Monday, September 13, 2010

लवगुरु, भाग-३७ , इसलिए यौन रोगों के मामले में तो यही कहा जा सकता है कि बचाव ही सबसे बड़ा इलाज है. वरना जीवन भर पछताने के अलावा कोई चारा
नहीं रह जाता. मैंने अखबारों में कई पढ़ा है कि एड्स पीड़ित व्यक्ति को किस तरह समाज में भी अपमान सहना पड़ता है . एक तरह से उनको बहिष्कृत कर दिया जाता है.
मुंशीजी- बिलकुल सही बात है , मगर भरोसा भी कोई चीज है, मुझे भरोसा है तुम पर. मेरा दिल कहता है कि किसी तरह की कोई यौन बीमारी न तो तुम्हें होगी और न ही मुझे .
डोली- भरोसा करना एक बात है और होना एक दूसरे बात. जरूरी नहीं कि हम जों सोचती हैं हमेशा वही सच हो.
मुंशीजी- हाँ , बात में दम तो है, इस बात को हम तुम समझ सकते हैं, बचाव भी कर सकते हैं मगर उन लोगों का क्या जिन बेकसूरों से जबरन बलात्कार किया जाता है. अगर
जबरदस्ती करने वाला किसी बीमारी का शिकार है, खासकर एड्स जैसी भयानक बीमारी का , तब क्या होगा ? बेचारी पीड़ित भी इसका शिकार हो जायेगी और उसका जीवन हमेशा के लिए
अंधकारमय हो जाएगा.
डोली- हाँ, औरत का गहना होती है इज्जत. इज्जत महिला के अस्तित्व से भी ज्यादा मायने रखती है. इसकी कीमत सिर्फ एक महिला को ही पता होती है. इज्जत एक शब्द जिस पर महिलाओं का संसार टिका है. अब जरा सोचिए, आपके पुरुखों की सम्पति

या आपका सबसे कीमती सामान कोई चुरा कर ले जाए जिसकी वजह से आप समाज में तुच्छ निगाहों से देखे जाएं तो आप क्या करेंगे. इस पीड़ा का अनुभव तो मात्र एक प्रतिशत भी नहीं उस पीड़ा की जो उस लड़की को होती है जिसके साथ बलात्कार हुआ

हो. बलात्कार किसी भी लड़की के लिए मौत से पहले मौत होती है.हमारे गाँव में रहने वाली एक लड़की के साथ जो हुआ वह मौत से कम नहीं था. पहले तो रानी के साथ उसके शरीर का कुछ वासना के भोगियों ने बलात्कार किया, उसके बाद उस असहाय को

उसके खुद के माता-पिता ने कलंकिनी, कलमुंही जैसे अलंकारिक नाम दिए. कानून के रक्षकों ने उसे इंसाफ दिलाने की बजाय उसे ही दोषी माना और अंत में समाज की चुभती आखों से बचने के लिए उसने आत्महत्या को बेहतर माना.

मुंशीजी -ओह , बेहद दुखद है. बलात्कार जैसे शब्द से ही अनुमान लगता है बलपूर्वक किया गया काम. अक्सर बलात्कार का प्रयोग उस जगह किया जाता है जहां 18 वर्ष से कम आयु की लड़की के साथ जबरदस्ती उसकी इज्जत लूटी जाती है. हालांकि यही

शब्द 18 वर्ष से ऊपर की लडकियों के लिए भी लागू होता है. रेप या बलात्कार एक ऐसा अपराध है जो एक स्त्री के साथ जबरदस्ती या उसकी इजाजत के बिना या कभी इजाजत के बाद भी किया जाए.

भारत की आईपीसी की धारा 375 के अनुसार जब कोई पुरुष किसी स्त्री के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध सम्भोग करता है तो उसे बलात्कार कहते हैं. साथ ही अगर किसी भी कारण से सम्भोग क्रिया पूरी हुई हो या नहीं वह बलात्कार ही कहलायेगा. 15 वर्ष से

कम उम्र की पत्नी के साथ पति द्वारा किया गया सम्भोग भी बलात्कार है.

इस संदर्भ में भारतीय सापेक्ष में एक बात सबसे गौर करने की है शादी के बाद जबरदस्ती शारीरिक संबंध, प्रेमिका के साथ डेट के बहाने शारीरिक संबंध बनाने को भी बलात्कार की श्रेणी में रखा जाता है.
हालांकि यह विषय कोई खास महत्व नहीं रखता लेकिन सामाजिक बीमारी की किसी भी श्रेणी को छोड़ना हमें गवारा नहीं.

