Tuesday, February 8, 2011

बेवफा खँडहर वाली , भाग-47
सूरज- सच तो ये है कि मेरा मन बड़ा घबरा रहा है.
किरण- मुझसे डर तो नहीं लग रहा
सूरज- जिससे प्यार करते हैं, उससे डर कैसा ?
किरण- तो अपने चाहने वालों को इस तरह ठोकर मारकर जाता है क्या ?
सूरज- तुम तो मेरी जान हो . मेरे दिल में जिगर में हो, मेरी साँसों में हो, हर धडकन में बसी हो.मैं तुम्हारा दिल भला कैसे दुखा सकता हूँ, तुम सोच भी कैसे सकती हो कि मै तुम्हारे दिल को दुखाऊंगा
, बस ये उम्मीद कर सकता हूँ कि तुम भी मेरी भावनाओं को समझने की कोशिश करोगी . अगर तुम मेरे तरीके से सोचने का प्रयत्न करो तो सारा मामला साफ़ हो जाएगा .
किरण- मै तुम्हें खोने से डरती हूँ, मै चाहती हूँ कि किसी तरह से तुम मेरे दिल के दर्द को समझ पाओ . मेरी बातों को समझ पाओ .
सूरज- अच्छा ठीक है, मै जरूर जानने की कोशिश करूँगा. बताओ तो सही .
किरण- मेरी जों भी संपत्ति है, उस सबके मैनेजर बन जाओ , मालिक बन जाओ . और अगर ऐसा करते हो तो तुम मेरे साथ रहोगे . मै तुम्हारे बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती .
सूरज- मुझे भी तुमसे कम लगाव नहीं है. मै भी यही चाहता हूँ , लेकिन जब मै घर जाना चाहता हूँ तो इसमें तुम्हें क्या ऐतराज हो रहा है .
किरण- मेरे कहने का अर्थ ये है कि मै एक पल के लिए भी दूर रहने से मुझे डर लगता है. इसकी जब मै कल्पना करती हूँ तभी मेरी रूह तक काँप जाती है. मै विचलित हो जाती है. और जब तुम प्रणय के इन पलों
को छोड़कर जाने की बात करते हो तब मेरा बहुत बुरा हाल हो जाता है.
सूरज- क्या और लोग ऐसा नहीं करते कि अपने चाहने वालों को छोड़कर कुछ समय के लिए जाते हैं. तुम इतना डर क्यों पाले हुए हो ?
किरण- मेरे इस डर को अपने दिमाग से निकाल दीजिए . किसी भी तरह से ऐसा करो.
सूरज- आओ, मेरे करीब आओ. आकर फिर से मेरे सीने में समा जाओ. मेरे साथ इश्क करो. मोहब्बत करो. यह प्यार ही है जों तुम्हारे -हमारे मन की दहशत को खत्म कर सकते हैं.
किरण- हाँ, यार बात बिलकुल सही है. बस यही बात ठीक है. मुझे प्यार के रंग में रंगलो .मुझे अपने आगोश में ले लों और दुनिया को मुझसे दूर करदो.
सूरज ने अब किरण को अपने आगोश में भर लिया था. वह उसके होठों से अपने होठों को सटाने लगा. किरण के जिस्म में फिर से आग सुलगने लगी. यह कामवासना की आग थी. सूरज अपने होठों के स्पर्श
से इस आग को जितना बुझाने का प्रयास करता, वह उतनी ही सुलगने लगती थी. किरण के सीने पर जों उभार थे, उनमे जोश आने लगा . वह कराहते हुए बोली-
- आह, इस बेकरारी को अब बढ़ने मत दो. मुझे अच्छी तरह से भींच लों.
सूरज- ज्यादा समय भी नहीं हो पाया है और हम लोग कितने करीब आ गए हैं.
किरण- हाँ, शायद हम जन्मो -जन्मो के प्रेमी हैं, बिछड़े हुए हैं , अब मिले हैं, और फिर से जुदा होने की जिद करते हैं, मै किसी भी कीमत पर ऐसा नहीं होने दूंगी .
सूरज- तुम तो मेरी जान हो , जैसा कहोगे , वैसा कहूँगा .
किरण- कभी हंसाते हो और कभी रुलाते हो. जब भी तुम्हारे दिल में कोई कीड़ा पैदा होता है तभी यहाँ से जाने की जिद करते हो.
सूरज- क्या करूं, तुम समझ ही नहीं पाती .
किरण- मैं सिर्फ प्यार की भाषा समझती हूँ, इतना ही जानती हूँ कि तुम्हारे सिवाय मेरा अस्तित्व ही नहीं है.
सूरज- इस प्यार के रंग में तुमने मुझे भी रंग लिया है.
