Friday, October 8, 2010

vलवगुरु , ६१
तुम तो मेरी जान बन चुकी हो न , बड़ा अटपटा लगेगा . है न ?
रानी- अच्छा जी. जब तुम्हारी पत्नी को तुम्हारा भाई भी यूज करता है तब तो कुछ नहीं कहते , और यहाँ पर मिल बांटकर खाने में तुमको तकलीफ हो रही है .
खूब मजा लेते हो तुम भी . अरे मैं मना थोड़े ही करती हूँ, जितना चाहो ऐश करो .तुम्हारे गाँव में भाई के अलावा और कोई भी जवां मर्द हो तो लेकर आओ .
मैं तैयार हूँ. देखते हैं , मुकाबले में कौन जीतता है ? मैं या तुम्हारे गाँव का मर्द . यहाँ जब तक नहीं आएगा , तब तक तो खूब शेखी बघारेगा मगर यहाँ आते ही फिनिश हो जाएगा
केशव- आप मेरी यानि कि केशव की मर्दानगी को ललकार रही हैं. देखो , माफ करना मैं सेठजी जैसा नहीं हूँ. मैं अकेला ही सब कुछ कर सकता हूँ यानि कि हर मोर्चा संभाल सकता
हूँ, जब चाहो आजमा लेना, मगर तुम खुद ही पीछे क्यों हट जाती हो , जब रात भर साथ रुकने की बात आयेगी तो मना कर देती हो , बस मुझे इस्तेमाल करने तक ही साथ रखती हो ,
तब तक तो मेरे शरीर के अंग-अंग को चूमती हो और फिर बाद में क्या हो जाता है ? क्या बाद में मेरे जिस्म से बदबू आने लगती है. इस बात को बहुत दिनों से महसूस कर रहा
था , लेकिन कहने का सही मौक़ा नहीं मिला . अब जबकि बात चल ही पडी है तो मैं भी कहकर रहूंगा. मुझे भी तकलीफ होती है , मेरा भी दिल है . भले ही आपका नौकर हूँ, यहाँ
तक कि गुलाम हूँ , तब भी क्या हुआ ? गुलाम भी आखिरकार एक इंसान होता है और हर इंसान की फीलिंग्स होती हैं. म९न भी सोचता हूँ कि कभी तो , किसी रात को तो सेवा करने का ,
तुम्हारे साथ सोने का अवसर मिले . मगर तुम तो कोई न कोई बहाना बनाकर टाल दिया करती हो .
रानी- ज्यादा भावुक होने की जरूरत नहीं है मेरी जान. केशव / त्तुम तो जानते ही हो कि तुम्हारी यहाँ पर कुछ खास जिम्मेदारियां हैं, तुम्हारी जरूरतें पड़ती रहती हैं. तुम्हारे अपने काम हैं
अगर मैं तुम्हारे साथ सोऊँगी तो लोग जान जायेंगे कि तुम गायब हो , ऐसे में हम पकडे जायेंगे .
केशव- अगर दम देखन है तो एक बार तो सेवा का चांस दो, मैं हमेशा की नहीं कहता. भले ही हमेशा न करो . आज तो करने दो कम से कम.
रानी -अच्छा , इसका मतलब तुझे चर्ब्नी चढी है. देखती हूँ क्या कर पाता है . चल, आज रात हम दोनों साथ-साथ बिताते हैं. अब खुश है ? मगर मुझे बीच में थोडा सा टाइम चाहिए .
केशव -ओके , अब तुम सीढी हो अजो , मैं तुम्हें जन्नत की सैर करवाता हूँ. यह एक ऐसा स्वाद है , जसिके आगे सब आनंद फीके ही पड जाते हैं .
रानी -आज की रात को यादगार बनादे केशव, ऐसा हमला कर कि दुनिया के सब दुखों को हमेशा -हमेशा के लिए भूल जाऊ.
केशव- मैं जानता हूँ कि तुम्हें क्या पसंद है . आज मैं ऐसे जोरदार प्रहार करूँगा कि मस्त हो जाओगी , फिर कभी भी गाँव से किसीको बुलाने की बात नहीं करोगी यकीन मानो .
रानी- अगर तू ऐसे ही मजे देता और लेता रहा तो भला मुझे काया जरूरत आन पडी है कि मैं किसी और को बुलीन को कहूँ , वैसे वो भी मैं तेरे फायदे के लिए ही कह रही थी.
मैं चाहती थी कि तुझे भी थोड़ा सा आराम मिल जाएगा , और मजा भी मिलजुलकर लिया करेंगे . तूने फिल्मों में नहीं देखा क्या, कैसे एक हीरोइन को दो -दो , तीन-तीन हीरो एक बार में ही
जिस्मानी सुख देते हैं. उस समय जब देखने भा में ही इतना मजा आता अहि तो उसे पर अमल करने में कितना सुख मिलेगा , यह आसानी से अनुमान लगया जा सकता है .
केशव- हाँ यार, अगर ऐसि९ बात है तो ठीक है , मैं तैयार हूँ. मैं अपने भाई को ही बुलवा लेता हूँ . कम से कम घर का माल घर में ही रहेगा .
रानी- अब की है तूने समझदारी की बात . मगर उसका पहले डॉक्टरी चेकअप कराना पडेगा . अगर उसे कोई बीमारी नहीं हुई तभी मैं उसके साथ सम्बन्ध बना सकती हूँ . और
चेकअप भी अपने पहचान के डॉक्टर से करवाउंगी . ठीक अहि ?
केशव- ठीक अहि , यह तो हम सभी के हित की बात है , वैसे मैं इतना बता सकता हूँ कि उसे कोई भी बीमारी नहीं होगी , क्योंकि मेरी जानकारी में उसे कभी सिर का दर्द भी नहींहुआ.
रानी ठीक अहि तो अब आज की रासलीला समाप्त करो . अब मैं और सहन नहीं कर पाउंगी .
बिजली इन सब बातों को सुन रही थी. काम वासना की आग उसके बदन को जलाने लगी . वह बेचैन दिख रही थी. जब उससे सहन नहीं हुआ तो उसने अपनी सारे कापसे उतर फेंके .
पहली उसने टॉप उतारा , इसके बाद स्कर्ट , और फिर भी तसल्ली नहीं मिली तो उसने अपने सारे कपडे उतार दिए . अब वह पूरी तरह से नग्न थी. बेडरूम में रानी और केशव
अपने -अपने जिस्मों की प्यास बुझा रहे थे और बाहर बिजली दीवार से सीना रगडकर अपनी काम्ज्वाला को शांत करने की कोशिश रही थी,

