Monday, May 10, 2010

भाग-२

कम्मो ने शिल्पा को अपने होटल के कमरे में खाने पर आमंत्रित किया , दोनों समय पास करने के लिए कहानियाँ सुनाने लगीं , कम्मो ने उसे अपने कमरे पर ही रोक लिया , तब अनुभव सुनाये हुए शिल्प बोली-
-ठीक है सुनो, राहुल और संगीता के बीच पिछले तीन बरस से डेटिंग का सिलसिला ठीक-ठाक बल्कि यूँ कहिए बहुत अच्छा चल रहा था। अचानक राहुल कुछ फासला रखने लगा। संगीता को उसकी यह हरकत समझ में नहीं आई। वह सोचने लगी कि आखिर उससे क्या गलती हो गई?
दरअसल, अन्य लड़कियों की तरह संगीता को भी नहीं मालूम था कि वाई-क्रोमोसोम प्राणी बहुत अजीब होते हैं। वे सिंगल स्टेटस को खोने से बहुत डरते हैं। संगीता ने शादी का जिक्र किया था और तभी से राहुल में बदलाव आने लगा था।
शादी लड़कियों के लिए तो एक मील का पत्थर होता है जबकि लड़कों के लिए यह स्वतंत्र जीवन को खोना होता है और इसलिए यह तालमेल बिठाना उनके लिए कठिन होता है। बहरहाल, अगर संगीता इस बात को समझ जाए कि पुरुषों का दिमाग किस तरह से कार्य करता है, तो वह इस कठिन राह से आसानी से गुजर जाएगी औरराहुल हमेशा के लिए उसका हो जाएगा।
कम्मो- वाव , तब क्या हुआ ?
शिल्पा- डेट की रातों को दोस्तों की महफिलों में तब्दील करने का मतलब यह है कि वह आपको बतलाना चाह रहा है कि अब आप उसकी वरीयता सूची पर नहीं हैं और वह आपसे शादी नहीं करना चाहता।
बातचीत के दौरान सर्वनाम का प्रयोग बहुत महत्वपूर्ण होता है, खासकर जब मुद्दा संबंध का हो। लड़कियाँ जब 'मैं' की जगह 'हम' का प्रयोग करने लगती हैं तो लड़कों को लगने लगता है कि उनकी आजादी और कुँवारेपन के दिन खत्म होने जा रहे हैं। इस 'हम' से लड़के इस वजह से भी डरते हैं कि उन्हें लगता है कि लड़कियाँ अब उनके जीवन को नियंत्रित करने जा रही हैं।
इस समस्या से बचने का बेहतर तरीका यह है कि अपनी गुफ्तगू में आप 'हम' का इस्तेमाल बहुत सावधानीपूर्वक करें। मसलन, यह कहने की जगह 'इस संडे हम क्या कर रहे हैं?' यह कहें 'मैं सोच रही थी इस संडे अगर हम फिल्म देखने चले जाएँ, तो अच्छा रहेगा, तुम्हारा क्या ख्याल है?' इस तरह सर्वनाम का प्रयोग करने से आप यह नहीं दर्शातीं कि आप उसके जीवन को नियंत्रण में करना चाह रही हैं।
विश्वास दिलाएँ कि आप दो नहीं एक कैम्प पर यकीन करती हैं
शादीशुदा जीवन में प्रवेश करने से लड़के इसलिए भी डरते हैं कि उनके परिवार के सदस्यों से आने वाली बहू का रवैया न जाने किस किस्म का हो? इसलिए इस संदर्भ में भी लड़के को विश्वास दिलाना आवश्यक होता है। खासकर इसलिए भी क्योंकि लड़का ऐसी स्थिति में नहीं होना चाहता जहाँ उसे परिवार या आप में से किसी एक की तरफदारी करनी पड़े।
यही बात उसके दोस्तों के संदर्भ में भी लागू होती है। यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि एक लड़के के जीवन में उसके दोस्त और उसकी गर्लफ्रेंड दो महत्वपूर्ण कैम्प होते हैं। उसे ऐसा मजबूर न किया जाए कि वह एक कैम्प का होकर रह जाए। कहने का अर्थ यह है कि दोनों कैम्पों में तालमेल बिठाने की आवश्यकता है।
आजकल यह फैशन नहीं रहा है कि प्रपोज सिर्फ लड़का ही करे। लड़की भी प्रपोज कर सकती है। लेकिन प्रपोज जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए। अचानक या बिना सोचे-समझे या हालात को साजगार बनाए प्रपोज करने से लड़का असमंजस में पड़ सकता है। इसलिए प्रपोज करने से पहले स्थिति को टटोलकर देख लेना चाहिए।
मसलन, बातों-बातों में आप उससे यह जिक्र करें कि किस तरह आपकी सहेली और उसके ब्वॉयफ्रेंड ने जीवनभर साथ रहना तय किया है। इस पर उसकी प्रतिक्रिया को गौर से देखें। उसकी प्रतिक्रिया से आपको यह अंदाजा हो जाएगा कि वह स्वयं शादी के लिए तैयार है या नहीं।

