Thursday, April 30, 2009

तड़प, भाग-20

शैली को अपने वे दिन याद आने लगे जब वह अपने प्रेमी से बात- बात पर झगड़ने लगती थी, उसे ताने देने लगती थी... दीपू ने उसे समझाया की प्रेम की असली परिभाषा तो त्याग है... जो जितना बड़ा त्यागी है वह उतना ही बड़ा प्रेमी भी है, दीपू के शब्द उसके अंतर्मन पर छा गए, वह कह रहा था-
- अब भगवान् को देखो, लोग उसे अलग -अलग नामों से पुकारते हैं , मगर वह बुरा मानता है क्या ? हममें से कुछ लोग ऐसे भी जिनके मन की इच्छा पूरी न होने पर हम मालिक को ही कोसने लगते हैं, अपशब्द इस्तेमाल कारनमे लगते हैं... मगर वह बुरा नहीं मानता ... फ़िर भी सबको बराबर उजाला देता है, बोलने -सुनने चलने -फिरने या सोचने -समझने की शक्ति देता है...सबको अन्न देता हैं... सबकी साँसों को नियंत्रित रखता है... वह किसीसे भेदभाव नहीं करता, अपने सभी बन्दों से प्यार करता है... तुमने सुना है उसने कभी किसीको उलाहना दिया हो, ताना दिया हो... सवाल ही नहीं.... तो मेरे कहने का मतलब है की जो जितना प्यार बांटता है वह उतना ही बड़ा होता है... जैसे मालिक सबसे निष्पक्ष मोहब्बत करता है तो वह सबसे बड़ा है... क्योंकि सबसे ज्यादा प्यार करता है...जो लोग इश्वर की बात को ज्यादा से ज्यादा मानते हैं, उनके बताये अच्छे रास्तों पर चलते हैं, वे देवता कहलाते हैं...
शैली- तुम तो गज़ब का प्रवचन देते हो दीपू, साधू बनकर खूब कमा सकते हो...
दीपू- ऐसा मैं नहीं हूँ शैली, मैं भूखा रह सकता हूँ , गुमनामी की जिन्दगी बसर कर सकता हूँ लेकिन किसीको भगवान् के नाम पर उल्लू नहीं बना सकता ...
शैली- तुमने तो मुझे अपनी मुरीद ही बना लिया दीपू, मैं समझती थी की तुम भी औरों जैसे साधारण इंसान होंगे मगर तुम तो सबसे ख़ास इंसान हो, सबसे अलग, प्यारे इंसान...
दीपू- इतनी तारीफ़ भी मत कीजिये की मैं झाड़ पर चढ़ जाऊं, मुझ जैसे कितने ही लोग गली-गली घुमते फिरते हैं...
शैली- तुम्हारे हर शब्द में नशा है... इतनी कम उम्र में भी तुम बहुत सुलझे हुए हो...
दीपू- शुक्रिया, अगर वास्तब में इन बातों ने तुम्हें प्रभावित किया हजी तो मैं ख़ुद को खुशनसीब समझता हूँ...
शैली- मैं तुम्हें अपने जीवन की बीती हुयी बातों का राजदार जरूर बनाउंगी... मैं इस मसले पर तुमसे सलाह लेना पसंद करुँगी... वैसे यह राज मैंने अभी तक किसीको नहीं बताया ...मेरे ही सीने में दफ़न है,
दीपू- ठीक है, यूँ समझिये की अब भी ये बात तुम तक ही सीमित रहूंगी... मैं हमेशा तुम्हारे भरोसे का समान करूँगा... मुझसे मिलने के बाद मर्दों के बारे में तुम्हारी धारणा शायद बदल जायेगी...
शैली- काश, ऐसा ही हो मेरी जान ... मैं ख़ुद भी नेगेटिव और भयावह धारणाओं को बदल देना चाहती हूँ...तुम्हारे स्पर्श और शब्दों में ही इतना जादू है की अभी से मेरे रौंगटे खड़े होने शुरू हो गए हैं... शराब पीने की जरूरत भी नहीं, वैसे ही नशा होना शुरू हो जाता है... खूब आनंद आ रहा है...
दीपू- मैं भी कामोत्तेजित होने लगा हूँ... पहली बार मैं किसी लड़की के साथ अकेले में लेट रहा हूँ....
शैली- कोई दिक्कत नहीं यहाँ कोई नहीं आएगा, हम यहाँ पर भी मौज मस्ती कर सकते हैं...बेफिक्र रहो...
दीपू को इसी बात का इन्तजार था... उसने शैली के जिस्म को चूमना शुरू कर दिया, उसके संवेदनशील अंगों को स्पर्श करने का ही असर था की उसकी कामवासना भड़क उठी... दीपू ने उसे अपनी मजबूत बांहों में थामकर उसके रसीले होठों का रस चूसना शुरू कर दिया, दोनों की भावनायें मचलने लगीं...

