काश, हम लोग पहले मिले होते तो इस तरह का सुख तब भी भोग सकते थे, मगर राज की एक बात यह भी है की यह सुख अभी कुछ नहीं है, शुरुआत भर है , जब यहाँ से आगे बधोगी तो पता चलेगा की प्रणय क्रीडा का असली आनंद क्या होता है ? जानोगी वो खेल ?
स्वीटी- अब , जबकि तुमसे दोस्ती हो गयी है, प्यार हो गया है तो जो कुछ भी कहोगे, वही सुनूंगी और वही मानूंगी। अब मैंने यह प्राण कर लिया है की मोहब्बत के इस सफर में कभी अकेली नहीं चलूंगी, कोई दूसरा हमसफ़र भी मेरे साथ नहीं होगा । जीवन का यह सफर बिन तुम्हारे अधूरा है। साथ- साथ चलेंगे , साथ -साथ रुकेंगे । जो भी होगा वह तुम्हारी मर्जी से होगा,समझे ।
राज - वाह। कैसी किस्मत लिखवाकर लाया हूँ मैं। जी चाहता है तुम्हें अपने जिस्म में समा लूँ और फ़िर हमेशा के लिए तुम्हें अपने दिल में कैद करके रख लूँ।
स्वीटी- तो इससे इनकार किसको है। जो भी जी चाहता है वह करो। मेरी तरफ़ से तुम्हें सहयोग ही मिलेगा ।मैंने सब कुछ अब तुम पर ही छोड़ दिया है। तुम फैसला करो । जो भी करना वह सोच समझ कर करना क्योंकि मैं तो तुम्हारे प्यार में मद होश हो चुकी हूँ , मुझे कुछ भी ध्यान या ज्ञान नहीं है।
राज- और मेरे दिल का हाल समाजः रही हो , मुझे कुछ नहीं मालूम की तुमसे इतनी बातें कर कैसे रहा हूँ, वो कौन सी शक्ति है जो मुझे तुमसे बात करने के लिए प्रेरित कर रही है। शायद तुम्हारे प्रेम की ताकत की वजह से यह सब हो रहा है । कोई बात नहीं , जब तुमने सब कुछ मेरे ऊपर सब कुछ छोड़ा है तो फ़िर मैं सही फैसला ही करूँगा।
स्वीटी- तुम कितने अच्छे हो । मेरे सबसे प्रिय हीरो तुम ही तो हो ।
राज- तो फ़िर मुझे कभी भी अकेला तो नहीं छोडोगी । अपना बनाकर कभी दिल तो नहीं तोडोगी?
स्वीटी- नहीं मेरे राज, मैं हरगिज ऐसा नहीं कर सकती। तुम्हारी खातिर मैं किसी भी गम से दो चार होने को तैयार हूँ, किसी भी दुःख तकलीफ से टकराने के लिए तैयार हूँ। मैं कभी तुम्हें दुखी नहीं देख सकती, दुःख देने की बात तो अलग है।
राज भावुक हो गया। उसने स्वीटी को मजबूती से जकड़कर एक झाडी के अन्दर कर लिया। यह घनी झाडी थी और इसके अन्दर जाने पर बाहर से कुछ दिखाई ही नहीं देता था, इसीका फायदा उठाकर वहाँ पर प्रेमी जोड़े अक्सर अपने जिस्म की प्यास बुझाया करते थे। यह पार्क इसी तरह का था। यहाँ पर लड़के -लड़कियां आकर अपने दिल की बातें एक दूसरे को बताया करते थे। राज भी यहाँ पर अपने किसी ऐसे दोस्त के साथ आया था जो अपनी महबूबा को साथ लेकर आया था। अब वह उसी का इन्तजार कर रहा था की अपनी सहेली का इन्तजार करती हई स्वीटी उसे मिल गयी। बातचीत करते-करते वे दोनों पार्क के अन्दर चले गए और फ़िर दोनों की जुबान पर प्यार के शब्द नाचने लगे। आखिरकार दिल की बातें बाहर आ गयीं और वे दोनों एक जिस्म दो जान बन्ने की राह पर अग्रसर होने लगे। दोनों खूबसूरत , नौजवान थे और दोनों ही इस वक्त एक झाडी के अन्दर अकेले थे । ऐसे समय पर तो वैसे भी काम्भाव्नाएं भड़क उठती हैं। राज और स्वीटी के दिल में भी गज़ब की आग भड़क उठी थी , उसे पता ही नहीं था की यह हो क्या रहा है । स्वीटी बार- बार गर्म आहें भर रही थी। राज ने उसके संवेदनशील अंग पर जब अपने होठ का स्पर्श किया तो स्वीटी के तन मन की ज्वाला और भी भड़क उठी । वह कहने लगी-
-यह क्या कर रही हो मेरी जान। क्या मार डालने का इरादा है ? मेरा तन- मन जल रहा है। भूचाल सा आया हुआ है। क्या इस अग्नि को शांत करने का दूसरा कोई कोई तरीका है क्या ?
राज - दूसरा तरीका , मैं समझा नहीं । आख़िर यह आग तो एक ही रास्ते से बुझाई जा सकती है।
स्वीटी- नहीं मेरी जान , दूसरा रास्ता तो निकालना ही होगा। इसके बिना काम नहीं चलेगा।
राज - मगर पहले तो तुमको कोई ऐतराज नहीं था, अब अचानक यह क्या हो गया ?
