Saturday, November 12, 2011

जलेबी -भाग-३९ , यह शुक्रवार अंक के लिए एडवांस है

जलेबी -३९
मेरी सूनी सी दुनिया में चारों तरफ फूल ही फूल खिला दिए हैं, मैं कितने गहरे अन्धकार में जी रही थी. तुम उजाले की किरण नहीं बल्कि उजाले का सूरज बनकर मेरी जिंदगी में आये हो.
राजेश- यह हमारा इस जन्म का नहीं,बल्कि जन्मो -जन्म का रिश्ता है.जब तक हम जन्म लेंगे किसी न किसी रूप में मिलते रहेंगे .यह महज फ़िल्मी डायलोग नहीं , बल्कि ऐसी सच्चाई है , जिसे मैं दिल की गहराइयों से बयाँ कर रहा हूँ. दिल कभी झूठ नहीं बोल सकता . इस तरह के मामले में दिल हमेशा आगे रहता है, इसीलिए तो मैं कहता हूँ कि बिजनेस हमेशा दिमाग से करना चाहिए और मोहब्बत दिल से , मैंने तो दिलो दिमाग से , होशो हवास में तुमसे मोहब्बत की है. और इस प्यार को हम एक मिसाल के तौर पर पेश करेंगे ताकि आने वाली पीढियां भी हमारे सच्चे इश्क का उदाहरण पेश कर सकें.
नेहा- बहुत रोमांटिक हो रहे हो राजेश. देख रही हूँ तुम्हारी हरकतें बढ़ती जा रही हैं. उँगलियाँ भी चाकर घिन्नी खा रही हैं. मैं समझ गयी तुम्हारा मन बहक रहा है. अब मुझे छोड़ दीजिए वरना यहीं पर सुहागरात हो जायेगी . शादी से पहले ही सुहागरात हो जायेगी . अगर ऐसा करोगे तो शादी के लिए क्या बचाकर रखोगे ? फिर कोई रोमांच नहीं रहेगा न .
राजेश- ये सिन्दूर का टीका, ये भांवर , ये सब तो ढकोसले हैं, असली शादी तोदिलों से दिलों का मिलन होता है. हमारा तुम्हारा दिल तो अब मिल ही चुका है. ऍम दोनों बालिग हैं और अपनी मर्जी से साथ -साथ रहने , जीने -मरने की कसम खा रहे हैं. तब हमको रोकने-टोकने वाला कौन है ?
नेहा- कोई और न सही , मगर हम तो हैं न . हमको यह निर्णय लेना है कि लक्ष्मण रेखा पार नहीं करनी है. तुम्हें बस इतनी ही इजाजत है. इससे ज्यादा अगर कुछ करना है तो शादी करनी होगी मेरे साथ . और शादी करने से पहले मुझे समर्पण करना होगा . उसके आबाद अदालत का भी चककर रहेगा . पता नहीं कबतक फ्री हो पाउंगी .
राजेश- तम उसकी फ़िक्र बिलकुल मत करो,मैं सब कुछ बहुत सही तरीके से कर लूंगा . कोई परेशानी नहीं आने दूंगा . सब कुछ ठोस तरीके से किया आजायेगा . जो समझौता पत्र तैयार करेंगे उसके लिएबहुत अनुभवी अधिकारियों की सहायता ली जा रही है. ऐसे अधि़करी जो पहले भी फ्फोलन देवी द्सहित सैकड़ों लोगो के समर्पण का मसौदा तैयार कर चुके हैं.
नेहा- तुम जो भी करोगे , ठीक ही करोगे .इतना भरोसा हो गया है तुम पर .शरीर का समर्पण बाद में पहले तो दिल को समर्पित कर चुकी हूँ.
राजेश- झूठी हो तुम. सिर्फ कहती हो, करती कुछ भी नहीं हो. देखो बना मेरी साँसें कितनी गर्म हैं. मेरी आहों को देखो. मेरी आँखों की पुतलियाँ देखो. मेरी आँखों में अपने लिए लहराता प्यार का समुन्दर तो देखो.
नेहा - मुझे बहकाने से कुछ फायदा होने वाला नहीं है. अप्पने आप पर काबू करेंगे तब न फायदा होगा. भावनाओं को पूरी तरह से कब्जे में कर लीजिए . सुलगते अरमानों को हवा न दीजिए ,. अभी इश्क की इस एजी को बुझा ही रहने दो तो बेहतर होगा राजेश- मंदिर में अगर कोई डिस्को गीत सुअनाये तो अच्काहा नहीं लगता . और रात के समय बार में अगर कोई ओम जय जगदीश हरे सुनाता है तो अटपटा सा लगता है . अब भी अही ओ हो रहा है. मैं तुम्हारे मुख से कुछ प्यार भरी बातें सुनना चाहता हूँ, और तुम हो कि उपदेश दे रही हो. ऐसा कैसा चलेगा ?चलो , मैं ही शुरू करता हूँ. आई लव यू माई डीयर,,,,,
नेहा- आई लव यू टू माय डीअर , मेरी जान. मेरे जाने जिगर. अब तो खुश हो गए न . और कुछ बुलवाना हो तो वह भी बात दीजिए. मैं बोल दूंगी .
राजेश- ये तो ऐसा लगता है जैसे कि हम उधार का प्यार ले रहे हैं. जो हम कहलवाना चाहेंगे , क्या आप सिर्फ वही कहेंगी . यह तो जुल्म है हम पर . महा जुल्म है.
नेहा- अच्छा , इधर आइये, इस प्यार को नकद प्यार में बदल देती हूँ, तुम्हारे होठों पर एक गरम सा, मीठा सा चुम्बन ले लेती हूँ.

No comments: