समझ रही हो ना... वहाँ फोकट खाने वाले लोग नहीं हैं... प्यार मोहब्बत ठीक है, मगर ये सब खोखले शब्द होते हैं... इनकी कोई प्रमाणिकता नहीं होती, कोई प्रतिबद्धता नहीं होती... मैं किसीके प्यार पर शक नहीं कर रही, किसीकी बुराई करने का भी सवाल नहीं ... इसमे कोई डाउट नहीं किराजेश जैसा लड़का आज की तारीख में मिलना मुश्किल है... इसके बावजूद ज़माना तो अपनी रफ़्तार से चल ही रहा है , उसे तो कोई रोक ही नहीं सकता... मेरा इशारा समझ रही हो न तुम ? इसीलिए कह रही हूँ कि लाइफ सेफ करो...
शैली- मुझे शराब चढ़ने लगी है , अब नहीं समझ पाउंगी... राजेश मेरा पहला और आख़िरी प्यार है ... उसके बिना जीने कि कल्पना भी नहीं कर सकती... मुझे नहीं लगता कि राजेश मुझे मुंबई जाने देंगे... एक दिन नहीं देखते तो परेशान हो उठते हैं...
रोजी- तुम्हारा नाम तो भोली होना चाहिए , शैली किसने रख दिया... तरस आ रहा है तुम पर ...
शैली- तुम मुझे समझा रही हो, बहका रही हो या फ़िर डरा रही हो... कर क्या रही हो तुम ?
रोजी- मैं tumhaaree बड़ी बहन जैसी हो , मुझे तुमसे लगाव हो गया है, तुम बहुत अच्छी लगने लगी हो... इसलिए तुम्हारे हित कि बात कर रही हूँ... मैं तुमसे कुछ न कुछ बड़ी ही हूँ... तुमसे कोई दुश्मनी भी नहीं... दुशमनी होती तो तुम ये कयास लगा सकती थीं कि मैंने इसलिए तुमसे येसब बातें कही हैं...
रोजी- अभी तो तुम हमारे गाँव में ही ठहरी हो, कल अपने घर बुलाऊंगी तुम्हें, फ़िर फुर्सत में बात करेंगे... अभी तो खाने पीने में मजा आ रहा है... इस मजा को किरकिरा क्यों करें... मैं आभारी हूँ जो तुमने मेरे बारे में इतना सोचा वरना आजकल लोगों को अपने आप से ही फुर्सत नहीं है...
रोजी- इसमें आभार जैसी कोई बात नहीं है, जीवन भर हमें एक दूसरे की भलाई करनी है....
शैली- क्या तुम्हारी शादी हो चुकी है ?
रोजी- नहीं ... पहले कैरियर बाद में शादी कि बात सोचेंगे,, वैसे भी इस झगडे में पड़नेकी जरूरत ही क्या है... भले ही मैं कुंवारी हूँ मगर शादीशुदा लड़कियों से अच्छी हूँ... मैं कोई भी रात बेकार नहीं जाने देती... हर रात मैं जिस्मानी सुख लूटती रहती हूँ... इसके बिना मेरा चलता ही नहीं... मुझे नए नए मर्द पसंद हैं... थके हारे मरियल लोग मुझे ज़रा भी नही भाते ... मुझे चाहिए ऐसे जवान मर्द जो मुझ पर पूरी तरह हावी हो जाएँ और मेरी चीख निकल्वादें.... मैं चीखती चिलाती राहों और वे हमला पर हमला करते रहें...
शैली- ऐसा करने से दुःख नहीं होता तुम्हें ?
रोजी- बुल्कुल नहीं, मुझे उग्र सहवास ही पसंद है... मुंबई में एक विदेशी जिगोलो है, वह एक रात की फीस दस हजार लेता है मगर ऐसा सुख देता है कि तन के साथ साथ मन भी खुश हो जाता है ...
शैली- तुम उसे उल्टे दस हजार देती हो , कमाल है...
रोजी- इसमें हैरत की क्या बात है , पैसा या तो स्वाद के लिए होता है या फ़िर बात के लिए लिए...
शैली- इतने रुपये लाती कहाँ से हो ?
रोजी - बहुत आसान है, जब कोई दोस्त मेरे इस बदन से खेल खेलना चाहता है तो मैं उससे दस कि जगह बीस मांग लेती हूँ और फ़िर अगली रात मजे से उस विदेशी के साथ गुजारती हूँ... बहुत ताकतवर है वो... कभी तुम मुंबई आओगी तो अपने खर्चे से मिल्वौंगी उससे... मान जाओगी तुम...
शैली- आह,..... तुम्हारी गर्म बातें सुन सुनकर मैं भी गर्म हो गयी हूँ...
Sunday, June 7, 2009
Saturday, June 6, 2009
तड़प, भाग-56
शैली- मैं ठहरी गाँव की गंवार...मुझे ये सब नहीं आता... ये तो आप जैसी में का काम है, आप आगे बढिए ... फ़िल्म स्टार बनिए... हम लोगों के लिए इतना ही काफी है... साथ के लोगों को बताया करेंगे आपके बारे में...
रोजी- ऐसा क्यों सोचती हो शैली?चाहो तो तुम भी सब कुछ कर सकती हो... अगर हिम्मत हो, हुनर हो तो क्या नहीं हो सकता... बार -बार अभ्यास करने से हुनर आ ही जाता है... तुमने ये शेर तो सुना ही होगा- हौसला जब जवान होता है, जमीन पर आसमान होता है... समझ गयीं, जब आसमान भी जमीन पर आ सकता है तो और चीजों की क्या औकात है ? रवि कल मिलेगा तो बात करुँगी तुम्हारे लिए...
शैली- अरे नहीं -नहीं... ऐसा कुछ मत कहना ... यह बिल्कुल सम्भव नहीं है... मैं गाँव छोड़कर नहीं जा सकती... और कोई फ़िल्म स्टार मेरे लिए तो यहाँ पर पूरी यूनिट लाने से रहा...
रोजी- छोडो... पहले अपना पैग ख़त्म करो, तुम्हें लगता है की ऐसा होना नामुमकिन है, इसीलिए कह रही हो तुम...
शैली- तुम शहर के लोगों को कोई तकलीफ तो होती नहीं है इसीलिए ऐसी बातें अआसानी से सोच लेती हो... हम लोगों को रात दिन मेहनत करने से फुर्सत मिले तब ये सब करें... मैं कभी अपने जिला मुख्यालय तक नहीं गयी तो मुंबई जैसे शहर में कैसे जाउंगी... कोई जान नहीं पहचान नहीं... रहने खाने का ठिकाना नहीं... ऊपर से घरवालों की टेंशन ... कैसे देंगे वहाँ जाने की इजाजत?
रोजी- क्यों नहीं देंगे इजाजत ? क्या डकैती डालने जा रही हो ? कोई क़ानून तोड़ रही हो ? अपना भविष्य संवारने जा रही हो... देश के गांवों में रहने वाली लाखों लड़कियां विभिन्न क्षेत्रों में तरक्की कर रही हैं तो क्या वे घर बैठे-बैठे ही इतना सब कर रही हैं...
शैली- उन सब की बात अलग और हमारी बात अलग है ...
