अछूतों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने और उन्हें उनकी माँग से पीछे हटने के लिये दवाब डालने के लिये गांधी का खेला एक नाटक करार दिया।
राजनीतिक जीवन 13 अक्टूबर 1935, को येओला नासिक मे अम्बेडकर एक रैली को संबोधित करते हुए.13 अक्टूबर 1935 को,अम्बेडकर को सरकारी लॉ कॉलेज का प्रधानचार्य नियुक्त किया गया और इस पद पर उन्होने दो वर्ष तक कार्य किया। इसके चलते अंबेडकर बंबई में बस गये, उन्होने यहाँ एक बडे़ घर का निर्माण कराया, जिसमे उनके निजी पुस्तकालय मे 50000 से अधिक पुस्तकें थीं। इसी वर्ष उनकी पत्नी रमाबाई की एक लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई। रमाबाई अपनी मृत्यु से पहले तीर्थयात्रा के लिये पंढरपुर जाना चाहती थीं पर अंबेडकर ने उन्हे इसकी इजाज़त नहीं दी। अम्बेडकर ने कहा की उस हिन्दु तीर्थ मे जहाँ उनको अछूत माना जाता है, जाने का कोई औचित्य नहीं है इसके बजाय उन्होने उनके लिये एक नया पंढरपुर बनाने की बात कही। भले ही अस्पृश्यता के खिलाफ उनकी लडा़ई को भारत भर से समर्थन हासिल हो रहा था पर उन्होने अपना रवैया और अपने विचारों को रूढ़िवादी हिंदुओं के प्रति और कठोर कर लिया। उनकी रूढ़िवादी हिंदुओं की आलोचना का उत्तर बडी़ संख्या मे हिंदू कार्यकर्ताओं द्वारा की गयी उनकी आलोचना से मिला। 13 अक्टूबर को नासिक के निकट येओला मे एक सम्मेलन में बोलते हुए अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन करने की अपनी इच्छा प्रकट की। उन्होने अपने अनुयायियों से भी हिंदू धर्म छोड़ कोई और धर्म अपनाने का आह्वान किया। उन्होने अपनी इस बात को भारत भर मे कई सार्वजनिक सभाओं मे दोहराया भी।
1936 में, अम्बेडकर ने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की, जो 1937 में केन्द्रीय विधान सभा चुनावों मे 15 सीटें जीती। उन्होंने अपनी पुस्तक जाति के विनाश भी इसी वर्ष प्रकाशित की जो उनके न्यूयॉर्क मे लिखे एक शोधपत्र पर आधारित थी। इस सफल और लोकप्रिय पुस्तक मे अम्बेडकर ने हिंदू धार्मिक नेताओं और जाति व्यवस्था की जोरदार आलोचना की। उन्होंने अस्पृश्य समुदाय के लोगों को गाँधी द्वारा रचित शब्द हरिजन पुकारने के कांग्रेस के फैसले की कडी़ निंदा की। अम्बेडकर ने रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद के लिए श्रम मंत्री के रूप में सेवारत रहे।
1941 और 1945 के बीच में उन्होंने बड़ी संख्या में अत्यधिक विवादास्पद पुस्तकें और पर्चे प्रकाशित किये जिनमे ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ भी शामिल है, जिसमें उन्होने मुस्लिम लीग की मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान की मांग की आलोचना की। वॉट कॉंग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स (काँग्रेस और गान्धी ने अछूतों के लिये क्या किया) के साथ, अम्बेडकर ने गांधी और कांग्रेस दोनो पर अपने हमलों को तीखा कर दिया उन्होने उन पर ढोंग करने का आरोप लगाया। उन्होने अपनी पुस्तक ‘हू वर द शुद्राज़?’( शुद्र कौन थे?) के द्वारा हिंदू जाति व्यवस्था के पदानुक्रम में सबसे नीची जाति यानी शुद्रों के अस्तित्व मे आने की व्याख्या की. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि किस तरह से अछूत, शुद्रों से अलग हैं। अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक पार्टी को अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन मे बदलते देखा, हालांकि 1946 में आयोजित भारत के संविधान सभा के लिए हुये चुनाव में इसने खराब प्रदर्शन किया। 1948 में हू वर द शुद्राज़? की उत्तरकथा द अनटचेबलस: ए थीसिस ऑन द ओरिजन ऑफ अनटचेबिलिटी (अस्पृश्य: अस्पृश्यता के मूल पर एक शोध) मे अम्बेडकर ने हिंदू धर्म को लताड़ा।
हिंदू सभ्यता .... जो मानवता को दास बनाने और उसका दमन करने की एक क्रूर युक्ति है और इसका उचित नाम बदनामी होगा। एक सभ्यता के बारे मे और क्या कहा जा सकता है जिसने लोगों के एक बहुत बड़े वर्ग को विकसित किया जिसे... एक मानव से हीन समझा गया और जिसका स्पर्श मात्र प्रदूषण फैलाने का पर्याप्त कारण है?