बलात्कारी एक ऐसा वहशी बीमार होता है जिसे हर नारी में फिर चाहे वह उसकी मां हो या उसकी बहन, वह 6 माह की बच्ची हो या 60 वर्ष की वृद्धा उसे मात्र अपनी हवश पूरी करने का सामान लगती है. और इस जघन्य कुकर्म को करने के लिए कभी-कभी

तो वह समूह में स्त्री को अपने हवश का शिकार बनाते हैं जिसे कानून सामूहिक बलात्कार कहता है. अब आप ही सोचिए जब किसी को अपनी बहन, मां, बच्चे और वृद्धा में सिर्फ वासना नजर आए तो उसे क्या कहेंगे.

बाजारवाद और पश्चिमी सभ्यता के फैलाव के कारण आए बदलाव ने पुरुष की भोग और वासना को चरम पर पहुंचा दिया है. खुलेपन के इस दौर में जहां हर चीज बिकने के लिए तैयार है, पुरुष को इज्जत भी बिकाऊ चाहिए.

हालांकि ऐसा नहीं है कि बलात्कार आज ही हो रहे हैं, बल्कि हमारे समाज में यह बहुत पहले से विद्यमान थे. जिसकी सबसे बड़ी वजह है पुरुष का अपने पौरुष को दर्शाने के लिए वासना को दर्शाना कि वह कितना उत्तेजक है. अब पुरुष के दिमाग में यह बात

कहां से आई कहा नहीं जा सकता.लेकिन हैरत तो तब होती है जब मुंबई जैसे शहर में भी इस तरह की घटनाएं घटती हैं.

Sunday, September 12, 2010

लवगुरु -३६

मगर इस प्रयास में मुंशीजी खुद ही गर्म हो गए , डोली ने भी मौक़ा देखकर चौका लगाना उचित समझा , और ज्यादा गर्मी लाने के उद्देश्य से डोली ने मुद्दा छेड़ा -
-दुर्भाग्य है कि सेक्स को पाप, पति को परमेश्वर और नारी को नरक का द्वार कहा जाता है। अब सोचो, जब तीनों बातें एक साथ एकत्र होंगी, तो क्या होगा? युद्ध ही होगा और कुछ नहीं। कितनी हैरानी की बात है कि हम उसको युद्ध नहीं बल्कि सात जन्मों का पवित्र बंधन भी कहते हैं। अगर सेक्स पाप है, तो जन्म लेने वाली हर संतान पाप की देन है, अगर वो पाप की देन है तो वो पापमुक्त कैसे हो सकती है? हमने सेक्स को पहले पाप कहा, फिर शादी का बंधन बनाकर उसका परमिट भी बना दिया। हमारी सोच में कितना विरोधाभास है।

हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि विवाह के बाद रिश्तों में खटास क्यों आ जाती है? विवाह के बाद रिश्ते कच्चे धागों की तरह टूटने को लगते हैं? हम ने सेक्स को पाप बना दिया, स्त्री को नरक का द्वार बता दिया और पति को परमेश्वर। बस इसमें उलझकर रह गया मनुष्य। पति को परमेश्वर बताकर हमने ईगो को जन्म दे दिया, मैं को जन्म दे दिया, तानाशाह को जन्म दे दिया। और मनुष्य इससे आगे नहीं निकल पाया। मनुष्य ने पुरुषवादी सोच रखते हुए औरत को सेक्स पूर्ति की मशीन समझा, और औरत ने सेक्स को दमन। सपनों का दमन, रीझों का दमन, उमंगों का दमन। उसको इस रिश्ते से घुटन होने लगी। जब पानी में कड़वाहट आने लगती है तो उसका मीठा स्वाद जाने लगता है। ऐसा ही होने लगता है विवाह के बाद। बस धीरे धीरे रिश्ते पतन की ओर जाने लगते हैं। सेक्स वो अवस्था है यहाँ पर मैं और तू का अर्थ खत्म हो जाता है, लेकिन हमने एक को बड़ा कहकर मैं को जन्म दे दिया। तू नारी है, मैं पुरुष हूँ, जब मैं तू का भेद खत्म हो जाए और जब सब शून्य हो जाए। वो ही सेक्स संपूर्ण है, वरना तो दोनों ही एक दूसरे के लिए सेक्स पूर्ति की मशीनें हैं। इस देश में सेक्स एजुकेशन की नहीं, बल्कि सेक्स के सही अर्थ समझाने की जरूरत है। सेक्स को पाप कहकर खुद को पाप की संतान घोषित करने से उभरना होगा। सेक्स को सही ढंग से परिभाषित करना होगा। सेक्स दो रूहों का वो मिलन है, जो समाधि पर जाकर खत्म होता है। समाधि ईश्वर की ओर लेकर जाती है।
मुंशीजी - क्या बात कही है यार , कहाँ से सीखी ?
डोली- किसी अखबार में पढ़ा था इस बारे में, उसे अपने शब्दों में बयान कर दिया .