Wednesday, April 29, 2009

तड़प, भाग-२०

पहले तुम लोग मन लूटते हो फॉर तन और इसके बाद कंगाल बनाकर फ़िर शिकार की तलाश में निकल पड़ते हो ... तुम्हें शिकार मिलने में कोई परेशानी नहीं होती, और तुम मर्द .... उफ़... रंग तो गिरगिट से भी ज्यादा बदलना जानते हो , हो सकता है पहले कभी गिरगिट ने भी रंग बदलना तुम मर्दों से ही सीखा हो...
दीपू- मर्दों से इतनी क्रोधित होकर भी मुझ जैसे मर्द के साथ हो , इससे शब्द और सच्चाई में विरोधाभास नजर आता है... मुझे डरा तो नहीं रही हो ?
शैली- तुम कुछ अलग लगते हो... ना चाहते हुए भी ऐसा कुछ है जो मुझे तुम्हारी तरफ़ खींचता है...
दीपू- ओह हां , ये तो है... मेरे साथी भी मुझे आम इंसान न समझकर पागल समझते रहे हैं...
शैली- अच्छा जोक कर लेते हो, पता भी नहीं चलता और अपनी बात भी कह लेते हो...

Tuesday, April 28, 2009

तड़प, भाग-19

दीपू- आज की रात मैं किसी काम के लिए नहीं बल्कि तुम्हारे लिए समर्पित करना चाहता हूँ... फ़िर पता नहीं ऐसी हसीं रात कभी नसीब होगी की नहीं होगी ?

Sunday, April 26, 2009

तड़प, भाग-18

दीपू- जब तुम कह रही हो की सी ग्रेड की फ़िल्म बनाने वाला है तो तुम्हें उस पर इतना भरोसा कैसे है , वह तुम्हारी बात मान लेगा ? कहीं ऐसा तो नहीं की बेवजह चक्कर लगवाएगा ?
शैली- मान तो जायेगा , हर सी ग्रेड की फ़िल्म बनाने वाले इंसान एक तरह के नहीं होते, मगर उसकी परेशानी यही है की जब उसकी फ़िल्म बनेगी तभी रिलीज होगी... कभी- कभी उसे काफी समय लग जाता है... तब तक इन्तजार करना पड़ेगा.... वैसे उसकी एक खासियत बतादूँ की वे अह अपनी फ़िल्म को रिलीज जरूर करता है... बहुत जुगादी आदमी है... अब तक दर्जनों फिल्में बनाकर रिलीज कर चुका है... उसकी ख़ास बात यही है की वह अपनी हर फ़िल्म को बेच लेता है... चाहे कम थियेटर में चले लेकिन उसकी फ़िल्म चलती जरूर है...
दीपू- ठीक है, मैं उससे मिल लूँगा... क्या वह दे पाटा है तुम्हारी फीस ?
शैली- तुम जैसे लोग यहाँ कम नहीं है , सुबह से शाम तक उससे न जाने कितने टकराते हैं ?अगर एक भी मुर्गा उसे मिला तो वह सीधा शाम को हमें ही याद करता है , शराब और शबाब में ही इन लोगों का पूरा पैसा खर्च हो जाता है... मैं नहीं मिली तो किसी दूसरी को ढूंढता है, औरतों की कमी है क्या यहाँ ?
दीपू- ठीक कहती हो मुंबई और दिल्ली जैसे शहर में यही चीज सबसे सस्ती मिलती है और आसानी से उपलब्ध होती है... जेब में रुपये होने चाहिए...
शैली- दिखने में भले ही सीधे दीखते हो मगर तुम भी इतने नादाँ तो नहीं हो, गर्म गोश्त के बाजार में कभी न कभी तो तुमने भी दस्तक दी होगी... आख़िर नौजवान हो ... जज्बात तो मचलते ही होंगे...
दीपू- बहुत बार मचले हैं जज्बात ... मगर इनसे होता क्या है ? कभी जेब गवारा नहीं करती तो कभी हालात ...
शैली- मुझे नहीं लगता की हर जगह पैसे की ही पूछ होती है ? अगर तुम ख़ुद भी उल्टे पैसे लेने लगो तो कितनी ही दिलफेंक महिलायें तुम पर जान न्यौछावर करने के लिए तैयार हो जायेंगी...
दीपू- अच्छा, आज मजाक उडाने के लिए मैं ही मिल रहा हूँ न... तुम्हारी इच्छा है कितना भी उडाओ...
शैली- हीरा ख़ुद नहीं परख सकता की उसकी कीमत क्या है , जौहरी ही यह बात जान सकता है...
दीपू- ठीक है मेरे प्यारे जौहरी जी, चलो तुम ही बतादो क्या है मेरी कीमत ? अगर मैं रोजाना तुम्हारे दरबार में हाजिरी लगाऊँ तो बताओ मुझे क्या कीमत मिलेगी ?
शैली- तुम ? क्या करोगे तुम मेरे यहाँ ?
दीपू- अभी तक तो तुम कह रही थीं की मैं बेशकीमती हूँ और अब मैं किसी काम के लायक भी नही रहा ...
शैली- मेरा अर्थ ये नहीं था दीपू... तुम तो मेरे प्यारे दोस्त बन चुके हो, तुमसे काम लुंगी मैं ?
दीपू- तो क्या तब खुश रहोगी जब मैं भूखा मर जाउंगा...
शैली- ऐसी नौबत आने से पहले तो मैं दुनिया से लड़ जाउंगी दीपू... ये क्या कहते हो ? क्या तुम्हें काम की इतनी ज्यादा जरूरत है... तब तो मैं आज रात को ही तुम्हारी मुलाक़ात एक एड एजेंसी के मालिक से करवा दूंगी... मुझे बहुत चाहता है... दो महीने से फोन पर फोन कर रहा है मुखे खंडाला अपने साथ ले जाना चाहता है मगर मेरे पास टाइम ही नहीं... एक बार वह मुझे एक विदेशी क्ल्यायंत की खिदमत के लिए लेकर गया था... तभी से दीवाना है मेरा... मैं तुम्हें उसकी कम्पनी में काम दिलवा दूंगी... उसके पास कई बड़ी कम्पनियों का काम है...