अम्बेडकर इस्लाम और दक्षिण एशिया में उसकी रीतियों के भी आलोचक थे। उन्होने भारत विभाजन का तो पक्ष लिया पर मुस्लिम समाज मे व्याप्त बाल विवाह की प्रथा और महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की घोर निंदा की। उन्होंने कहा, बहुविवाह और रखैल रखने के दुष्परिणाम शब्दों में व्यक्त नहीं किये जा सकते जो विशेष रूप से एक मुस्लिम महिला के दुःख के स्रोत हैं। जाति व्यवस्था को ही लें, हर कोई कहता है कि इस्लाम गुलामी और जाति से मुक्त होना चाहिए, जबकि गुलामी अस्तित्व में है और इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से समर्थन मिला है। हालाँकि कुरान में वर्णित ग़ुलामों के साथ उचित और मानवीय व्यवहार के बारे में पैगंबर के विचार प्रशंसायोग्य हैं लेकिन, इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है जो इस अभिशाप के उन्मूलन का समर्थन करता हो। अगर गुलामी खत्म भी हो जाये पर फिर भी मुसलमानों के बीच जाति व्यवस्था रह जायेगी।
उन्होंने लिखा कि मुस्लिम समाज मे तो हिंदू समाज से भी अधिक सामाजिक बुराइयाँ हैं और मुसलमान उन्हें " भाईचारे " जैसे नरम शब्दों के प्रयोग से छुपाते हैं। उन्होंने मुसलमानो द्वारा अर्ज़ल वर्गों के खिलाफ भेदभाव जिन्हें " निचले दर्जे का " माना जाता था के साथ ही मुस्लिम समाज में महिलाओं के उत्पीड़न की दमनकारी पर्दा प्रथा की भी आलोचना की। उन्होंने कहा हालाँकि पर्दा हिंदुओं मे भी होता है पर उसे धर्मिक मान्यता केवल मुसलमानों ने दी है। उन्होंने इस्लाम मे कट्टरता की आलोचना की जिसके कारण इस्लाम की नातियों का अक्षरक्ष अनुपालन की बद्धता के कारण समाज बहुत कट्टर हो गया है और उसे को बदलना बहुत मुश्किल हो गया है। उन्होंने आगे लिखा कि भारतीय मुसलमान अपने समाज का सुधार करने में विफल रहे हैं जबकि इसके विपरीत तुर्की जैसे देशों ने अपने आपको बहुत बदल लिया है।
"सांप्रदायिकता" से पीड़ित हिंदुओं और मुसलमानों दोनों समूहों ने सामाजिक न्याय की माँग की उपेक्षा की है।
हालांकि वे मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग की विभाजनकारी सांप्रदायिक रणनीति के घोर आलोचक थे पर उन्होने तर्क दिया कि हिंदुओं और मुसलमानों को पृथक कर देना चाहिए और पाकिस्तान का गठन हो जाना चाहिये क्योकि एक ही देश का नेतृत्व करने के लिए, जातीय राष्ट्रवाद के चलते देश के भीतर और अधिक हिंसा पनपेगी। उन्होंने हिंदू और मुसलमानों के सांप्रदायिक विभाजन के बारे में अपने विचार के पक्ष मे ऑटोमोन साम्राज्य और चेकोस्लोवाकिया के विघटन जैसी ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख किया।
उन्होंने पूछा कि क्या पाकिस्तान की स्थापना के लिये पर्याप्त कारण मौजूद थे? और सुझाव दिया कि हिंदू और मुसलमानों के बीच के मतभेद एक कम कठोर कदम से भी मिटाना संभव हो सकता था। उन्होंने लिखा है कि पाकिस्तान को अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करना चाहिये। कनाडा जैसे देशों मे भी सांप्रदायिक मुद्दे हमेशा से रहे हैं पर आज भी अंग्रेज और फ्रांसीसी एक साथ रहते हैं, तो क्या हिंदु और मुसलमान भी साथ नहीं रह सकते। उन्होंने चेताया कि दो देश बनाने के समाधान का वास्तविक क्रियान्वयन अत्यंत कठिनाई भरा होगा। विशाल जनसंख्या के स्थानान्तरण के साथ सीमा विवाद की समस्या भी रहेगी। भारत की स्वतंत्रता के बाद होने वाली हिंसा को ध्यान मे रख कर यह भविष्यवाणी कितनी सही थी।