रोजी- क्यों ? अलग कैसे ? क्या वे लोग सोना चांदी खाते हैं ? जो० वे खाते हैं वही हम लोग खाते हैं... जिस भगवान् ने उनको बनाया है वही हमारा भी मालिक है... अब अगर कहीं तकलीफ है तो वो हमारे आत्मविश्वाश की है... रवि के अपने कैई घर हैं... तुम्हारा रहने खाने का इंतजाम आराम से हो सकता है... खाने -पीने की कोई टेंशन नहीं... मैं ख़ुद भी तो रहती हूँ... जल्दी ही तुम कमाने भी लगोगी फ़िर अपना ख़ुद का घर ले लेना... मुझे कोई ऐतराज नहीं होगा...मैं हरदम तुम्हारे साथ रहूंगी...
रोजी- बेवजह इतनी तकलीफ क्यों उठाने जा रही हो... जल्दी ही उकताने लग जाओगी...
रोजी- बिल्कुल नहीं... तुम मेरी अच्छी दोस्त बन चुकी हो...तुम्हारी दोस्ती को पूरी सुरक्षा दूंगी...
शैली- मुझे शराब का कम और तुम्हारी बातों का नशा ज्यादा हो रहा है... क्या सचमुच ऐसा हो सकता है ?
रोजी - हाँ, बहुत खूबसूरत हो तुम... तुम्हारी ये गोलाइयां गज़ब की हैं... इन्हें देखकर कोई भी दीवाना हो सकता है...
जो काम नहीं देना चाहेगा वह निर्देशक भी आसानी से काम देने को तैयार हो जाएगा...
शैली- मुझे शर्मिन्दा कर रही हैं आप... मैं इत्निस सुंदर भी नहीं हूँ॥
रोजी- अगर तुम हसीं नहीं होतीं तो राजेश तुम पर जान न्यौछावर नहीं करता ... वह बहुत चाहता है तुम्हें...
शैली- तो वे मुझे मुंबई जाने की इजाजत कैसे देंगे ? मैं ख़ुद भी जी नहीं पाउंगी...
रोजी- वहाँ पर एक से बढ़कर एक मर्द मिलता है, वो भी ऐसा मर्द जो तुमसे अगर कुछ लेगा तो इसके बदले तुम्हें कुछ देगा भी...l
रोजी- ऐसा क्यों सोचती हो शैली?चाहो तो तुम भी सब कुछ कर सकती हो... अगर हिम्मत हो, हुनर हो तो क्या नहीं हो सकता... बार -बार अभ्यास करने से हुनर आ ही जाता है... तुमने ये शेर तो सुना ही होगा- हौसला जब जवान होता है, जमीन पर आसमान होता है... समझ गयीं, जब आसमान भी जमीन पर आ सकता है तो और चीजों की क्या औकात है ? रवि कल मिलेगा तो बात करुँगी तुम्हारे लिए...
शैली- अरे नहीं -नहीं... ऐसा कुछ मत कहना ... यह बिल्कुल सम्भव नहीं है... मैं गाँव छोड़कर नहीं जा सकती... और कोई फ़िल्म स्टार मेरे लिए तो यहाँ पर पूरी यूनिट लाने से रहा...
रोजी- छोडो... पहले अपना पैग ख़त्म करो, तुम्हें लगता है की ऐसा होना नामुमकिन है, इसीलिए कह रही हो तुम...
शैली- तुम शहर के लोगों को कोई तकलीफ तो होती नहीं है इसीलिए ऐसी बातें अआसानी से सोच लेती हो... हम लोगों को रात दिन मेहनत करने से फुर्सत मिले तब ये सब करें... मैं कभी अपने जिला मुख्यालय तक नहीं गयी तो मुंबई जैसे शहर में कैसे जाउंगी... कोई जान नहीं पहचान नहीं... रहने खाने का ठिकाना नहीं... ऊपर से घरवालों की टेंशन ... कैसे देंगे वहाँ जाने की इजाजत?
रोजी- क्यों नहीं देंगे इजाजत ? क्या डकैती डालने जा रही हो ? कोई क़ानून तोड़ रही हो ? अपना भविष्य संवारने जा रही हो... देश के गांवों में रहने वाली लाखों लड़कियां विभिन्न क्षेत्रों में तरक्की कर रही हैं तो क्या वे घर बैठे-बैठे ही इतना सब कर रही हैं...
शैली- उन सब की बात अलग और हमारी बात अलग है ...
रोजी- क्यों ? अलग कैसे ? क्या वे लोग सोना चांदी खाते हैं ? जो० वे खाते हैं वही हम लोग खाते हैं... जिस भगवान् ने उनको बनाया है वही हमारा भी मालिक है... अब अगर कहीं तकलीफ है तो वो हमारे आत्मविश्वाश की है... रवि के अपने कैई घर हैं... तुम्हारा रहने खाने का इंतजाम आराम से हो सकता है... खाने -पीने की कोई टेंशन नहीं... मैं ख़ुद भी तो रहती हूँ... जल्दी ही तुम कमाने भी लगोगी फ़िर अपना ख़ुद का घर ले लेना... मुझे कोई ऐतराज नहीं होगा...मैं हरदम तुम्हारे साथ रहूंगी...
रोजी- बेवजह इतनी तकलीफ क्यों उठाने जा रही हो... जल्दी ही उकताने लग जाओगी...
रोजी- बिल्कुल नहीं... तुम मेरी अच्छी दोस्त बन चुकी हो...तुम्हारी दोस्ती को पूरी सुरक्षा दूंगी...
शैली- मुझे शराब का कम और तुम्हारी बातों का नशा ज्यादा हो रहा है... क्या सचमुच ऐसा हो सकता है ?
रोजी - हाँ, बहुत खूबसूरत हो तुम... तुम्हारी ये गोलाइयां गज़ब की हैं... इन्हें देखकर कोई भी दीवाना हो सकता है...
जो काम नहीं देना चाहेगा वह निर्देशक भी आसानी से काम देने को तैयार हो जाएगा...
शैली- मुझे शर्मिन्दा कर रही हैं आप... मैं इत्निस सुंदर भी नहीं हूँ॥
रोजी- अगर तुम हसीं नहीं होतीं तो राजेश तुम पर जान न्यौछावर नहीं करता ... वह बहुत चाहता है तुम्हें...
शैली- तो वे मुझे मुंबई जाने की इजाजत कैसे देंगे ? मैं ख़ुद भी जी नहीं पाउंगी...
रोजी- वहाँ पर एक से बढ़कर एक मर्द मिलता है, वो भी ऐसा मर्द जो तुमसे अगर कुछ लेगा तो इसके बदले तुम्हें कुछ देगा भी...l
Friday, June 5, 2009
तड़प, भाग-55
इसी कारण वे चुपचाप रहने लगे... मोहल्ले में भी खुसर -फुसर होने लगी थी... हांलाकि मामला राजेश से जुडा था...इस वजह से कोई कुछ कहने की हिम्मत नहीं करता था... अगर कोई आम आदमी का मला होता तो लोग मेरा भी जीना हराम कर देते... गाँव की ज्यादातर लड़कियां तथा सुंदर औरतें राजेश के खानदान से सम्बन्ध रखती थीं, यह बात सबको मालूम थी ... फ़िर कौन क्या कहता ... असल में वहाँ कुछ ऐसा माहोल बना था की राजेश के परिवार से kareebee रिश्ता बनाना गर्व की बात समझी जाती थी... हर महिला चाहती थी की उसका घनिष्ठ सम्बन्ध बने ... मेरा रिश्ता अपने आप बन गया था... ख़ुद राजेश ने ही तो मेरे सामने प्रस्ताव रखा था और अच्छी तरह सोच विचारने के बाद मैंने हाँ करदी थी... अगली शाम आयी तो मेरे पास फ़िर राजेश का बुलावा आया... मेरा मन तो नहीं था लेकिन मैं ख़ास हवेली में चली गयी ... वहाँ रोजी मौजूद थी... वह अकेली शराब पी रही थी... मेरे पहुचते ही उसने गिलास मेरी तरफ़ बढ़ा दिया... मैं बोली-
- शुक्रिया... मैं तो कल से ही परशान हूँ, सर में बहुत दर्द हो रहा है... चक्कर से आ रहे हैं...