Sunday, May 9, 2010

प्यार से प्यारा , यार हमारा

कम्मो अकेली ही मुंबई आ गयी . दिखने में वह बेहद सुन्दर थी लेकिन उसने जान बूझकर अपना हुलिया कुछ ऐसा बिगाड़ लिया जिससे की किसी को वह ज्यादा खूबसूरत न लगे , मगर जवानी की निश्जानियों का क्या करती , उनको छिपाना तो मुश्किल था, कैसे छिपाती अपने यौवन की गोलाइयों को. जितना छिपाने की कोशिश करती वह उतनी ही ज्यादा दिखाई देती थीं, उसने किसीको बाते नहीं की वह मुंबई में अकेली है . उसे एक और लड़की मिल गयी . उसका नाम था शिल्पा . कुछ देर में ही वे दोनों अच्छी तारा से घुल मिल गयी . आखिर कम्मो ने बता ही दिया की वह सिंगल है . तपाक से शिल्पा बोली-
-क्या हुआ, जो आप सिंगल हैं और जल्दी किसी के साथ जुड़ने के लिए तैयार भी नहीं। ऎसे में कभी-कभी कुछ परेशानियां पेश आती हैं। फैसला लेना मुश्किल लगता है।अगर
आप अकेली हैं और खाने के लिए बाहर जाने का मन है, लेकिन साथ जाने के लिए कोई भी नहीं है। ऎसे में अधिकांश लोग बाहर जाने का इरादा ही त्याग देते हैं। आप ऎसा न करें। कुछ बातों को ध्यान में रखकर आप अकेले ही "डाइनिंग आउट" का लुत्फ उठा सकती हैं और अकेले होने का एहसास भी नहीं सताएगा।
अपने साथ कोई अच्छी मैगजीन, बुक या न्यूज पेपर रखें। यह आपको किसी दूसरे के फोकस के एहसास से बचाएंगे और आप असहज महसूस नहीं करेंगी।
खाना ऑर्डर करने के बाद उसके आने तक का समय अच्छा संगीत सुनकर पास कर सकती हैं। अपने साथ आईपॉड रखें।
रेस्त्रां में दूसरों को खुद को घूरने से रोका नहीं जा सकता, इसलिए अपना ध्यान अपने खाने पर ही रखें और हर निवाले का आनंद लें। दूसरों की वजह से जल्दबाजी में खाना खत्म कर भागने की कोई जरूरत नहीं है। आत्मविश्वास बनाए रखें।
किसी खुशदिल और हंसोड़ दोस्त के साथ बाहर जाने से अच्छा विकल्प और क्या होगा। उसके साथ रेस्त्रां जाएं या फिर दोनों की रूचि जिसमें हो वहां यानी-शॉपिंग! एक दूसरे के मेकओवर के लिए एक दूसरे को अच्छे आईडिया दें और एक दूसरे की कमियां और अच्छाइयां बताएं।
जब तक सिंगल हैं अपनी हॉबीज को पूरा करें। जो भी चाहती हैं कर लें, योग करना है या फिर अपनी पसंद के नॉवल पढ़ने हैं। ऎसे कामों की लिस्ट बना लें और समय तय करें।
यही समय है जब आप अपने करिअर पर ध्यान दे सकते हैं। अपने सारे प्रयास इस ओर लगा दें। करिअर अचीवमेंट्स आपके आत्मविश्वास को बढ़ाने में सहायक होंगे। इसके बाद जब भी आप डेटिंग शुरू करेंगे तो यही कॉन्फिडेंस आपकी रिलेशनशिप में भी मददगार साबित होगा।
कम्मो-इतना बड़ा भाषण ? थकती नहीं हो तुम ?
शिल्पा- हा हा हा . पहले ये बताओ की कम्प्यूटर जानती हो ? अगर हाँ तो ब्लॉग्स आपको दूसरों से संपर्क को मजबूत बनाते हैं। अपना ब्लॉग बनाएं और खुद से जुड़ी हर चीज का अनुभव दूसरों से शेयर करें चाहे वह टे्रवल, ब्यूटी, सेलिब्रिटी या केवल गॉसिप ही क्यों न हो। आपके जैसे लोग आपसे जुड़ते जाएंगे। दोस्तों का ग्रुप बनाएं और हर तरह के मुद्दों पर बातचीत करें। दूसरों के सतत संपर्क में बने रहने का यही बेहतर तरीका है।
खुद को जानने का सबसे अच्छा तरीका है ट्रेवलिंग। अपनी आजादी को अच्छे से एंजॉय करें। ट्रिप का इंतजाम करने से लेकर हर चीज खुद मैनेज करें। ऎसी जगह जाएं, जहां आपकी जाने की तमन्ना रही हो। इसके अलावा वीकेंड पर भी बाहर जाने के बारे में सोचा जा सकता है।और फिर मैं यानी तुम्हारे दोस्त शिल्पा तो तुम्हारे साथ मौजूद है ही .