संविधान निर्माणअपने विवादास्पद विचारों, और गांधी और कांग्रेस की कटु आलोचना के बावजूद अम्बेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी जिसके कारण जब, 15 अगस्त, 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व मे आई तो उसने अम्बेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 29 अगस्त 1947 को, अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना कि लिए बनी के संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। अम्बेडकर ने मसौदा तैयार करने के इस काम मे अपने सहयोगियों और समकालीन प्रेक्षकों की प्रशंसा अर्जित की। इस कार्य में अम्बेडकर का शुरुआती बौद्ध संघ रीतियों और अन्य बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन बहुत काम आया।
संघ रीति मे मतपत्र द्वारा मतदान, बहस के नियम, पूर्ववर्तिता और कार्यसूची के प्रयोग, समितियाँ और काम करने के लिए प्रस्ताव लाना शामिल है। संघ रीतियाँ स्वयं प्राचीन आदिवासी गणराज्यों जैसे शाक्य और लिच्चवि की शासन प्रणाली के निदर्श (मॉडल) पर आधारित थीं। अम्बेडकर ने हालांकि उनके संविधान को आकार देने के लिए पश्चिमी मॉडल इस्तेमाल किया है पर उसकी भावना भारतीय है या कहें आदिवासी है।
अम्बेडकर द्वारा तैयार किया गया संविधान पाठ मे संवैधानिक गारंटी के साथ व्यक्तिगत नागरिकों को एक व्यापक श्रेणी की नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा प्रदान की जिनमें, धार्मिक स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत और सभी प्रकार के भेदभावों को गैर कानूनी करार दिया गया। अम्बेडकर ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की वकालत की, और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए सिविल सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों की नौकरियों मे आरक्षण प्रणाली शुरू के लिए सभा का समर्थन भी हासिल किया, भारत के विधि निर्माताओं ने इस सकारात्मक कार्यवाही के द्वारा दलित वर्गों के लिए सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के उन्मूलन और उन्हे हर क्षेत्र मे अवसर प्रदान कराने की चेष्टा की जबकि मूल कल्पना मे पहले इस कदम को अस्थायी रूप से और आवश्यकता के आधार पर शामिल करने की बात कही गयी थी. 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया। अपने काम को पूरा करने के बाद, बोलते हुए, अम्बेडकर ने कहा :
मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मज़बूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नही होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अधम था।
1951 मे संसद में अपने हिन्दू कोड बिल के मसौदे को रोके जाने के बाद अम्बेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया इस मसौदे मे उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की मांग की गयी थी। हालांकि प्रधानमंत्री नेहरू, कैबिनेट और कई अन्य कांग्रेसी नेताओं ने इसका समर्थन किया पर संसद सदस्यों की एक बड़ी संख्या इसके खिलाफ़ थी। अम्बेडकर ने 1952 में लोक सभा का चुनाव एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे लड़ा पर हार गये। मार्च 1952 मे उन्हें संसद के ऊपरी सदन यानि राज्य सभा के लिए नियुक्त किया गया और इसके बाद उनकी मृत्यु तक वो इस सदन के सदस्य रहे।