तड़प भाग -17

उनके आस -पास भी कुछ जोड़े मौजूद थे, इस बात का एहसास उनकी गर्म आहों से हो रहा था... कोई दिखाई नहीं दे रहा था... वह स्थान इसीलिए गुप्त रखा गया था...शैली को यह विशेष रूप से पसंद था... सुरक्षा की भी गारंटी थी...दीपू ने मौका देखकर चौका लगाना शुरू कर दिया, उसने अपने ख़ास अंग पर शैली का हाथ रख दिया, शैली समझदार थी, उसने जब अपनी कलाकारी दिखाई तो दीपू दंग रह गया... वह उसके अंग से खूब प्यार करने लगी...दीपू की भावनाएं भड़कने लगीं... मन में चिंगारियां फूटने लगीं... यह बहुत नाजुक घड़ी थी... दीपू के मन में थोड़ा सा डर था... उसे आशंका थी की कहीं कुछ ग़लत न हो जाए , उसे सिर्फ़ शैली की तरफ़ से भय था... अन्य लड़कियों की तरह अगर वह भी बदल गयी और उसके ख़िलाफ़ बयान दे दिया तो उसे सजा होने से कोई नहीं बच्चा सकता... उसने यह बात शैली के सामने भी कहदी-
- अगर यहाँ कोई लफडा हुआ, पुलिस आ गयी और पूछताछ करने लगी तो तुम मुकर तो नहीं जाओगी ?
शैली- कुछ नहीं होगा यार ... यहाँ के सब इंसपेक्टर मेरे हुस्न के गुलाम हैं... एक नहीं कई हैं... जिसको बोलो छुड़वा सकती हूँ , जिसको बोलो उठवा सकती हूँ... तकलीफ यहाँ के लोगों से नहीं होती, तकलीफ होती है समाजसेवा के अधिकारियों से , वे यूज भी करते हैं और पैसे भी लेते हैं... फ़िर भी कभी-कभी केस बना देते हैं... ज्यादा खुन्नस हो या फ़िर कोई नया अधिकारी आया हो तो प्रेस को बुलवाकर अखबारों में फोटो भी छपवा देते हैं... इससे होता तो कुछ नहीं है... आराम से जमानत हो जाती है मगर बदनामी का डर बना रहता है... वैसे भी हमारा कौन सा नाम है जो इससे ज्यादा डरें...
दीपू- फ़िर तो युम्हारी बहुत पहचान होगी, किसी फ़िल्म वाले से नहीं है, अगर हो तो मैं उससे मिलूँ, मेरा भी काम हो जाए... तुम्हारे सहारे मुझे भी अपनी मंजिल मिल जाए...
शैली- दीपू, बहुत भोले हो तुम... ऐसी बात करते हो ... यहाँ पहचान की कोई कमी नहीं हैं मगर हर आदमी अपने फायदे की बात करता है... फ़िल्म वाले सब तो बुरे नहीं होते लेकिन सब अच्छे भी नहीं होते ... यहाँ हजार में से एक आदमी सही है... अब ना जाने वह सही आदमी कब मिल पाये...चिराग लेकर ढूंढते रहो....
दीपू- जो किस्मत में होगा वो देखा जायेगा... पहले तुम मेरी किसीसे सिफारिश तो करदो...
शैली- अच्छी बात है, एक निर्माता मेरी पहचान का है, वह सी ग्रेड की फिल्में बनाता है... एक नंबर का रसिया है... ओशिविरा में एक ऑफिस लेकर बैठा रहता है... पोस्टर लगाये रखेगा, जब कोई लड़की आएगी तो उसको सब्ज बाग़ दिखायेगा, उसको शीशे में ऐसे उतारेगा की फ़िर वह उसके साथ हमबिस्तर होने के लिए तैयार हो जायेगी...
दीपू- ओह, फ़िर वह उस लड़की को काम नहीं देता ?
शैली- हाँ -हाँ देता है , क्यों नहीं देता... जब उसकी फ़िल्म बनती है तो छोटा -मोटा काम दे देता है... फ़िल्म में तो वैसे भी बहुत सारे कलाकारों की जरूरत पड़ती है, जिस दिन उसके चंगुल में कोई नई लड़की नहीं फंसती तो मेरे पास चला आता है, मेरे साथ रात गुजारकर उसे बहुत आनंद आता है॥
दीपू- क्या उसकी पत्नी नहीं है ?
शैली- ऐसे लोगों से कौन शादी करता है ? कई बार उसने मुझसे भी शादी का प्रस्ताव रखा था... मगर मैं जानती हूँ उसकी औकात ? वह शादी के बाद मेरा जिस्म भी इस्तेमाल करेगा और मेरी कमाई भी खायेगा, यानी मुझसे धंधा करवाएगा... ऐसे इंसान से क्या शादी करनी ? मैं कह दूंगी तो वह अपनी फ़िल्म में तुम्हें काम दे देगा ...