मुन्शीजी -सेक्स को पर्दे में डाल दिया, हर कोई उसको देखने के लिए उतावला हो उठा। आपको याद होगा आज से कई साल पहले की फिल्मों में हीरोईनों का ड्रेस सेंस। उनकी नंगी टांगें और बाँहें देखकर कुछ दर्शक तालियाँ बजा उठते थे, और कहते थे थोड़ा सा और दिखाओ, लेकिन आजकल अभिनेत्रियाँ जिस्म की नुमाइश तक लगा देती हैं, कोई देखता नहीं बल्कि कहते हैं कि कुछ कहानी लाओ। कुछ ऐसा ही सेक्स के बारे में। जब सेक्स को हम अच्छी तरह से परिभाषित कर देंगे, तब सेक्स हम को एक शांति और सुकुन की तरफ लेकर जाएगा। जब हमारे जेहन से सेक्स का भूत निकल जाएगा, तब महिलाएं आराम से घूम पाएंगी, उनको कोई भय न होगा। हमने दिमागों में तो सेक्स भर रखा है, लेकिन विरोधी बने घूम रहें हैं सेक्स के। महिला को देखते ही सबसे पहले पुरुष की निगाह उसकी उभरी हुई छाती पर जाती है क्यों?
आखिर वासना इस कदर कूट-कूट कर समाज में फैल चुकी है कि हमें एड्स और अन्य यौन रोगो की रोकथाम का दूसरा रास्ता सूझता ही नहीं. हम यह क्यों नहीं सोचते कि यदि अनैतिक यौन संबंध बनेंगे ही नहीं और सेक्स पर मनुष्य काबू रखेगा तो कंडोम की जरुरत ही नहीं पड़ेगी. आज ज्यादातर लड़कों की दो या उससे ज्यादा प्रेमिका होती ही हैं. लडकियां भी आज सेक्स संबंध बनाने में लड़कों से किसी तरह पीछे नहीं हैं. ऐसे में रिजल्ट तो बुरा होना ही है.
लाइए , अब कंडोम निकालिए , फिर बात करते हैं ....
डोली- देती हूँ, मगर क्या कभी सोचा है कि कंडोम से कई बार रिसाव और फटने आदि की स्थिति में यौन रोगों से सुरक्षा नहीं मिलती और कई बार लोग दुकानों से कंडोम खरीदने में सकोच भी करते हैं.

लेकिन हर समस्या का समाधान होता है. सेल्फ-कंट्रोल और नैतिकता एक ऐसी दवा है जिससे आप सौ प्रतिशत यौन रोगों से बच सकते हैं. अपने साथी के प्रति विश्वास और वासना पर काबू रखना हर मनुष्य को बेहतर जिंदगी की तरफ ले जा सकता है.

यह चीज समझने वाली है कि सेक्स और वासना का आनंद एक तय उम्र सीमा तक ही आप उठा सकते हैं, उसके बाद आपका अंतर्मन आपसे कई सवाल करेगा. इन सवालों को आप आत्मविश्वास के सहारे ही झेल सकते हैं.

अपने साथी के प्रति ही वफादार रहें, जितना हो सके संयम अपनाएं और याद रखें एड्स से बचना है तो कंडोम ही एक मात्र साधन नहीं है. ऐसे हालात ही क्यों आने दें कि मन में डर या ग्लानि का छोटा सा भी भाव आए.

Thursday, September 9, 2010

लवगुरु , ३४

मुंशीजी जबसे डोली से मिले थे, तभी से सिर्फ रोमांस और सेक्स की दुनिया में खोये हुए थे. किसी ने सच ही कहा है कि जों जैसी संगत में रहता है , उस पर वैसा असर होना स्वभाविक है. हाँ, चन्दन जैसे उदाहरण जरूर अपवाद हो सकते हैं. उससे कितने ही सांप लटके रहते हैं , मगर चन्दन कभी अपनी शीतलता नहीं छोडता , मगर हर पद तो चन्दन नहीं हो सकता. उस दोपहर मुंशीजी और डोली ने एक बार जिस्मानी रिश्ता बनाया , और इसके बाद वे मार्केट घूमने गए, खूब जमकर खरीदारी की गयी. रात के समय डोली ने मुंशीजी को एक दो नहीं पूरे चार पैग पीला दिए. पीते ही मुंशीजी भाषण देने लगे-

-प्यार शायद दुनिया के सभी प्राणियों को कुदरत की तरफ से दिया गया सबसे बेहतरीन तोहफा है। यही जीवन में रंग भरता है और जीवन तथा इस सृष्टि की निरंतरता को बनाए रखता है। शायद इसी वजह से प्राचीन परंपराओं में इसे जीवन के चार अहम उद्देश्य धर्म, अर्थ और मोक्ष के साथ काम के रूप में अहमियत दी गई है। प्राचीन हिन्दू धर्म जीवन में आने वाले इस आनंद की अनुभूति को उतना ही अहम मानता है, जितना कि ज्ञान की तलाश को।