बौद्ध धर्म मे परिवर्तनसन् 1950 के दशक में अम्बेडकर बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध भिक्षुओं व विद्वानों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका(तब सीलोन) गये। पुणे के पास एक नया बौद्ध विहार को समर्पित करते हुए, अम्बेडकर ने घोषणा की कि वे बौद्ध धर्म पर एक पुस्तक लिख रहे हैं, और जैसे ही यह समाप्त होगी वो औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लेंगे। 1954 में अम्बेडकर ने बर्मा का दो बार दौरा किया; दूसरी बार वो रंगून मे तीसरे विश्व बौद्ध फैलोशिप के सम्मेलन में भाग लेने के लिए गये। 1955 में उन्होने भारतीय बुद्ध महासभा या बौद्ध सोसाइटी ऑफ इंडिया की स्थापना की। उन्होंने अपने अंतिम लेख , द बुद्ध एंड हिज़ धम्म को 1956 में पूरा किया। यह उनकी मृत्यु के पश्चात प्रकाशित हुआ।
14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में अम्बेडकर ने खुद और उनके समर्थकों के लिए एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह का आयोजन किया. अम्बेडकर ने एक बौद्ध भिक्षु से पारंपरिक तरीके से तीन रत्न ग्रहण और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इसके बाद उन्होने एक अनुमान के अनुसार लगभग 500000 समर्थको को बौद्ध धर्म मे परिवर्तित किया। नवयान लेकर अम्बेडकर और उनके समर्थकों ने हिंदू धर्म और हिंदू दर्शन की स्पष्ट निंदा की और उसे त्याग दिया। इसके बाद वे नेपाल में चौथे विश्व बौद्ध सम्मेलन मे भाग लेने के लिए काठमांडू गये. उन्होंने अपने अंतिम पांडुलिपि बुद्ध या कार्ल मार्क्स को 2 दिसंबर 1956 को पूरा किया।
मृत्यु1948 से, अम्बेडकर मधुमेह से पीड़ित थे। जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो नैदानिक अवसाद और कमजोर होती दृष्टि से ग्रस्त थे। राजनीतिक मुद्दों से परेशान अम्बेडकर का स्वास्थ्य बद से बदतर होता चला गया और 1955 के दौरान किये गये लगातार काम ने उन्हें तोड़ कर रख दिया। अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसंबर 1956 को अम्बेडकर की मृत्यु नींद में दिल्ली में उनके घर मे हो गई।
7 दिसंबर को चौपाटी समुद्र तट पर बौद्ध शैली मे अंतिम संस्कार किया गया जिसमें सैकड़ों हजारों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों भाग लिया।
मृत्युपरांत अम्बेडकर के परिवार मे उनकी दूसरी पत्नी सविता अम्बेडकर रह गयी थीं जो, जन्म से ब्राह्मण थीं पर उनके साथ ही वो भी धर्म परिवर्तित कर बौद्ध बन गयी थीं। विवाह से पहले उनकी पत्नी का नाम शारदा कबीर था। सविता अम्बेडकर की एक बौद्ध के रूप में सन 2002 में मृत्यु हो गई, अम्बेडकर के पौत्र, प्रकाश यश्वंत अम्बेडकर भारिपा बहुजन महासंघ का नेतृत्व करते है और भारतीय संसद के दोनों सदनों मे के सदस्य रह चुके है।
कई अधूरे टंकलिपित और हस्तलिखित मसौदे अम्बेडकर के नोट और पत्रों में पाए गए हैं। इनमें वैटिंग फ़ोर ए वीसा जो संभवतः 1935-36 के बीच का आत्मकथानात्मक काम है, और अनटचेबल, ऑर द चिल्ड्रन ऑफ इंडियाज़ घेट्टो जो 1951 की जनगणना से संबंधित है।