किरण- काश, ऐसा होता. तुम मेरे प्यार के रंग में रंग पाते.
सूरज- और कैसा रंग होता है ?
किरण- तुम मेरे साथ रहोगे , तो जीऊँगी, वरना मेरा जीना बेकार है.
बेवफा खँडहर वाली , भाग-46
सूरज और किरण की हालत इस समय सांप और छछुंदर जैसी थी. वह न तो उसे निगल ही सकता था और ना उगल ही सकता था. वह उसके जी का जंजाल बन गयी थी. दिखने में वह हसीन थी .
कामुक थी , उसकी अदाएं बेहद दिलकश थीं, लेकिन जब उसे यह एहसास होता कि जिस कमरे में वे दोनों मौजूद हैं , वह कुछ अजीब तरह का है तो उसका हाल बेहाल हो जाया करता था . उसके
मन के संदेह को वह पढ़ भी लिया करती थी. यह बात उसके लिए और भी ज्यादा आश्चर्य जनक थी. हिम्मत करके सूरज ने एक बार कह भी दिया -
- अब तो खाना भी हो गया है, अगर आप अपनी गाड़ी भेज सकें तो मुझे गाँव तक भिजवा दीजिए . बाइक को मै बाद में ले जाउंगा .
किरण- गाड़ी भी आपकी है , मै भी आपकी हूँ, कोई गैर थोड़े ही हूँ. तुम मुझे अपना क्यों नहीं मान पा रहे हो ?
सूरज- अगर आपको अपना नहीं मानता तो भला यहाँ इस तरह क्यों नहीं होता ?
किरण- अगर तुम्हारा वश चलता तो यहाँ से भाग खड़े होते , मै गलत कह रही हूँ तो दिल पर हाथ रखकर कहदो .
सूरज- तो इसका मतलब ये हुआ कि आप मुझे यहाँ लेकर आई थीं . आया तो मै अपने मन से था, मदद मांगने आया था और इस वक्त भी सहायता की गुहार कर रहा हूँ.
किरण- भले ही अपने दिल से आये थे मगर मुझसे मिलने तो नहीं आये थे, वो तो तुम्हारी मर्दानगी पर मेरा ही मन आ गया .
सूरज- आपके साथ बिताए हर पल को मै जीवन भर भी नहीं भूल पाउँगा . आपका मै बेसब्री से इन्तजार करूँगा और जैसे ही मौक़ा मिला मिलने भी आउंगा .
किरण- क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मेरी इस छोटी सी दुनिया में ही तुम अपना आशियाना बनालो . यहाँ तुम्हें किसी तरह की कोई चिंता नहीं होगी. मै कोई कमी नहीं रहने दूंगी
सूरज- मुझे ऐतराज नहीं है. मगर घर तो जाना ही होअगा .
किरण- तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करते ? जहां तक घर की बात है , मैं इनकार थोड़े ही कर रही हूँ. सच बात तो ये है कि तुमने मुझे पागल जैसी बना दिया है. अब मै तुम्हारे बिना जीने की कल्पा भी नहीं
कर सकती. ऐसा लगता है जैसे तुमने मेरी ऊपर कोई जादू सा कर दिया है.
सूरज- जादूगर तो तुम हो.
किरण- अगर ऐसा होता तो तुम मेरे साथ ऐसा व्यवहार नहीं करते. मुझे ठुकराकर इस तरह नहीं जा सकते थी.
सूरज- अपने घर तो हर किसीको जाना ही होता है. ऐसा कौन होगा जों अपने घर ना जाकर एक जगह पर ही कैद होकर रह जाएगा . क्या यहाँ कोई मोबाइल नहीं है ?
किरण- तुम्हारे मोबाइल का क्या हुआ ?
सूरज- जैसे ही मेरी मोटर साइकिल टकराई , मोबाइल भी जेब से गिर गया था, वह सीधा पानी में जा गिरा, उसे निकालने का भी कोई अर्थ नहीं था. खराब हो गया होगा .
किरण- हाँ, सो तो है. दरअसल मोबाइल तो मेरे पास है , लेकिन किसी काम का नहीं है.
सूरज- क्यों ? ऐसी क्या तकलीफ है ?
किरण- यहाँ नेटवर्क नहीं है. अभी तक टावर नहीं लग पाए हैं.
सूरज- तो फोन से काम चल जाएगा . मेरा एक नंबर लगवादों . घर में लोग परेशां होते होंगे .
किरण- तुम्हारी तबियत तो ठीक है न , अरे बेमतलब रात में किसीको तकलीफ देते हो. तुम्हींने तो कहा था कि तुम्हारे घरवालों को मालूम है कि तुम लेट सेट होते रहते हो.
सूरज- सच तो ये है कि मेरा मन बड़ा घबरा रहा है.