Thursday, October 7, 2010

लवगुरु-६०


केशव वासना के ज्वालामुखी में तपने लगा . उसने आगे बढ़कर रानी को अपने कब्जे में ले लिया और उसके गालों से अपने होठ सटाने लगा . उन दोनों के बदन से आग दहक
रही थी, उन्हें देख-देखकर बिजली भी अपने ऊपर से नियंत्रण खोने लगी. उसने अपने दोस्त को फोन घुमाया -
- हेलो , कैसे हो अमित ? कितने दिन हुए मुलाक़ात नहीं हुई .किधर हो ?
अमित- ओ हाय ... मैं ठीक हूँ बिजली, इतनी रात गए कैसे फोन किया ? मैं घर पर हूँ यार सो रहा था . इस समय और भला कहाँ हो सकता हूँ ? सब कुछ ठीक तो है न . अगर कुछ खास
नहीं तो सुबह बात करते हैं. ओके ... बाय...
उसका फोन कट चुका था , बिजली ने उसे ऐसे ही फोन लगा दिया था , उसका कुछ खास उद्देश्य तो था नहीं, ' तो फिर अमित को फोन क्यों लगाया ' उसने अपने आप से ही सवाल कर डाला.
शायद मन बहलाने के लिए उसने ऐसा किया था. केशव के साथ अपनी माँ को आपत्तिजनक अवस्था में देखकर उसका दिल डोलने लगा था , मन बहकने लगा था. दिल के किसी कोने में यह इच्छा दब
रही थी कि काश वह भी अपनी माँ की तरह क्रीडा कर सके, वह भी ऐसी ही सीत्कार भरे जिससे कि उसका साथ बी ही उसके गालों को चूमने लगे, उसके होठों को चूमने लगी . उसने सोचा कि इस खेल में
तो शायद बहुत ज्यादा आनंद आता है, तभी तो उसकी माँ अपने पति को छोड़कर एक नाकुछ नौकर के साथ इंजॉय कर रही है. बिजली का यह पहला मौक़ा था , जब उसने किसी मर्द और औरत को एक
ही बिस्तर पर एक साथ मौज -मस्ती करते हुए देखा था. वह आहिस्ता-आहिस्ता जवानी की दहलीज पर कदम रख रही थी, उसके सीने के आकार में भी बदलाव हो रहा था . कली धीरे -धीरे खिलने के लिए
बेताब हो रही थी, अब उसकी समझ में आया कि यह बदलाव क्यों हो रहे हैं. अगले ही पल उसने केशव को देखा कि वह किसी अबोध बालक की तरह उसकी माँ के उभारों को चूस रहा था. बिजली केलिए
अब हर पल कठिन होता जा रहा था, उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे, एक बार को भावनाओं का ऐसा तूफ़ान उठा कि दरवाजा खटखटाकर अंदर कमरे में घुसने का ही मन बना लिया. उसने सोचा
कि इसमें बुरा ही क्या है ? वह अंदर जाकर अपनी माँ से कहेगी कि या तो उसे भी ऐसा ही आनंद दिलाए वरना वह शोर-शोर मचा-मचाकर सबको बता डालेगी . फिर अगले ही पल उसे ख़याल आया कि इससे बवंडर
मच सकता है . उसके पास क्या सबूत है कि वह इस बात को साबित करे, उसने सोचा कि कैमरा लाकर उन दृश्यों को कैद करले , ,मगर ऐसा भी सम्बह्व नहीं दिख रहा था . क्योंकि जिस दरार से वह अंदर
की रासलीला को देख रही थी, वह दरार इतनी बड़ी नहीं कि वह फिल्मांकन कर सके. उसे ध्यान आया कि उसके मोबाइल में भी तस्बीर खींचने की सुविधा है , उसने काफी प्रयास किया मगर फोटो निकालने
में सफलता नहीं मिल पाई. थक हारकर वह दरवाजे से कमर टेककर खड़ी हो गयी और जिस तरह से केशव उसकी माँ के उरोजों को दबा रहा था वह खुद ही अपने हाथों से दबाने लगी. उसे भी थोड़ा-थोड़ा सा
मजा आने लगा,बेडरूम से आने वाली आवाजें और भी उत्तेजक होती जा रही थीं, बिजली ने अपना सिर झुकाकर अपने होठ सीने तक लाने की कोशिश की मगर कोई फायदा नहीं हुआ. आखिरकार कुदरत ने
महिला और पुरुष को अलग-अलग रूप में इसिलए तो बनाया है. उसके कानों में केशव की फुसफुसाहट सुनाई दी , वह कह रहा था-
-मैं खा-खाकर भी दुबला-पतला होता जा रहा हूँ और तूम हो कि बिना कुछ कहाए भी रोजाना डील छोडती जा रही हो . इस मोटापे पर थोड़ा सा कंट्रोल करो वरना बहुत परेशानी हो जायेगी , अब तो काम
निकल भी जाता है मगर आगे चलकर तकलीफ हो जायेगी , कभी सेठजी इस तरह की शिकायत नहीं करते क्या ?
रानी- देख रही हूँ कि अब चिड़ियों के भी पर निकलने लगे हैं, तुम भी सेठ की भाषा बोल रहे हो, बोलती हूँ कि उस नामुराद का नाम मत्लो तो बार-बार उसका नाम ले रहे हो . पानी लग गया
है, ऐसा लगता है . अपने काम को ठीक तरह से अंजाम दे न, अगर ज्यादा ही दुबला हो रहा है तो अगले महीने से तनख्वाह में हजार रुपये और बढ़ा दूंगी , बादाम -सादाम खाया करो , सेहत बनाया करो .
केशव- हजार रउपाए में क्या होता है मैडम, कुछ नहीं आता. घरवाली भी अब हजार रुँप्ये वाली साड़ी नहीं पहनती , उसे भी मंहगी-मंहगी सादिया चाहिए .
रानी- मैं एक बार पहनने के बाद दोबारा साडियों को कब पहनती हूँ. तू ले जाया कर . एक-एक लाख की सादिया हैं, चल हर महीन दो चार साडियां ले जाया कर . पत्नी के लिए मेकप का सामान भी
ली जाया कर. तेरी पत्नी भी खुश और तेरा भाई भी खुश . वैसे करता क्या है तेरा भाई ?.
केशव- कुछ नहीं, गाँव भर में आवारागर्दी करता फिरता है. कमाने के लिए मैं हूँ, खेती से भी आ जाता है, पट्ठा हीरो बना घूमता है.
रानी- अगर ज्यादा गर्मी है तो उसे यहाँ पर बुलाले, उसे भी नौकरी पर रख लूंगी , तू अकेला थक जाता होगा , तुझे भी आराम मिल जाया करेगा. एक दिन तू मेरी सेवा करना , एक दिन वह कर लिया
करेगा, जब मुझे कोई तकलीफ नहीं है तो तू क्यों परेशान होता है ?
केशव- ऐसा ठीक रहेगा क्या ? थोड़ा सा अजीब लगेगा कि जिसके साथ मैं रात गुजारता हूँ वह मेरे भाई के साथ भी रात गुजारे .