एक स्मारक अम्बेडकर के दिल्ली स्थित उनके घर 26 अलीपुर रोड में स्थापित किया गया है। अम्बेडकर जयंती पर सार्वजनिक अवकाश रखा जाता है। 1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। कई सार्वजनिक संस्थान का नाम उनके सम्मान में उनके नाम पर रखा गया है जैसे हैदराबाद, आंध्र प्रदेश का डॉ. अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय, बी आर अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय- मुजफ्फरपुर , डॉ. बाबासाहेब् अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नागपुर में है, जो सोनेगांव हवाई अड्डे के नाम से जाना जाता था. अम्बेडकर का एक बड़ा आधिकारिक चित्र भारतीय संसद भवन में प्रदर्शित किया गया है।
मुंबई मे उनके स्मारक हर साल लगभग पाँच लाख लोग उनकी वर्षगांठ (14 अप्रैल) पुण्यतिथि (6 दिसम्बर) और धम्म चक्र परिवर्तन् दिन 14 अक्टूबर नागपुर में, उन्हे अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इकट्ठे होते हैं। सैकड़ों पुस्तकालय स्थापित हो गये हैं, और लाखों रुपए की पुस्तकें बेची जाती हैं। अपने अनुयायियों को उनका संदेश था " शिक्षित बनो !!!, संगठित रहो!!!, आंदोलन करो !!!".ग्रामीण जीवन पर अम्बेडकर बनाम गांधीअम्बेडकर, महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उग्र आलोचक थे. उनके समकालीनों और आधुनिक विद्वानों ने उनके महात्मा गांधी (जो कि पहले भारतीय नेता थे जिन्होने अस्पृश्यता और भेदभाव करने का मुद्दा सबसे पहले उठाया था) के विरोध की आलोचना है।
गांधी का दर्शन भारत के पारंपरिक ग्रामीण जीवन के प्रति अधिक सकारात्मक, लेकिन रूमानी था, और उनका दृष्टिकोण अस्पृश्यों के प्रति भावनात्मक था उन्होने उन्हें हरिजन कह कर पुकारा। अम्बेडकर ने इस विशेषण को सिरे से अस्वीकार कर दिया। उन्होंने अपने अनुयायियों को गांव छोड़ कर शहर जाकर बसने और शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया।
आलोचना और विरासतअम्बेडकर की सामाजिक और राजनैतिक सुधारक की विरासत का आधुनिक भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा है। स्वतंत्रता के बाद के भारत मे उनकी सामाजिक और राजनीतिक सोच को सारे राजनीतिक हलके का सम्मान हासिल हुआ। उनकी इस पहल ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों मे आज के भारत की सोच को प्रभावित किया। उनकी यह् सोच आज की सामाजिक, आर्थिक नीतियों, शिक्षा, कानून और सकारात्मक कार्रवाई के माध्यम से प्रदर्शित होती है। एक विद्वान के रूप में उनकी ख्याति उनकी नियुक्ति स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री और संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में कराने मे सहायक सिद्ध हुयी। उन्हें व्यक्ति की स्वतंत्रता में अटूट विश्वास था और उन्होने समान रूप से रूढ़िवादी और जातिवादी हिंदू समाज और इस्लाम की संकीर्ण और कट्टर नीतियों की आलोचना की है। उसकी हिंदू और इस्लाम की निंदा ने उसको विवादास्पद और अलोकप्रिय बनाया है, हालांकि उनके बौद्ध धर्म मे परिवर्तित होने के बाद भारत में बौद्ध दर्शन में लोगों की रुचि बढ़ी है।
अम्बेडकर के राजनीतिक दर्शन के कारण बड़ी संख्या में दलित राजनीतिक दल, प्रकाशन और कार्यकर्ता संघ अस्तित्व मे आये है जो पूरे भारत में सक्रिय रहते हैं, विशेष रूप से महाराष्ट्र में। उनके दलित बौद्ध आंदोलन को बढ़ावा देने से बौद्ध दर्शन भारत के कई भागों में पुनर्जागरित हुआ है। दलित कार्यकर्ता समय समय पर सामूहिक धर्म परिवर्तन के समारोह आयोजित उसी तरह करते रहते हैं जिस तरह अम्बेडकर ने 1956 मे नागपुर मे आयोजित किया था।