किरण- मुझसे डर तो नहीं लग रहा
सूरज- जिससे प्यार करते हैं, उससे डर कैसा ?
किरण- तो अपने चाहने वालों को इस तरह ठोकर मारकर जाता है क्या ?
सूरज- तुम तो मेरी जान हो . मेरे दिल में जिगर में हो, मेरी साँसों में हो, हर धडकन में बसी हो.

Monday, February 7, 2011

बेवफा खँडहर वाली , भाग-45
सूरज- तुम्हें ठुकराने का साहस भला कौन कर सकता है ?
किरण- और किसकी कहूँ, तुम हो न . साक्षात मेरे सामने हो.
सूरज- मै तो लिपटा हुआ हूँ तुमसे. मैं कहाँ दूर हूँ.
किरण- इन्हीं नजदीकियों को तो हमेशा के लिए और भी करीब लाने की बात कर रही हूँ.
सूरज- पहले ये बताओ कि तुम्हें मेरे साथ प्रणय क्रीडा करके मजा आया कि नहीं ?
किरण- अच्छा, इसका मतलब ये हुआ कि अपने मुंह से तारीफ़ करने का इरादा है क्या ? चलो , फिर से किये देती हूँ. इतना मजा या कि शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता . साक्षात कामदेव भी अगर आता है
तो फेल हो जाएगा. मैं तो ठहरी पेशेवर औरत. मैंने बहुत कुओं का पानी पिया है. घाट -घाट का पानी पीने के बाद अच्छी तरह से जान गयी हूँ कि तुम सबसे कमाल हो. तुम्हारे जैसा दुनिया में कोई दूसरा नहीं है.
सूरज- बस अब रफ़्तार को रोक डालिए. मै फ्रेश होकर कुछ भोजन करना चाहता हूँ.
किरण- हाँ यार, मै तो भूल ही गयी कि आज हमारी याह सुहागरात है, फोर्मेलिटी पूरी करनी जरूरी है , इसलिए मैंने दूध का इंतजाम पहले ही कर लिया था . ये लीजिए .
सूरज- क्या अब वो कहानी नहीं सुनाओगी जिसके कारण आपको अपना यह सोने जैसा तन बेचने का काम करना पडा.
किरण- पहले दूध पीजिए , फ्रेश होते रहिये मैं बताती रहूंगी.
सूरन ने जैसे आदेश का पालन किया , वह तुरण बाथरूम चला गया. अपने आप फौवारे चलने ;आगे. हाथ में सिगरेट थामे किरण भी उसके पास ही आ गयी . वह बताने लगी .
- जों प्रिंस था , वह मेरे जिस्म का दीवाना हो गय था. वह मेरी खतीर किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार था। उसने गिरोह चलाने वाले लोगों से परमीशन भी ले ली थी। वे लोग मुझे उस शेख के साथ दुबई भेजने के लिए राजी भी हो गए । प्रिंस की उम्र तो ज्यादा थी मगर वह सेक्सी बहुत ज्यादा था। उसने मुझे पूरी रात परेशां किये रखा रखा । शाय द वह कामवासना की शक्ति बढानेवाली कोई दवा खाता था।उसने कहा -
-




Saturday, February 5, 2011

बेवफा खँडहर वाली , भाग-44
सूरज- देखो मै तुम्हारी हर बात मानूंगा बस यही नहीं मानूगा , मुझे मोहब्बत से मतलब है दौलत मेरी दुश्मन है.
किरण- नाराज क्यों होते हो , मेरे कहने का मतलब तो ये है कि जों कुछ मेरा है वही तुम्हारा भी है न.
सूरज- ये दौलत बड़ी कुत्ती चीज होती है , इंसान का जीना तक हराम कर देती है.
किरण- दौलत जीने का सहारा भी तो है, इसके बिना कुछ है भी नहीं,.
सूरज- मैं नहीं मानता, दौलत बहुत कुछ हो सकती है लेकिन सब कुछ तो हरगिज नहीं. दौलत से रोटी तो खरीद सकते हैं लेकिन भूख नहीं खरीदी जा सकती . यह मेरा कहना नहीं बुजुर्गो की हिदायते हैं
इसलिए मुझे आप दौलत के जाल में उलझाने की कोशिश न करें. मुझे आपसे लगाव हो सकता है, मोहब्बत हो सकती है , मै आपका आदर सम्मान कर सकता हूँ मगर दौलत मुझे अपनी तरफ आकर्षित
नहीं कर सकती, तुम यकीन मानो , हमारे गाँव में लोगो ने गलत रास्ते अपनाकर करोडों की जमीं जायदाद बना लिए हैं हैं , मैं भले ही इतना बड़ा इंसान नहीं हूँ , मगर इतना है कि मैं इज्जत की
कमाता -खाता हूँ. .