Saturday, April 25, 2009

तड़प, भाग-16

शैली तो बिंदास थी , जिससे वह ख़ास बात करना चाहती थी, उसे फोन करने के बाद फ़िर वह आराम से अपना मोबाइल बनद कर दिया करती थी... टेंशन लेना या देना उसे अच्छा नहीं लगता था... दीपू के साथ रहकर वह सिर्फ़ दीपू से ही मोहब्बत करने के मूड में थी, प्रणय क्रीडा के दौरान अगर किसी का फ़ोन आ जाए तो मजा किर-किरा हो जाता है, यही सोचकर वह एक टाइम में एक ही ग्राहक को अटेंड किया करती थी....वह होटल काफी बड़ा था, उसके अन्दर गार्डन , पार्क आदि सुविधा थी, शैली एक बार जिस्मानी सुख भोगकर फ़िर कहीं बाहर निकलना चाहती थी मगर दीपू ने अपनी एक मांग रखदी-
- मेरी इच्छा होती है की थोडी देर के लिए गार्डन में टहलने चलें... रात ज्यादा पीने के कारण मेरे सर में थोड़ा सा दर्द जैसा महसूस हो रहा है... कहीं चलते हैं .... उसके बाद फ़िर यहीं आ जायेंगे, दिन अपना ....रात अपनी है...
शैली- ठीक है... बन कमरे की ठंडी हवाएं मुझे भी ज्यादा पसंद नहीं आती... खुली हवा पसंद है चाहे वह कैसी भी क्यों न हो... तुम चाहो तो एक एस्प्रिन की टेबलेट भी ले सकते हो ...मेरे बैग में रखी है... सर का दर्द थोड़ी देर में ही दूर हो जायेगा...जितना पी सको पानी भी पीओ... इससे तुम्हें काफी सुविधाएं मिलेंगी...समझ रहे हो ना... इससे पहले कभी पीने पिलाने की लत नहीं थी क्या ?
दीपू- अनाडी हूँ... तुमसे सब सीख रहा हूँ, हांलाकि इन चीजों के कहीं स्कूल नहीं हुआ करते ...
शैली- ये तो पते की बात कही है तुमने... अब चलो होटल के गार्डन में बैठकर बतियाते हैं... वहां भी एकांत का माहोल मिल सकता है...
दीपू खुशी -खुशी उसके साथ हो लिया, वहाँ का मआहोल वास्तब में बेहद सुंदर था, वहाँ खुशबूदार फूल थे, छोटी-छोटी नालियां थीं, जिनमे पानी बह रहा था... यहाँ तक की कपल्स के बैठने के लिए ऐसे स्थान भी बना रखे थे जो गुप्त थे, अन्दर होने वाली घटना की जानकारी बाहर वाले को नहीं हो पाती थी... शैली और दीपू ऐसी ही एक गुफा में बैठ गए... शैली ने अपना सर दीपू की गोद में रख दिया , दीपू को जैसे ही अवसर मिला वह उसका फायदा उठानेलगा... बातों ही बातो में पूछ बैठा-
- तुम बेहद खूबसूरत हो, मुझे लगता है, कालेज टाइम में तुम्हारे भी खूब दोस्त होंगे, कितने ही लोग तुम पर जान छिड़कते होंगे... तुम भी खूब नखरे करती होंगी ?
शैली- करती होंगी से तुम्हारा क्या मतलब है नोटी , क्या अब कोई मुझ पर जान नहीं छिद्केगा ? अब भी इस शहर में लाकों हैं मेरी जान ... जो मेरे एक इशारे पर खून खराबा तक करने को तैयार हो जाते हैं... इन आशिकों में पुलिस अधिकारी से लेकर बड़े-बड़े उद्द्योग्पति शामिल हैं... यकीन नहीं आ रहा क्या ?
दीपू- तुम्हारा झूठ बोलने का कोई कारण भी तो नहीं है... मैं क्यों तुम्हारी बात काटूँगा...
शैली-ऐसा तुम्हारे अन्दर क्या है जो तुम मेरे दिल पर छा गए हो ? जिस शैली के सब दीवाने हैं, वही तुम्हारी दीवानी बन चुकी है....
दीपू- तुम मुझे बहका तो नहीं रही हो ? सुनकर बड़ा अजीब लग रहा है...
शैली- मैं तुमसे कभी ग़लत बात नहीं करुँगी...
दीपू ने उसके तपते होठों पर अपने होठ रख दिए और फ़िर वह उसकी गोलाइयों पर भी दवाब बनाने लगा....