सेक्स को हम महज यौन क्रिया से नहीं जोड़ सके। यह दोनों लोगों के बीच गहरी आत्मीयता से पैदा होता है। जब दो लोग एक-दूसरे की परवाह करते हैं। जब हमारा शरीर, मन और आत्मा एक हो जाते हैं। यह तभी संभव होता है जब हम सामने वाले की भावनाओं की कद्र करना सीखते हैं।

सेक्स में प्यार की अहम भूमिका है। सबसे पहले एक शारीरिक क्रिया होने के नाते इसका हमारे शरीर से गहरा नाता है। महिलाओं में यौन क्रिया आक्सीटॉनिक को शरीर में प्रवाहित करती है। यह आक्सीटॉनिक उनके भीतर स्नेह और सेवा की भावना को मजबूत करता है। इतना ही नहीं यौन क्रिया हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है

सिर्फ शरीर नहीं मन से भी सेक्स का गहरा रिश्ता है। एक स्वस्थ सेक्स जीवन किसी भी स्त्री अथवा पुरुष के भीतर शांति और प्रसन्नता की भावना पैदा करता है। यह उनके आपसी रिश्तों को मजबूत करता है। यह प्रसन्नता की भावना उनके लिए लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन का सबब भी बनती है।

प्यार किसी भी दंपति के लिए आनंद का सबब बनते हैं। मगर दांपत्य जीवन में प्यार का मतलब सिर्फ सेक्स से नहीं जोड़ना चाहिए। कई बार विभिन्न वजहों से आपके साथी में सेक्स के प्रति अनिच्छा भी पैदा हो सकती है। ऐसी स्थिति में हमें उसकी वजह को जानने और उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए। यदि पार्टनर की इच्छा न हो तो सेक्स को कभी उस पर थोपने की कोशिश नहीं करनी चाहिए बल्कि उसकी दिक्कतों को शेयर करते हुए उससे सहानुभूति का बर्ताव करना चाहिए।

तो डोली डार्लिंग , याद रखिए... सेक्स आपके जीवन का एक अहम हिस्सा तभी बनेगा जब आप उसे प्यार की ऊर्जा से सराबोर रखेंगे। तभी आप एक स्वस्थ सेक्स जीवन, बेहतर संबंधों और मजबूत होते रिश्तों की तरफ बढ़ सकेंगे।
डोली-वाह क्या स्पीच है , मजा आ गया . काफी कुछ जानते हैं प्यार के बारे में . तब तो किसी से किया जरूर होगा , बताओं न .
मुंशीजी- प्यार ? हाँ,. नहीं... अरे उसे क्या प्यार कहेंगे , वो तो इकतरफा प्यार था. उसे छोडिये , तुम कुछ सुनाइये
डोली- प्यार तो जीवन में हर कोई करता है, मैंने भी किया है , लेकिन अभी यह शुरुआत में है. जानना चाहते हो, वो कौन है , जिसे मैं जी जान से प्यार करती हूँ, उसकी एक अदा पर अपनी जान न्यौछावर कर सकती हूँ,
मुंशीजी- हाँ, हाँ ... बोलो न, अच्छा लगेगा मुझे ,मैं बुरा नहीं मानूंगा . बिंदास बोलो न. मैं जानना चाहूँगा उसका नाम
डोली- दिल थाम कर बैठिये, मैं जानती हूँ आपका दिल बहुत धड़क रहा होगा ., वो आप हैं मुंशीजी, और कौन हो सकता है ? आप ही वो हैं , जिन पर मेरा रोंया -रोंया मरता है.
मुंशीजी - ओह गोड .. मैं तो सचमुच डर गया था. कितना खुशनसीब हूँ मैं.
डोली- आअज आपने मुझे जितनी मंहगी साडियां दिलवाई हैं, उतनी तो शायद वो भी नहीं दिलवाता, जिससे घरवाले मेरी शादी करते. मेरे कहने से आज शराब भी पीली. मैंने एक फिल्म में देखा था , अरे हाँ, फिल्म से याद आया, आपने कभी ब्लू फिल्म देखी है ?
मुंशीजी -हाँ, कई बार देखी है, वेटर से पूछता हूँ, शायद यहाँ भी होगी, दिखाता हूँ तुम्हें , खूब मजा आएगा.