रोजी- कोई दिक्कत नहीं होगी... इसे पीलो... यह उतारे की है... हलक से नीचे उतारते ही सारी तकलीफें ख़त्म हो जायेंगी... बिल्कुल फ्रेश हो जाओगी... मेरी तरह...
शैली- रवि नहीं दिख रहे ? कहीं बाहर गए हुए हैं क्या ?
रोजी- वाह ... तुम पर भी चढ़ ही गया ना रवि का जादू ... मैंने कहा था न... दरअसल वह है ही गज़ब का इंसान ... जो लड़की एक रात उसके साथ गुजार लेती है, फ़िर वह हमेशा के लिए उसकी दीवानी हो जाती है... मुझे रोजाना एक मर्द की जरूरत पड़ती है, मैं उसका इंतजाम भी करती हूँ लेकिन रवि की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता...
शैली- हैरत है .... तुम रोजाना मरदों को कैसे बर्दाश्त कर लेती हो ? मेरी हालत तो एक दिन में ही खस्ता हो गयी...
रोजी- भले ही मुझे रोटी मत दो मगर मर्द तो हर हालत में चाहए ही... मुझे इसकी आदत लग चुकी है...
शैली- लेकिन इसका सुरक्षित इंतजाम अकिसे होता है ? किसीको मालूम पड़ गया तो ?
रोजी- अरे किसको पता चल सकता है, सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से होता है... रवि के बारे में पूछ रही थीं ना... आज वह तुम्हारे पडौस के गाँव में आमंत्रित है... वहाँ पर किसी ख़ास हसीना को लाया गया है... बाहर से आई है ... उसको हीरो इन बन्ना है... जो इस तरह की हसीनाएं आती हैं उनका बॉडी टेस्ट रवि ही लेता है, बाद में उसकी तकदीर बन जाती है... उसको फिल्मों में कम मिल जाता है...
शैली- अच्छा , बुरा मत मानना फ़िर तुम्हारी किस्मत अभी तक क्यों नहीं बदली ?
रोजी- तुम्हें क्या पता की नहीं बदली ? मेरी भी एक फ़िल्म रिलीज होने वाली है... फ़िर देखना , हर तरफ मैं ही मैं रहूंगी... चौराहों पर मेरे बड़े-बड़े पोस्टर दिखाई देंगे...
शैली- ये तो बहुत अच्छी बात है... मैं भी देखूंगी आपकी फ़िल्म....कब तक आने की संभावना है ?
रोजी- साल के अंत तक उम्मीद है, तुम भी तो सुंदर दिखती हो, जवान हो फिल्मों में कोशिश क्यों नहीं कर लेतीं...?
शैली-- मुझे कौन काम देगा ?
रोजी- रवि किस दिन काम आएगा ? इसको बोलो न...
- शुक्रिया... मैं तो कल से ही परशान हूँ, सर में बहुत दर्द हो रहा है... चक्कर से आ रहे हैं...
रोजी- कोई दिक्कत नहीं होगी... इसे पीलो... यह उतारे की है... हलक से नीचे उतारते ही सारी तकलीफें ख़त्म हो जायेंगी... बिल्कुल फ्रेश हो जाओगी... मेरी तरह...
शैली- रवि नहीं दिख रहे ? कहीं बाहर गए हुए हैं क्या ?
रोजी- वाह ... तुम पर भी चढ़ ही गया ना रवि का जादू ... मैंने कहा था न... दरअसल वह है ही गज़ब का इंसान ... जो लड़की एक रात उसके साथ गुजार लेती है, फ़िर वह हमेशा के लिए उसकी दीवानी हो जाती है... मुझे रोजाना एक मर्द की जरूरत पड़ती है, मैं उसका इंतजाम भी करती हूँ लेकिन रवि की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता...
शैली- हैरत है .... तुम रोजाना मरदों को कैसे बर्दाश्त कर लेती हो ? मेरी हालत तो एक दिन में ही खस्ता हो गयी...
रोजी- भले ही मुझे रोटी मत दो मगर मर्द तो हर हालत में चाहए ही... मुझे इसकी आदत लग चुकी है...
शैली- लेकिन इसका सुरक्षित इंतजाम अकिसे होता है ? किसीको मालूम पड़ गया तो ?
रोजी- अरे किसको पता चल सकता है, सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से होता है... रवि के बारे में पूछ रही थीं ना... आज वह तुम्हारे पडौस के गाँव में आमंत्रित है... वहाँ पर किसी ख़ास हसीना को लाया गया है... बाहर से आई है ... उसको हीरो इन बन्ना है... जो इस तरह की हसीनाएं आती हैं उनका बॉडी टेस्ट रवि ही लेता है, बाद में उसकी तकदीर बन जाती है... उसको फिल्मों में कम मिल जाता है...
शैली- अच्छा , बुरा मत मानना फ़िर तुम्हारी किस्मत अभी तक क्यों नहीं बदली ?
रोजी- तुम्हें क्या पता की नहीं बदली ? मेरी भी एक फ़िल्म रिलीज होने वाली है... फ़िर देखना , हर तरफ मैं ही मैं रहूंगी... चौराहों पर मेरे बड़े-बड़े पोस्टर दिखाई देंगे...
शैली- ये तो बहुत अच्छी बात है... मैं भी देखूंगी आपकी फ़िल्म....कब तक आने की संभावना है ?
रोजी- साल के अंत तक उम्मीद है, तुम भी तो सुंदर दिखती हो, जवान हो फिल्मों में कोशिश क्यों नहीं कर लेतीं...?
शैली-- मुझे कौन काम देगा ?
रोजी- रवि किस दिन काम आएगा ? इसको बोलो न...
Thursday, June 4, 2009
तड़प, भाग-54
बहुत समझदार और सबसे अलग हो तुम... महिलायें अक्सर घमंड से बात करती हैं, मैं सबकी नहीं कहता ज्यादातर की बात कर रहा हूँ... मगर तुम्हारे अन्दर ये चीज नहीं है... तुम बिल्कुल भी अहंकारी नहीं हो... मुझे खुशी हो रही है की तुम मेरी दोस्त हो... तुमने मुझे अपने लायक समझा ,यह मेरी खुशकिस्मती है...
शैली- सिर्फ़ दोस्त नहीं , तुम मेरी जिन्दगी बन चुके हो... जीने का मकसद बन गए हो....जान से प्यारे बन गए हो... अब सिर्फ़ हमारे बन जाओ तो यह नीरस जिन्दगी भी संवर जाए, जीने में मजा आ जाए...
दीपू- बड़ी शायराना हो रही हो... जानती हो न क्या कह रही हो... अपना बनाने के बात करती हो... दिल में समाने की बात करती हो... ठीक है, लेकिन फ़िर भूल ना जाना... दिल को तोड़ मत देना... अगर दिल टूटा तो हम भी टूटेंगे ... फ़िर बिखर जायेंगे इन हावाओं में ...
शैली- अपने दिल से बाहर निकलने दूंगी तब ना... मैं तो तुम्हें अपने कलेजे से चिपकाकर रखूंगी...
