Sunday, August 31, 2008

भाग-94

तुम्हारा दुःख भी इसी तरह दूर कर दूंगा... फ़िर कभी तुम किसी मर्द जात से शिकायत नहीं कर पाओगी... मेरे ख़याल से अभी तुम्हें ऐसा कोई मर्द ही नहीं मिला जोतुम्हें सुख के सागर में गोते लगवा सकें... मैं आज तुम्हें एक नईदुनिया से रूबरू कराऊंगा...
बिजली- ये मर्द लोग भी न, बड़े स्वार्थी होंतेहैं... अपने मतलब के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं और जब मतलब निकल गया तो ;पहचानते भी नहीं...
सलीम - ये तुम्हें किसी ने ग़लत जानकारी दी है...
बिजली- तुम बातें तो बहुत अच्छी करते हो... आज तुम्हारा दम भी देख ही लेती हूँ...
सलीम- तुम्हारी कोठा मालकिन भी मुझे अब तक याद करती है... इसीसे तुम मेरे दम का अनुमान लगा सकती हो... अपने मुह से अपनी तारीफ क्या करूँ, सब बातें तुम्हें आशा ने भी सुना ही दी हैं...
उसकी बहकी -बहकी बातें सुकर बिजली मन ही मन कुढ़ रही थी... वह चाहती थी की सलीम उससे शारीरिक सम्बन्ध न बनाए, लेकिन यह बात वह अपनी तरफ़ से कहना नहीं चाहती थी...उसकी इच्छा थी की सलीम ख़ुद ही इनकार कर दे ...वह जानती थी की जैसेही सलीम उसके साथ हम बिस्तर होगा, वैसे ही वह ऐड्स का शिकार हो जायेगा... बिजली बेहद खूबसूरत थी लेकिन ऐड्स ग्रस्त थी... आशा ने अपना बद्ला लेने के लिए यह साजिस रची थी... इस काम के लिए बिजली को अच्छी -खासी रकम भी मिलती थी... सलीम इस सबसे बेखबर था... वह अपने पूरे कपड़े उतार कर बैठ गया... उसने बिजली को पूरी तरह से निर्वस्त्र कर दिया... वह मुस्कराने लगी... आशा तो पहले ही उन दोनों को ऐसी दवा पिला चुकी थी, जिसे पीकर वे दोनों कामोत्तेजना की आग में झुलसने लगे थे.... सलीम जल्दी के मूड में नहीं था इसके बावजूद वह अपने मन पर काबू नहीं रख पा रहा था... उसको यह समझ कर हैरत हुई की उसका अपने आप से पूरी तरह से नियंत्रण हट चुका था... बिजली ने उसको अपने ऊपर खींच लिया... सलीम बोली-
- कंडोम कहाँ है ? निकालिए...
बिजली- उसकी क्या जरुरत है... मुझे वह अच्छा नहीं लगता... बड़ी गिल -गीली सी लगती है...
सलीम- बिना कंडोम के यह सब करना ठीक नहीं होता...
बिजली- इसमें हर्ज भी क्या है ... एक बार कर लेते हैं ... बाद में लगा लेंगे ...
सलीम थोडी देर तक तो तर्क देते रहा , मगर बिजली की जिद के आगे झुक गया... उसने सोचा की आशा के मुताबिक अभी एक ही ग्राहक ने उसकी नथ उतारी है... उस समय तो कंडोम लगाया ही होगा... फ़िर अब इसकी क्या जरुरत है... और फ़िर एक बार से क्या होता है ? उसकी इसी सोच के कारण वह बिजली के झांसे आ गया... अगले ही पल वे दोनों एक दूसरे में समाने लगे ... बिजली चीख रही थी... सलीम बड़ी बेदर्दी के साथ हावी हो रहा था... वह चाहता था की जितने हो सकें उतने जोर-जोर से प्रहार किए जाएँ ताकि बिजली उसकी मर्दानगी की कायल हो सके...उसने बिजली से पूछा-
- अब कैसा लग रहा है ?
बिजली - बहुत दुःख हो रहा है ...
सलीम- बस थोडी देर रुको, जितना दुःख हो रहा है , उससे कई गुना सुख मिल जाएगा...अगर मुझसे मेरे मन की बात जानो तो मैं बहुत खुश हूँ... सचमुच, कंडोम से इतना मज़ा नहीं आता...