Wednesday, October 6, 2010

लवगुरु -५९
बस वो आता है और चला जाता है. स्टार्ट होने से पहले ही गाड़ी बंद हो जाती है. बड़ा तड़पाता है ये सेठ का बच्चा . उससे अच्छा तो अपना पप्पी है . अरे पप्पी ...
केशव- पप्पी ? ये जों लेब्राडोर जैसा है , उसकी बात कर रही हो ? क्या क्या तुम उसके साथ भी ???
रानी- क्या फर्क पड़ता है रे केशव, मजा आना चाहिए , कैसे भी क्यों न आये ? जब रात को पति मुझे संतुष्ट नहीं कर सकता और तो और क्या करू, कुत्ता छोड़ तेरे
जैसे गधे के साथ भी सम्बन्ध बनाने पड़ते हैं, तुझे तो ज़रा भी टाइम मिला नहीं कि लुगाई के पास घर पहुँच जाता है , छुट्टी लेकर. तुझे वहाँ पर ज्यादा आनंद आता है
क्या ? तेरी घरवाली ज्यादा सुन्दर है क्या ? ऐसा उसमे क्या है , जिसके चक्कर में अपनी प्यारी मालकिन को छोड़कर चला जाता है ?
केशव - बात सुन्दर की नहीं है मालिकन , कुछ और है ? मुझे लगता है उसका किसीके साथ चक्कर चल रहा है . शायद मेरे भाई के साथ . मैं उसीको ताडने के लिए जाता
हूँ, अगर एक बार रंगे हाथों पकड़ लूं तब देखूं साली को , वहीं पर खड़े-खड़े गोली मार द्नुगा , चाहे जों हो. जमानत तो दे दोगी न ? तुम्हारे पहचान के तो कई वकील हैं, कह देना
किसीसे, तुम्हारी बात को कौन टाल सकता है ? कराओगी न मेरी जमानत . ?
रानी- पागल हुआ है क्या ? ऐसे थोड़े ही होता है , किसीका क़त्ल कर देना , किसीके साथ बलात्कार कर देना , खाने का काम नहीं है . यह बच्चों की बात नहीं है . सिर्फ जमानत
करा देने भर से कुछ नहीं होता, उसके बाद भी तो अदालत में केस चलता है , और बाद में आरोप सिद्ध हुआ तो उम्र कैद या फांसी निश्चित है . समझे मूर्खानंद . यह क्यों नहीं सोचता
कि जब तू यहाँ पर रहता है तो कोई दूसरा तेरी पत्नी की सेवा कर रहा होता है. सोच वह कितने पुण्य का काम करता है . बीवी तरी ही रहेगी , बच्चे भी तेरे ही रहेंगे और काम मेहनत
करेगा कोई और . और फिर तू खुद भी तो वही कर रहा है , क्या तू मेरे साथ रंगरेलियां नहीं मनाता है ? तू भी तो वही कर रहा है , जों कोई दूसरा तेरी पत्नी के साथ कर रहा है ,
यही जीवन है, यही दुनिया है और यही आध्यात्म है . इसे ठीक तरह से समझ ले और अपनी पत्नी की जासूसी करना छोड़ दे, तुझे जों चाहिए उस जरूरत को मैं पूरा करती रहूंगी ,
मैं हूँ न. हर दम तेरी इच्छा पूरी करने के लिए तैयार हूँ. तू मेरी सेवा कर और मैं तुझे मनमाफिक सेवा दूंगी मेरा वादा है.
केशव- ये तुम क्या कह रही हो मैडम, तुमने तो मेरा पूरा सिस्टम ही बदल डाला . मेरी सोच को ही उखाडकर फेंक दिया . अब मैं क्या करू ?