दीपू- मैं भी इस दिल में समाये रखूँगा... लाख तूफ़ान आयें , बिजलियाँ चमकें लेकिन मेरी मोहब्बत को कोई तस से मस न कर सकेगा... मैं अपने प्यार की ऊंचाई हिमालय की तरह कर दूंगा...
शैली- तुम बहुत अच्छे हो, सच्चे हो, यह तुम्हारी आंखों की चमक बता रही है...अगर इतना प्यार एक क्षण भी मिल जाए तो उसीके सहारे तमाम जिन्दगी गुजारी जा सकती है....अब अगर तुम मुझे धोखा भी दोगे तो ज्यादा मलाल नहीं होगा, एक जन्म के लायक तो तुम मुझे अभी तक ही प्यार दे चुके हो...
दीपू- यह तो कुछ भी नहीं है, आगे -आगे देखिये होता है क्या ? जानती हो मुझे तुम्हारी किन बातों ने सबसे ज्यादा अपील किया , सच बोलने की आदत ने ... तुमने अपने संबंधों को जिस तरह से खोलकर मेरे सामने रखा, उससे मुझे लगा की तुम भी सत्य की पुजारिन हो... मैं बहुत प्रभावित हुआ...
शैली- अगर ऐसी बात है तो यह भी आपका बड़प्पन ही है... सच्चा इंसान ही दूसरे सच्चे इंसान की कद्र करता है...
दीपू- मैं बहुत नासमझ हूँ, भारी भरकम बातों को समझ नही पाता हूँ...हाँ, राजेश की बात सुनना जरूर चाहूँगा... मुझे उसमें दिलचस्पी है... तुम जैसी पवित्र भावना रखने वाली लड़की आखिरकार कत्ल जैसा निर्णय कैसे ले सकती है ? मैं उन हालातों को समझना चाहता हूँ...
शैली- ठीक है, मैं जरूर बताउंगी... पहले फ्रेश हो जाएँ ?
इसके बाद उन लोगों ने साथ-साथ स्नान किया...शैली ने दीपू को अपने हाथों से स्नान कराया ... दीपू ने भी शैली के साथ काफी देर तक जल क्रीडा की... इसके बाद उन्होंने हलके कपड़े पहने और बगीचे में टहलने चले गए... शैली ने दीपू को बताना शुरू किया-
- उस रात हम लोगों ने खूब आनंद लिया ... उस दिन सुबह चार बजे ही मैं घर पहुच पाई ... जब सोयी तो ऐसी गहरी नीद आयी की दोपहर को दो बजे ही जाग पाई , पूरा शरीर दुःख रहा था... जैसे किसी ने बदन से सारा खून चूस लिया हो... नहाने के बाद जब मैं खाना खाने बैठी तो रात की घटनाएं आंखों के सामने नाचने लगीं... मुझे अपने आप पर ही हैरत हो रही थी... दो लोगों से एक ही समय पर सहवास करने के नाम मात्र से ही मैं शर्मशार हो रही थी... समझ में नहीं आया की मैंने ये सब करने की स्वीक्रति कैसे दे दी... राजेश ने मुझे ख़ुद इसके लिए उकसाया था... उसीने रवि को शहर में बुलाया था... उसके साथ जो लड़की थी, उसने भी मेरे सामने ही रवि और राजेश से सम्बन्ध बनाए थे... मुझे अपने आप से ही घरना होने लगी... मेरे घरवाले चुप थे... शायद वे समझ चुके थे की मैं अब पीछे हटने की स्थिति में नहीं हूँ...
शैली- सिर्फ़ दोस्त नहीं , तुम मेरी जिन्दगी बन चुके हो... जीने का मकसद बन गए हो....जान से प्यारे बन गए हो... अब सिर्फ़ हमारे बन जाओ तो यह नीरस जिन्दगी भी संवर जाए, जीने में मजा आ जाए...
दीपू- बड़ी शायराना हो रही हो... जानती हो न क्या कह रही हो... अपना बनाने के बात करती हो... दिल में समाने की बात करती हो... ठीक है, लेकिन फ़िर भूल ना जाना... दिल को तोड़ मत देना... अगर दिल टूटा तो हम भी टूटेंगे ... फ़िर बिखर जायेंगे इन हावाओं में ...
शैली- अपने दिल से बाहर निकलने दूंगी तब ना... मैं तो तुम्हें अपने कलेजे से चिपकाकर रखूंगी...
दीपू- मैं भी इस दिल में समाये रखूँगा... लाख तूफ़ान आयें , बिजलियाँ चमकें लेकिन मेरी मोहब्बत को कोई तस से मस न कर सकेगा... मैं अपने प्यार की ऊंचाई हिमालय की तरह कर दूंगा...
शैली- तुम बहुत अच्छे हो, सच्चे हो, यह तुम्हारी आंखों की चमक बता रही है...अगर इतना प्यार एक क्षण भी मिल जाए तो उसीके सहारे तमाम जिन्दगी गुजारी जा सकती है....अब अगर तुम मुझे धोखा भी दोगे तो ज्यादा मलाल नहीं होगा, एक जन्म के लायक तो तुम मुझे अभी तक ही प्यार दे चुके हो...
दीपू- यह तो कुछ भी नहीं है, आगे -आगे देखिये होता है क्या ? जानती हो मुझे तुम्हारी किन बातों ने सबसे ज्यादा अपील किया , सच बोलने की आदत ने ... तुमने अपने संबंधों को जिस तरह से खोलकर मेरे सामने रखा, उससे मुझे लगा की तुम भी सत्य की पुजारिन हो... मैं बहुत प्रभावित हुआ...
शैली- अगर ऐसी बात है तो यह भी आपका बड़प्पन ही है... सच्चा इंसान ही दूसरे सच्चे इंसान की कद्र करता है...
दीपू- मैं बहुत नासमझ हूँ, भारी भरकम बातों को समझ नही पाता हूँ...हाँ, राजेश की बात सुनना जरूर चाहूँगा... मुझे उसमें दिलचस्पी है... तुम जैसी पवित्र भावना रखने वाली लड़की आखिरकार कत्ल जैसा निर्णय कैसे ले सकती है ? मैं उन हालातों को समझना चाहता हूँ...
शैली- ठीक है, मैं जरूर बताउंगी... पहले फ्रेश हो जाएँ ?
इसके बाद उन लोगों ने साथ-साथ स्नान किया...शैली ने दीपू को अपने हाथों से स्नान कराया ... दीपू ने भी शैली के साथ काफी देर तक जल क्रीडा की... इसके बाद उन्होंने हलके कपड़े पहने और बगीचे में टहलने चले गए... शैली ने दीपू को बताना शुरू किया-
- उस रात हम लोगों ने खूब आनंद लिया ... उस दिन सुबह चार बजे ही मैं घर पहुच पाई ... जब सोयी तो ऐसी गहरी नीद आयी की दोपहर को दो बजे ही जाग पाई , पूरा शरीर दुःख रहा था... जैसे किसी ने बदन से सारा खून चूस लिया हो... नहाने के बाद जब मैं खाना खाने बैठी तो रात की घटनाएं आंखों के सामने नाचने लगीं... मुझे अपने आप पर ही हैरत हो रही थी... दो लोगों से एक ही समय पर सहवास करने के नाम मात्र से ही मैं शर्मशार हो रही थी... समझ में नहीं आया की मैंने ये सब करने की स्वीक्रति कैसे दे दी... राजेश ने मुझे ख़ुद इसके लिए उकसाया था... उसीने रवि को शहर में बुलाया था... उसके साथ जो लड़की थी, उसने भी मेरे सामने ही रवि और राजेश से सम्बन्ध बनाए थे... मुझे अपने आप से ही घरना होने लगी... मेरे घरवाले चुप थे... शायद वे समझ चुके थे की मैं अब पीछे हटने की स्थिति में नहीं हूँ...