Saturday, August 30, 2008

भाग-93

आशा मम ही मन खुश थी... उसको इंतकाम लेने में बहुत सुकून मिलता था... उस रात उसने अपने हाथों से बिस्तर सजाया ... कई साल पहले सलीम ने जो खेल उसके साथ खेला था, आशा ने भी वही खेल दोहराया ... उसने पहले से ही सलीम की शराब में कामोत्तेजना बढ़ाने वाली दवा मिला दी थी ... उस दवा ने जब अपना असर दिखाना शुरू किया तो सलीम की काम वासना भड़क उठी... आशा ने बिजली को उसके करीब ही बिठा दिया था... वह जब बिजली की आंखों में झाँक कर देखता तो उसको करंट सा लगता था ... उसने बिजली से कहा-
- तुम बहुत खूबसूरत हो... आशा की खोज का भी जवाब नहीं है... अगर तुम मेहनत और प्यार से काम करोगी तो एक दिन तुम भी आशा की तरह बड़ी बन जाओगी... ऊपर वाले ने तुम्हें जो हुस्न की दौलत दी है, वह हर किसी को कहाँ मिलती है... बस इतना करना है की तुम्हें इनकी हट बात माननी होगी...
बिजली- मैं यहाँ रहना नहीं चाहती... मुझे अपने घर जाना है...
सलीम-इसे भी घर ही समझिये... अगर तुमको यहाँ कोई परेशानी है तो मुझसे कहो, मैं उस परेशानी का हल निकलवा सकता हूँ... मैंने बहुत से पत्थरों को तरस कर हीरा बनाया है... तुम्हें भी बना दूंगा॥
बिजली - और तुम ख़ुद पत्थर के पत्थर ही रहे... बड़ी हैरत की बात है...
आशा- क्या कहती हो मेरी बिजली रानी ... ये बहुत बड़े आदमी हैं...
बिजली - जो इंसान अपनी बेटी की उम्र की लड़की के साथ रंगरेलियां मनाना चाहे उसका बड़प्पन आसानी से समझ में आता है ...
आशा- तुम इनके साथ रात बिताओगी तो बहुत आनंद उठाओगी... मैं भी तो उस आनंद को प्राप्त कर चुकी हूँ...
सलीम- मैं तुम्हें ऊपर से ही बूढा नज़र आता हूँ... जब मेरे साथ कुछ पल बिताओगी तब समझ पाओगी ...
जब वे दोनों बातों में उलझे हुए थे तो आशा ने बिजली को भी कामोत्तेजना बढ़ाने वाला विशेष शरबत पिला दिया ... उसे पीते ही बिजली की भाषा बदलने लगी... उसका हर अंदाज़ बदलने लगा... अब वह ख़ुद ही चर्चा में मज़ा लेने लगी थी... जब आशा ने उसको एक सिगरेट जलाकर उसके हाथ में थमादी तो वह जोर-जोर से काश लगाने लगी...उसका बटन टूटने लगा था... काम वासना की चिंगारियां उसके जिस्म को झुलसा रही थीं...वह कातिल अंगडाइयां ले लेने लगी...सलीम ने उसके सीने पर हाथ फिराना शुरू कर दिया ... अब वे उस शानदार कमरे में दोनों ही बचे थे... बिजली इतनी उत्तेजित हुई की उसने अपने ऊपरी वस्त्र उतारने शुरू कर दिए... सलीम भी उसका सहयोग करने लगा... वह क्या जानता था की जिस बिजली के साथ वह आनंद की कल्पना कर रहा था, वह उसकी जान की सबसे बड़ी दुश्मन थी... वह उसे तोहफे में ऐड्स की सौगात सौपने वाली थी... वह ऐड्स,जिसका पूरी दुनिया में कोई इलाज नहीं है...वही बिजली कह रही थी-
- अचानक यह मुझे क्या हो गया है ? मेरे शरीर से आग की चिंगारियां क्यों निकलने लगीं ?
सलीम- थोडी देर में ये शांत हो जायेगी... इसी लिए तो मुंबई से यहाँ पर विशेष तौर पर लाया गया है... मैंने अब तक तुम जैसी न जाने कितनी लड़कियों की तकलीफ दूर की है... आज वे सब सुखी हैं... तुम्हारी मालकिन आशा का दर्द भी तो मैंने ही दूर किया था... तुम फ़िक्र न करो...