स्वीटी- मैं सोच रही थी की इस तरह से सम्बन्ध बनाना ठीक नहीं होगा, हामारे पास सुरक्षा का कोई उपाय जो नहीं है। अब तो मैं यही चाहती हूँ की कोई सादा सा उपाय मिल जाए तो हम दोनों ही इस अपराध से बच जाएँ ।
राज- अपराध ? किस अपराध की बात कर रही हैं आप ? प्रेम करते हैं हम दोनों। एक दूसरे से मोहब्बत करना कोई पाप तो नहीं ? अगर हम लोग एक दूसरे के जिस्म से सत्कार कोई सुख हासिल कर सकते हैं तो ऐतराज क्या है , दिक्कत क्या है ?
स्वीटी- दुनिया नहीं समझती यह सब ? और बीमारी भी नहीं समझ पाती । जिसे लगनी होती है , लग ही जाती है।
Saturday, November 7, 2009
Friday, November 6, 2009
मोहब्बत के मसीहा , भाग-9
दिल जोर जोर से धड़कने लगा। ऐसा लगता था जैसे उसके जिस्म में किसीने भट्टी सुलगा दी हो। वह इस तरह से तड़प रही थी जैसे किसी मछली को पानी से अलग कर दिया गया हो। जल बिन मछली जैसे अकेलापन और दर्द महसूस करती है वैसे ही स्वीटी कर रही थी। राज उसके नर्म और रसीले होठों को चूसने के बाद कह रहा था-
- बहुत सुकून महसूस रहा है, ऐसा लगता है जैसे सारी दुनिया के सुख यही सिमट गए हैं। सारी दुनिया का आनंद तुम्हारे दामन में सिमट आया है। इस सुन्दरताकी जितनी तारीफ़ करुँ वो कम ही है। तुम विश्व की सबसे अच्छी और सच्ची लड़की हो, तुम्हें पाकर मेरे तन और मन प्रफुल्लित हैं। आज की यह मुलाक़ात संयोग से ही हो पाई है। मैं इस संयोग को सलाम करता हूँ। जानता हूँ की मोहब्बत ही दुनिया की सबसे ख़ास चीज है। इसके बिना कहीं कुछ नहीं है। प्यार ही एक ऐसा तौहफा है जो हर किसीको नसीब नहीं होता।
स्वीटी- कितनी मीठी बात कर रहे हो तुम। पहले तो हमेशा अलग थलग रहते थे और कटे -कटे से रहते थे , अब जाना की कितने रसिक हो तुम। मैं तुम जैसा दोस्त पाकर अभिभूत हूँ। वैसे तो मेरे सैकडों जानकार हैं मगर तुम जैसा प्यारा मित्र कहाँ मिलेगा ? तुम तो हीरो से भी खूबसूरत हो। फ़िल्म के हीरो भी चाय कम पानी हैं।
राज - आप भी तो सबसे अलग है। लाखों करोड़ों में एक हैं। आपका चेहरा देखते ही मन के अन्दर फुल्झादियाँ फूटने लगती हैं।
स्वीटी- मैं बहुत खुश हूँ। तुमसे मिलकर बहुत आनंद मिल रहा है।
राज- अगर बुरा ना मानो तो मैं जीवन का असली सुख देने की कोशिश करता हूँ। यह एक ऐसा सुख है की जिसे पाये बिना अमरत्व प्राप्त नहीं होता है। इसे पाते ही जीवन सफल हो जाता है। धन्य हो जाता है।
स्वीटी- आह, कितना जादू है तुम्हारे शब्दों में । कितना सुखद है यह सब।
राज- जादू तो तुम्हारे जिस्म में हैं, इतनी सुगठित देह तो चित्रों में भी नहीं होती। इस जवानी का उपभोग करना जरूरी है, इसका सही इस्तेमाल करना जरूरी है। तुम शमा हो मैं परवाना हूँ। हुस्न और जवानी की इस आग में जल जाना चाहता हूँ मैं। मुझे भस्म हो जाने दो।
स्वीटी- मैं कहाँ इनकार करती हूँ , मैं तो पहले से ही इस पक्ष में रही हूँ की तुमसे बात हो, मुलाक़ात हो मगर तुम्हीं नखरे दिखाने में लगे थे । अब जाकर तुम बात करने लगे हो।
राज- तुम्हें पता नहीं कैसे लगा की मैं दिलचस्पी नहीं रखता था, असली बात तो ये है की मैं तुमसे मन ही मन खूब प्रेम करता था। मैं तो मिलना चाहता था, मगर तुम इतनी हाई -फाई थीं की मैं कुछ बोल ही नहीं पाटा था।
स्वीटी- एक बार ... आह्ह्ह्ह । सिर्फ़ एक बार तो तुमने कहा होता , मैं सब कुछ छोड़कर भी चली आती तुम्हारे पास। मैं अगर अपनी सहेली से मिलने यहाँ पर नहीं आती तो मुलाक़ात भी नहीं हो पाती। अच्छा हुआ जो मैं यहाँ पर आया गयी। और मुलाक़ात हो गयी तुमसे ।
राज के हाथ अचानक हरकत करने लगे थे। वह स्वीटी के अंदरूनी वस्त्रों में हरकत कर रहा था। उसकी नाभि के नीचे वाला हिस्सा तड़पने लगा। राज की उँगलियाँ अब स्वीटी के शरीर में आग लगाने का काम कर रही थीं। वह चुपचाप सह रही थी, उसकी तरफ़ से ज़रा भी विरोध नहीं हो रहा था इस कारण उसका हौसला बढ़ता ही जा रहा था। वह सोचती थी की मात्र खेल -खेल में में ही यह सब हो रहा है , मगर सच्चाई कुछ और थी । वे दोनों जवानी की भूल दोहराने के कगार पर थे, जवानी की शुरुआत में जिस तरह कदम बहक जाते हैं, उसी तरह उन दोनों के कदम भी बहक चुके थे और मात्र जिस्मानी जरूरत पूरा करने के हिसाब से वे लोग हद पार करने लगे। राज ने पूछा भी-
-कैसा महसूस कर रही हो मेरी रानी ?