Wednesday, June 3, 2009
तड़प, भाग-53
दिल से निकली आवाज दिल की गहराइयों में उतर रही है, इश्वर सब सुन रहा है, हम दोनों के मन की मुराद जरूर पूरी होगी... मैं तुम्हें पूरी आजादी दूंगा , पूरा सम्मान दूंगा...
शैली- मैं समझ सकती हूँ... तुम्हारे जज्बात पाक साफ़ हैं, तुम्हारे विचारों में पवित्रता झलक रही है....
दीपू- तुम बहुत भावुक हो... ऊपर से कठोर दिखती हो मगर अन्दर से नारियल की तरह हो... बिल्कुल शुद्ध , निर्मल और मुलायम... बेहद मधुर और शीतल-शीतल......
शैली- मेरी इतनी तारीफ़ भी न करो किमैं घमंडी हो जाऊं.... मुझे अंहकार पसंद नहीं है....
दीपू- कुछ नहीं होगा मेरी जान... मैं जान गया हूँ तुम्हें... तुमने अपने सम्मान की खातिर राजेश की ह्त्या करदी यह बहुत बड़ी बात है... मैंने सुना है कि जुल्म करने वाले से ज्यादा जुल्म सहने वाला गुनाहगार होता है, तुमने जुल्म का प्रतिकार करके यह सिद्ध कर दिया कि तुम आत्मसम्मान कि रक्षा करने के लिए कुछ भी कर सकती हो...बहादुर लोग ही ऐसा कर सकते हैं...
शैली- क्षण भर का आवेग था जो हो गया सो गया... वैसे बहुत पछता रही हूँ मैं...
दीपू- तुम्हारी जगह कोई दूसरी औरत होती तो जीवन भर उस राजेश और रवि की गुलाम बनी रहती... तुम्हें अपने निर्णय पर गर्व होना चाहिए... खुश होना चाहिए तुम्हें....
शैली- सच कहूं तो मेरा दिल बहुत जोर-जोर से धड़कता है, पश्चाताप कि चिंगारियों में मेरा वजूद झुलस रहा है... मैंने उस आवेग में आकर राजेश को मौत के घाट तो उतार दिया लेकिन अब बहुत दुःख होता है... कभी जब राजेश वाली बात याद आती है तो बहुत ग्लानी होती है... मन उचाट जाता है...
दीपू- क्यों ? मन पर इतना बोझ क्यों ? जब उसे मारा तब नहीं सोचा था क्या ?
शैली- नहीं, सब अचानक हो गया ....तुम जानना चाहते हो कैसे हुआ ये सब .... मैंने योजना को अंजाम तो धीरे -धीरे दिया मगर योजना अचानक बन गयी...
दीपू- अब मैं हर बात सुनूंगा मगर प्यार करने के बाद... अब मैं बिल्कुल शिखर पर हूँ, कामोत्तेजना के कारण मेरा जिस्म फटने को बेताब है...
शैली- मैं ख़ुद भी इसी आग में जल रही हूँ, तभी तो तुमसे कहती हूँ की मुझे प्यार करो , मगर सुनो तब ना...तुम्हें तो प्रणय क्रीडा में कम और राजेश कि९ बातों में ज्यादा मजा आ रहा है... जासूस की तरह हर बात पूछ रहे हो... मर गया सो मर गया.... अब जो जिन्दा हैं उनका भी कुछ ख़याल कीजिये...
दीपू रुका नहीं ... वह उस पर भूखे भेदिये की तरह टूट पडा... जब दोनों के बदन एक दूसरे से रगड़ने लगे तो वासना की चिंगारियां फूटने लगीं... मन में हजारों रंग बिरंगे फूल खिलने लगे...दिल से निकली आवाज दिल की गहराइयों में उतर रही है, इश्वर सब सुन रहा है, हम दोनों के मन की मुराद जरूर पूरी होगी... मैं तुम्हें पूरी आजादी दूंगा , पूरा सम्मान दूंगा... शैली- मैं समझ सकती हूँ... तुम्हारे जज्बात पाक साफ़ हैं, तुम्हारे विचारों में पवित्रता झलक रही है.... दीपू- तुम बहुत भावुक हो... ऊपर से कठोर दिखती हो मगर अन्दर से नारियल की तरह हो... बिल्कुल शुद्ध , निर्मल और मुलायम... बेहद मधुर और शीतल-शीतल...... शैली- मेरी इतनी तारीफ़ भी न करो किमैं घमंडी हो जाऊं.... मुझे अंहकार पसंद नहीं है.... दीपू- कुछ नहीं होगा मेरी जान... मैं जान गया हूँ तुम्हें... तुमने अपने सम्मान की खातिर राजेश की ह्त्या करदी यह बहुत बड़ी बात है... मैंने सुना है कि जुल्म करने वाले से ज्यादा जुल्म सहने वाला गुनाहगार होता है, तुमने जुल्म का प्रतिकार करके यह सिद्ध कर दिया कि तुम आत्मसम्मान कि रक्षा करने के लिए कुछ भी कर सकती हो...बहादुर लोग ही ऐसा कर सकते हैं... शैली- क्षण भर का आवेग था जो हो गया सो गया... वैसे बहुत पछता रही हूँ मैं... दीपू- तुम्हारी जगह कोई दूसरी औरत होती तो जीवन भर उस राजेश और रवि की गुलाम बनी रहती... तुम्हें अपने निर्णय पर गर्व होना चाहिए... खुश होना चाहिए तुम्हें.... शैली- सच कहूं तो मेरा दिल बहुत जोर-जोर से धड़कता है, पश्चाताप कि चिंगारियों में मेरा वजूद झुलस रहा है... मैंने उस आवेग में आकर राजेश को मौत के घाट तो उतार दिया लेकिन अब बहुत दुःख होता है... कभी जब राजेश वाली बात याद आती है तो बहुत ग्लानी होती है... मन उचाट जाता है... दीपू- क्यों ? मन पर इतना बोझ क्यों ? जब उसे मारा तब नहीं सोचा था क्या ? शैली- नहीं, सब अचानक हो गया ....तुम जानना चाहते हो कैसे हुआ ये सब .... मैंने योजना को अंजाम तो धीरे -धीरे दिया मगर योजना अचानक बन गयी... दीपू- अब मैं हर बात सुनूंगा मगर प्यार करने के बाद... अब मैं बिल्कुल शिखर पर हूँ, कामोत्तेजना के कारण मेरा जिस्म फटने को बेताब है... शैली- मैं ख़ुद भी इसी आग में जल रही हूँ, तभी तो तुमसे कहती हूँ की मुझे प्यार करो , मगर सुनो तब ना...तुम्हें तो प्रणय क्रीडा में कम और राजेश कि९ बातों में ज्यादा मजा आ रहा है... जासूस की तरह हर बात पूछ रहे हो... मर गया सो मर गया.... अब जो जिन्दा हैं उनका भी कुछ ख़याल कीजिये... दीपू रुका नहीं ... वह उस पर भूखे भेदिये की तरह टूट पडा... जब दोनों के बदन एक दूसरे से रगड़ने लगे तो वासना की चिंगारियां फूटने लगीं... मन में हजारों रंग बिरंगे फूल खिलने लगे... कुछ समय तक तो वे आपस में प्यार करते रहे और फ़िर जल्द ही दोनों एक दूसरे में समा गए... ये बेहद आत्मीय क्षण थे...कुछ समय तक तो वह आहिस्ता आहिस्ता दौड़ रहा था मगर जब शैली ने उसको ललकारा तो उसने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी... इस मिल्सं का आनंद अलग था... शैली तो दीवानी बन कर गयी.... दीपू पर भी गज़ब का नशा सवार था ... वह शक्तिमान की तरह व्यवहार कर रहा था... और फ़िर इस खेल में जीत का सेहरा भी दीपू के सर पर ही बंधा... वह जीत की इस खुशी को संभाल नहीं पा रहा था... शैली ने भी कहा-
- मुबारक हो दोस्त् , तुमने मेरा दिल पहले ही जीत लिया था और अब बदन भी जीत लिया... बहुत कम लोग मुझे संतुष्ट कर पाते हैं...