Friday, August 29, 2008

भाग-92

सलीम उसका गुनाहगार ही तो था... उसने आशा को प्यार की आड़ लेकर वैश्या बना दिया था... सबसे ज्यादा नफरत वह सलीम से ही करती थी... आज वही सलीम उसके रहमो करम पर उसीके सामने गिडगिडा रहा था... आशा के मन में तो कुछ और ही चल रहा था... वह दांतों से अपने निचले होठ को काट रही थी... सलीम उसके प्लान को समझ नहीं पाया... आशा उसको अपने हाथों से पैग बनाकर पिला रही थी... अपने लिए एक सिगरेट सुलगाकर आशा ने धुएं के छल्ले उडाने शुरू कर दिए... फ़िर सलीम की आंखों में आँखें डालकर बोली-
-क्या तुम्हारे लिए भी सिगरेट जला दूँ ?
सलीम- मैंने तीन सालों से सिगरेट छोड़ रखीं हैं ,लेकिन अगर तुम कहोगी तो जहर भी पी लूँगा...
उसकी बात पर आशा ऐसे ठहाका मारकर हंसी, जैसे किसी बच्चे ने कोई अटपटी बात कहदी हो... उसने बिजली को आवाज़ दी... वह चंचल और शोख लड़की थी ... उसने अभी-अभी जवानी की दहलीज पर कदम रखा था... उसे जो कोई एक बार देख लेता था, वह उसीका होकर रह जाता था... आशा के सिवाय किसी को भी यह मालूम नहींथा की बिजली को ऐड्स है... दो वर्ष पहले, जब वह बहुत छोटी थी, तभी उसके साथ एक हवसी ने बलात्कार किया था.... तभी से वह बलात्कार की शिकार हो गई... आशा ने उसका टेस्ट करवाया था... जिन लोगों से वह नफरत करती थी उनको प्यार से बिजली के हवाले कर दिया करती थी... बिजली के संपर्क में आकर आशा का शिकार इतना दीवाना हो जाया करता था की कंडोम भूलकर उसके साथ प्रणय क्रीडा में मस्त हो जाता था... और यहीं से उसकी उलटी गिनती शुरू हो जाया करती थी... बिजली को आशा ने अपना सबसे बड़ा हथियार बना रखा था... सलीम के लिए भी उसने बिजली को ख़ास तौर पर मिशन पर लगाया था... उसने सलीम के सामने ही बिजली से पूछा-
- साहब को खुश कर सकती हो ? मेरे बिल्कुल ख़ास हैं... इन्हें आज मुंबई से बुलाया गया है... मुंबई के बारे में तो तुमने सुना ही होगा... वहां पर एक से बढ़कर एक हसीना मिलती हैं... पता नहीं इनको यहाँ का स्वाद पसंद आएगा भी की नहीं ? वैसे ये पुराने रसिया हैं... बहुत खेले खाए हैं... पहले यहाँ की हजारों कलियों को मसल चुके हैं...
बिजली- मैं अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करुँगी...आप निश्चिंत रहें ...
आशा - इतना ख़याल रखना की ये आम ग्राहक नहीं हैं... मेरे जानो -जिगर हैं...
सलीम - तुम फ़िक्र न करो, अब मैं बिजली को समझा दूंगा...

आशा के चेहरे पर मुस्कराहट नाचने लगी... उसको बहुत खुशी हो रही थी... वह चाहती थी की सलीम ऐड्स का मरीज बनकर बची हुई जिंदगी जिए... उसका तीर बिल्कुल सही निशाने पर जाकर लगा था... सलीम ने पैग पर पैग पीने शुरू कर दिए... वह नशे में चूर होकर न जाने क्या-क्या बकता रहा ...