स्वीटी- जैसे की मैं स्वर्ग में आ गयी हूँ। मैंने स्वर्ग का बहुत नाम सुना था , अब जान गयी की यही असली स्वर्ग है, इसके अलावा और कहीं स्वर्ग हो ही नहीं सकता।
राज- ठीक कहती हो , मैं भी हवा में उड़ रहा हूँ। आसमान में उड़ रहा हूँ। मेरे अन्दर भी खलबली मची हुई है।
स्वीटी - क्या इससे पहले भी तुम इस तरह का खेल खेल चुके हो ?
राज- नहीं, सौभाग्य से यह मेरा पहला अवसर है ।
- बहुत सुकून महसूस रहा है, ऐसा लगता है जैसे सारी दुनिया के सुख यही सिमट गए हैं। सारी दुनिया का आनंद तुम्हारे दामन में सिमट आया है। इस सुन्दरताकी जितनी तारीफ़ करुँ वो कम ही है। तुम विश्व की सबसे अच्छी और सच्ची लड़की हो, तुम्हें पाकर मेरे तन और मन प्रफुल्लित हैं। आज की यह मुलाक़ात संयोग से ही हो पाई है। मैं इस संयोग को सलाम करता हूँ। जानता हूँ की मोहब्बत ही दुनिया की सबसे ख़ास चीज है। इसके बिना कहीं कुछ नहीं है। प्यार ही एक ऐसा तौहफा है जो हर किसीको नसीब नहीं होता।
स्वीटी- कितनी मीठी बात कर रहे हो तुम। पहले तो हमेशा अलग थलग रहते थे और कटे -कटे से रहते थे , अब जाना की कितने रसिक हो तुम। मैं तुम जैसा दोस्त पाकर अभिभूत हूँ। वैसे तो मेरे सैकडों जानकार हैं मगर तुम जैसा प्यारा मित्र कहाँ मिलेगा ? तुम तो हीरो से भी खूबसूरत हो। फ़िल्म के हीरो भी चाय कम पानी हैं।
राज - आप भी तो सबसे अलग है। लाखों करोड़ों में एक हैं। आपका चेहरा देखते ही मन के अन्दर फुल्झादियाँ फूटने लगती हैं।
स्वीटी- मैं बहुत खुश हूँ। तुमसे मिलकर बहुत आनंद मिल रहा है।
राज- अगर बुरा ना मानो तो मैं जीवन का असली सुख देने की कोशिश करता हूँ। यह एक ऐसा सुख है की जिसे पाये बिना अमरत्व प्राप्त नहीं होता है। इसे पाते ही जीवन सफल हो जाता है। धन्य हो जाता है।
स्वीटी- आह, कितना जादू है तुम्हारे शब्दों में । कितना सुखद है यह सब।
राज- जादू तो तुम्हारे जिस्म में हैं, इतनी सुगठित देह तो चित्रों में भी नहीं होती। इस जवानी का उपभोग करना जरूरी है, इसका सही इस्तेमाल करना जरूरी है। तुम शमा हो मैं परवाना हूँ। हुस्न और जवानी की इस आग में जल जाना चाहता हूँ मैं। मुझे भस्म हो जाने दो।
स्वीटी- मैं कहाँ इनकार करती हूँ , मैं तो पहले से ही इस पक्ष में रही हूँ की तुमसे बात हो, मुलाक़ात हो मगर तुम्हीं नखरे दिखाने में लगे थे । अब जाकर तुम बात करने लगे हो।
राज- तुम्हें पता नहीं कैसे लगा की मैं दिलचस्पी नहीं रखता था, असली बात तो ये है की मैं तुमसे मन ही मन खूब प्रेम करता था। मैं तो मिलना चाहता था, मगर तुम इतनी हाई -फाई थीं की मैं कुछ बोल ही नहीं पाटा था।
स्वीटी- एक बार ... आह्ह्ह्ह । सिर्फ़ एक बार तो तुमने कहा होता , मैं सब कुछ छोड़कर भी चली आती तुम्हारे पास। मैं अगर अपनी सहेली से मिलने यहाँ पर नहीं आती तो मुलाक़ात भी नहीं हो पाती। अच्छा हुआ जो मैं यहाँ पर आया गयी। और मुलाक़ात हो गयी तुमसे ।
राज के हाथ अचानक हरकत करने लगे थे। वह स्वीटी के अंदरूनी वस्त्रों में हरकत कर रहा था। उसकी नाभि के नीचे वाला हिस्सा तड़पने लगा। राज की उँगलियाँ अब स्वीटी के शरीर में आग लगाने का काम कर रही थीं। वह चुपचाप सह रही थी, उसकी तरफ़ से ज़रा भी विरोध नहीं हो रहा था इस कारण उसका हौसला बढ़ता ही जा रहा था। वह सोचती थी की मात्र खेल -खेल में में ही यह सब हो रहा है , मगर सच्चाई कुछ और थी । वे दोनों जवानी की भूल दोहराने के कगार पर थे, जवानी की शुरुआत में जिस तरह कदम बहक जाते हैं, उसी तरह उन दोनों के कदम भी बहक चुके थे और मात्र जिस्मानी जरूरत पूरा करने के हिसाब से वे लोग हद पार करने लगे। राज ने पूछा भी-
-कैसा महसूस कर रही हो मेरी रानी ?