दीपू- तुमने भी तबियत खुश करदी , मैं बहुत आनंदित हूँ...
शैली- मैं समझ सकती हूँ... तुम्हारे जज्बात पाक साफ़ हैं, तुम्हारे विचारों में पवित्रता झलक रही है....
दीपू- तुम बहुत भावुक हो... ऊपर से कठोर दिखती हो मगर अन्दर से नारियल की तरह हो... बिल्कुल शुद्ध , निर्मल और मुलायम... बेहद मधुर और शीतल-शीतल......
शैली- मेरी इतनी तारीफ़ भी न करो किमैं घमंडी हो जाऊं.... मुझे अंहकार पसंद नहीं है....
दीपू- कुछ नहीं होगा मेरी जान... मैं जान गया हूँ तुम्हें... तुमने अपने सम्मान की खातिर राजेश की ह्त्या करदी यह बहुत बड़ी बात है... मैंने सुना है कि जुल्म करने वाले से ज्यादा जुल्म सहने वाला गुनाहगार होता है, तुमने जुल्म का प्रतिकार करके यह सिद्ध कर दिया कि तुम आत्मसम्मान कि रक्षा करने के लिए कुछ भी कर सकती हो...बहादुर लोग ही ऐसा कर सकते हैं...
शैली- क्षण भर का आवेग था जो हो गया सो गया... वैसे बहुत पछता रही हूँ मैं...
दीपू- तुम्हारी जगह कोई दूसरी औरत होती तो जीवन भर उस राजेश और रवि की गुलाम बनी रहती... तुम्हें अपने निर्णय पर गर्व होना चाहिए... खुश होना चाहिए तुम्हें....
शैली- सच कहूं तो मेरा दिल बहुत जोर-जोर से धड़कता है, पश्चाताप कि चिंगारियों में मेरा वजूद झुलस रहा है... मैंने उस आवेग में आकर राजेश को मौत के घाट तो उतार दिया लेकिन अब बहुत दुःख होता है... कभी जब राजेश वाली बात याद आती है तो बहुत ग्लानी होती है... मन उचाट जाता है...
दीपू- क्यों ? मन पर इतना बोझ क्यों ? जब उसे मारा तब नहीं सोचा था क्या ?
शैली- नहीं, सब अचानक हो गया ....तुम जानना चाहते हो कैसे हुआ ये सब .... मैंने योजना को अंजाम तो धीरे -धीरे दिया मगर योजना अचानक बन गयी...
दीपू- अब मैं हर बात सुनूंगा मगर प्यार करने के बाद... अब मैं बिल्कुल शिखर पर हूँ, कामोत्तेजना के कारण मेरा जिस्म फटने को बेताब है...
शैली- मैं ख़ुद भी इसी आग में जल रही हूँ, तभी तो तुमसे कहती हूँ की मुझे प्यार करो , मगर सुनो तब ना...तुम्हें तो प्रणय क्रीडा में कम और राजेश कि९ बातों में ज्यादा मजा आ रहा है... जासूस की तरह हर बात पूछ रहे हो... मर गया सो मर गया.... अब जो जिन्दा हैं उनका भी कुछ ख़याल कीजिये...
दीपू रुका नहीं ... वह उस पर भूखे भेदिये की तरह टूट पडा... जब दोनों के बदन एक दूसरे से रगड़ने लगे तो वासना की चिंगारियां फूटने लगीं... मन में हजारों रंग बिरंगे फूल खिलने लगे...दिल से निकली आवाज दिल की गहराइयों में उतर रही है, इश्वर सब सुन रहा है, हम दोनों के मन की मुराद जरूर पूरी होगी... मैं तुम्हें पूरी आजादी दूंगा , पूरा सम्मान दूंगा... शैली- मैं समझ सकती हूँ... तुम्हारे जज्बात पाक साफ़ हैं, तुम्हारे विचारों में पवित्रता झलक रही है.... दीपू- तुम बहुत भावुक हो... ऊपर से कठोर दिखती हो मगर अन्दर से नारियल की तरह हो... बिल्कुल शुद्ध , निर्मल और मुलायम... बेहद मधुर और शीतल-शीतल...... शैली- मेरी इतनी तारीफ़ भी न करो किमैं घमंडी हो जाऊं.... मुझे अंहकार पसंद नहीं है.... दीपू- कुछ नहीं होगा मेरी जान... मैं जान गया हूँ तुम्हें... तुमने अपने सम्मान की खातिर राजेश की ह्त्या करदी यह बहुत बड़ी बात है... मैंने सुना है कि जुल्म करने वाले से ज्यादा जुल्म सहने वाला गुनाहगार होता है, तुमने जुल्म का प्रतिकार करके यह सिद्ध कर दिया कि तुम आत्मसम्मान कि रक्षा करने के लिए कुछ भी कर सकती हो...बहादुर लोग ही ऐसा कर सकते हैं... शैली- क्षण भर का आवेग था जो हो गया सो गया... वैसे बहुत पछता रही हूँ मैं... दीपू- तुम्हारी जगह कोई दूसरी औरत होती तो जीवन भर उस राजेश और रवि की गुलाम बनी रहती... तुम्हें अपने निर्णय पर गर्व होना चाहिए... खुश होना चाहिए तुम्हें.... शैली- सच कहूं तो मेरा दिल बहुत जोर-जोर से धड़कता है, पश्चाताप कि चिंगारियों में मेरा वजूद झुलस रहा है... मैंने उस आवेग में आकर राजेश को मौत के घाट तो उतार दिया लेकिन अब बहुत दुःख होता है... कभी जब राजेश वाली बात याद आती है तो बहुत ग्लानी होती है... मन उचाट जाता है... दीपू- क्यों ? मन पर इतना बोझ क्यों ? जब उसे मारा तब नहीं सोचा था क्या ? शैली- नहीं, सब अचानक हो गया ....तुम जानना चाहते हो कैसे हुआ ये सब .... मैंने योजना को अंजाम तो धीरे -धीरे दिया मगर योजना अचानक बन गयी... दीपू- अब मैं हर बात सुनूंगा मगर प्यार करने के बाद... अब मैं बिल्कुल शिखर पर हूँ, कामोत्तेजना के कारण मेरा जिस्म फटने को बेताब है... शैली- मैं ख़ुद भी इसी आग में जल रही हूँ, तभी तो तुमसे कहती हूँ की मुझे प्यार करो , मगर सुनो तब ना...तुम्हें तो प्रणय क्रीडा में कम और राजेश कि९ बातों में ज्यादा मजा आ रहा है... जासूस की तरह हर बात पूछ रहे हो... मर गया सो मर गया.... अब जो जिन्दा हैं उनका भी कुछ ख़याल कीजिये... दीपू रुका नहीं ... वह उस पर भूखे भेदिये की तरह टूट पडा... जब दोनों के बदन एक दूसरे से रगड़ने लगे तो वासना की चिंगारियां फूटने लगीं... मन में हजारों रंग बिरंगे फूल खिलने लगे... कुछ समय तक तो वे आपस में प्यार करते रहे और फ़िर जल्द ही दोनों एक दूसरे में समा गए... ये बेहद आत्मीय क्षण थे...कुछ समय तक तो वह आहिस्ता आहिस्ता दौड़ रहा था मगर जब शैली ने उसको ललकारा तो उसने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी... इस मिल्सं का आनंद अलग था... शैली तो दीवानी बन कर गयी.... दीपू पर भी गज़ब का नशा सवार था ... वह शक्तिमान की तरह व्यवहार कर रहा था... और फ़िर इस खेल में जीत का सेहरा भी दीपू के सर पर ही बंधा... वह जीत की इस खुशी को संभाल नहीं पा रहा था... शैली ने भी कहा-
- मुबारक हो दोस्त् , तुमने मेरा दिल पहले ही जीत लिया था और अब बदन भी जीत लिया... बहुत कम लोग मुझे संतुष्ट कर पाते हैं...