Friday, May 7, 2010

pyar ka prinda bhaag-86

माफी चाहता हूँ माँ, आप जानती हैं मेरा मकसद क्या है ? और हाँ, मियो आपको बताना ही भूल गयी . यह चंदाबाई है आपकी बहू. इसे आशीर्वाद दो माँ. हम दोनों ने शादी करली है. कानूनी तौर पर नहीं बल्कि दिली तौर पर . हमने अपने दिल में तय कर लिया है की हम दोनों पति, पत्नी की तरह रहेंगे . जब मैं कानूनी रूप से बालिग़ हो जाउंगा तो इससे बाकायदा कानूनी और सामाजिक तरीके से इसे अपना लूंगा. अआप सबकी उपस्थिति में . यह सब जो कुछ हुआ , इसके लिए मैं माफी चाहता हूँ. मुझे माफ कर दीजिए ...
कमरे में गज़ब का सन्नाटा छा गया . अजय की माँ का कलेजा तो उछलकर बाहर निकलने के लिए तैयार हो गया. आँखों के सामने अन्धेरा छ गया. उनका लाल , उनका अपना इकलौता बेटा इतनी बड़ी बात को कितनी आसानी से कह गया था . विजय प्रताप सिंह को तो अपने कानों पर यकीन ही नहीं हो रहा था. जैसा फिल्मों में हो जाता है, ठीक उसीतरह का सीन था और उसी खामोशी का फायदा उठाकर चन्दा आशीर्वाद लेने के लिए झुकी, ना तो किसी ने इनकार किया और ना आशीर्वाद ही दिया. अब स्वीटी के पिता के बारी थी . उबोले-
- बेटा , शादी , ब्याह गुड्डा -गुड़ियों का खेल नहीं होता, अभी तुम्हारी उम्र ऐसी नहीं है की सही और गलत का फैसला किया जा सके . माँ- बाप सदा अपनी औलाद की खुशी के लिए काम करते हैं. वे क्यों चाहेंगे की उनका पुत्र परेशान रहे, तुम्हारी और चन्दा की दोस्ती है , ठीक है . आप लोग दोस्त बने रह सकते हैं. इन्हें अपने काम [पर ध्यान देना है और आपको अपनी पढाई पर. कैरियर बनाने के बाद ही आप लोग अगर शादी की बात करें तो बेहतर होगा , इससे होगा ये की तब तक तुम्हारे सोचने समझनी की क्षमता भी परिपक्व हो जायेगी.
विजय प्रताप सिंह- हाँ , बेटे ये सही कह रहे हैं. हम तुम्हारी भलाई चाहते हैं, तुम्हें दुःख पहचाना हमारा भी उद्देश्य नहीं, हमने तुम्हें बड़ी मुश्किल से देखा है बेटा, ऐसे दिल ना तोडो.
अजय- माफ क्लीजिये बाबूजी, मैं वचन दे चुका हूँ, और आपसे ही ये सीखा है की क्षत्रिय को वचन की मर्यादा करनी चाहियी. विष दो मगर किसीको विश्वाश मत दो. मैं बड़े धर्मसंकट में हूँ,समझ में नहीं आता की क्या निर्णय लूं. एक तरफ मेरे जन्मदाता हैं, जिन्होंने मुझे जन्म दिया , मेरा सही पालन पोषण किया और दूसरी तरफ मेरी जीने का मकसद. चन्दा के बिना मैं एक पल भी जीने की कल्पना नहीं कर सकता . इससे अच्छा है की आप सब लोग मुझे आदेश दे , मैं मौत के आगोश में समा जाना चाहता हूँ. सारी दुनिया बस मेरे ही पीछे पडी है. सब लोग बस मुझे ही समझाने में लगे है , ऐसा लगता है जैसे की दुनिया का सबसे नादाँ मैं ही हूँ. अगर मेरे जाने से ही सबको खुशी होती है तो ठीक है , मैं चला जाता हूँ.
तड़प उठी अजय की माँ. उसका बेटा मरने की बात कर रहा था . स्वीटी को भी जोर का झटका लगा , बोली-
-अगर अजय चाहते हैं तो हम लोग इनकी चाहत का सम्मान क्यों नहीं कर सकते ? हमें भी इनकी भवनाओं का ख़याल रखना चाहिए. चंदाबाई में क्या कमी है , उम्र तो लगी रहती है, आज नहीं तो कल सबको इस उम्र तक पहुचना है . मेरी आप लोगों से प्रार्थना है की इनको चन्दा से मिला देना चाहिए ...
माँ- ये तुम कह रही हो बेटी ?मुझे आश्चर्य हो रहा है.
स्वीटी- हाँ, क्या अपनी बेटी की इतनी सी बात नहीं मानोगी ? आप तो मुझे अपनी बेटी से भी ज्यादा मानती हैं, माँ से बढ़कर लाड -प्यार दिया है आपने . बचपन से लेकर आज तक मैंने जो भी माँगा , जिद की , सब आपने पूरी की. शायद माँ -बाप का जन्म ही औलाद को जीवन भर देने के लिए ही होता है माँ.
माँ- ठीक कहती हो मेरी बेटी ... इसीलिए होता है. तुम्हारा दिल बहुत बड़ा है बेटी . तुम त्याग की जीती जागती मूर्ती हो. त्याग की देवी हो . मेरी क्षमता इतनी नहीं है बेटी. मेरा दिल इतना बड़ा दिल नहीं है.