रानी - कहती हूँ न उस बेचारी का चक्कर छो दे, अगर तेरा भाई उसके साथ सोता होगा तब भी जान ले कि घर का माल घर में ही है , तेरी पगड़ी तो नहीं उछ्लेगी , और अगर गुस्सा
करेगा तो पत्नी भी हाथ से जायगी और भाई भी . मेरे हाथ से तू चला जाएगा . मुझे तो ज्यादा टेंशन नहीं है, आजकल नौकरों की लाइन लगी होती है , कोई दूसरा रख लूंगी .
केशव- दिल पर हाथ रखकर कहो , क्या ऐसा कर पाओगी ? मेरे बिना रह पाओगी तुम ? अरे तुम क्या रहोगी ? जब तुम मेरे दो दिन घर जाने से परेशान हो जाती हो तो
दूसरा नौकर कैसे रख पाओगी ? चलो अब लास्ट पैग तैयार करो , तब जोश आएगा . अरे फ़िक्र नोट . मैं तुम्हें बीच मंझदार में छोड़ने वाला नहीं हूँ.
रानी मुस्कराने लगी, जब वह बोलती तो केशव नहीं बोलता था और केशव के बोलने पर रानी रोक-टोक नहीं करती थी . उन दोनों के बाच यह अघोषित और अलिखित समझोता
था. पैग तैयार हुआ तो रानी ने केशव की तरफ बढ़ा दिया , एक पैग वह खुद भी पी रही थी. रानी बहुत सेक्सी थी . बवह सम्बन्ध के बीच रूककर भी शराब का आनंद उठा लिया करती थी.
वे दोनों प्रणय क्रीडा के रंग में रंगे थे , रानी को अच्छी खासी चढ गयी थी, वह खूब जोर-जोर से बोल रही थी . उसे इस बात का ज़रा भी ज्ञान नहीं था कि उसकी बेटी बिजली उसकी हरकतों
को दरवाजे की दरार में से देख रही है . उन दोनों को आपत्तिजनक अवस्था में देखकर बिजली के तन-मन में बिजली का करंट दौड रहा था. वह अपने सीने को अपने ही हाथों से दबाने लगी,
जैसे -जैसे उसकी हरकतें बढ़ती जा रही थीं वैसे -वैसे उसकी उत्तेजना भी चरम पर पहुँच रही थी. उसके बदन से वासना की चिंगारियां उठने लगीं. वह अपनी जाँघों के बीच में उंगली
से रगड पैदा करने की कोशिश करने लगी . मगर इससे क्या होने वाला था ? अब वह कल्पना के सतरंगे संसार में खो गयी, वह सोचने लगी कि काश केशव उसकी मा को किसी बहाने छोड़ आये
और आकार उससे लिपट जाए तो वह भी उसी क्रिया को दोहराएगी . काम क्रीडा का सुख उठाने के लिए वह बेताब होने लगी . कई बार उसके दिमाग में यह भी आया कि कहीं ऐसा न हो कि
वह सचमुच ही बाहर निकल रहा हो . अगर ऐसा हुआ तो वह उससे बात करेगी , उसके साथ यह शर्त रखी जा सकती है कि या तो वह उसे भी इसी तरह का सुख प्रदान करे वरना वह अपने पिता
को उन दोनों की काली करतूतों को बता डालेगी . मगर बिल्ली के भाग्य से छींका नहीं टूटा करता . उसने देखा कि उसकी माँ की आहें और भी बढ़ती जा रही थीं. केशव अपनी समस्त क्षमता का इस्तेमाल
कर रहा था , उसकी माँ केशव को अपनी तरफ धकेल रही थी.