स्वीटी- जैसे की मैं स्वर्ग में आ गयी हूँ। मैंने स्वर्ग का बहुत नाम सुना था , अब जान गयी की यही असली स्वर्ग है, इसके अलावा और कहीं स्वर्ग हो ही नहीं सकता।
राज- ठीक कहती हो , मैं भी हवा में उड़ रहा हूँ। आसमान में उड़ रहा हूँ। मेरे अन्दर भी खलबली मची हुई है।
स्वीटी - क्या इससे पहले भी तुम इस तरह का खेल खेल चुके हो ?
राज- नहीं, सौभाग्य से यह मेरा पहला अवसर है ।
Thursday, November 5, 2009
मोहब्बत के मसीहा , भाग- 8
अब मेरी एक यही जिद है किसी भी तरह से राज को अपनी अदाओं में उलझाना है और फ़िर उसको अपना दीवाना बनाकर दूध में पडी हुई मक्खी की तरह निकालकर फेंक देना है। यही सजा देनी है उसको ।
रचना -बुरा नहीं मानो तो एक बात पूछू क्या ? दिल में बार -बार एक सवाल उठ रहा है ।
स्वीटी- बोलो , जानती हूँ क्या बीत रही है तुम्हारे दिल पर । तुम इस समय और बीयर पीना चाहती हो ।
रचना- नहीं यार । मैं ये जानना चाहती हूँ की राज से तुम्हारी क्या व्यक्तिगत दुश्मनी है ? क्योंकि छोटी-मोटी बात पर तो कोई भी इतना पंगा नहीं ले सकता। जरूर उसने तुम्हें कोई ख़ास चोट दी होगी।
स्वीटी- मेरे लिए यहेई बात बहुत मायने रखती है की कोई मुझे नजरअंदाज करदे।
उसने कई अवसरों पर मुझे इग्नोर किया, इससे मैंने मन ही मन अपने आपको अपमानित महसूस किया । मैंने कई बार उसको हैलो -हाय किया मगर पत्थर की तरह व्यवहार करता है। मेरी खूबसूरती और मेरी अदाओं के जलवों को चेलेंज करना चाहता है। मगर मैं ऐसा नहीं होने दूंगी।मैं उसे मुँहतोड़ जवाब दूंगी, उसकी किसी भी बदतमीजी को मैं ऐसे ही नहीं छोड़ सकती।
रचना- बदतमीजी ? तो क्या कभी वह इस हद तक भी गिर गया था ?
स्वीटी=- हिम्मत है क्या उसकी ? उसने मेरे सवाल का मेरे मन के अनुसार जवाब नहीं दिया , यह भी तो एक किस्म की बदतमीजी ही हुई न ? तुम क्या कहती हो ?
रचना- बराबर है। बिल्कुल सही बात है । बड़ी बदतमीजी तो यही है।उसको जवाब दिया जाएगा।
स्वीटी- हाँ , मेरी जान। अब ठीक है। अब हम लडेंगे जरूर। उससे बदला लेंगे जरूर।
रचना- अच्छा ठीक है। अब चलना होगा मुझे। लगता है बीयर चढ़ने लगी है। सुरूर सा होने लगा है।
स्वीटी- अरे कुछ नहीं यार। एक बार पेशाब करने जायेगी , बीयर का सारा मसला फिनिश हो जाएगा, कुछ नहीं बचेगा। सच मानो। किसीको शक भी नहीं हो सकता।
उन दोनों की वार्ता वहीं पर ख़त्म हो गयी, लडखडाते हुए क़दमों से रचना अपने घर चली गयी। स्वीटी ने बीयर की बोतलें भी उसकी सुपुर्द करदी थीं ताकि वह रास्ते में उनको फेंकती चली जाए, और फ़िर खाना खाकर वह ख़ुद भी सो गयी। वह सोने से पहले राज के बारे में ही सोच रही थी। सोने के बाद उसे सपने में भी राज ही दिखाई देने लगा। उसे वह सपने में एक गार्डन में मिला। गार्डन में सैकडों युवा जोड़े थे, कोई अपनी महबूबा के बालों में कंघी कर रहा था तो कोई अपनी प्रेमिका को चूम रहा है। उन्हीं में से एक है राज । वह अकेला घूम रहा है। कुछ परेशान सा है। उसकी उलझन इसीसे समझी जा सकती है की वह बार-बार किसी को देख रहा है , किसीको ताक रहा है। तभी कहीं से स्वीटी आ जाती है। राज के पास पहुचकर पूछती है-
- अरे राज , तुम यहाँ ? किसका इन्तजार कर रहे हो ? कुछ ख़ास बात है क्या ?