कुछ विद्वानों, जिनमें से कुछ प्रभावित जातियों से है का विचार है कि अंग्रेज अधिकतर जातियों को एक नज़र से देखते थे और अगर उनका राज जारी रहता तो समाज से काफी बुराईयों को समाप्त किया जा सकता था। यह राय ज्योतिबा फुले समेत कई थी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने रखी है।
नारायण राव काजरोलकर ने अम्बेडकर की आलोचना की है क्योंकि उन्हें विश्वास था कि वे खर्च बजाय सब लोगों के बीच, सिर्फ अपनी ही जाति यानि महार पर खर्च करने मे करते थे। सीताराम नारायण शिवतारकर भी इससे सहमत है।
आधुनिक भारत में कुछ लोग, अम्बेडकर के द्वारा शुरू किए गए आरक्षण को अप्रासांगिक और प्रतिभा विरोधी मानते हैं।
अम्बेडकर के बादपिछले वर्षों में लगातार बौद्ध समूहों और रूढ़िवादी हिंदुओं के बीच हिंसक संघर्ष हुये है. 1994 में मुंबई में जब किसी ने अम्बेडकर की प्रतिमा के गले में जूते की माला से लटका कर उनका अपमान किया था तो चारों ओर एक सांप्रदायिक हिंसा फैल गयी थी, और हड़ताल के कारण शहर एक सप्ताह से अधिक तक बुरी तरह प्रभावित हुआ था। जब अगले वर्ष इसी तरह की गड़बड़ी हुई तो एक अम्बेडकर प्रतिमा को तोड़ा गया। तमिलनाडु में ऊंची जाति के समूह भी बौद्धों के खिलाफ हिंसा में लगे हुए हैं। इसके अलावा, कुछ परिवर्तित बौद्धों ने हिंदुओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया (2006, महाराष्ट्र में दलितों द्वारा विरोध) और हिंदू मंदिरों मे गन्दगी फैला दी, और देवताओं के स्थान पर अम्बेडकर के चित्र लगा दिये। एक कट्टरपंथी अम्बेडकरवादी संस्था बौद्ध पैंथर्स मूवमेंट ने तो अम्बेडकर के बौद्ध धर्म के आलोचकों की हत्या तक करने का प्रयास किया है।
फिल्मजब्बार पटेल ने सन 2000 मे डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर नामक हिन्दी फिल्म बनाई थी। इसमे अम्बेडकर की भूमिका माम्मूटी मे निभाई थी. भारत के राष्ट्रीय फ़िल्म विकास निगम और सामाजिक न्याय मंत्रालय के द्वारा प्रायोजित, यह फिल्म प्रदर्शन से पहले एक लंबी अवधि तक विवादो मे फँसी रही।
यू. सी. एल. ए. मे मानव शास्त्र के प्रोफेसर और ऐतिहासिक नृवंश विवरणकार, डॉ. डेविड ब्लुंडेल फिल्मों की एक श्रृंखला बनाने की दीर्घकालिक परियोजना बनाई है जो उन घटनाओं पर आधारित है जो भारत में समाज कल्याण की स्थिति के बारे में ज्ञान और इच्छा को प्रभावित करती है। ए राएज़िग लाइट डॉ. बी आर अम्बेडकर के जीवन और भारत में सामाजिक कल्याण की स्थिति पर आधारित है।

Thursday, December 4, 2008

रंगीला रतन , भाग-३८

रमेश को अपनी भूल का एहसास होने लगा... हसीं महिला के पहलू में लेटकर उसको टाइम पास वाली बात नहीं करनी चाहिए थी... उसने अगले ही पल रंजना की गोलाइयों को दबाना शुरू कर दिया... रंजना का जिस्म ज्वालामुखी की तरह तप रहा था... उसने वही आग अब अपने बदन में लगानी चाही ... रंजना उसकी भावनाओं से अनभिज्ञ नहीं थी... वह तो हर हाल में रवि के साथ जीवन का सर्वश्रेष्ट सुख भोगना चाहती थी... उसने अपने बैग से एक डीवीडी निकालकर चालू करदी... उसके अन्दर बड़े भयानक द्रश्य थे... जैसे ही फ़िल्म शुरू हुई, परदे पर तबाही मचनी शुरू हो गयी... एक गठे हुए जिस्म का लड़का अपने से दुगुनी उम्र की महिला पर हावी हो रहा था... यह इतना खतरनाक सीन था की इसे देखते ही रवि के दिलो -दिमाग में वासना की चिंगारियां सुलगने लगीं... वह अब और भी आक्रामक हो गया ... इसका असर ये हुआ की रंजना की साँसें पहले से भी तेज चलने लगीं....वह कह रही थी-
- कैसा लग रहा है रवि ? ऐसी फ़िल्म इससे पहले कभी देखि की नहीं ?