Thursday, August 28, 2008

भाग -९१

आशा- बड़ा एहसान किया मुझ पर ... कोई कितनी भी कोशिश क्यों न करले मगर पहले प्यार को नहीं भुला सकता ... तुम भी तो मेरा पहला-पहला प्यार हो ... तुमको बहुत मिस किया है मैंने...
सलीम- पहला नहीं दूसरा... पहला तो मेरे ख़याल से राजू था न... देखो , कितने बरस हुए लेकिन मैंने अभी तक तुम्हारे दोस्त का नाम याद कर रखा है...
आशा- और मेरी नहीं कहोगे... मैं बनना तो चाहती थी देवी, मगर तुमने मुझे वैश्या बना डाला ... मुझे कोठे पर बेच दिया ... फ़िर प्यार करती हूँ तुमसे ... ऐसी कौन सी रात होगी जब मैंने तुम्हें याद न किया हो...
सलीम- मैं तुम्हारे प्यार को सलाम करता हूँ...
आशा- घर -परिवार के बारे में कुछ बताओ ...
सलीम - जैसा था व् ऐसा ही हूँ... मेरा कोई नहीं है इस दुनिया में... तुम्हारे सिवाय...
आशा- शादी नहीं की ?
सलीम- नहीं... पूरी जिंदगी बस प्यार- मोहब्बत में ही गुजर गई... मैं सबसे प्यार करता रह, सब पर भरोसा जताता रहा, फ़िर भी तन्हाईयाँ मिलीं...
आशा- जो सबसे प्यार करने का दावा करता है, वह किसी से प्यार नहीं करता, और जो सब पर भरोसा करने का दम भरता है वह किसी पर भरोसा नहींकर पाटा... दुनिया इसी तरह की है... तुम्हारे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है...
सलीम- तुम ठीक कहती हो ... अब अगर तुम इजाजत दोगी , तो तुम्हरी चौखट पर पड़ा दो रोतो खाता रहूँगा...
आशा- ये सब इतना आसान नहीं होता सलीम ... कहने और करने में बड़ा अन्तर होता है... हो सकता है तुमसे भी अभी किसी ने बस इतनी सी ही, यानी सिर्फ़ दो रोटियों की ही तमन्ना की हो और इसका झांसा देकर तुमने न जाने कितनी बड़ी कीमत वसूली हो... यह सब होता है... मगर हमको भो यह सब सहने के लिए ख़ुद भी तैयार

Wednesday, August 27, 2008

भाग-90

इस धंधे में आकर भी अगर कोई लड़की पीना शुरू न करे , यह कैसे सम्भव है ?शबाब और शराब का मेल न हो तो सारा मज़ा बेकार हो जाता है... क्या तुम यह भी भूल गए की पहला जाम मुझे तुमने ही पिलाया था... शरबत में मिलाकर... शराब के साथ-साथ तुमने उसमें कामोत्तेजना बढ़ाने वाली दवा भी तो मिला राखी थी... उसे पीते ही मैं गर्म होकर तुमसे लिपटने लगी थी... याद आया ...
सलीम- छोडो भी... बहुत पुराणी बातें हैं... गढे हुए मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा ?
आशा- हाँ , ये बात भी ठीक ही है... क्या फायदा ? आज भी तुम हर बात फायदे के हिसाब से करते हो... अच्छा है... आओ, आज अपने हाथों से जाम पिलाऊंगी...
सलीम- वाह... क्या बात है ... यह घुंघराले बालों वाली लड़की कौन है ?
आशा- बड़े चालाक हो तुम... तुम्हारी नज़र भी शातिर है... आखिरकार उस छिपे हुए आइटम को ढूंढ ही लिया...
सलीम - हुस्न के असली पारखी तो हम ही हैं... पहले हम लोग ही देखते हैं...
आशा- लो , पैग बना दिया है... सच कहते हो ... अगर इन कोठों पर रोजाना घुंघरुओं का अलग-अलग संगीत्ब सुनाई देता है तो उसमें सबसे बड़ा योगदान तुम जैसे लोगों का ही होता है...
सलीम- कौन है ये ? कमसिन नज़र आती है...
आशा- एकदम करारी है... अभी-अभी तो हाथ लगी है... इसने बड़ी मुश्किल से नथ उतरवाई है... नाम तो इसका बिजली है , मगर यह सचमुच की बिजली है... तुम्हें भी देखते ही करंट लग गया ना ?
सलीम- कितने देती हो ताज़ा माल का ?
आशा - माल अच्छा हो तो पैसे की कोई सीमा नहीं है ... तुम कल से काम पर लग जाओ ...
सलीम-कल से काम पर जोर-शोर से लग जाता हूँ... आज इस क़यामत का आनंद चख लेता हूँ.... खूब मज़ा आएगा... अगर तुम कहो तो मैं तुम दोनों को साथ-साथ भी संतुष्ट कर सकता हूँ...
आशा- मैं कहीं भागी थोड़े ही जा रही हूँ.... मैं तो आख़िर तुम्हारी ही हूँ...
सलीम- बात तो तुम आज भी ऐसी करती हो की कलेजे के पार हो जाती हैं... पहले कितनी झिझकती थीं तुम ?
आशा- हाँ, पहले की तो बात ही कुछ और है ... उन बातों को अब याद करने से क्या फायदा... उस वक़्त तो मैं बिल्कुल भोली थी और तुम इतने ही मक्कार ...
सलीम- इसी बहाने मुझे गालिउँ भी दे रही हो... शराब भी पिला रही हो...
आशा- अरे नहीं... दरअसल , इस लाइन में आते ही मेरी जुबां भी गन्दी हो चुकी है... होठों पर हमेशा गालियाँ राखी रहती हैं... ये सारी देन भी आपकी ही है...
सलीम-मैंने जब मुंबई में यह सुना की तुम इतनी दौलतमंद हो गई हो तो बड़ा अच्छा लगा... तुम्हारे भेजे हुए आदमी के साथ तुंरत यहाँ चला आया ... तुम बुलाओ और मैं ना आऊँ ... भला यह कैसे हो सकता है...
