Tuesday, October 5, 2010

लवगुरु-५८
जब तक इश्क में आहें न हों, तड़प न हो, जोश न हो तब तक आनंद नहीं आता. कल कैसे सिसक रही थीं, छोड़ने की गुहार लगा रही थीं और अब तो एकदम बिंदास हो चुकी
हो, आओ तो सही , कल की तरह , मेरा मतलब है कि दुल्हन की तरह शरमाओ तो सही , कल तक आपने जों अदाएं दिखाई थीं वे बेमिसाल थीं, आज फिर उन्हीं कातिल अदाएं
को देखने का दिल कर रहा है .
डोली- समझ गयी, बहुत नटखट हैं आप. उस बात की चर्चा कर रहे हो . पहले फिल्म तो चलाओ, उसे देखकर ही जिस्म में गर्मी आयेगी , लाओ अब मैं देखती हूँ कौन सी फिल्म ठीक रहेगी ?
और इस तरह डोली ने कुछ सीडी चलाकर देखीं, उनमे से एक को पसंद कर स्टार्ट कर दिया गया. यह बेहद भयानक फिल्म थी. मुंशीजी को देखते ही ज्वर आने लगा. यह बिलकुल नग्न
फिल्म थी. असली ब्लू फिल्म. उसका एक -एक द्रश्य जानलेवा था. एक पतला दुबला युवक मोटी -ताजी युवती पर हावी हो रहा था . उस युवक की उम्र २० से ज्यादा नहीं थी,जबकि महिला ४०
से ऊपर थी , दिखने में ही युवक गरीब और युवती अमीर दिख रही थी. युवक का जिस्म भले ही कमजोर था लेकिन उसका गुप्त अंग बहुत खतरनाक था , उसे देखते ही डोली आह भरने लगी ,
मुंशीजी भी आह भरने लगे , सोचने लगे कि काश उनका हथियार भी इतना मजबूत होता तो वे बेड पर डोली को धुल चटा सकती थे , मगर सिर्फ सोचने भर से क्या होता है . फिल्म शुरू हुई
तो पता चला कि युवक नौकर था और और महिला उसकी मालकिन . युवक का नाम केशव था. वह रानी नामक सेठानी के घर पर नौकरी करता था . सेठ तो बिजनेस के सिलसिले में अक्सर बाहर
रहता था मगर केशव दिन रात का सेवक था . रानी की एक ही बेटी थी , उसका नाम बिजली था. बिजली की उम्र १८ साल थी. धीरे- धीरे केशव और रानी के बीच अवैध सम्बन्ध बन गए. दोनों
वक्त मिलते ही अपने-अपने जिस्म की प्यास बुझाने लगे. एक रात गज़ब हो गया . हल्की-हल्की बूंदा-बांदी हो रही थी. आसमां में रह-रहकर बिजली कड़क रही थी . रानी की बेटी बिजली अपनी सहेलियों
के साथ पार्टी मनाकर आयी थी, घर में घुसते समय वह थोड़ी सी भीग गयी, उसे सर्दी सी होने लगी. उसका बँगला बहुत विशाल था. कई नौकर चाकर थे, मगर सबका रहने का अलग इंतजाम था .
बिजली ने महसूस किया कि बंगले में कुछ हलचल हो रही है. उसकी मा का बेडरूम बंद था और वहाँ से जोर-जोर की आवाजें आ रही थीं. पहले तो उसे लगा कि हो सकता है टी.वी . जोर से
चल रहा होगा, मगर उसे फिर याद आया कि उसकी मा रानी तो कभी इतनी तेज आवाज में टी.वी. देखती -सुनती ही नहीं थी. उत्सुकतावश वह उस कमरे की तरफ चलदी. उसे अपनी मा की फुसफुसाहट
सुनाई दी . उसने एकड दरार से अपनी ऑंखें सटा दी. अनादर का द्रश्य देखकर बिजली की रग -रग में बिजली जैसी दौड गयी . उनके घर का नौकर केशव उसकी मा के ऊपर झुका हुआ था. दोनोंनग्न अवस्था
में थे. रानी अपने नकार को उत्साहित कर रही थी, जोर-जोर के धक्के लगाने को कह रही थी. नौकर भी उसके आदेश का पालन कर रहा था , वह पूरी ताकत और फुर्ती के साथ प्रहार कर रहा था
दोनों ने एक दुसरे को अच्छी तरह से जकड रखा था . रानी का जिस्म मोटा था इसलिए उसने अपनी जांघें अच्छी तरह से मोड रखी थीं, रानी कह रही थी-
- वाह, अब आया मजा. पूरा जोर लगा केशव. एक -एक किलो मटन खा जाता है मगर जब कुछ काम की बात हो तो ज़रा सी देर में हांफने लगता है. तुझे दामाद की तरह इसीलिए तो चराती हूँ.
केशव - फिकर मत करो मैडम , पूरे मजा की गारंटी है . किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होने दूंगा . आपकी टांगों की वजह से थोड़ी सी दिक्कत होती है. अगर ज़रा सी घूम जाओगी तो ठोकर
लगाने में आसानी होगी .
रानी- तू जैसा चाहे वैसा कर न. तेरी पूरी छुट्टी है . कोई एतराज नहीं है मुझे . बस एक बार स्वर्ग की सैर करादे .
केशव . एक बार क्यों, पूरी रात पडी है मैडम. जितनी बार बोलोगी, सेवा करूँगा . अब काम ही क्या है ?
रानी- हाँ, इसलिए मैंने बिजली को उसकी सहेली के घर भेज दिया है, पार्टी के बाद वह वहीं सो जायेगी . आज रात तू ठीक तरह से मालिस करना. पूरे तीन दिन हो गए , इस आनंद को लिए हुए.
जब तू छुट्टी लेकर घर जाता है तो बड़ी तकलीफ हो जाती है. तेरी पत्नी तो खूब मजे लेती होगी ?
केशव - मजे तो आप भी लेती होंगीमैडम. सेठजी तो इस बार यहीं थे, खूब मजा लिया होगा ?
रानी- आह, किस कमबख्त का नाम ले दिया. वह क्या जाने मजा क्या होता है ? वह न तो किसीको मजा दे सकता हिया उअर न ही मजा ले सकता है . उसे तो बस दौलत चाहिए .
केशव- क्यों ? क्या सेठजी आपको संतुष्ट नहीं कर पाते ?
रानी- नहीं रे नालायक, वो क्या संतुष्ट करेगा, वो तो फिस्सबम है. उसका जिक्र छेड़कर मूड खराब मत कर , बस खाना खाते ही बिस्तर पर लेट जाता है . और फिर खर्राटे भरने लगता है .
अगर कभी जबरदस्ती करून भी तो बेकार है . किसी काम का नहीं खाली फायरिंग वाला हिसाब -किताब है .