राज- नहीं यार। कुछ ख़ास नहीं। दरअसल मेरा एक दोस्त आने वाला है । टाइम तो हो गया , उसका मोबाइल भी स्विच ऑफ़ है । समझ में नहीं आ रहा क्या करुँ ?
स्वीटी - कोई दोस्त है या किसी प्रेमिका का इंतजार कर रहे हैं ?
राज - नहीं, नहीं दोस्त हैं। प्रेमिका तो अभी तक कोई है ही नहीं। हाँ मेरा दोस्त जरूर अपनी प्रेमिका के साथ आया था। मगर उसे अब तक तो आ जाना चाहिए था। आया क्यों नहीं। आप यहाँ कैसे ? किसी बॉय फ्रैंड के साथ आई हो क्या ? लग तो कुछ ऐसा ही रहा है ।
स्वीटी- नहीं यार ऐसी कोई बात नहीं नहीं है। मैं भी यहाँ पर एक सहेली से मिलने ही आयी थी ।
राज- वाह । क्या इत्तेफाक है, तुम्हें यहाँ पर सहेली नहीं मिली और हमको यहाँ दोस्त नहीं मिला। अब जब ऐसा ही है तो चलो फ़िर कहीं चलकर बैठते हैं।
और फ़िर सकुचाती हुई स्वीटी भी उसके साथ -साथ चलदी। राज एक सुनसान जगह पर जाकर रुक गया। उससे थोड़ी दूरी पर ही एक प्रेमी जोड़ा प्यार के रन में रंगकर मगन हो रहा था।
जब वहाँ पर स्वीटी और राज बैठे तो राज ने स्वीटी के गोरे गाल पर एक चुम्बन अंकित कर दिया, यह तो शुरुँआत मात्र थी, आगे -आगे तो राज और भी आक्रामक होता गया। वह स्वीटी के उभरे हुए वक्ष को सहला रहा था , उसके बदन को दबा रहा था , स्वीटी कसमसा रही थी, उसका दिल खूब जोर -जोर से धड़क रहा था। वह कुछ कहना चाहती थी लेकिन राज ने उसके होठों पर अपने होठ रख दिए । काम्ज्वाला भड़क उठी।
रचना -बुरा नहीं मानो तो एक बात पूछू क्या ? दिल में बार -बार एक सवाल उठ रहा है ।
स्वीटी- बोलो , जानती हूँ क्या बीत रही है तुम्हारे दिल पर । तुम इस समय और बीयर पीना चाहती हो ।
रचना- नहीं यार । मैं ये जानना चाहती हूँ की राज से तुम्हारी क्या व्यक्तिगत दुश्मनी है ? क्योंकि छोटी-मोटी बात पर तो कोई भी इतना पंगा नहीं ले सकता। जरूर उसने तुम्हें कोई ख़ास चोट दी होगी।
स्वीटी- मेरे लिए यहेई बात बहुत मायने रखती है की कोई मुझे नजरअंदाज करदे।
उसने कई अवसरों पर मुझे इग्नोर किया, इससे मैंने मन ही मन अपने आपको अपमानित महसूस किया । मैंने कई बार उसको हैलो -हाय किया मगर पत्थर की तरह व्यवहार करता है। मेरी खूबसूरती और मेरी अदाओं के जलवों को चेलेंज करना चाहता है। मगर मैं ऐसा नहीं होने दूंगी।मैं उसे मुँहतोड़ जवाब दूंगी, उसकी किसी भी बदतमीजी को मैं ऐसे ही नहीं छोड़ सकती।
रचना- बदतमीजी ? तो क्या कभी वह इस हद तक भी गिर गया था ?
स्वीटी=- हिम्मत है क्या उसकी ? उसने मेरे सवाल का मेरे मन के अनुसार जवाब नहीं दिया , यह भी तो एक किस्म की बदतमीजी ही हुई न ? तुम क्या कहती हो ?
रचना- बराबर है। बिल्कुल सही बात है । बड़ी बदतमीजी तो यही है।उसको जवाब दिया जाएगा।
स्वीटी- हाँ , मेरी जान। अब ठीक है। अब हम लडेंगे जरूर। उससे बदला लेंगे जरूर।
रचना- अच्छा ठीक है। अब चलना होगा मुझे। लगता है बीयर चढ़ने लगी है। सुरूर सा होने लगा है।
स्वीटी- अरे कुछ नहीं यार। एक बार पेशाब करने जायेगी , बीयर का सारा मसला फिनिश हो जाएगा, कुछ नहीं बचेगा। सच मानो। किसीको शक भी नहीं हो सकता।
उन दोनों की वार्ता वहीं पर ख़त्म हो गयी, लडखडाते हुए क़दमों से रचना अपने घर चली गयी। स्वीटी ने बीयर की बोतलें भी उसकी सुपुर्द करदी थीं ताकि वह रास्ते में उनको फेंकती चली जाए, और फ़िर खाना खाकर वह ख़ुद भी सो गयी। वह सोने से पहले राज के बारे में ही सोच रही थी। सोने के बाद उसे सपने में भी राज ही दिखाई देने लगा। उसे वह सपने में एक गार्डन में मिला। गार्डन में सैकडों युवा जोड़े थे, कोई अपनी महबूबा के बालों में कंघी कर रहा था तो कोई अपनी प्रेमिका को चूम रहा है। उन्हीं में से एक है राज । वह अकेला घूम रहा है। कुछ परेशान सा है। उसकी उलझन इसीसे समझी जा सकती है की वह बार-बार किसी को देख रहा है , किसीको ताक रहा है। तभी कहीं से स्वीटी आ जाती है। राज के पास पहुचकर पूछती है-
- अरे राज , तुम यहाँ ? किसका इन्तजार कर रहे हो ? कुछ ख़ास बात है क्या ?