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लवगुरु , ३४

Tuesday, September 7, 2010

lav guru bhag-32

लवगुरु
मुंशीजी एक अजीब समस्या के शिकार हो गए, पहले तो उनको सिर्फ यही लगा था कि वे डोली के साथ एक रात मौज मस्ती करेंगे. इतनी खूबसूरत युवती के साथ
रंगरेलियां मनाने के एवज में अगर दस बीस हजार खर्च भी हो जाते हैं तो कौन सा फर्क पड़ता है. दौलत तो उन्होंने खूब कमाकर रखी थे, अब तो उन्हें शारीरिक तृप्ति
की जरूरत थी, वे जिस्मानी सुख संतुष्टि पाने के लिए ही तो अपने पडौस में रहने वाली छबीली पर फ़िदा हुए थे . मगर वह कोरी, कुंवारी कली थी, उसकी उम्र बहुत कम
थी और उनके यहाँ पर प्रचलन था कि कोई कितना गरीब क्यों न हो लेकिन वह अपनी बेटी की शादी बराबर की उम्र के लड़के के साथ करता था . चाहे कितने भी गरीब
घर में क्यों न करे, इसलिए राजी खुशी तो मुंशीजी को लगता नहीं था कि छबीली का पिता उनकी शादी उसके साथ करेगा. इसीलिए वे चाहते थे कि लवगुरु से मिलकर
छबीली को पटाने की कला सीख्लें. इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर वे यहाँ आये थे, लवगुरु से मिले भी . लवगुरु का आदेश हुआ कि आज रात जों सपना वे देखते हैं वे अक्षरशः
वे अगले दिन लवगुरु को बताएं , तब वे किसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे और उसे टिप्स देंगे. होटल आने पर मुंशीजी को वेटर ने हसीनों के दर्शन कर लिए और एक रात के लिए
उन्होंने डोली को हायर कर लिया . डोली के साथ जिस्मानी सम्बन्ध बनाने के बाद मुंशीजी उसके दीवाने हो गए, उनको छबीली का ध्यान भी नहीं रहा. वे डोली के मादक यौवन पर इतने
मोहित हुए कि उसे हमेशा के लिए अपना जीवन साथी बनाने का फैसला कर लिया. वे नहीं जानते थे कि डोली उस शहर की टॉप लेबल की वैश्या थी . उसकी अदाओं के जलवों
में अच्छे -अच्छे धनिक शिकार हो जाया करते थे. काम क्रीडा के दौरान वह इतनी ज्यादा कामुक बातें करती थी कि सामने वाला सब कुछ भूलकर उसका गुलाम हो जाता था
, मुन्शीजी को भी कुछ याद नहीं था, वे अपनी मेहनत की कमाई को खर्च कर डोली को पाना चाहते थे. सुहागरात मानाने के बाद लवगुरु ने पहला काम ये किया कि डोली को
अगले दिन रात के लिए बुक किया और फिर साथ-साथ खाना खाने के बाद वे आराम से सो गए . अगली दोपहर मुंशीजी ने डोली के साथ ही स्नान किया , उसके साथ ही नाश्ता किया