Monday, October 4, 2010

लवगुरु-५७
डोली- गलत , बिलकुल गलत है . ऐसा नहीं हो सकता . जिसको होश होगा वह मोहब्बत करने का कोई अधिकार नहीं है , मैं तो कहती हूँ कि यह काम होशवालों का है
ही नहीं, अरे मोहब्बत तो सिर्फ दीवाने ही कर सकते हैं , वे लोग जिनको कोई होश नहीं रहता , जिनको हर जगह, हर हर घड़ी हर वक्त सिर्फ और सिर्फ महबूब दिखाई देता
हो , जों तिनके -तिनके में महबूब देखता हो . और जिसे महबूब की आँखों में भी भगवान नजर आता हो . वही कर सकता है इश्क. इश्क के पुजारी बड़े दीवाने होते हैं , उनकी
नजर में दौलत का कोई महत्त्व नहीं होता है. और यहाँ तक कि दुनियादारी का भी कोई ध्यान नहीं रहता , समझ रहे हो ?
मुंशीजी- हाँ , मेरी जान सोचने की कोशिश कर रहा हूँ , शायद तुम यही कहना चाहती हो कि मैं व्यापारी होकर इश्क की कद्र नहीं जानता , यही न कि मैं अब तक दौलत के पीछे
ही भागता रहा हूँ. यही कहने का रथ है न तुम्हारा , मगर ये जान लों कि मैं पिचले कुछ दिनों में जों कदम उठाये हैं , उनसे तुम ये जान सकती हो कि मैं भी प्यार की राह में किसी
भी हद से गुजर जाउंगा . मैं जमाने के छिछोरे आशिकों , निकम्मे मजनुओं का पीछा भले ही न कर पाऊं लेकिन मोहब्बत की ऐसी मिसाल पेश करने की ताकत रखता हूँ जिसे लोग बरसों
याद करेंगे, सम्मान के साथ मेरे नाम लेंगे और ठंडी आह भरके कहेंगे कि आह. इस्श्क करे तो कोई ऐसा करे, आशिक हो तो कोई ऐसा हो . एक बार हम पर और हमारे प्यार पर भरोसा
करके तो देखिये. एक बार अवसर तो दीजिए .
डोली-देखो, अभी से आने लगी न व्यापार की भाषा. ऐसा लग रहा है जैसे आप अपने ग्राहकों से अपील कर रहे हैं कि एक बार हमारी दूकान में पधारकर सेवा का अवसर प्रदान करें. कम से
मुझे तो ऐसा ही महसूस हो रहा है . पता नहीं यह शराब पीने के कारण हो रहा है . या कोई और बात है ? ओह. मेरा तो सिर भी भारी हो रहा है . दर्द भी है . अब क्या करून.
मुंशीजी- कुछ नहीं होगा जानेमन, सब कुछ ठीक हो जाएगा . उतारे का पैग जल्दी खत्म कर लों, एक बार प्यार के समुन्डर में भी गोते लगा लेते हैं. उसके बाद कुछ करेंगे . देखना मेरे प्यार के कारण दर्द
ऐसे उड़न छू हो जाएगा जैसे कभी हुआ ही नहीं था. आ जाओ , मेरी जाँघों पर अपना सिर रखलो , मैं तुम्हारा माथा दबा देता हूँ.
डोली ने मुंशीजी की बातों पर ध्यान देने के बजाय एक सिगरेट सुलगाली और फिर धुंए के छल्ले उड़ाने लगी. मुंशीजी भी अपने आपको यंग दिखाने से नहीं चुके , उन्होंने भी अपनी एक अलग सिगरेट सुलगाली
और वे भी गम को छल्लों में उड़ाने लगे . फिर आहिस्ता से बोले-
- जब तुम ठीक रहोगी तो मैं भी ठीक ही रहूंगा . और जब तुम ही अपने आप मर्ज की आगोश में जाने का मन बना चुकी है तो मैं भी स्वस्थ रहकर क्या करूँगा .
डोली- मैं समझी नहीं, आखिर तुम्हारे कहने का सही क्या है ? मैं मर्ज को क्यों आमंत्रित करूंगी ?
मुंशीजी- अरे ये सिगरेट पीना बीमारी को आमंत्रण देना नहीं तो और क्या होता है . देखा नहीं, डिब्बी पर साफ़-साफ़ लिखा है कि इसके पीने से कर्क रोग हो सकते हैं, इसीलिए तो मैं पहले इसका इस्तेमाल नहीं
करता था. इसकी जगह पर अच्छा-अच्छा खाता था , बढ़िया पेय पदार्थ पिया करता था.
डोली- अच्छा जी, एक बात बताओ , अगर इसके पीने से केंसर होता है तो सरकार इसके बनने पर रोक क्यों नहीं लगाती ?
मुंशीजी- क्योंकि इस पर सरकार को टेक्स मिलता है . अरबों रुपये सरकार को मिलते हैं , इसलिए .
डोली- तो क्या इसका मतलब सरकार दौलत की खातिर कुछ भी कर सकती है , अपने नागरिकों को केंसर जैसी बीमारी भी दे सकती है ? मैं इतना जानती हूँ कि ना होगा बांस और न बजेगी बांसुरी . लेकिन
अगर कहीं आग होगी तो धुँआ उठा लाजिमी है . सरकार अगर इस बीमारी से अगर सचमुच डरती है तो उसे सिगरेट बनाने पर ही पाबंदी लगानी होगी .
मुंशीजी- अब ये काम तो मेरा है नहीं, हाँ इतना यकीन मानो कि जब कभी मैं पावर में आया तो तुम्हारे आदेश का पालन अवश्य किया जाएगा . वैसे मेरा मानना है कि इसकी बजाय जवानी का सुट्टा
मारा जाए तो ज्यादा बेहतर होता है . आओ हम लोग इसका शुभारंभ करें.
डोली ऐसे म्सुकाई जैसे किसी नादाँ ने पहली बार कोई सही बात कही हो . उसने अपनी दोनों बाँहें ऊपर की तरफ फैलादी और जोरदार अंगड़ाई ली. मुंशीजी मुस्कराने लगे . दोनों के शरीर पर
इस समय नाम मात्र के कपडे भी मौजूद नहीं थे. इस समय डोली मुंशीजी के साथ ऐसे लग रही थी जैसे कि हूर के साथ लंगूर लगता हो . दोनों की साँसें तेज होने लगीं. डोली बोली-
- आप तड़पाते बहुत हैं.
मुंशीजी- मजा तो कैसे भी मिल जाता है लेकिन असली मजा तो तड़प के बाद ही आता है.