राज- नहीं यार। कुछ ख़ास नहीं। दरअसल मेरा एक दोस्त आने वाला है । टाइम तो हो गया , उसका मोबाइल भी स्विच ऑफ़ है । समझ में नहीं आ रहा क्या करुँ ?
स्वीटी - कोई दोस्त है या किसी प्रेमिका का इंतजार कर रहे हैं ?
राज - नहीं, नहीं दोस्त हैं। प्रेमिका तो अभी तक कोई है ही नहीं। हाँ मेरा दोस्त जरूर अपनी प्रेमिका के साथ आया था। मगर उसे अब तक तो आ जाना चाहिए था। आया क्यों नहीं। आप यहाँ कैसे ? किसी बॉय फ्रैंड के साथ आई हो क्या ? लग तो कुछ ऐसा ही रहा है ।
स्वीटी- नहीं यार ऐसी कोई बात नहीं नहीं है। मैं भी यहाँ पर एक सहेली से मिलने ही आयी थी ।
राज- वाह । क्या इत्तेफाक है, तुम्हें यहाँ पर सहेली नहीं मिली और हमको यहाँ दोस्त नहीं मिला। अब जब ऐसा ही है तो चलो फ़िर कहीं चलकर बैठते हैं।
और फ़िर सकुचाती हुई स्वीटी भी उसके साथ -साथ चलदी। राज एक सुनसान जगह पर जाकर रुक गया। उससे थोड़ी दूरी पर ही एक प्रेमी जोड़ा प्यार के रन में रंगकर मगन हो रहा था।
जब वहाँ पर स्वीटी और राज बैठे तो राज ने स्वीटी के गोरे गाल पर एक चुम्बन अंकित कर दिया, यह तो शुरुँआत मात्र थी, आगे -आगे तो राज और भी आक्रामक होता गया। वह स्वीटी के उभरे हुए वक्ष को सहला रहा था , उसके बदन को दबा रहा था , स्वीटी कसमसा रही थी, उसका दिल खूब जोर -जोर से धड़क रहा था। वह कुछ कहना चाहती थी लेकिन राज ने उसके होठों पर अपने होठ रख दिए । काम्ज्वाला भड़क उठी।
Wednesday, November 4, 2009
मोहब्बत के मसीहा , भाग-7
रचना- क्यों, आज क्यों नहीं। मेरी तरफ़ से । चलो न चलते हैं। आज मन कुछ उदास सा है। ठीक सा नहीं लग रहा है। एकाध बीयर मार लेंगे तो ज़रा मूड बदल जाएगा।
स्वीटी - ठीक है , मगर उसके लिए किसी डिस्कोथेक या होटल में जाना ठीक नहीं है। हम लोग आराम से घर पर बैठकर मूड बनायेंगे। मेरे कमरे में तो कोई वैसे भी नहीं आता -जाता। मगर आज तो रात के १२ बजे तक घर में हम लोग के सिवाय कोई भी नहीं रहेगा। माल लेकर चलेंगे। साथ में चखना भी ले लेंगे।
कुछ ही देर में सब कुछ तैयार हो गया। पार्टी की जोरदार तैयारी हो चुकी थी। यह सब स्वीटी के बंगले पर किया जा रहा था। दोनों सहेलियों ने स्ट्रोंग बीयर मंगवाई थी। साथ में चिकन तंदूरी और काजू बादाम भी थे। चिकन रचना की पसंद का था और काजू बादाम स्वीटी को बहुत पसंद थे। बड़े घर की होने के कारण उनके पास पैसों की कोई कमी नहीं रहती थी। वे आराम से पार्टियाँ करती थीं। गुलछर्रे उडाती थीं और यार दोस्तों के साथ घूमती फिरती भी थीं। कोई उनको रोकने टोकने वाला नहीं था। पहला गिलास ख़त्म करने के बाद स्वीटी ने कहा-
हाँ , अब आया मजा। हलक से जब तक उतरती नहीं, तब तक आनंद ही नहीं आता। एक कसक सी बनी रहती है। मन के अन्दर खालीपन सा रहता है। इसे पीते ही दिमाग की घंटी भी खुलने लगती है।
रचना- हाँ, यार ... ये तो है। मैं भी आज थोड़ी सी उदासी फील कर रही थी। ऐसा लगता था जैसे की कुछ अशुभ होने वाला है। तभी तो मैंने कहा की चलो आज एक बीयर ही मार देते हैं।
स्वीटी-तो मैंने मना किया क्या ? मैं भी तो तुंरत राजी हो गयी। तुम्हारी कोई बात कभी गिराई है क्या ?