और फिर साथ -साथ टीवी देखा, इस समय डोली ने मुंशीजी की जाँघों पर अपना सिर रखा हुआ था . मुंशीजी ने अपने होठ डोली के नाजुक होठों पर रख दिया. डोली के शरीर में
गर्मी का संचार होने लगा. उसका जिस्म वासना की भट्टी में तपने लगा था. मुंशीजी का संवेदनशील अंग धीरे-धीरे जाग्रत हो रहा था. मुंशीजी अब सभी फार्मूले इस्तेमाल कर रहे थे .
लवगुरु ने उन्हें चुम्बन से पहले कोलगेट प्लाक्स से कुल्ला करने की नसीहतदी थी. लवगुरु ने उस पर अमल भी किया. अब उनकी साँसें महक रही थीं. डोली को भी खूब आनंद आ रहा
था. मुंशीजी ने लवगुरु की बातों को पूरी तरह से आत्मसात कर लिया था . डोली कह रही थी-
- ऐसा लगता है , जैसे कि हमारा यहसम्बन्ध आज का नहीं, बरसों बल्कि कहिये कि सदियों पुराना है. क्या फिल्मों की तरह हम किसी पुराने जन्म के बिछड़े हुए प्रेमी-प्रेमिका हैं ?
मुंशीजी- हाँ, मगर मुझे ऐसा एहसास होता है जैसे कि कभी हम बिछड़े ही नहीं, बल्कि हमेशा साथ-साथ रहे. तुम मेरी आत्मा में बसी रहीं और मैं न जाने कहाँ -कहाँ ढूँढता रहा ,
ठीक उसी तरह जैसे कस्तूरी मृग की नाभि में होती है , और वह उसकी महक पाकर उसे पाना चाहता है, इसलिए जंगल दर जंगल भटकता रहता है .
डोली- अगर आप ना आते तो मेरा जीवन बेकार चला जाता .
मुंशीजी- मैं ऐसा कैसे होने देता, जब हमारे मुकद्दर में मिलन लिखा है, मोहब्बत लिखी है तो कोई बुराई , कोई व्यवधान हमारा -तुम्हारा क्या बिगाड़ सकता है ?
डोली- आज की रात आपने मुझे बहुत सुख दिया है . आज से पहले मैं ऐसे किसी सुख से अनजान थी, कभी नहीं जान पाई कि जिस्मों का मिलन इतना सुन्दर भी हो सकता है .
हांलाकि मैं पहले तो डर रही थियो, सोचती थी कि पता नहीं आप किस तरह का वयवहार करेंगे , डरती थी कि ऐसा न हो कहीं दर्द के मारे मेरा दम ही निकल जाए , मगर आपसे मिलकर
मेरा सारा डर समाप्त हो गया. अब तो आनंद ही आनंद है . आपका यह काला नाग मुझे पहले जितना डरा रहा था , अब उतना ही रोमांचित कर रहा है .
मुंशीजी- यह मेरा पहला अनुभव था , इससे पहले मैंने कभी किसी महिला के साथ न तो रोमांस किया और न ही सेक्स किया .
डोली- हम दोनों का यह पहला ही अवसर था. दोनों ही खुश हुए .
मुंशीजी- मैंउस मीठी रात को कभी नहीं भूल पाउँगा , मरनेके बाद भी वह छवि मेरी आँखों में बसी रहेगी.
डोली- अब तो हर रात सुहागरात होगेई, मैं आज की रात आपको कल रात से भी ज्यादा सुख दूंगी .