दीपू- तुमने भी तबियत खुश करदी , मैं बहुत आनंदित हूँ...
Tuesday, June 2, 2009
तड़प, भाग-52
शैली को लगता था किवह अपने पूर्व प्रेमी की दगा के बारे में बताकर दीपू कि सहानुभूति बटोर लेगी , मगर वह नहीं जानती कि यह दांव उसी पर उलटा पड़ने वाला है... उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वह इतने बड़े अधिकारी के साथ सहवास कर रही थी... दीपू उससे इस तरह कि ही बातें कर रहा था , जो कि उसको अच्छी लगती थीं, वह अपनी असलियत का ज़रा भी एहसास नहीं होने दे रहा था... दीपू कि खासियत थी कि वह अपने दिल में चल रही खींचतान का असर चेहरे पर नहीं होने देता था... कमाल का कलाकार था वो... जब दुःख का प्रसंग आता तो उसकी आवाज में बहुत दर्द पैदा हो जाया करता था, जब खुशी का वक्त होता तो उसकी उमंग देखते ही बनतीथी... शैली समझती कि वह उसका सच्चा आशिक बन चुका है... शैली कि नजर में वह सम्पूर्ण मर्द था... किसी और कि बात होती तो वह खूब सोच समझकर कदम उठाती लेकिन यह उसकी पसंद का मामला था... अपनी पसंद कि हर चीज को प्राप्त करना उसका शौक था... वह दीपू को दिल से चाहने लगी थी , यहाँ तक कि भविष्य को लेकर तरह -तरह की नई-नई योजनायें भी बनाने लगी... उसको बंगले में रहने का शौक था , जब उसे एक बँगला पसंद आ गया तो उसने बाजार भाव से ज्यादा कीमत देकर उसे खरीद लिया था... वह नहीं चाहती थी कि सिर्फ़ पैसे के लिए उसकी पसंद कि चीज हाथ से नहीं निकालनी चाहिए....दीपू उसके विशेष अंग में समाने कि कोशिश कर रहा था... पहले तो उसने उँगलियों कि दस्तक दी और जल्द ही उसके ख़ास द्वार पर आक्रमण कि तैयारी करने लगा... ये सुनहरे पल थे... शैली को खूब सुख मिल रहा था... इसी कारण उसकी सोच का सिलसिला टूट गया... अब वह पूरा ध्यान शारीरिक सुख पर देना चाहती थी... दीपू ने उसकी भावनाओं को भड़काने के उद्देश्य से पूछ लिया-
-अब कैसा महसूस कर रही हो मेरी जान ?
शैली- अगर कहीं स्वर्ग है तो वो ये है, यह तुम्हारे स्पर्श का जादू है...
दीपू- मुझ अकेले पर ही सब क्यों दाल रही हो , इसमें तुम्हारा भी तो उतना ही योगदान है , क्योंकि जितनी खुश तुम हो मैं तो उतना ही खुश हूँ, मुझे बहुत आनंद मिल रहा है....
शैली- हाँ दीपू, यह असीमित और अकल्पनीय है , ऐसा कभी मैंने सपने में भी नहीं सोचा था...
दीपू- और मेरे दिल से पूछकर देखो, मुझे तो कभी यकीन ही नहीं हुआ कि दुनिया में इतना सुख भी होता है, यहाँ के दुःख दर्दों को देखकर लगता था जैसे हर जगह गम ही गम हैं... मगर तुमसे मिलकर तो जैसे मुझे खुशियों का खजाना ही मिल गया है...
शैली- यह दोस्ती , यह प्यार हमेशा के लिए तो है ना ?
दीपू- इसमें भी शंका की कोई बात है शैली....मैं हमेशा तुमसे मोहब्बत करता रहूँगा...
शैली- कोई वादा मत करो प्लीज.... मुझे बहुत डर लगता है... जब वादा टूटता है तो दिल को बेहद तकलीफ होती है...जीना हराम हो जाता है....
दीपू- ऐसा तब होता है जब कोई धोखा देता है....मैं कभी ऐसा नहीं करूंगा... अपनी मोहब्बत के लिए किसी भी हद से गुजर जाऊं गा...
शैली- तुम बहुत अच्छे हो दीपू , देवता हो तुम ... सच कहूं तो मैंने इतनी इज्जत पहले कभी किसी की नहीं की...
दीपू- मैं समजह्ता हूँ शैली, तुम्हारी भावुक आवाज तुम्हारे जज्बातों को बयान कर रही है...
-अब कैसा महसूस कर रही हो मेरी जान ?
शैली- अगर कहीं स्वर्ग है तो वो ये है, यह तुम्हारे स्पर्श का जादू है...
दीपू- मुझ अकेले पर ही सब क्यों दाल रही हो , इसमें तुम्हारा भी तो उतना ही योगदान है , क्योंकि जितनी खुश तुम हो मैं तो उतना ही खुश हूँ, मुझे बहुत आनंद मिल रहा है....
शैली- हाँ दीपू, यह असीमित और अकल्पनीय है , ऐसा कभी मैंने सपने में भी नहीं सोचा था...
दीपू- और मेरे दिल से पूछकर देखो, मुझे तो कभी यकीन ही नहीं हुआ कि दुनिया में इतना सुख भी होता है, यहाँ के दुःख दर्दों को देखकर लगता था जैसे हर जगह गम ही गम हैं... मगर तुमसे मिलकर तो जैसे मुझे खुशियों का खजाना ही मिल गया है...
शैली- यह दोस्ती , यह प्यार हमेशा के लिए तो है ना ?
दीपू- इसमें भी शंका की कोई बात है शैली....मैं हमेशा तुमसे मोहब्बत करता रहूँगा...
शैली- कोई वादा मत करो प्लीज.... मुझे बहुत डर लगता है... जब वादा टूटता है तो दिल को बेहद तकलीफ होती है...जीना हराम हो जाता है....
दीपू- ऐसा तब होता है जब कोई धोखा देता है....मैं कभी ऐसा नहीं करूंगा... अपनी मोहब्बत के लिए किसी भी हद से गुजर जाऊं गा...