रचना- मानती हूँ। तभी तो तुम मेरी सबसे करीबी सहेली हो। सबसे प्यारी और सबसे अच्छी भी।
स्वीटी- हाँ, अब मैंने जो बात तुम्हें राज के बारे में बताई , वह जम गयी है न तुम्हें ?
रचना- हाँ -हाँ अच्छी तरह से जान गयी हूँ, कल मैं उससे मिलने की कोशिश करती हूँ, फ़िर बताती हूँ की किस तरह से तुम उस पर मरती हो । उसकी तारीफ़ करती हो। शुरुआत तो यहीं से करनी होगी। फ़िर देखूंगी की उसका रिस्पोंस क्या है। ऐसे ही टालने की कोशिश करता है यार फ़िर दिलचस्पी लेकर आगे की बात पूछता है। अगर पूछ बैठा तो ये समझलो की वह इंटरेस्ट ले रहा है।
स्वीटी- मुझे तुम्हारी काबलियत पर पूरा यकीं है।मुझे भरोसा है की काम जरूर हो जाएगा।
रचना- और मुझे तुम्हारे दिमाग पर बहुत गर्व होता है। ना जाने कहाँ से पाई है ये खोपडी। ऐसे -ऐसे सदयंत्र बनाती हो की सामने वाला उस जाल में फंसने से बच ही नहीं सकता।
स्वीटी- इसे सदयंत्र नहीं कहते बल्कि प्लान कहते हैं। योजना। एक अच्छी और फुलप्रूफ योजना। बिना योजना के किया गया काम हमेशा सफलता का मुह ताकता रहता है। जबकि सोच समझकर किया गया काम अपने अंजाम तक जरूर पहुचता है।
रचना- कोई कुछ भी कहे मगर बात तो वही है। मुझे राज के बारे में सारी जानकारी इकट्ठी करनी होंगी , जैसे की वह कब घर से बाहर होता है , उससे अचानक मिलना कहाँ ठीक रहेगा और वह किस समय किस ख़ास मूड में होता है,पीने -खाने का भी शौकीन है की नहीं।
स्वीटी- डोंट वारी माई डीयर , यह सब कुछ बहुत पहले से ही हो चुका है। उसके बारे में सारी पर्सनल जानकारियाँ मेरी फाइल में मौजूद हैं। मैं तुम्हें दे देती हूँ। इसमे सब कुछ मिल जाएगा। यहाँ तक की कहाँ सोता है, क्या खाने की पसंद है क्या -क्या पीता है। कहाँ-कहाँ निकलता है जैसी छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी जानकारी मौजूद है।
रचना- वाह... मगर कैसे जान पायीं ये सब ?
स्वीटी- निजी जासूस नियुक्त की थी इसके लिए। उसने सारी जानकारी उपलब्ध कराई है।
रचना- मान गयी तुमको। बहुत ऊंची चीज निकलीं यार । मैं तो सोच भी नहीं सकती थी की तुम ये सब भी कर सकती हो। इतनी आगे बढ़ चुकी हो , यह मेरे कल्पना से भी आगे की बात है।
स्वीटी- मेरी यही आदत है , जो ठान लेती हूँ, उसको करके ही दम लेती हूँ।
स्वीटी - ठीक है , मगर उसके लिए किसी डिस्कोथेक या होटल में जाना ठीक नहीं है। हम लोग आराम से घर पर बैठकर मूड बनायेंगे। मेरे कमरे में तो कोई वैसे भी नहीं आता -जाता। मगर आज तो रात के १२ बजे तक घर में हम लोग के सिवाय कोई भी नहीं रहेगा। माल लेकर चलेंगे। साथ में चखना भी ले लेंगे।
कुछ ही देर में सब कुछ तैयार हो गया। पार्टी की जोरदार तैयारी हो चुकी थी। यह सब स्वीटी के बंगले पर किया जा रहा था। दोनों सहेलियों ने स्ट्रोंग बीयर मंगवाई थी। साथ में चिकन तंदूरी और काजू बादाम भी थे। चिकन रचना की पसंद का था और काजू बादाम स्वीटी को बहुत पसंद थे। बड़े घर की होने के कारण उनके पास पैसों की कोई कमी नहीं रहती थी। वे आराम से पार्टियाँ करती थीं। गुलछर्रे उडाती थीं और यार दोस्तों के साथ घूमती फिरती भी थीं। कोई उनको रोकने टोकने वाला नहीं था। पहला गिलास ख़त्म करने के बाद स्वीटी ने कहा-
हाँ , अब आया मजा। हलक से जब तक उतरती नहीं, तब तक आनंद ही नहीं आता। एक कसक सी बनी रहती है। मन के अन्दर खालीपन सा रहता है। इसे पीते ही दिमाग की घंटी भी खुलने लगती है।
रचना- हाँ, यार ... ये तो है। मैं भी आज थोड़ी सी उदासी फील कर रही थी। ऐसा लगता था जैसे की कुछ अशुभ होने वाला है। तभी तो मैंने कहा की चलो आज एक बीयर ही मार देते हैं।
स्वीटी-तो मैंने मना किया क्या ? मैं भी तो तुंरत राजी हो गयी। तुम्हारी कोई बात कभी गिराई है क्या ?