lav guru bhag-32

लवगुरु
मुंशीजी एक अजीब समस्या के शिकार हो गए, पहले तो उनको सिर्फ यही लगा था कि वे डोली के साथ एक रात मौज मस्ती करेंगे. इतनी खूबसूरत युवती के साथ
रंगरेलियां मनाने के एवज में अगर दस बीस हजार खर्च भी हो जाते हैं तो कौन सा फर्क पड़ता है. दौलत तो उन्होंने खूब कमाकर रखी थे, अब तो उन्हें शारीरिक तृप्ति
की जरूरत थी, वे जिस्मानी सुख संतुष्टि पाने के लिए ही तो अपने पडौस में रहने वाली छबीली पर फ़िदा हुए थे . मगर वह कोरी, कुंवारी कली थी, उसकी उम्र बहुत कम
थी और उनके यहाँ पर प्रचलन था कि कोई कितना गरीब क्यों न हो लेकिन वह अपनी बेटी की शादी बराबर की उम्र के लड़के के साथ करता था . चाहे कितने भी गरीब
घर में क्यों न करे, इसलिए राजी खुशी तो मुंशीजी को लगता नहीं था कि छबीली का पिता उनकी शादी उसके साथ करेगा. इसीलिए वे चाहते थे कि लवगुरु से मिलकर
छबीली को पटाने की कला सीख्लें. इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर वे यहाँ आये थे, लवगुरु से मिले भी . लवगुरु का आदेश हुआ कि आज रात जों सपना वे देखते हैं वे अक्षरशः
वे अगले दिन लवगुरु को बताएं , तब वे किसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे और उसे टिप्स देंगे. होटल आने पर मुंशीजी को वेटर ने हसीनों के दर्शन कर लिए और एक रात के लिए
उन्होंने डोली को हायर कर लिया . डोली के साथ जिस्मानी सम्बन्ध बनाने के बाद मुंशीजी उसके दीवाने हो गए, उनको छबीली का ध्यान भी नहीं रहा. वे डोली के मादक यौवन पर इतने
मोहित हुए कि उसे हमेशा के लिए अपना जीवन साथी बनाने का फैसला कर लिया. वे नहीं जानते थे कि डोली उस शहर की टॉप लेबल की वैश्या थी . उसकी अदाओं के जलवों
में अच्छे -अच्छे धनिक शिकार हो जाया करते थे. काम क्रीडा के दौरान वह इतनी ज्यादा कामुक बातें करती थी कि सामने वाला सब कुछ भूलकर उसका गुलाम हो जाता था
, मुन्शीजी को भी कुछ याद नहीं था, वे अपनी मेहनत की कमाई को खर्च कर डोली को पाना चाहते थे. सुहागरात मानाने के बाद लवगुरु ने पहला काम ये किया कि डोली को
अगले दिन रात के लिए बुक किया और फिर साथ-साथ खाना खाने के बाद वे आराम से सो गए . अगली दोपहर मुंशीजी ने डोली के साथ ही स्नान किया , उसके साथ ही नाश्ता किया
और फिर साथ -साथ टीवी देखा, इस समय डोली ने मुंशीजी की जाँघों पर अपना सिर रखा हुआ था . मुंशीजी ने अपने होठ डोली के नाजुक होठों पर रख दिया. डोली के शरीर में
गर्मी का संचार होने लगा. उसका जिस्म वासना की भट्टी में तपने लगा था. मुंशीजी का संवेदनशील अंग धीरे-धीरे जाग्रत हो रहा था. मुंशीजी अब सभी फार्मूले इस्तेमाल कर रहे थे .
लवगुरु ने उन्हें चुम्बन से पहले कोलगेट प्लाक्स से कुल्ला करने की नसीहतदी थी. लवगुरु ने उस पर अमल भी किया. अब उनकी साँसें महक रही थीं. डोली को भी खूब आनंद आ रहा
था. मुंशीजी ने लवगुरु की बातों को पूरी तरह से आत्मसात कर लिया था . डोली कह रही थी-
- ऐसा लगता है , जैसे कि हमारा यहसम्बन्ध आज का नहीं, बरसों बल्कि कहिये कि सदियों पुराना है. क्या फिल्मों की तरह हम किसी पुराने जन्म के बिछड़े हुए प्रेमी-प्रेमिका हैं ?
मुंशीजी- हाँ, मगर मुझे ऐसा एहसास होता है जैसे कि कभी हम बिछड़े ही नहीं, बल्कि हमेशा साथ-साथ रहे. तुम मेरी आत्मा में बसी रहीं और मैं न जाने कहाँ -कहाँ ढूँढता रहा ,
ठीक उसी तरह जैसे कस्तूरी मृग की नाभि में होती है , और वह उसकी महक पाकर उसे पाना चाहता है, इसलिए जंगल दर जंगल भटकता रहता है .
डोली- अगर आप ना आते तो मेरा जीवन बेकार चला जाता .
मुंशीजी- मैं ऐसा कैसे होने देता, जब हमारे मुकद्दर में मिलन लिखा है, मोहब्बत लिखी है तो कोई बुराई , कोई व्यवधान हमारा -तुम्हारा क्या बिगाड़ सकता है ?
डोली- आज की रात आपने मुझे बहुत सुख दिया है . आज से पहले मैं ऐसे किसी सुख से अनजान थी, कभी नहीं जान पाई कि जिस्मों का मिलन इतना सुन्दर भी हो सकता है .
हांलाकि मैं पहले तो डर रही थियो, सोचती थी कि पता नहीं आप किस तरह का वयवहार करेंगे , डरती थी कि ऐसा न हो कहीं दर्द के मारे मेरा दम ही निकल जाए , मगर आपसे मिलकर
मेरा सारा डर समाप्त हो गया. अब तो आनंद ही आनंद है . आपका यह काला नाग मुझे पहले जितना डरा रहा था , अब उतना ही रोमांचित कर रहा है .
मुंशीजी- यह मेरा पहला अनुभव था , इससे पहले मैंने कभी किसी महिला के साथ न तो रोमांस किया और न ही सेक्स किया .
डोली- हम दोनों का यह पहला ही अवसर था. दोनों ही खुश हुए .
मुंशीजी- मैंउस मीठी रात को कभी नहीं भूल पाउँगा , मरनेके बाद भी वह छवि मेरी आँखों में बसी रहेगी.
डोली- अब तो हर रात सुहागरात होगेई, मैं आज की रात आपको कल रात से भी ज्यादा सुख दूंगी .