Thursday, May 6, 2010

प्यार का परिंदा भाग-८५

माँ- ओह मेरी बच्ची मेरी लाडली तुम उस बदनसीब की कितना चाहती हो और वह तुम्हारा ज़रा भी ख़याल नहीं रखता . तुम्हारी ज़रा भी फ़िक्र नहीं है उसे. काश , वह तुम्हारी भावनाओं को समझ सकता. काश वह तुम्हारे दिल में झांककर देख पाटा यही तो होता है यहाँ हम जिसे चाहते हैं वह किसी और को चाहता है और जो हमें चाहता है हम उसे नहीं चाहते .
स्वीटी- ये आप क्या कह रही हैं माँ जी मैं कुछ समझ नहीं पाई.
माँ - रहने दो बेटी . कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें कम समजहना ही सबके लिए बेहतर होता है . मैं जानती हूँ तू भी हम सब लोगों के सतह मुंबई चलना चाहेगी , क्योंकि उसे देखे नबीना तुम्हें तो चैन नहीं आएगा भले ही वो हरजाई है, भले उसको तुम्हारी याद नहीं आयी है लेकिन तुम तो उसे एक पल भी नहीं भुला पाई रात -रात भर जागी हो उसके लिए , मुझसे कुछ छिपा नहीं है बेटी . मैं सब कुछ जानती और समझती हूँ तुम्हारे माँ मेरी पक्की सहेली है . कोई और होती तो इस तरह तुम्हें हमारे घर थोड़े ही भेजती मगर यहाँ तो बिलकुल घर जैसा मामला है . मैं जानती थी, तुम्हारी निगाहों में अजय के लिए प्रेम के भाव देखे थे तभी तो मैंने तुम्हें यहाँ बुला लिया मगर अफ़सोस ... खैर, अब तुम भी हमारे साथ मुंबई चलने की तैयारी कार्लो . देखते हैं क्या होता है . भगवान को जो मंजूर होगा वो तो हर हाल में होकर ही रहेगा.
और इओस तरह स्वीटी भी उनके मुंबई जाने वाले दल में शामिल हो गयी. मुंबई में जो स्वीटी की सहेली थी, वाहन उन्हें अजय के उस होटल का पता चला जिसमे वह चन्दा के साथ ठहरा था . सभी लोग बेहद गोपनीय तरीके से होटल पहुंचे , वे होटल के स्टाफ को भी किसी तरह की जानकारी नहीं देना चाहते थे. सब कुछ साइलेंस रखने के पक्ष में थे ताकि उनकी इज्जत न उछले और अगर अजय केपिता विधायक का चुनाव लादेन तो विपक्ष के लोग उन्हें इस मुद्दे पर घेर न सकें. हर कदम फूक -फूंक कर रखा जा रहा था. आखिरकार विजय प्रताप सिंह का परिवार उस होटल पर पहुच ही गया जहां पर अजय अपनी महबूबा चन्दा के साथ ठहरा था. यह सब इतनी जल्दबाजी में हुआ था की अजय को भनक भी नहीं लगी . उसने अपना सामान इकट्ठा कर लिया था और थोड़ी देर में वे लोग वहाँ से जाने की तैयारी कर ही रहे थे . कार्मे पर दस्तक अजय की माँ ने दी. दरवाजा अजय ने खोला. माँ को देखते ही उसे गहरा शोक्ड लगा. उसे ऐसी आशा नहीं थी फिर अगले ही पल वह माँ के पैरों में झुकता चला गया. माँ ने उसे गले से लगा लिया , जब अजय ने ध्यान से देखा तो उसे सामने पिता , स्वीटी, स्वीटी के पिता आदि दिखाई दिए . अजय को थोड़ी सी आशंका हुई मगर दिल को मजबूत कर लिया , उसने एक हल्की सी मुस्कान स्वीटी की तरफ उछाली और अपने पिता के पैर छू लिए , इसके बाद स्वीटी के पिता खड़े दिखे , अजय ने पैर छूकर आशीर्वाद लिया . उसने स्वीटी को भी गले से लगा लिया. सब लोग होटल के कमरे में जमा हो गए . वक्त की नजाकत को देखते हुए चन्दा ने इंटरकाम से फोन कर कुर्सियां और चाय नाश्ते का आदेश दे दिया था. सब लोगों ने जब अजय के साथ चन्दा को देखा तो उनके होश उड़ गए. चन्दा ने सर झुकाकर सर पर पल्लू ले लिया और सबका अभिवादन करने लगी .किसीकी समझ में नहीं आया की उससे क्या कहा जाए , खामोशी छाई हुई थी . कोई कुछ बोल ही नहीं पा रहा था . मानो सबकी जुबान पर ताला लगा हो . आखिर स्वीटी के पिता ने खामोशी तोडी -
-कैसे हो बेटे ? हम सब लोग तुम्हारे लिए कितने परेशान थे., कहाँ -कहाँ नहीं तलाश किया तुम्हें अगर मुंबई ही आना था तो बताकर आते सब इंतजाम कर दिए जाते .
अजय- जी, माफी चाहता हूँ अंकल जी, आपको कष्ट पहुचाने का मेरा कोई इरादा नहीं था. वैसे मैंने स्वीटी से कह दिया था, इनको सब पता था तभी तो शायद आप लोग यहाँ तक पहुच पाए हो ....
माँ- हम तुम्हें लेने आये हैं बेटा चलो सब लोग तुम्हारा इन्तजार कर रहे हैं.
अजय- कहाँ ? कहाँ चलना है माँ ?
माँ- अपने घर बेटे . अपने घर . तुम्हारे अपने घर. और कहाँ ?