शैली- तुम बहुत अच्छे हो दीपू , देवता हो तुम ... सच कहूं तो मैंने इतनी इज्जत पहले कभी किसी की नहीं की...
दीपू- मैं समजह्ता हूँ शैली, तुम्हारी भावुक आवाज तुम्हारे जज्बातों को बयान कर रही है...
Monday, June 1, 2009
तड़प , भाग-51
जीवन बहुत वीराने में गुजरेगा ... मुझे तुमसे बहुत प्यार है... इतना ज्यादा प्यार की उसे सिर्फ़ महसूस ही किया जा सकता है, जो लोग प्रेम का ढिंढोरा पीटते हैं उनको झूठा कहा जाता है, तुम मेरे बारे में भी अपनी ऐसी राय बना सकते हो मगर मैंने वही कहा जो मेरे दिल की गहराइयों में है, मुझे इतना प्यार कभी किससे नहीं हुआ जितना की तुमसे हुआ है... अब तो यही कह सकती हूँ कितुम ही सब कुछ हो ....चाहे सजा देना या मजा देना... मैं जल्दी किसी पर भरोसा नहीं करती , एक तुम ही ऐसे हो जिस पर कि आँखें मूंदकर विश्वाश करने को जी चाहता है...
दीपू- ठीक है , तुम्हारे इस विश्वाश को मैं हमेशा बनाए रखने का प्रयास करूँगा...
शैली- मैं अपने कुछ दोस्तों से सिफारिश करके तुमको छोटी-मोटी फ़िल्म में काम जरूर दिलाउंगी....मैं चाहती हूँ कि तुम जल्दी ही एक स्टार बन जाओ... तब हम भी किसी मोड़ पर तुम्हें मिल ही जायेंगे... प्रशंषकों की आटोग्राफ वाली लाइन में किसी दिन तुम हमें भी खड़े पाओगे...
दीपू- तुम तो अपनी जान हो, तुम्हें कागज़ पर नहीं दिल पर दिल से आटोग्राफ दे चुका हूँ....
शैली- शुक्रिया दीपू... तुम बहुत अच्छे हो, तुहें देखकर प्यार करने को जी चाहता है, तुम पहले ऐसे मर्द हो जिसकी मैं ख़ुद तारीफ़ कर रही हूँ वरना यहाँ सारे मर्द मेरी अदाओं के गीत गाते हैं, आधा समय वे सहवास में और आधा समय मेरी तारीफ़ में गुजारते हैं....
दीपू- हर आदमी के अपने -अपने विचार होते हैं, जीने का तरीका होता है... मेरा नजरिया इन सबसे अलग है... अच्छा , मुझे राजेश , रवि और रोजा के बारे में जो कहानी सूना रही थीं उनमे से अब कोई जिंदा भी है या फ़िर सब टपक गए ? तुमने तो बस एक का ही काम तमाम किया था न ?
शैली- हाँ, मैंने तो राजेश का ही कत्ल किया था , वो भी इसलिए क्योंकि उसने मेरा जीना हराम कर दिया था... उसने मुझे जीते जी नर्क मर झोंक दिया था... वह अपनी मौज मस्ती और अपने हितों को साधने में मेरा इस्तेमाल करने लगा था... म्मुझे रोजाना नए नए लोगों के सामने परोसने लगा था...
दीपू- क्या उसने तुम्हें वो खेत नहीं दिया , जिसका उसने वादा किया था...
शैली- खेत तो उसने जरूर दिया था मगर वह ऐसा खेत था जिस पर पहले से ही मुकदमा चल रहा था... उसने रजिस्ट्रेशन कराने के बजाय सिर्फ़ एग्रीमेंट बनवा दिया था... हम लोग कानूनी दांव पेच के बारे में कुछ नहीं जानते थे... हमें तो खेत मिलने की खुशी ही इतनी ज्यादा थी की कोई जांच पड़ताल करने का विचार भी मन में नहीं आया... वैसे भी दीपू पर शक करने का कोई मतलब नहीं था...
दीपू जानता था की जब उत्तेजक क्षण होते हैं , तब कोई झूठ नहीं बोलता , वह भी शैली से ऐसे समय सवाल कर रहा था जब उसका बदन कामोत्तेजना की भट्टी में दाहक था, शैली को उसने मजबूती के साथ पकड़ रखा था... दीपू का मजबूत जिस्म इस बात की गवाही दे रहा था की वह रोजाना व्यायाम जरूर करता होगा...
दीपू- ठीक है , तुम्हारे इस विश्वाश को मैं हमेशा बनाए रखने का प्रयास करूँगा...
शैली- मैं अपने कुछ दोस्तों से सिफारिश करके तुमको छोटी-मोटी फ़िल्म में काम जरूर दिलाउंगी....मैं चाहती हूँ कि तुम जल्दी ही एक स्टार बन जाओ... तब हम भी किसी मोड़ पर तुम्हें मिल ही जायेंगे... प्रशंषकों की आटोग्राफ वाली लाइन में किसी दिन तुम हमें भी खड़े पाओगे...
दीपू- तुम तो अपनी जान हो, तुम्हें कागज़ पर नहीं दिल पर दिल से आटोग्राफ दे चुका हूँ....
शैली- शुक्रिया दीपू... तुम बहुत अच्छे हो, तुहें देखकर प्यार करने को जी चाहता है, तुम पहले ऐसे मर्द हो जिसकी मैं ख़ुद तारीफ़ कर रही हूँ वरना यहाँ सारे मर्द मेरी अदाओं के गीत गाते हैं, आधा समय वे सहवास में और आधा समय मेरी तारीफ़ में गुजारते हैं....
दीपू- हर आदमी के अपने -अपने विचार होते हैं, जीने का तरीका होता है... मेरा नजरिया इन सबसे अलग है... अच्छा , मुझे राजेश , रवि और रोजा के बारे में जो कहानी सूना रही थीं उनमे से अब कोई जिंदा भी है या फ़िर सब टपक गए ? तुमने तो बस एक का ही काम तमाम किया था न ?
शैली- हाँ, मैंने तो राजेश का ही कत्ल किया था , वो भी इसलिए क्योंकि उसने मेरा जीना हराम कर दिया था... उसने मुझे जीते जी नर्क मर झोंक दिया था... वह अपनी मौज मस्ती और अपने हितों को साधने में मेरा इस्तेमाल करने लगा था... म्मुझे रोजाना नए नए लोगों के सामने परोसने लगा था...
दीपू- क्या उसने तुम्हें वो खेत नहीं दिया , जिसका उसने वादा किया था...
शैली- खेत तो उसने जरूर दिया था मगर वह ऐसा खेत था जिस पर पहले से ही मुकदमा चल रहा था... उसने रजिस्ट्रेशन कराने के बजाय सिर्फ़ एग्रीमेंट बनवा दिया था... हम लोग कानूनी दांव पेच के बारे में कुछ नहीं जानते थे... हमें तो खेत मिलने की खुशी ही इतनी ज्यादा थी की कोई जांच पड़ताल करने का विचार भी मन में नहीं आया... वैसे भी दीपू पर शक करने का कोई मतलब नहीं था...
दीपू जानता था की जब उत्तेजक क्षण होते हैं , तब कोई झूठ नहीं बोलता , वह भी शैली से ऐसे समय सवाल कर रहा था जब उसका बदन कामोत्तेजना की भट्टी में दाहक था, शैली को उसने मजबूती के साथ पकड़ रखा था... दीपू का मजबूत जिस्म इस बात की गवाही दे रहा था की वह रोजाना व्यायाम जरूर करता होगा...
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