किरण- तुम्हारे गाँव में लोग कौन सा गलत रास्ता अपनाए हुए हैं ?
सूरज- हथियारों की अवैध फैक्ट्रियां हैं, उनमे लागत कम आती है और मुनाफ़ा ज्यादा होता है. ज्यादा मुनाफे के लिए लोग देश के दुशमनों को हथियार की सप्लाई कर रहे हैं. जों बन्दूक वे लोग बेचते हैं
उसकी गोलियाँ हमारे किसी अपने के सीने को ही चीरकर जाती होगी, ऐसे लोगों का अंजाम ये होगा कि किसी दिन इनके अपने को भी उन्हीं की गोलियों का शिकार होना पडेगा . तब ये समझेंगे कि मानवता
क्या होती है और दानवता कितनी भयंकर होती है .
किरण- छोडो भी ... इन बातोब को . बस गलत बातों से दूर रहो इतना ही काफी है. मैंने बन्दूक बेचकर नहीं बल्कि अपना जिस्म बेचकर यह संपत्ति कमाई है और इस पर मेरा अधिकार है. यह मेरी मेहनत
की कमाई है, इस कमाई को तुम गलत तरीके से कमाई हुई नहीं बोल सकते . मैं अपनी मेहनत की कमाई को समर्पित करना चाहती हूँ. जब कोई प्रेमी अपनी मेहनत की कमाई आपनी प्रेमिका को देता है
तब क्या वह इनकार कर देती है. ? क्या वह उसे स्वीकार नहीं करती ? जब मै खुद तुम्हें इस दौलत को समर्पित करना चाहती हूँ तो तुम ऐतराज क्यों उठाते हो ? क्यातुम समझते हो कि यह जमीं जायदाद
यह दौलत , तुम्हारे प्यार की दौलत से किसी भी तरह श्रेष्ठ है ? नहीं सूरज. तुम्हारा यह प्यार मेरे लिए अनमोल है. मै इसकी कद्र करती हूँ और अपनी तुच्छ दौलत को तुम्हें समर्पित करने के लिए आग्रह
करती हूँ. ज़रा कल्पना करिये कितना अच्छा होगा जब तुम मेरे बिजनेस को संभालोगे और घर बैठकर मै मजे से तुम्हारे आने का इन्तजार करूंगी . वे पल कितने खट्टे , कितने मीठे कितने मदमस्त होंगे . कितना
अच्छा होता जब मै व्यापार की टेंशन से मुक्त हो जाउंगी और तुम [प्यार की टेंशन से मुक्त हो जाओगे , फिर कभी तुम्हें किसी महिला को मोटर साइकिल पर लिफ्ट देने की जरूरत नहीं पड़ेगी . मै खुद तुमसे
चिपककर बैठा करूंगी . सचमुच वे पल बड़े ही यादगार होंगे.
सूरज- मेरे पास ऐसा क्या है जिसे तुम इतना पसंद करने लगी हो ?
किरण- तुम्हारे पास तो मोहब्बत की असीम दौलत है, तुम उसे महसूस नहीं कर पाओगे .
सूरज- लेकिन तुम्हारे पास तो हजारों तरह के लोग आते हैं, क्या उनमे से किसीके पास तुम्हें ऐसा हुनर नहीं आया ?
किरण- सच तो ये है कि ऐसे और भी लोग मुझसे मिले जों तुम्हारी तरह तो नहीं मगर हाँ, इससे कुछ मिलते -जुलते थे, लेकिन किसीने ने मुझे ठुकरा दिया तो किसीको मैंने ठुकरा दिया . और
अंत में मुझे यही तन्हाइयां नसीब हुईं.
सूरज- तुम्हें ठुकराने का साहस भला कौन कर सकता है ?
किरण- और किसकी कहूँ, तुम हो न . साक्षात मेरे सामने हो.
सूरज- मै तो लिपटा हुआ हूँ तुमसे. मैं कहाँ दूर हूँ.
किरण- इन्हीं नजदीकियों को तो हमेशा के लिए और भी करीब लाने की बात कर रही हूँ.
सूरज- पहले ये बताओ कि तुम्हें मेरे साथ प्रणय क्रीडा करके मजा आया कि नहीं ?