Wednesday, May 5, 2010

परिंदा , भाग -८४

उसने मुझे तुम्हारी अनुपस्थिति में बहुत साथ दिया. अगर वह साथ नहीं देती तो बहुत गडबड मामला हो जाता , मुझे उसी से संबल मिला. उसीने मेरा हौसला बढ़ाया और तुम तक पहुचने का रास्ता बताया .
चन्दा- हम दोनों तहेदिल से उसका शुक्रिया अदा करते हैं , क्या वह जानती है की आप मुझे चाहते हैं, मेरे सतह जीवन बिताना चाहते हैं ?
अजय- हां, अच्छी तरह से , मैं बता चूका हूँ उसे. तभी तो उसने मेरी मदद की है , या यूं कहिये की उसे दया आ गयी मेरे ऊपर. वह बहुत सुलझी हई और बड़े दिल की लड़की है. वह मुझे ज़रा बी ही दुखी नहीं देख सकती.
वे दोनों बात;लाते रहे, जुदाई के समय की बातें करते रहे , और एक दुसरे से अपना हाल कहते रहे , और उधर गाँव में जब पूरी तरह से पता चल गया की अजय घर , गाँव या किसी रिश्तेदारी में वह मौजूद नहीं था, जब हर जगह की तलाशी ले ली गयी तो भी अजय के घरवालों को कोई कामयाबी नहीं मिली. अखबारों में विज्ञापन देने से भी कोई लाभ नहीं हुआ, दूरदर्शन पर भी गुमशुदगी की खबर दी गयी, आखिरकार उसे आस -पास के शहरों में ढूँढा गया ,स्वीटी के घरवालों ने उससे भी कड़ी पूछताछ की , अजय के घर छोसने के पहले वही उसके साथ मौजूद थी, इसलिए उससे बातचीत की गयी , बातचीत के आधार पर पता चला की स्वीटी ने ही उसे मुंबई जाने के लिए कहा था , इतना ही नहीं अपनी एक सहेली का रेफरेंस भी दिया था. बस इतनी सूचना ही काफी थी.
अजय के माता -पिता ने मुंबई जाने की तैयारी कर ली, स्वीटी और उसके पिता भी साथ हो लिए . साथ में और भी बहुत से लोग थे. सबने मुंबई का रास्ता पकड़ लिया. स्वीटी का दिल जोर -जोर से धड़क रहा था , उसने जिस अजय के सपने देखे थे , आज वही अजय उससे बहुत दूर चला गया था, उसे अजय के साथ बिताए पलों की यादें सताने लगीं , यही वो अजय था जब बचपन में उसके साथ गुडिया गुड्डों का खेल खेलता था, चोर सिपाही खेलता था और अगर कोई लड़का उसके साथ जोड़ी बनाकर खेलना चाहता तो वह साफ़ इनकार कर दिया करता था, झगडा कर लिया करता था, मारपीट पर उतारू हो जाता था, वह किसी दुसरे से उसे टच भी नहीं होने देता था. आज वही अजय कितना बदल गया है. सब लोग बचपन से ही उसकी और अजय की जोड़ी की तारीफ़ करते नहीं थकते था. वही अजय चन्दा के प्यार में दीवाना हो गया था, पता न्महीं उसने चन्दा में ऐसा क्या देखा था जो उसमे नहीं है, हो सकता है कुछ खास हो, होगा तभी तो वह उसके बिना एक पल भी नहीं जी सकता , काश, वह भी अपने दिल की भावनाएं बता सकती, अपने दिल चीरकर किसीको दिखा सटी, काश, कोई सुए भी भी उसके दिल का हाल कहने का अवसर देता , काश , अजय एकबार उसके दिल की धड़कने सूनी की कोशिश करता. वह कुछ भी देक्ल्ह सकती है मगर अजय को परेशान नहीं देख सकती.अजय की माँ ने भी तो उससे यही सवाल किया था-
- बेटी , क्या तुम मेरे अजय को पसंद नहीं करती ?
स्वीटी- ये आपने क्या पूछ लिया ? ये कैसा सवाल है माँ जी , मैं उसे पसंद नहीं करती ? मैं अजय पर अपनी जान न्यौछावर करती हूँ, वह मेरी धडकन में समाया है, रग-रग में समाया है माँ जी, ऐसा न कहिये प्लीज .
माँ- फिर तुमने उसे मुंबई क्यों जाने दिया ? चन्दा से उसे मिलाने में उसकी मदद क्यों कर रही हो ? सच कहो बेटी .
स्वीटी- क्योकी , मैं अजय से बहुत प्रेम करती हूँ माँ जी, उसका दुःख नहीं देख सकती, वह चन्दा से मिलने के लिए तड़प रहा था, जल बिन मछली की तरह छटपटा रहा था, अगर मैं उसकी हेल्प नहीं करती तो वह टूट जाता , जो मुझसे कैसे बर्दाश्त होता , मैं अजय को परेशान हाल नहीं देख सकती माँ जी, मैंने सोचा की अगर उसे चन्दा से मिलने में ही खुशी होती है तो उसे खुश कर देती हूँ, यही सोचकर मैंने उसकी मदद के, उसे बताया की चन्दा मुंबई गयी है, यह बात मुझे नौटंकी के मैनेजर रंजन नेबतायी थी, तब मैंने अपनी एक सहेली से बात की और अजय को उसका पता देकर मुंबई जाने को कहा, वहाँ वह कुशल है. कोई दिक्कत नहीं है .