Tuesday, August 26, 2008

भाग-89

वह सफलता की सीढियां चढ़ती जा रही थी... कहते हैं की जब दौलत आती है तो कई बुराइयां भी साथ लाती है... आशा भी उद्दंड और घमंडी हो गई थी... उसका मिजाज़ बेहद सख्त हो गया... वह अपने कोठे की वेश्याओं के साथ बहुत मारपीट करती थी... उसके साथ जो गद्दारी हुई थी, वह उसका बदला लेने की हर सम्भव कोशिश करती थी... भ्रष्ट अफसरों ने उसके होसलों को और भी बढ़ा दिया था... इस प्रकार आशा टॉप लेबल की वैश्या से टॉप लेबल की कोठे मालकिन बन गई थी... उसने सलीम को भी ढूंढ लिया था... उससे आशा ने इतना खतरनाक इंतकाम लिया की सुनने वालों के भी रोंगटे खड़े हो जाएँ... उसने पहले सलीम को अपने पास बुलाया और प्यार से कहा-
- शुक्रिया सालीम... अगर तुम ना होते तो आज मैं इतनी ऊंचाई पर नहीं पहुच पाती... किसी ऑफिस में क्लर्क होती या फ़िर सब्जी की कोई छोटी-मोटी दूकान खोलकर बैठी होती... तुमने एहसान किया मुझ पर ... अगर वैश्या नहीं बनाया होता तो आज मेरे ये थाट-बाटनहीं होते... मैं बार -बार तुम्हारा आभार मानती हूँ...
सलीम- तुम मेरा मजाक तो नहीं उड़ा रही हो ?
आशा- कमाल है ... क्या तुम मजाक के लायक हो... मैंने तुम्हें खोजने में कोई कसार नहीं छोड़ी... लेकिन तुम ठहरे नम्बर एक के दलाल ... तुम मिले तो मुंबई की बदनाम गलियों में मिले... आख़िर मैंने तुम्हें पा ही लिया...
सलीम- तुमने घर बसाया की नहीं ?
आशा - अब मजाक तुम कर रहे हो सलीम, जिस लड़की की आबरू इस तरह लूट ली जाए , उसका घर भला कैसे बस सकता है... अगर तुमने मुझे जिस्म की मंदी में नीलाम नहीं किया होता तो शायद शादी भी हो ही जाती... खैर, छोडो... ये सब बेकार की बातें हैं... जिस राह से जाना ही नहीं उसके कोस गिनने से क्या फायदा ...
सलीम-अब मेरे लिए क्या आदेश है ?
आशा- तो क्या अब भी तुम दलाली कर सकते हो ? अब तो तुम्हारी उम्र भी काफी हो गई है...
सलीम - इससे क्या फर्क पड़ता है ... आज भी मैं तुम्हारे लिए एक से बढ़कर लड़की का प्रबंध कर सकता हूँ...
आशा - हाँ -हाँ , क्यों नहीं ?चोर भले ही चोरी छोड़ दे लेकिन हेरा फेरी नहीं छोड़ सकता... तुम तो वैसे भी पक्के दलाल हो... तुम जैसा सख्त जान दलाल हो तो बाट ही क्या है ?क्या अब भी शराब और शबाब का शौक रखते हो या ढलती उम्र के साथ-साथ जोश और जवानी भी रुखसत हो गए ?
सलीम- क्या कहती हो आशा ?मर्द कभी बूढे नहीं होते... सोलह साल की कमसिन भी पानी मांगने लगेगी...
आशा- एक आइटम है मेरे पास ... बहुत खतरनाक है... अभी-अभी नाथ उतरी है... अगर इच्छा हो तो आज रात पेश करूँ... तुम्हें निराशा नहीं होगी...
सलीम- नेकी , और पूछ-पूछ ?
आशा- ठीक है ... फ़िर , पीने -पिलाने का दौर शुरू कर देते हैं...
सलीम -क्या तुम भी पीने लगी हो ?
आशा- तुम भी कभी-कभी बच्चों जैसी बात करने लगते हो सलीम...