रवि- बिल्कुल नहीं... कहाँ से देखता ? कभी फुर्सत ही नहीं मिलती... यहाँ तक की सादा फ़िल्म देखने का मौका भी कम ही मिलता है... अब इसे देख रहा हूँ तो अच्छा लग रहा है... जाते-जाते कुछ फिल्में छोड़ती जाना ....
रंजना- छोड़ तो खैर जाउंगी मगर इसे देखकर जब तुम्हारी काम वासना जाग्रत हो उठेगी तो क्या करोगे ?
रवि - अपने आपको संभालने की क्षमता मेरे पास है... मैं तुम्हारे सिवाय किसी और लड़की के बारे में सोच भी नहीं सकता... मैं इन्तजार करूँगा... जब तुम आओगी, तभी प्यार की बातें होंगी...
टीवी स्क्रीन पर अब जो सीन उभर रहे थे, वे पहले से ज्यादा कामुक थे... रवि ने देखा की फ़िल्म के पात्र रति क्रीडा में लीन थे... रवि ने उत्सुकता से पूछा -
-इस फ़िल्म के कलाकार सचमुच ऐसा कर रहे हैं या फ़िर ये महज़ कैमरा की कारस्तानी है ?
रंजना- कैमरा इतना सब नहीं कर सकता ... जो ये हो रहा है, वाकई करना पड़ा होगा... बिना किए फ़िल्म सम्भव नहीं ... फर्क अगर कैमरे से ही हो जाए तो फ़िर हीरो-हीरो इन की जरूरत ही क्या पड़े ?
रवि अब आपे से बाहर होने लगा... वह बेकाबू होने लगा था... उसकी आंखों की पुतलियाँ सुर्ख लाल हो चुकी थीं... रंजना का बदन भी तपने लगा... जब उसने कातिल अंगडाई ली तो रवि ने उसकी चिकनी जाँघों पर हाथ फिराना शुरू कर दिया ... दोनों ही क्लाइमेक्स की तरफ़ बढ़ने के लिए बेताब थे... रंजना ने जोश में भरकर उसको अपनी तरफ़ खींच लिया... रवि और उसके होठ आपस में मिल गए... दोनों तरफ़ से रस्साकसी तेज होने लगी... रवि ने कहा-
- ऐसा लगता है जैसे मेरा बदन फट जायेगा... बड़ी बैचैनी महसूस हो रही है... आह, मेरी जान बचालो...
रंजना-- इस आग में तुमने मुझे भी झुलसा दिया है, मेरी नस-नस में अग्नि प्रवाहित हो चुकी है... अब तो इस आग को जली ही रहने दो... ताकि इसका एहसास हमेशा -हमेशा के लिए बना रहे...
रवि- ऐसा न हो की इश्क की इस आग में हमारा वजूद ही भस्म हो जाए...



नई दिल्ली : मुंबई हमले की ज़िम्मेदारी लेने वाले आतंकवादी संगठन डेकन मुजाहिदीन ने बुधवा
र रात एक और आतंकी ईमेल भेजा। संगठन ने इस बार देश के एयरपोर्ट्स को निशाना बनाने की बात कही है। इस आतंकी ईमेल में 3 से 7 दिसंबर के बीच नई दिल्ली, चेन्नै और बेंगलुरु एयरपोर्ट्स पर आतंकी हमला करने की धमकी दी गई है। यह ईमेल नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनैशनल एयरपोर्ट को भेजा गया। इस ईमेल के मद्देनज़र इन सभी एयरपोर्ट्स पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। खुफिया सूत्रों के मुताबिक डेकन मुजाहिदीन की ओर से पहले आए ईमेल की तरह यह ईमेल भी रूस के रिले सर्वर्स से भेजा गया है और इसे सऊदी अरब में ट्रेस किया गया। इससे पहले डेकन मुजाहिदीन द्वारा भेजे गए आतंकी ईमेल को इंटरपोल ने ट्रैक किया था जिसे लाहौर में ट्रेस किया गया था। खुफिया एजंसियों का मानना है कि डेकन मुजाहिदीन लश्कर का ही संगठन है और इसे खासतौर पर मुंबई में हमले करने के लिए तैयार किया गया।

Wednesday, December 3, 2008

रंगीला रतन-भाग-37

रंजना - मन के अन्दर इतना डर बैठ गया है की अपनी खुशियाँ छिनने का गम अक्सर सताता रहता है... दुःख की कोई एक परछाई भी जीवन भर परेशान करने के लिए लिए काफी होती है... इसीलिए तो कहती हूँ, जब भी कोई सुख मिले, उसको हमेशा के लिए आत्मसात कर लेना चाहिए.... रमेश की बेवफाई ने मुझे डरपोक बना डाला है... इतनी बड़ी डरपोक की रस्सी को भी सांप समझ लेती हूँ....