विचार मंच


कसाव को फंसी होने दीजिए
बचाने के लिए कांग्रेस है न
-मुकेश कुमार मासूम
देश में आतंकवाद के जड़ें दिनों दिन मजबूत होते जा रही हैं। सरकार करने के लिए बस इतना ही करती है कि जहां कहीं बम कांड की घटना होती है वहाँ पर जांच पड़ताल का कार्य तेज कर दिया जाता है, कुछ नियम बदल दिए जाते हैं। बहुत हुआ तो एकाध अधिकारी का तबादला कर दिया जाता है, बम विस्फोट में मरे लोगों के आश्रितों को कुछ मुआवजा दी दिया जाता है, कुछ मंत्री दौरा करते हैं, पुलिस अधिकारी प्रेस कांफ्रेंस करते हैं। जांच कमेटी गठित होती है , और और सब लोग अगले बम कांड होने का इन्तजार करने लगते हैं। १३ फरवरी को पुणे में बम विस्फोट हुआ , उसमे ५ विदेशी सहित १७ लोग से ज्यादा मारे गए । कई घायल हुए। गृह मंत्री आर आर पाटिल ने खुद सदन को बताया कि आरोपियों की शिनाख्त कर ली गयी है। मगर क्या हुआ । आज इतने महीनों के बाद भी कुछ नहीं हुआ । सरकार कहती रही कि इस बम कांड में इंडियन मुजाहिदीन का हाथ है लेकिन सिर्फ कहने भर से क्या हुआ ? पुलिस सिर्फ यही कहती रही कि 'जांच सही दिशा में चल रही है ' । २६ नवंबर २००८ को क्या हुआ ? महज दस लोगों की फ़ौज ने मुंबई पर हमला कर दिया। यानी कि देश पर हमला कर दिया। सारा ख़ुफ़िया तंत्र , सारी पुलिस, नेवी अधिकारी सब देखते रह गए और दस लोग मुंबई को तहस -नहस कर गए। उनमे से ९ आतंकवादी मारे गए और अब दसवा जीवित बचा है - कसाव। आमिर अजमल कसाव की सुरक्षा पर ट्रायल के दौरान महाराष्ट्र सरकार ने ३१ करोड रुपये खर्च किये । भारत जैसे गरीब देश के लिए खर्च की रकम का यह आंकडा मामूली नहीं हो सकता। आज उसी कसाव को विशेष अदालत सजा सुनाएगी , बहुत संभव है उसे फांसी की सजा ही दी जाए , और यह सब पुलिस अधिकारियों के अथक परिश्रम , सबूत , गवाह आदि के बल पर और सरकारी वकील के तर्कों की बदौलत संभव हो सकेगा। मगर सजा सुनाये जाने के बाद भी क्या किलिंग मशीन कसाव को फांसी पर इतनी आसानी से चढाया जा सकता है ? इसे लेकर देश में संशय का माहौल है । सब जानते हैं कि अभी तक ५० ऐसे खतरनाक अपराधी हैं, जिन्हें वर्षों पहले फांसी की सजा तो सुनाई जा चुकी है मगर अभी तक फांसी का फंदा उसनके गले से बहुत दूर है। क्योंकि उन्होंने राष्ट्रपति के पास दया याचिका कर रखी है। अब तर्क की बात ये है कि जब पहले से ही खूंखार अपराधी सजा भुगतने के लिए वोटिंग लिस्ट में हैं तो इस नए मामले का क्या होगा ? संसद अर्थात देश के सबसे बड़ी पंचायत पर हमला हुआ।उस आरोप में अफजल गुरु नामक अपराधी को गिरफ्तार किया गया। सर्वोच्च अदालत ने उसको फांसी की सजा सुनाई , लेकिन आज भी वह ज़िंदा है। उसने मर्सी पिटीशन जो डाल रखी है, जिसका क्रमांक २८ है । जाहिर सी बात है कि जब तक पहले ५० अपराधियों को फांसी नहीं दी जाती , अथवा उनका कोई फैसला नहीं होता तब तक कसाव भी सरकारी मेहमान नवाजी का लुत्फ़ उठा सकता है और ईद के दिन तो नॉन वेज भी खा सकता है। भारत सरकार पहले भी मौलाना मसूद अजहर , उम्र शेख और मुस्ताक जरगर जैसे खतरनाक अपराधियों को छोड़ चुकी है । अब तो आम आदमी को यह पक्का भरोसा हो गया है कि कोई भी दुश्मन हमारे यहाँ आकर तबाही मचा सकता है, हमारे जवानों पर गोलियाँ बरसाकर उन्हें शहीद कर सकता है मगर सजा उसे कुछ नहीं मिलेगी । अगर सजा का ऐलान हो भी गया तो कांग्रेस है न। बचा लेगी ।आखिर 'धर्मनिरपेक्षता ' का सवाल जो है । और बिना ऐसे सवालों के वोट नहीं मिला करते । सत्ता चाहिए तो वोट भी चाहिए ही। और वोट के लिए दया का दिखावा भी जरूरी है।