Thursday, April 23, 2009

तड़प-भाग-14

शैली- सब छोड़ना पड़ गया... अब काम ही ऐसा हो गया है की समय नहीं मिल पाटा... पापी पेट का सवाल जो है... हमारा हाल ये है की खूब फुर्सत में रहेंगे और कभी भी टाइम नहीं मिलेगा...
दीपू- यह फंदा कुछ समझ में नहीं आया... खोपडी के ऊपर होकर गुजर गया...
शैली- मैं जानती हूँ तुम्हारा दिमाग जहाँ काम कर रहा है... तुम मस्ती के मूड में आ चुके हो... पहले नित्य कर्म कर लो, चाय नाश्ता कर लो , उसके बाद फ़िर देखेंगे ....
दीपू- अभी भी नजर हटाने का दिल नहीं करता , बाद की बात अलग है... मुझे कुछ भी नहीं दिख रहा, सिवाय तुम्हारे...थोडी बहुत जो नींद आई है, उसमें भी तुम ही तुम अजर आती रहीं...
शैली- aashiki की बात कर रहे हो, सुना नहीं है ,इश्क इंसान को निकम्मा बना देता है...
दीपू- ना मामा से काना मामा ही सही... अभी तो कुछ नहीं है ....तुम्हारी मेहरबानी से कुछ तो बन जाऊँगा... इन झील सी गहरी आंखों में डूब जाना चाहता हूँ,॥
शैली- रहने भी दो, क्यों बुझती आग को हवा देती हो , चिंगारी फ़िर भड़क उठेगी... बड़ी मुश्किल संभाला है दिल ...
दीपू- इस बेचैनी का राज जानकर रहूँगा मैं... आख़िर मोहब्बत के नाम पर तुम्हें इतनी तकलीफ क्यों होती है ? तुम तड़प क्यों उठती हो ? इसकी वजह जो भी हो , मगर ठीक नहीं है...
शैली- छोडो भी दीपू , यह प्यार मोहब्बत की बातें रहने दो... मौज मस्ती करो और अपना काम देखो...
दीपू- मैं मानने वाला नहीं हूँ... जिद्दी हूँ, जो ठान लिया सो ठान लिया...
शैली- ओह, जख्मों पर नमक छिड़कना चाहते हो ? क्या मिलेगा तुम्हें ऐसा करके ?
दीपू- ये इल्जाम है मुझ पर... मैं ऐसा कोई काम कैसे कर सकता हूँ जिससे तुम्हें परेशानी होती हो...