Friday, February 4, 2011

बेवफा खँडहर वाली , भाग-४३
वह किसी तरह से भाग जाए, पीछे मुड़कर भी नहीं देखे, उसने अपने मन में यह निश्चय भी कर लिया था कि किरण अगर उसके घर जाने के लिए मना करती है तब भी वह सुबह होते ही भाग जाएगा . अपनी बाइक को
भी वहीं छोड़ देगा , फिर जों हो सो हो. और होगा भी क्या ? वह दौडकर सड़क पर जाएगा , वहाँ से किसी भी वाहन में बैठ सकता है, मजबूरी बताने पर कौन होगा जों उसकी मदद नहीं करेगा. रही बात बाइक की तो उसका
भी बीमा कराया हुआ था, पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करा देगा , बेंक की किश्त बीमा वाले भर देंगे, मगर इस सबकी नौबत ही नहीं आई. किरण ने खुद ही उसे सुबह घर जाने की इजाजत दे दी थी, मगर किरण का यह
वाजी उसे परेशां किये हुए था कि इस रात की कभी सुबह नहीं होती. क्यों नहीं होती ? वह बुदबुदा भी रहा था और किरण के साथ प्रणय सम्बन्ध भी बना रहा था, उसके प्रहार तेज हो चले थे, वासना की आंधी अब और भी तेज चलने
लगी थी. कामवासना का तूफ़ान उन दोनों को अपनी आगोश में लपेटे हुए था. एक क्षण ऐसा भी आया जब शब्द मौन हो गए और वे दोनों एक दूसरे में समा गए. यह प्यार का मौसम था. ये पल बेहद रंगीन , बेहद खुशनुमा और
कभी न भूलने वाले थे, किरण ने सूरज को इतनी जोर से कसकर पकड़ रखा था जैसे कि उसे यह डर कि सूरज किसी भी क्षण उससे दूर चला जाएगा . सूरज भी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहा था. वह जान गया था किरण
कि कमजोरी को, उसकी समझ में यह बात आ चुकी थी कि किरण सेक्सी युवती है, उसकी प्यास को हर कोई नहीं बुझा सकता. वह खुद स्वीकार कर चुकी थी कि बड़े- बड़े धुरंधर दिखने वाले और अपने आपको तीसमारखां
बताने वाले लोग भी उसको बिस्तर पर ऐसी सुख संतुष्टि नहीं दे पाए थे जिसकी उसे दरकार थी, वह उसको कामदेव जैसा मान रही थी इसका मतलब साफ़ अहि कि वह उसकी ताकत की आगे नतमस्तक हो चुकी थी. वह
सोच ही रहा था कि किरण के मुझ से आवाज निकली-
- बस, अब और नहीं. अब छोड़ भी दो, तुमने तो मेरा तूफ़ान मेल ही बनाकर रख दिया. सचमुच तुम बहुत शक्तिमान हो, क्या परफेक्स खाते हो क्या ? तभी इतना जोश हो सकता है .
सूरज- मुझे भी तुमने बहुत खुशी दी है, मै आभारी हूँ आपका.
किरण- तुम बहुत सीधे और सच्चे हो, तुम्हारे जैसे लोग जमाने में बहुत कम मिलते हैं, मेरी किस्मत से जब तुम मिल ही गए हो तो आसानी से तुम्हें छोड़ने वाली नहीं हूँ, तुम जहाँ -जहाँ चलोगे मेरा साया साथ होगा .
सूरज तुम जैसी हसीना को भी कौन कमबख्त छोड़ना चाहेगा. अब तो मैं जब भी यहाँ से गुजरा करूँगा, तुमसे मुलाक़ात जरूर किया करूँगा .
किरण- क्या गज़ब ढाते हो, इधर से निकलोगे तभी मिलोगे क्या ? मुझसे मिलने के लिए स्पेशल नहीं आओगे ?
सूराज- जरूर आऊंगा, जब भी दिल से याद करोगी , चला आऊंगा .
किरण- सच कहूँ तो अब तुम्हें छोड़ने को ही जी नहीं चाहता . जब जाओगे तब न आने की टेंशन होगी, ऐसा क्यूँ नहीं करते ...
सूरज- कैसा ? बोलिए न रुक क्यों गयी ?
किरण- तुम यहीं पर क्यूँ नहीं रह लेते ? यहाँ तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी . तुम्हारी नौकरी की टेंशन भी दूर हो जायेगी, मै तुम्हें इस होटल पर बड़े पद पर रख दूंगी, कैसा रहेगा ? और हाँ, तुम्हारी वो समस्या भी हल हो जायेगी .
सूरज- और कौन सी समस्या की बात कर रही हो ?
किरण- वही, जों तुम लड़कियों से सटकर बैठना चाहते हो. तुम्हारी आदत है न लड़कियों को बाइक पर लिफ्ट देने की, फिर इसके लिए तुम्हें कहीं देर -सवेर जाने की जरूरत नहीं होगी . मैं हूँ न, जब जी चाहा , मुझे बाइक पर
बिठाकर घुमा लाये , मै तो वैसे भी तुम्हारी से बिलकुल चिपककर बैठने वाली हूँ.