Tuesday, May 4, 2010

परिंदा , भाग-८३
अजय-ये देखो न, हम तो आखिर मिल ही गए हैं, अब हारी थकी बातें करने का कोई मतलब नहीं है. मगर तुमने सताया बहुत है.मुझे बताये बिना ही चली
आयीं,मुझसे सूचना देना भी मुनासिब नहीं समझा. आखिर ऐसी क्या दिक्कत थी ?ऐसा कौन सा भूचाल आया जो तुमने ये सब किया ? और क्यों किया ?
क्या तुम्हें मेरी ज़रा भी याद नहीं आयी ? मेरे बारे में कुछ तो सोचा होता , कुछ भी नहीं सोचा .
चन्दा - मैं वक्त के हालात से मजबूर थी, इसीलिए आपके पास होकर भी बड़ी दूर थी. बस इससे आगे मुझसे कुछ न पूछिए , मैं कुछ नहीं बता पाउंगी . प्लीज...
अजय-किसीके हाथों मेरे तक खबर तो भेजनी थी, मुझे बताना तो चाहिए था कि ऐसी -ऐसी परेशानी है, तब हम दोनों मिलकर उसका हल भी निकाल लेते. मगर ये क्या हुआ
कि अपने अजय को अकेला छोड़कर चली आयी, तुमने सोचा होगा मैं तुम्हें ढूंढ नहीं पाऊंगा, मैंने इन सागर जैसी आँखों में अपने लिए प्रेम देख लिया था, अगर तुम
मुझे नकार देती तब मैं तुम्हारा पीछा नहीं करता, मगर किसी दहशत कीवजह से मैं तुम्हें अपने से दूर नहीं कर सकता. किसी भी हालत में नहीं .
चन्दा- ओह, अजय बाबू, जो हुआ सो हुआ , मुझे माफ कर दीजिए . इस वक्त आपने बहुत पी ली है, सो जाइए ... अब हम सुबह मिलेंगे और खूब जी भरके बात करेंगे.
अजय - इतनी मुश्किलों से मिली हो और चाहती हो कि इतनी आसानी से निकल जाओ. आज तो हम खुशी मनाएंगे , जश्न होगा. हम रात भर पियेंगे , नाचेंगे ,गायेंगे , खुशियाँ मनाएंगे
और खूम मस्ती करेंगे. खूब मजा लेंगे . धमाल होगा . आज हम कितने खुश हाँ, ये हम किसे बताएं ? किसके साथ शेयर करें इस खुशी को ? हम जानते हैं , तुम
हमारे माता-पिता के बारे में कछु कहना नहीं चाहती , मग नादाँ तो हम भी नहीं, ब्याह नहीं हुआ तो बरात तो बहुत की हैं. सब कुछ अनुमान लगा लिया है हमने .
सचन्दा- ठीक है, जो उचित समझो. मगर आप आराम कर लीजिए. अगर चाहो तो ये जश्न हम कल मनाएंगे . आपने शायद बहुत पी रखी है ...