lav guru bhag-32

लवगुरु
मुंशीजी एक अजीब समस्या के शिकार हो गए, पहले तो उनको सिर्फ यही लगा था कि वे डोली के साथ एक रात मौज मस्ती करेंगे. इतनी खूबसूरत युवती के साथ
रंगरेलियां मनाने के एवज में अगर दस बीस हजार खर्च भी हो जाते हैं तो कौन सा फर्क पड़ता है. दौलत तो उन्होंने खूब कमाकर रखी थे, अब तो उन्हें शारीरिक तृप्ति
की जरूरत थी, वे जिस्मानी सुख संतुष्टि पाने के लिए ही तो अपने पडौस में रहने वाली छबीली पर फ़िदा हुए थे . मगर वह कोरी, कुंवारी कली थी, उसकी उम्र बहुत कम
थी और उनके यहाँ पर प्रचलन था कि कोई कितना गरीब क्यों न हो लेकिन वह अपनी बेटी की शादी बराबर की उम्र के लड़के के साथ करता था . चाहे कितने भी गरीब
घर में क्यों न करे, इसलिए राजी खुशी तो मुंशीजी को लगता नहीं था कि छबीली का पिता उनकी शादी उसके साथ करेगा. इसीलिए वे चाहते थे कि लवगुरु से मिलकर
छबीली को पटाने की कला सीख्लें. इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर वे यहाँ आये थे, लवगुरु से मिले भी . लवगुरु का आदेश हुआ कि आज रात जों सपना वे देखते हैं वे अक्षरशः
वे अगले दिन लवगुरु को बताएं , तब वे किसी निष्कर्ष पर पहुंचेंगे और उसे टिप्स देंगे. होटल आने पर मुंशीजी को वेटर ने हसीनों के दर्शन कर लिए और एक रात के लिए
उन्होंने डोली को हायर कर लिया . डोली के साथ जिस्मानी सम्बन्ध बनाने के बाद मुंशीजी उसके दीवाने हो गए, उनको छबीली का ध्यान भी नहीं रहा. वे डोली के मादक यौवन पर इतने
मोहित हुए कि उसे हमेशा के लिए अपना जीवन साथी बनाने का फैसला कर लिया. वे नहीं जानते थे कि डोली उस शहर की टॉप लेबल की वैश्या थी . उसकी अदाओं के जलवों
में अच्छे -अच्छे धनिक शिकार हो जाया करते थे. काम क्रीडा के दौरान वह इतनी ज्यादा कामुक बातें करती थी कि सामने वाला सब कुछ भूलकर उसका गुलाम हो जाता था
, मुन्शीजी को भी कुछ याद नहीं था, वे अपनी मेहनत की कमाई को खर्च कर डोली को पाना चाहते थे. सुहागरात मानाने के बाद लवगुरु ने पहला काम ये किया कि डोली को
अगले दिन रात के लिए बुक किया और फिर साथ-साथ खाना खाने के बाद वे आराम से सो गए . अगली दोपहर मुंशीजी ने डोली के साथ ही स्नान किया , उसके साथ ही नाश्ता किया
और फिर साथ -साथ टीवी देखा, इस समय डोली ने मुंशीजी की जाँघों पर अपना सिर रखा हुआ था . मुंशीजी ने अपने होठ डोली के नाजुक होठों पर रख दिया. डोली के शरीर में
गर्मी का संचार होने लगा. उसका जिस्म वासना की भट्टी में तपने लगा था. मुंशीजी का संवेदनशील अंग धीरे-धीरे जाग्रत हो रहा था. मुंशीजी अब सभी फार्मूले इस्तेमाल कर रहे थे .
लवगुरु ने उन्हें चुम्बन से पहले कोलगेट प्लाक्स से कुल्ला करने की नसीहतदी थी. लवगुरु ने उस पर अमल भी किया. अब उनकी साँसें महक रही थीं. डोली को भी खूब आनंद आ रहा
था. मुंशीजी ने लवगुरु की बातों को पूरी तरह से आत्मसात कर लिया था . डोली कह रही थी-
- ऐसा लगता है , जैसे कि हमारा यहसम्बन्ध आज का नहीं, बरसों बल्कि कहिये कि सदियों पुराना है. क्या फिल्मों की तरह हम किसी पुराने जन्म के बिछड़े हुए प्रेमी-प्रेमिका हैं ?
मुंशीजी- हाँ, मगर मुझे ऐसा एहसास होता है जैसे कि कभी हम बिछड़े ही नहीं, बल्कि हमेशा साथ-साथ रहे. तुम मेरी आत्मा में बसी रहीं और मैं न जाने कहाँ -कहाँ ढूँढता रहा ,
ठीक उसी तरह जैसे कस्तूरी मृग की नाभि में होती है , और वह उसकी महक पाकर उसे पाना चाहता है, इसलिए जंगल दर जंगल भटकता रहता है .
डोली- अगर आप ना आते तो मेरा जीवन बेकार चला जाता .
मुंशीजी- मैं ऐसा कैसे होने देता, जब हमारे मुकद्दर में मिलन लिखा है, मोहब्बत लिखी है तो कोई बुराई , कोई व्यवधान हमारा -तुम्हारा क्या बिगाड़ सकता है ?
डोली- आज की रात आपने मुझे बहुत सुख दिया है . आज से पहले मैं ऐसे किसी सुख से अनजान थी, कभी नहीं जान पाई कि जिस्मों का मिलन इतना सुन्दर भी हो सकता है .
हांलाकि मैं पहले तो डर रही थियो, सोचती थी कि पता नहीं आप किस तरह का वयवहार करेंगे , डरती थी कि ऐसा न हो कहीं दर्द के मारे मेरा दम ही निकल जाए , मगर आपसे मिलकर
मेरा सारा डर समाप्त हो गया. अब तो आनंद ही आनंद है . आपका यह काला नाग मुझे पहले जितना डरा रहा था , अब उतना ही रोमांचित कर रहा है .
मुंशीजी- यह मेरा पहला अनुभव था , इससे पहले मैंने कभी किसी महिला के साथ न तो रोमांस किया और न ही सेक्स किया .
डोली- हम दोनों का यह पहला ही अवसर था. दोनों ही खुश हुए .
मुंशीजी- मैंउस मीठी रात को कभी नहीं भूल पाउँगा , मरनेके बाद भी वह छवि मेरी आँखों में बसी रहेगी.
डोली- अब तो हर रात सुहागरात होगेई, मैं आज की रात आपको कल रात से भी ज्यादा सुख दूंगी .