सूरज- तुम भी है न कमाल करती हो . मजाक भी उड़ा लेती हो और सामने वाले को एहसास भी नहीं होने देती.
किरण -अच्छा ये तो बताओ क तुम्हारे साथ मजाक मस्ती नहीं करूंगी तो किसके साथ करूंगी , अब तो मेरा अगर कोई इस दुनिया में है तो वो तुम हो. मै तुम्हारी हूँ, ये होटल तुम्हारा हो, करोड़ों-अरबों की मेरी जों संपत्ति
है वो सब भी तुम्हारी ही है.
सूरज- देखो मै तुम्हारी हर बात मानूंगा बस यही नहीं मानूगा , मुझे मोहब्बत से मतलब है दौलत मेरी दुश्मन है.
किरण- नाराज क्यों होते हो , मेरे कहने का मतलब तो ये है कि जों कुछ मेरा है वही तुम्हारा भी है न.
सूरज- ये दौलत बड़ी कुत्ती चीज होती है , इंसान का जीना तक हराम कर देती है.
किरण- दौलत जीने का सहारा भी तो है, इसके बिना कुछ है भी नहीं,.
सूरज- मैं नहीं मानता, दौलत बहुत कुछ हो सकती है लेकिन सब कुछ तो हरगिज नहीं.

Thursday, February 3, 2011

बेवफा खंडहर वाली , भाग-42
किरण- जी नहीं, बिलकुल नहीं. मैन तुमसे मजा तो ले सकती हूँ मगर तुम्हारा मजाक नहीं उड़ा सकती.
सूरज- यह भी क्या अजब बात बताई है आपने . जानती भी हीब सब कुछ हैं और छिपाती भी सब कुछ हैं.
किरण- अपने मन से वहम निकाल्दो मेरी जान . इससे चिंता बढ़ती है.
सूरज- क्या आसपास कोई गैरेज नहीं है ?
किरण- इतनी रात गए गैरेज की ख्वाहिश , कोई बात तो जरूर है. किस्से मिलने की इच्छा है इतनी रात ?
सूरज- अरे बाबा, मै अभी की नहीं सुबह की बात कर रहां हूँ. सुबह सवेरे ही मुझे गाड़ी ठीक करानीहै, सुबह जल्दी निकलना होगा. थोड़ी देर के लिए ही सही , मगर एक बार के लिए मुझे घर जाना होगा , बहुत
सारे काम बाकी रह गए हैं, मेरे बिना उन्हें कोई और नहीं कर सकता, इसलिए गैरेज पूछ रहा हूँ.
किरण- अच्छा सुबह की बात कर रहे हो, लेकिन सुबह होने तो दो , हो सकता है कि इस रात की कोई सुबह ही न हो. एक फिल्म भी आयी थी इस नाम की. 'इस रात की कोई सुबह नहीं ' .
सूरज- क्या ? क्या कहा आपने ? इस रात की कोई सुबह नहीं . प्रकृति से कभी कोई लड़ पाया है क्या ? अगर लड़ भी गया तो जीत भी सका है क्या. कुदरत ने दिन के बाद रात, रात के बाद दिन, अँधेरे के
बाद उजाला, गम के बा खुशी इस तरह के नियम बनाये हैं और अपना बनाया नियम भला कोई कैसे तोड़ सकता है .
किरण- मेरे रहते तुम्हें फ़िक्र करने की कोई जरूरत नहीं है, पूरा गैरेज ही उठकर तुम्हारे पास चला आएगा . यहाँ तक कि तुम्हें एक दूसरे नई गाडी दिलादी जायेगी .तुम डरते बहुत ज्यादा हो.
सूरज- तुम जोर का झटका धीरे से जों देती हो. अचानक ऐसा पंच मारती हो कि पता भी नहीं चल पाता.
किरण- हा हा हा ... अब ये न कहना कि मैं भी तुमको रहस्मयी दिखाई देती हूँ.
सूरज- सच तो यही है मगर ये बात मै अपनी जुबान से कह नहीं सकता, थरथरा जायेगीजुबान. क्योंकि तुमसे प्यार ही इतना ज्यादा हो गया है कि अब जुदाई का डर भी सताने लगा है. तुम्हारे नाराज होने की
चिंता भी सताने लगी है , सोचता हूँ कि मेरी किसी बात या व्यवहार से अगर तुम नाराज हो गयी तो मै कैसे ज़िंदा रहूंगा .
किरण- ये कैसी मोहब्बर है सूरज, एक तरफ बेंतिहाँ प्यार है तो दूसरे तरफ संदेह भी भी है. दोनों साथ -साथ कैसे चल सकते हैं. ?