Sunday, October 3, 2010

लवगुरु-५६
डोली- मैं आज तक भी इस बात को नहीं समझ पाई कि आप जैसे मर्दों को औरत के सीने को सहलाने से क्या मिल जाता है, अरे जों भी प्रतिक्रया होगी वह तो हमारी
तरफ से होगी न, आपको भले इससे क्या फर्क पड़ता है ? मेरे कहने का अर्थ है कि आप लोगों को क्या आनंद आ जाता है और कैसे आ जाता है , मैं नहीं जान पाई
इस बात को , अब मेरे सीने को देखकर आपको नशा कैसे चढता होगा यह मेरी कल्पना से बाहर की बात है . ये सभी तो मांस के लोथड़े हैं. इस जिस्म के अंदर हड्डियां
हैं, खून है , सब बेकार की चीजीं हैं. इनमे उलझकर मर्द सब कुछ क्यों भूल जाते हैं ? क्या है मेरे पास ? आप ही बताओ. अरे इंसान के लिए सबसे जारूरी चीज होती है
दौलत, वो तो आप जैसे धन्नासेठों की गुलाम है. हमेशा आपकी तिजोरियों में कैद रहती है . उससे जोक हाहो खरीद लों , सब कुछ बिकता है यहाँ.
मुंशीजी - मैं तुम्हारी बात को काटूंगा तो नहीं, लेकिन इतना दावे के साथ कहना कहाहुंगा कि हर चीज बिकती होगी बाजार में, मगर मोहब्बत खरीदने की चीज नहीं होती ,
बेचने की कहीज नहीं होती, जिस किसीके पास भी मोहब्बत की यह दौलत होती है, वह गरीब कहाँ होता है , सबसे अमीर तो वही होता है . क्योंकि सच्ची मोहब्बत किस्मतवालों
को मिलती है . और हां, अगर यह शरीर रक्त और हड्डियों का है तो फिर संसार में और भी ऐसा क्या है जों इनसे कुछ अलग हो, कुछ खास हो , मुझे नहीं लगता कि तुम कुछ
कह पाओगी, बता पाओगी . शायद ऐसा हो सकता है कि जिसके पास दौलत हो उसे दौलत महत्वपूर्ण नहीं लगती और जिसके पास हुस्न हो तो उसको यह खास नजर नहीं आता , इसी तरह जिसके
पास मोहब्बत का खजाना हो, उसे मोहब्बत की कद्र नहीं होती.
डोली- मुझे लगता है कि आज मेरी जुबान लडखडा रही है . अगर चलूंगी तो संभवतः कदम भी लडखडाने लगेंगे. मुझे बहुत चढ गयी है क्या ? अआप्को तो कुछ फर्क नहीं पड़ा. मर्द
हो न, आपको पहले से आदत होगी, अगर आदत नहीं हुई तब भी झेल जाओगे और मैं ठहरी कमजोर , मुझे अगर पहले से ही पीने की आदत होती तब भी नहीं बर्दाश्त कर पाती . मगर
आप चिंता मत करो, मैं पूरा मजा दूंगी , मजा किरकिरा नहीं हिने दूंगी , आखिरकार आपने मेरे ऊपर लंबी रकम खर्च की है , उसे यूं ही बेकार नहीं जाने दूंगी , मेरा यकीन मानो , मैं किसी को भी निराश नहीं करती, सबका ध्यान रखती
हूँ, सबको सामान मजा देती हूँ, आपकी रात बेकार नहीं जाने दूंगी, लोग बड़ी हसरत से इस रात क०ओ खरीदते होंगे .
मुंशीजी- क्या ? ये क्या कह रही हो डोली, लगता है सचमुच तुम्हें चढ गयी है , ये क्या कह रही हो कि किसीकी रात खराब नहीं करती.
डोली- मैं तो मिसाल दे रही हूँ, मेरा मतलब ... मतलब ... मतलब ये था कि मेरी जगह पर अगर कोई और भी होती तो आपको आपकी रकम के बदले पूरा इंजॉय कराती , आज मैं
समझती हूँ कि मेरी भी वही जिम्मेदारी है. तो मुझे अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए , मैं कामचोर नहीं हूँ. आज मेरा दूसरा ही दिन है , मैं अपने काम को ठीक तरह से अंजाम देना
चाहती हूँ, मेरे कहने का गलत अर्थ मत लगाना , ठीक है न .
मुंशीजी- ठीक है, चलो एक -अक पैग और बनाओ , मैं भी अब बहकना चाहता हूँ, जब तक मास्टी नहीं आयेगी तब तक हम दोनों एक जैसे नहीं हो जाते , मैं देखना चाहता हूँ, यह
महसूस करना चाहता हूँ कि उस लेबल पर जाकर आदमी को क्या महसूस होता है , वह किस तरह की बात करता है .?
डोली बार-बार अपनी पलकें मूँद और खोल रही थी, पता नहीं उसे सचमुच चढ गयी थी या फिर वह किसी खास मकसद के लिए मुंशीजी के सामने इस तरह का प्रदर्शन कर
रही थी, मुंशीजी कि समाजः में सिर्फ यही आया कि उन्होंने दो लार्ज पैग तैयार किये, एक डोली के हाथ में थमा दिया और दुसरे को खुद गटक गए. अब तक वे चार -चार पैग
हलक से नीचे उतार चुके थे. डोली की आँखों में लाल -लाल डोरे तैर रहे थे, प्राथमिक द्रष्टिकोण से ऐसा लगता था जैसे वह पीकर टुल्ल हो गयी हो . वह खुमारी में बोल रही थी-
- आज रात हम लोग सुहागरात मनाने वाले नहीं हैं क्या ? कल तो खूब मजा आया था ? क्या मैं सो जाऊं ?
मुंशीजी- हाँ, कल तो खूब मस्ती काटी थी मगर आज लगता है तुम बोर हो रही हो, मेरा साथ अच्छा नहीं लग रहा ?
डोली- कौन बोला ? ऐसा कौन बोला ? मैंने कहा क्या कि मजा नहीं आ रहा ?
मुन्शीजी - न अहिं कहा तो नहीं है मगर तुम्हारा व्यवहार कुछ ऐसा ही लग रहा है , शायद आज हम सुहागरात नहीं मना पायें .
डोली- लेकिन क्यों ? आपने तो कल वादा किया था कि अब हमारी हर रात सुहागरात होगी .
मुंशीजी- इस सबके लिए मोहब्बत चाहिए डोली, बिना मोहब्बत के सुहागरात नहीं मनाई जा सकती , और बिना होश के मोहब्बत नहीं की जा सकती .