अजय- हम होश में हैं, आप टेंशन न लें, ये लेडीज सर्विस वाले बार कहाँ ओरीजनल शराब पिलाते हैं ? ये तो बस उल्लू बनाते हैं. उल्लू ... पानी मिला देते हैं . शॉप पर
असली माल मिलता है. मेरी पास पडी होगी बोतल. मस्त एकदम...
और चन्दा ने उसकी बात मानली. उस रात उन दोनों ने खूब आनंद लिया, खूब खुशियाँ बांटी . अजय की फरमाइश पर चन्दा ने 'हुस्न हाजिर है मोहब्बत की सजा
पाने को, कोई पत्त्थर से न मारे मेरे दीवाने को. कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवानेको' गाना चलाया गया. चन्दा ने इस गीत पर सजीव अभिनय कर अजय को भाव विभोर
कर दिया. भले ही चन्दा कमजोर हो गयी थी, मगर उसके नृत्य और अभिनय का कोई सानी नहीं था. अजय ने जबसे होश संभाला , तब से लेलेकर अब तक उसे कभी
इतनी खुशी हासिल नहीं हुई, जितनी कि आज मिली थी. आनंद के सागर में डूबकर वह चन्दा के साथ ठुमके लगा रहा था, उसे बार -बार अपनी बांहों में भर लिया करता था . चन्दा भी हँसते -हँसते लोट -पोट हो गयी. कई साल के बाद वह खूब खुलकर हंसी थी, काम के दवाब और भाग दौड भरी जिंदगी में जैसे वहहंसना मुस्कराना ही भूल चुकी थी. आज जब अजय ने उसे हंसी की यह सौगात बक्शी तो वह अपने सारे गम भूल गयी . अजय ने उसकी कमर में हाह डालकर कपल डांस करते हुए कहा-
-जानती हो हमें एक दुसरे से मिलाने में सबसे बड़ा योगदान किसका है ? स्वीटी का , अगर स्वीटी मुझे सपोर्ट नहीं करती तो हम दोनों आज शायद मिल भी नहीं पाते , और मैं तो शायद कभी नहीं मिल पाता , क्योंकि तुम्हारे जाने के बाद तो जैसे मैं पागल हो गया था, एकदम निराश . मुझे उस अँधेरे से निकालने में स्वीतिऊ का बहुत बड़ा योगदान है, यहाँ तक कि उसीने यह पता लगाया कि तुम मुबई में मिल सकती हो.
चन्दा- अच्छा , तुम विधायक जी की बेटी की बात कर रहे हो, अपनी बचपन की दोस्त की , बहुत भली लड़की है वो, सच कहूँ तो तुम्हारी और उसकी जोड़ी बहुत जमती है.
अजय- हाँ , अच्छी तो है, बड़ी कृपा है उसकी .