Tuesday, November 15, 2011

भाग-४०

जलेबी -४०
जो हम कहलवाना चाहेंगे , क्या आप सिर्फ वही कहेंगी . यह तो जुल्म है हम पर . महा जुल्म है.
नेहा- अच्छा , इधर आइये, इस प्यार को नकद प्यार में बदल देती हूँ, तुम्हारे होठों पर एक गरम सा, मीठा सा चुम्बन ले लेती हूँ. बस , अब तो खुश हुए . वैसे मजा मुझे भी आया है. अब तक मैंने किसी अदद लड़की के होठों का चुम्बन भी नहीं लिया था . आज यह नेक काम भी हो गया तो आनंद की सीमा नहीं है. इतना बेहतर लग रहा है की जी चाहता है अब कभी इन होठों से और कुछ स्पर्श ही न होने दूं. तुम्हारे अधरों का स्पर्श मुझे सदैव याद रहेगा मेरे दिल में तुम्हारा चेहरा बस गया है.
नेहा- अब ज्यादा रोमांटिक होने की जरूरत नहीं है. मेरी टीम के सभी लोग जानते हैं की मैं तम्हारे साथ यहाँ अकेले में मीटिंग कर रही हूँ. इस मीटिंग के फ़ाइनल होने का कई लोग बेसब्री से इन्तजार कर रहे होंगे. देख रहे होंगे की मैं कब उनके पास खश खबरी लेकर पहुंचता हूँ.
राजेश- तुम्हारे लिए खुश खबरी के मायने क्या होते हैं ? मैं भी तो जानूं .
नेहा - सब लोग सोच रहे होंगे की मैं कोई बड़ा सौदा करके पहुँच रही होउंगी . बड़े सौदे का मतलब ये होता है की हम अपने बंधक पुलिसवालों से अपने कुछ साथियों को छुडाने को कहते हैं . तुम्हें भी हमने बंधक बनाया हुआ है. तुम पुलिस वाले बड़े चालाक होते हैं , हम भी कुछ कम नहीं हैं. तुम डाल डाल , तो हम पात -पात . जिस तरह से तुम मेरे ऊपर नजर रखे हुए थे, खुद हमने भी तुम पर पूरा फंदा कसा हुआ था . हमें पता चल गाया था की तुम कुछ न कुछ होंगे जरूर .हाँ, आईपीस अधिकारी होंगे इल्म तो इसका भी नहीं था. ज्यादा से ज्यादा इतना ही अनुमान लगा पाए थे की तुम इंटेलीजेंस के कर्मचारी हो सकते हो. हमको पता नहीं था की हमारे जाल में तुम जैसी बड़ी मछली फंस गयी है. अगर तुम बंधक ही बने रहते तो हमारे लिए इतने अफय्देमंद नहीं हो सकते थे जितने की अब हो रहे हैं. या भविष्य में हो सकते हैं. वो फायदा भी तुम अपनी मर्जी से पहुंचा रहे हो. हमने तो नहीं कहा था की हमारा पुनर्वसन कर दीजिए .अब मुद्दे की बात पर आना जरूरी है. हमारे दो हाजर से ज्यादा सहयोगी जेल में बंद हैं इनमे आधे से ज्यादा तो ऐसे लोग हैं जिनका हमसे सीधा कोई ताल्लुक नहीं हैं, कुछ ऐसे भी हैं जिनको शक के आधार पर गिरफतार किया गाया है. ज्यादातर लोग बेक़सूर हैं. उनको जेल से छुडाना बहुत जरूरी हैं. मानवता के आधार पर उनकी रिहाई की जानी चाहिए .
राजेश- कोई बात नहीं. तुम्हारी सभी मांगों पर बहुत ही शिद्दत के साथ विचार किया जाएगा . तुम्हें इस बारे में चिंता करने की जरूरत ही नहीं है. हम समझते हैं . हमने पहले भी इस तारह के सम्मानजनक समझौते कराये हैं.
नेहा- अब , जब आप हैं तो हमें कुछ सोचने की जरूरत ही क्या हैं. बंधक तो आप अब भी हैं, लेकिन नक्सलियों के नहीं , बल्कि अपने चाहने वाली के दिल में कैद हो गए हो. और इसकी सजा भी सिर्फ उम्र कैद तक सीमित नहीं है बल्कि जब तक हम दोनों जन्म लेते रहेंगे तब तक की बुकिंग करा ली गयी है.
राजेश- ठीक है , मैं भी तो यही चाहता हूँ, खुद मेरी भी यही इच्छा है की हम सदा -सदा साथ-साथ रहें. आंधी आये या तूफ़ान . बस हम -तुम साथ रहने चाहिए . मैंने तुमसे सच्चा प्यार किया है. और तुम्हारी सहमति ने मेरे प्यार के ऊपर मोहर भी लगा दी है, अब कोई ये भी तोहमत नहीं लगा सकता की मैं किसी से इकतरफा प्यार करता था . अब तो यह साबित हो गया की इश्क की यह आग दोनों तरफ लगी हुई है.
नेहा- जी हाँ, यह भी जान लीजिए की इस तरफ यह आग कुछ ज्यादा ही है. अब तक तो बस हम नफरत और बदले की बात ही करते आये थे . आज प्यार की बात कहने का मौक़ा आया है. तो दिल खोलकर तुम्हारे सामने रख देती हूँ. हाँ, ये भी सच है की जब तुम पहली बार स्टॉप पर तुम्हें खडा देखा तो तुम्हारी आँखों में प्यार का सागर उमडता पाया , तुम्हारी आँखों में अपनापन देखा था. मगर मैं मजबूर थी . तुमसे कैसे कहती ? मैं तो नक्सली संगठन से जुडी हुई थी. उस वक्त संगठन में मेरा पद भी बड़ा नहीं था .आज मैं उस मुकाम पर हूँ की जो चाहूँ वो कह सकती हूँ. कर सकती हूँ.

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