सूरज- पाता नहीं, मैंने तो पहली बार किसीसे मोहब्बत की है, पहली बार किसीके साथ प्रणय सम्बन्ध बनाये हैं, मै नहीं जानता दीवानगी किसे कहते हैं,मै नहीं जानता कि मै जों कर रहा हूँ वह गलत है या सही है ,
या फिर जों कह रहा हूँ वह गलत या सही क्या है ?
किरण- अब रहने भी दो, जाने भी दो. जों हुआ सो हुआ . अब चुप रहिये क्योंकि सचमुच तुम्हें नहीं मालूम कि तुम क्या कह रहे हो. मैं ऐसा करती हूँ कि तुमको सुबह गैरेज तक पहुंचा देती हूँ, और यह काम पहली
फुर्सत में ही करूंगी, इसके बाद आप ऐसा करना कि आराम से अपने घर चले जाना , जरूरी काम निबटाना और उसके बाद मुझसे मिलने आना , ठीक है ?
सूरज- हाँ, ठीक है. ये ठीक रहेगा. मेरा भी यही विचार था.
किरण - मै अपने महबूब के दिल को पढ़ना अच्छी तरह से जान गयी हूँ. अब दिल -दिमाग कुछ हल्का हुआ ?
सूरज- अब कोई चिंता नहीं है. अब मेरे मन में से गर्दिश के बादल छंट चुके हैं.
सूरज ने सचमुच राहत की सांस ली थी, वह दिल में इस बात को लेकर घबराया हुआ था कि किरण पता नहीं उसे घर जाने की इजाजत देगी भी कि नहीं. कभी-कभी उसकी इच्छा होती कि अपनी समूची शक्ति को समेटकर
वह किसी तरह से भाग जाए, पीछे मुड़कर भी नहीं देखे, उसने अपने मन में यह निश्चय भी कर लिया था कि किरण अगर उसके घर जाने के लिए मना करती है तब भी वह सुबह होते ही भाग जाएगा . अपनी बाइक को
भी वहीं छोड़ देगा , फिर जों हो सो हो. और होगा भी क्या ? वह दौडकर सड़क पर जाएगा , वहाँ से किसी भी वाहन में बैठ सकता है, मजबूरी बताने पर कौन होगा जों उसकी मदद नहीं करेगा. रही बात बाइक की तो उसका
भी बीमा कराया हुआ था, पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करा देगा , बेंक की किश्त बीमा वाले भर देंगे, मगर इस सबकी नौबत ही नहीं आई. किरण ने खुद ही उसे सुबह घर जाने की इजाजत दे दी थी, मगर किरण का यह
वाजी उसे परेशां किये हुए था कि इस रात की कभी सुबह नहीं होती. क्यों नहीं होती ? वह बुदबुदा भी रहा था और किरण के साथ प्रणय सम्बन्ध भी बना रहा था, उसके प्रहार तेज हो चले थे, वासना की आंधी अब और भी तेज चलने
लगी थी. कामवासना का तूफ़ान उन दोनों को अपनी आगोश में लपेटे हुए था. एक क्षण ऐसा भी आया जब शब्द मौन हो गए और वे दोनों एक दूसरे में समा गए.
बेवफा खंडहर वाली , भाग-42
किरण- जी नहीं, बिलकुल नहीं. मैन तुमसे मजा तो ले सकती हूँ मगर तुम्हारा मजाक नहीं उड़ा सकती.
सूरज- यह भी क्या अजब बात बताई है आपने . जानती भी हीब सब कुछ हैं और छिपाती भी सब कुछ हैं.
किरण- अपने मन से वहम निकाल्दो मेरी जान . इससे चिंता बढ़ती है.
सूरज- क्या आसपास कोई गैरेज नहीं है ?
किरण- इतनी रात गए गैरेज की ख्वाहिश , कोई बात तो जरूर है. किस्से मिलने की इच्छा है इतनी रात ?
सूरज- अरे बाबा, मै अभी की नहीं सुबह की बात कर रहां हूँ. सुबह सवेरे ही मुझे गाड़ी ठीक करानीहै, सुबह जल्दी निकलना होगा. थोड़ी देर के लिए ही सही , मगर एक बार के लिए मुझे घर जाना होगा , बहुत
सारे काम बाकी रह गए हैं, मेरे बिना उन्हें कोई और नहीं कर सकता, इसलिए गैरेज पूछ रहा हूँ.
किरण- अच्छा सुबह की बात कर रहे हो, लेकिन सुबह होने तो दो , हो सकता है कि इस रात की कोई सुबह ही न हो. एक फिल्म भी आयी थी इस नाम की. 'इस रात की कोई सुबह नहीं ' .
सूरज- क्या ? क्या कहा आपने ? इस रात की कोई सुबह नहीं . प्रकृति से कभी कोई लड़ पाया है क्या ? अगर लड़ भी गया तो जीत भी सका है क्या. कुदरत ने दिन के बाद रात, रात के बाद दिन, अँधेरे के
बाद उजाला, गम के बा खुशी इस तरह के नियम बनाये हैं और अपना बनाया नियम भला कोई कैसे तोड़ सकता है .