Saturday, October 2, 2010

लवगुरु -५५

मुंशीजी उसी टॉप नंबर की वैश्या को अपनी हमदम, अपनी हमराज , अपनी जिंदगी समझ बैठे थे. वे चाहते थे कि डोली जीवन भर के लिए सिर्फ और सिर्फ उनकी हो जाए. लवगुरु ने तो बस यही कहा था कि आज की रात वे जी भरके सपने देखें और फिर बताएं कि उन्होंने किस तरह के सपने देखे, उनके ख़्वाब में किसी लड़की आयी , उसके साथ उन्होंने क्या किया ? मगर इस बीच होटल के वेटर ने उनको बहका लिया और फ़िल्मी स्टायल में डोली को उनके हवाले कर दिया . डोली तो वैसे भी बेहद सुन्दर थी, उसकी अदाओं का कोई जवाब नहीं था, वह जब मुस्कराती तो फूल झड़ने लगते थे. जब उसे पहली बार मुंशीजी ने देखा तो दीवाने हो गए थे , पगला गए थे . उनकी समाजः में ही नहीं आया था कि वेटर से कैसे इनकार करें जबकि वे तो छबीली के आशिक थे और शिव पांडे उर्फ लवगुरु से मिलने के लिए इसीलिए आये थे ताकि वे उनकी प्रेम कहाँ को सक्सेस कर सकें, उन्हें प्रेम करने के गुण बतला सकें मगर यहाँ तो मामला बिलकुल उलटा पद चुका था , ऐसा नहीं है कि मुंशीजी ने लवगुरु से लव टिप्स नहीं सीखे, सीखे थे मगर वे सभी टिप्स को छबीली के बजाय डोली पर ही अआज्माने लगे और बेचारी डोली क्या करती ? वह ठहरी बाजार की प्रशिक्षित गर्ल. उसने फ़ौरन ताड़ लिया कि बकरा हजम करने लायक है सो फ़ौरन हलाल कर दिया. प्यार का ऐसा जाल फेंका कि सब कुछ उलटा-पुल्टा हो गया. छबीली को चाहने वाला , उस पर मर मिटने वाला आशिक अब डोली की जुल्फों में कैद होकर रह गया था . उसने लवगुरु से बिस्तर पर पार्टनर को संतुष्ट करने के जों भी तरीके सीखे थे वह उन तरीकों को चाबीली के बजाय डोली पर आजमा रहा था . डोली को उसके ग्राहक ग्रेट ब्यूटी के नाम से भी जानते थे, वह सिर्फ तन की ही नहीं , बल्कि बुद्धि की भी चालाक थी. उसको खूब सुन्दर होने के साथ-साथ बुद्धिमान होने का भी गौरव प्राप्त थी. उसकी वाकपटुता गज़ब की थी.जों कोई भी डोली से बात करता था, उसके शब्दों की मिठास का दीवाना हो जाता था. छबीली कसबेनुमा शहर की कोरी करारी और कुंवारी लड़की थी. जब वह कुछ मेहनत का काम करती और उसके माथे से पसीना टपकता तो उसकी सुंदरता और बी ही बढ़ जाया करती थी. उसका चेहरा सुर्ख लाल था. आँखें कारी, कजरारी , झील जैसी गहरी. कमर इतनी पतली और फिगर इतना आकर्षक कि करीना कपूर भी फेल हो जाए. वैसे तो वह आसपास के सभी लड़कों की आँख की किरकिरी थी, सभी उसकी कमसिन जवानी का रस चूसने को बेताब थे मगर वह बची हुई थी. अभी तक किसीके कब्जे में नहीं आयी थी. वह अपने काम से काम रखती थी. उस कसबे में भी मुंशीजी की कई बड़ी-बड़ी दुकाने थीं, जिन दुकानों पर रोजाना हजारों लाखों की आमदनी हुआ करती थी. छबीली भी उनकी दूकान पर आया करती थी और उसे देखने भर के लिए मुंशीजी अपना लंबा -चुअदा कारोबार छोड़कर यहाँ की उस दूकान पर आया करते थे , जिस पर सामान लेने के लिए छबीली आया करती थी. लोक लाज से बचने के लिए वे छबीली से न तो प्रेम का प्रस्ताव ही रख पाए थे और न ही कभी उन्होंने उसके घरवालों के सामने प्रस्ताव रखा था . उन्होंने सुन रखा था कि गरीब लोग बहुत स्वाभिमानी होते हैं, वे भले ही कम खा सकते हैं मगर कम सामान बर्दाश्त नहीं पाते, चाहे वे अपनी बेटी की शादी किसी रिक्शा चलाने वाले के साथ कर सकते हैं मगर ज्यादा उम्र के रईस के साथ नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें इस बात का डर रहता है कि उनके लोग उन पर अपनी बेटी बेचने का आरोप लगा सकते हैं, मुंशीजी को डर था कि कहींउनकी बात का गलत अर्हत निकालकर ,मामले को तूल न डे दिया जाए , और इस कारण हो सकता है कि छबीली उनकी दूकान पर आना -जाना भी छोड़ दे .
अभी तक मुंशीजी छबीली के बारे में ही सोच रहे थे कि डोली ने टोक दिया -
-किन ख्यालों में डूबे हो ? क्या अपनी चाहने वाली के बारे सोच रहे हो ?जरूर कोई न कोई है. मैं नहीं मान सकती.मर्द बड़े छलिया होते हैं. दस से इश्क फरमाते हैं. चार-छः को शादी का प्रस्ताव देते हैं और दो से तीन शादियाँभी करते हैं. दिखाने को एक बीवी रखती हैं मगर फिर भी दूसरी-तीसरी के साथ सेक्स करते ही हैं. अंदरूनीसम्बन्ध के बारे में मैंने सूना है कि मर्दों को एक औरत में मजा नहीं आता, इसलिए वे अन्य महिलाओं केसाथ में सम्बन्ध बनाते हैं.
मुंशीजी- यकीन मानो , मैंने सिर्फ तुम्हारे साथ सुहागरात मनाई है , किसी गैर स्त्री के साथ कभी शारीरिक सम्बन्धनहीं बनाए, हाँ, किस की बात अलग है . या फिर थोड़ा बहुत सीने को सहला लिया. मुझे भारी सीने बहुतउत्तेजित करता है. जैसा कि तुम्हारा है, इसे देखते ही मुझे नशा सा चढ जाता है. मन में आग लगने लगती है.जिस्म गर्म हो जाता है. ``