रवि- हर इंसान एक जैसा नहीं होता... तुम्हें अपने मन में बसी दहशत को हर हाल में निकालना ही होगा... वरना जीवन भर फ़िर किसी पर भरोसा नहीं कर पाओगी... रमेश ने तुम्हारे साथ जो जुल्म किया है , भगवान् उसको कभी माफ़ नहीं कर सकता ... कहावत है की विष दे दो, मगर किसी को विश्वाश नहीं देना चाहिए.... उसके बारे में कुछ और बताओ न... उसने रागिनी और प्रज्ञा के बारे में और क्या कहा ?
रंजना- उसने प्यार में आकर मुझे उन दोनों के बारे में सब कुछ बता दिया था... उसने कहा की प्रज्ञा और रागिनीउससे खूब आनंद उठा रही थीं... वे उसको कुछ रुपये देकर अपनी जिस्मानी प्यास को शांत कर लिया करती थी... यहाँ तक की मेडिकल में उसका एडमिशन भी प्रज्ञा ने ही कराया था...
रवि- अच्छा, तुम्हारी मुलाक़ात वहीं पर रमेश से हुई थी ?
रंजना- हाँ, हम साथ-साथ पढ़ते थे... मैंने देखा था की ज्यादातर डॉक्टर्स की पत्नियाँ भी डाक्टर्स ही होती हैं... इसी कारण मैंने भी यह तय किया की रमेश को अपना जीवन साथी बनाकर आराम से जिन्दगी गुजारुंगी... भविष्य में मेरी ख़ुद का अस्पताल खोलने की योजना थी... सोचा की दोनों मिलकर यह सब बखूबी कर लेंगे ... मगर वह तो बहुत बड़ा छलिया निकला ... उसकी नीयत मेरे पिता की दौलत पर थी... वह मेरा सहारा लेकर तुंरत करोड़ पति बनना चाहता था... वह एक नंबर का झूठा और ड्रामेबाज था... उसको समझने में मुझे बहुत वक्त लगा... मुझे उसीने बताया की एक बार शारीरिक सम्बन्ध बनाने के बाद प्रज्ञा उस पर जी जान से फ़िदा हो गयी थी... एक दिन वह रमेश से बोली-
- ओह, रमेश, तुम तो मेरे दिल पर छा गए हो यार ... मन से हटते ही नहीं... सच कहूं तो आजतक मुझे कभी भी इतना आनंद नहीं मिला ,जितना की तुमने दिया है.... तुम सच्चे मर्द हो... ऐसा जांबाज मर्द जो औरत को सम्पूर्ण सुख-संतुष्टि दे सकता है... ऐसा कूव्वत मेरे ख़याल से किसी और मर्द में नहीं है...
रमेश- ये आप कैसे कह सकती हैं ?
प्रज्ञा- क्योंकि तुम वो अकेले नहीं हो जिसके साथ मेरे शारीरिक सम्बन्ध हैं... अब तक मैं एक से बढ़कर एक लड़कों के साथ मजे लूट चुकी हूँ ... तुम उन सबसे अलग हो यार... तुम्हारी बात सबसे जुदा है... ऐसा पावर कहाँ से लाते हो ? कहीं सांड हा तेल तो इस्तेमाल नहीं करते ?
रमेश - क्या कहती हो? क्या इस तरह के किसी तेल से जिस्म के अन्दर जोश और मर्दानगी आ सकती है ?
प्रज्ञा - अगर तुम्हारा जैसा मर्द उसको इस्तेमाल करले तो क़यामत आ जायेगी... जब अभी तुम्हारा यह हाल है तो आगे क्या होगा ?
रमेश- अब पूरा वक्त तारीफ़ में ही गुजारने का इरादा है क्या ?