किरण- मेरे रहते तुम्हें फ़िक्र करने की कोई जरूरत नहीं है, पूरा गैरेज ही उठकर तुम्हारे पास चला आएगा . यहाँ तक कि तुम्हें एक दूसरे नई गाडी दिलादी जायेगी .तुम डरते बहुत ज्यादा हो.
सूरज- तुम जोर का झटका धीरे से जों देती हो. अचानक ऐसा पंच मारती हो कि पता भी नहीं चल पाता.
किरण- हा हा हा ... अब ये न कहना कि मैं भी तुमको रहस्मयी दिखाई देती हूँ.
सूरज- सच तो यही है मगर ये बात मै अपनी जुबान से कह नहीं सकता, थरथरा जायेगीजुबान. क्योंकि तुमसे प्यार ही इतना ज्यादा हो गया है कि अब जुदाई का डर भी सताने लगा है. तुम्हारे नाराज होने की
चिंता भी सताने लगी है , सोचता हूँ कि मेरी किसी बात या व्यवहार से अगर तुम नाराज हो गयी तो मै कैसे ज़िंदा रहूंगा .
किरण- ये कैसी मोहब्बर है सूरज, एक तरफ बेंतिहाँ प्यार है तो दूसरे तरफ संदेह भी भी है. दोनों साथ -साथ कैसे चल सकते हैं. ?
सूरज- पाता नहीं, मैंने तो पहली बार किसीसे मोहब्बत की है, पहली बार किसीके साथ प्रणय सम्बन्ध बनाये हैं, मै नहीं जानता दीवानगी किसे कहते हैं,मै नहीं जानता कि मै जों कर रहा हूँ वह गलत है या सही है ,
या फिर जों कह रहा हूँ वह गलत या सही क्या है ?
किरण- अब रहने भी दो, जाने भी दो. जों हुआ सो हुआ . अब चुप रहिये क्योंकि सचमुच तुम्हें नहीं मालूम कि तुम क्या कह रहे हो. मैं ऐसा करती हूँ कि तुमको सुबह गैरेज तक पहुंचा देती हूँ, और यह काम पहली
फुर्सत में ही करूंगी, इसके बाद आप ऐसा करना कि आराम से अपने घर चले जाना , जरूरी काम निबटाना और उसके बाद मुझसे मिलने आना , ठीक है ?
सूरज- हाँ, ठीक है. ये ठीक रहेगा. मेरा भी यही विचार था.
किरण - मै अपने महबूब के दिल को पढ़ना अच्छी तरह से जान गयी हूँ. अब दिल -दिमाग कुछ हल्का हुआ ?
सूरज- अब कोई चिंता नहीं है. अब मेरे मन में से गर्दिश के बादल छंट चुके हैं.
सूरज ने सचमुच राहत की सांस ली थी, वह दिल में इस बात को लेकर घबराया हुआ था कि किरण पता नहीं उसे घर जाने की इजाजत देगी भी कि नहीं. कभी-कभी उसकी इच्छा होती कि अपनी समूची शक्ति को समेटकर
वह किसी तरह से भाग जाए, पीछे मुड़कर भी नहीं देखे, उसने अपने मन में यह निश्चय भी कर लिया था कि किरण अगर उसके घर जाने के लिए मना करती है तब भी वह सुबह होते ही भाग जाएगा . अपनी बाइक को
भी वहीं छोड़ देगा , फिर जों हो सो हो. और होगा भी क्या ? वह दौडकर सड़क पर जाएगा , वहाँ से किसी भी वाहन में बैठ सकता है, मजबूरी बताने पर कौन होगा जों उसकी मदद नहीं करेगा. रही बात बाइक की तो उसका
भी बीमा कराया हुआ था, पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करा देगा , बेंक की किश्त बीमा वाले भर देंगे, मगर इस सबकी नौबत ही नहीं आई. किरण ने खुद ही उसे सुबह घर जाने की इजाजत दे दी थी, मगर किरण का यह
वाजी उसे परेशां किये हुए था कि इस रात की कभी सुबह नहीं होती. क्यों नहीं होती ? वह बुदबुदा भी रहा था और किरण के साथ प्रणय सम्बन्ध भी बना रहा था, उसके प्रहार तेज हो चले थे, वासना की आंधी अब और भी तेज चलने
लगी थी. कामवासना का तूफ़ान उन दोनों को अपनी आगोश में लपेटे हुए था. एक क्षण ऐसा भी आया जब शब्द मौन हो गए और वे दोनों एक दूसरे में समा गए.