Monday, August 25, 2008

भाग -८८

पहला ग्राहक जब उसके पास आया तो वह अपना दोस्त बनाकर आशा के पास ले गया ... आशा तो काम वासना की आग में बुरी तरह जल रही थी... उसने कोई एतराज दर्ज नहीं कराया ... सलीम मंजा हुआ खिलाडी था... उसने बहुत अच्छी तरह से आशा को मना लिया... उस रात आशा को वैश्या बनाने की शुरुआत कर दी गयी ...सलीम के अलावा दो अन्य लोगों ने उसके जिस्म का लुत्फ़ उठाया... आशा को पता ही नहीं चला की वह कब टॉप डिमांड की वैश्या बना दी गयी और कब उसको कोठे पर बेच दिया गया... सबसे हैरत की बात तो ये थी की उसके पेट में पल रहे गर्भ को भी गिरा दिया गया था... सलीम एक नम्बर का गद्दार निकला था... जब आशा को असलियत की जानकारी हुई तो काफी देर हो चुकी थी... उसकी दुनिया लुट चुकी थी... वह बहुत रोई...

कई दिनों तक खाना भी नहीं खाया , यहाँ तक की एक दिन अपना सर भी फोड़ लिया... आत्महत्या करने की कोशिश की, मगर कोई फायदा नहीं हुआ... उसने मौत मांगी लेकिन वह भी नहीं मिल पाई... कई ग्राहकों से उसने अपनी व्यथा सुनाई... तब भी उसकी इस नर्क से रिहाई नहीं हो पाई... आशा को मोहब्बत के नाम से नफरत हो गयी... उसका दुनिया के हर रिश्ते से विश्वाश उठ गया... उसको रोजाना हवस के भूखे भेदियों के सामने परोस दिया जाता था... जब वह इनकार करती तो कोठे की मालकिन उसे बहुत बड़ी सज़ा दिया करती थी... यातना सह-सहकर आशा इतनी सख्त हो गयी की धीरे-धीरे उसने कोठे की जिंदगी को पूरी तरह से आत्मसात कर लिया... वह प्यार के नाम से ही चिढ़ने लगी थी... कोठे की नर्क भरी जिंदगी जीते-जीते उसने यह तय कर लिया की अब वह दिल्ली की सबसे बड़ी कोठा मालकिन बनकर दिखायेगी... जब कोई उसके सामने प्यार-महब्बत की बात करता तो उसका खून खौल उठता था... क्रूर ग्राहकों ने उसकी संवेदनशील भावनाओं को एकदम मृत कर दिया था... वह इतनी सख्ती से पेश आती की देखने वाला देखकर दंग रह जाता था... कुछ साल के बाद ही उसने मौका पाकर अपनी मालकिन की ह्त्या करदी... पुलिस से सैटिंग करके उसने ह्त्या को आत्महत्या का रूप भी दे दिया था... इसके बाद वह ख़ुद कोठा मालकिन बन बैठी... यह ज्यादा बड़ा कोठा नहीं था, जगह भी किराए पर थी, मगर शुरुआत के लिए इतना ही काफी था... आशा ने फ़िर मुड़कर नहीं देखा ... जिस्मफरोशी के आकाश पर उसका नाम चमकने लगा... उसके कोठे पर रोजाना नई-नयी लड़कियां आने लगीं... वह ऊंची रकम देकर ऐसी लड़कियां अपने कोठे पर रखती थी की हर समय ग्राहकों की लाइन लगी रहती थी... आशा के पास जब दौलत आयी तो वह और भी ज्यादा तरक्की करने लगी... उसने एक कोठा और चालू कर दिया था... किस्मत उसका साथ दे रही थी... नेता से लेकर अफसर तक उसके कोठे का स्वाद चखते थे...