रचना- मानती हूँ। तभी तो तुम मेरी सबसे करीबी सहेली हो। सबसे प्यारी और सबसे अच्छी भी।
स्वीटी- हाँ, अब मैंने जो बात तुम्हें राज के बारे में बताई , वह जम गयी है न तुम्हें ?
रचना- हाँ -हाँ अच्छी तरह से जान गयी हूँ, कल मैं उससे मिलने की कोशिश करती हूँ, फ़िर बताती हूँ की किस तरह से तुम उस पर मरती हो । उसकी तारीफ़ करती हो। शुरुआत तो यहीं से करनी होगी। फ़िर देखूंगी की उसका रिस्पोंस क्या है। ऐसे ही टालने की कोशिश करता है यार फ़िर दिलचस्पी लेकर आगे की बात पूछता है। अगर पूछ बैठा तो ये समझलो की वह इंटरेस्ट ले रहा है।
स्वीटी- मुझे तुम्हारी काबलियत पर पूरा यकीं है।मुझे भरोसा है की काम जरूर हो जाएगा।
रचना- और मुझे तुम्हारे दिमाग पर बहुत गर्व होता है। ना जाने कहाँ से पाई है ये खोपडी। ऐसे -ऐसे सदयंत्र बनाती हो की सामने वाला उस जाल में फंसने से बच ही नहीं सकता।
स्वीटी- इसे सदयंत्र नहीं कहते बल्कि प्लान कहते हैं। योजना। एक अच्छी और फुलप्रूफ योजना। बिना योजना के किया गया काम हमेशा सफलता का मुह ताकता रहता है। जबकि सोच समझकर किया गया काम अपने अंजाम तक जरूर पहुचता है।
रचना- कोई कुछ भी कहे मगर बात तो वही है। मुझे राज के बारे में सारी जानकारी इकट्ठी करनी होंगी , जैसे की वह कब घर से बाहर होता है , उससे अचानक मिलना कहाँ ठीक रहेगा और वह किस समय किस ख़ास मूड में होता है,पीने -खाने का भी शौकीन है की नहीं।
स्वीटी- डोंट वारी माई डीयर , यह सब कुछ बहुत पहले से ही हो चुका है। उसके बारे में सारी पर्सनल जानकारियाँ मेरी फाइल में मौजूद हैं। मैं तुम्हें दे देती हूँ। इसमे सब कुछ मिल जाएगा। यहाँ तक की कहाँ सोता है, क्या खाने की पसंद है क्या -क्या पीता है। कहाँ-कहाँ निकलता है जैसी छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी जानकारी मौजूद है।
रचना- वाह... मगर कैसे जान पायीं ये सब ?
स्वीटी- निजी जासूस नियुक्त की थी इसके लिए। उसने सारी जानकारी उपलब्ध कराई है।
रचना- मान गयी तुमको। बहुत ऊंची चीज निकलीं यार । मैं तो सोच भी नहीं सकती थी की तुम ये सब भी कर सकती हो। इतनी आगे बढ़ चुकी हो , यह मेरे कल्पना से भी आगे की बात है।
स्वीटी- मेरी यही आदत है , जो ठान लेती हूँ, उसको करके ही दम लेती हूँ।
Tuesday, November 3, 2009
मोहब्बत , भाग-6
लेकिन स्वीटी इस सबसे बेखबर होकर होकर अपनी बात कहे जा रही थी-
- और जब अकेले कमरे में हम दोनों होंगे तो मन के अन्दर कितनी फुल्झादियाँ फूटेंगी। आह कितने सुख भरे क्षण होंगे, वह मुझे अपनी आगोश में भरकर प्यार करेगा। मेरे गालों का चुम्बन लेगा। फ़िर मैं कसमसाकर हटने का झूठा नाटक करुँगी। जब वह मुझे मनायेगा तो मैं एक बार में ही मान जाउंगी, उस समय मैं उससे खूब बातें करुँगी, खूब शिकायतें करुँगी। अच्छी -अच्छी चीजों की फरमाइश करुँगी। दिखावे के लिए शर्मौंगी भी। जब वह मेरे वक्षस्थल को चूमेगा टी या सहलाएगा तो मैं मचलने का दिखावा करुँगी, उसके हाथ भी हटाने की कोशिश करुँगी। और जब वह पूरी तरह रोमांस के मूड में आ जाएगा तो मैं तुंरत फिसल जाउंगी, उसका कहना मान लुंगी, उसके सीने से सटकरमैं उसकी धडकनों को गिनने का प्रयास करुँगी। आह वे कितने सुनहरे पल होंगे ।
रचना- हाँ, बहुत सुनहरे । और इसके बाद तुम उससे बातें करना भी छोड़ दोगी । उसके साथ बेवफाई करोगी ?
स्वीटी- नहीं रे पगली। इतनी जल्दी नहीं, उससे पहले तो बहुत कुछ करना है। उसके साथ रोमांस करना है, सेक्स करना है, जिन्दगी के असली पल आत्मसात करने हैं, असली सुख भोगने हैं।तुम तो पहले से ही ये सब अशुभ -अशुभ बोल रही हो। पहले उसका पूरा इस्तेमाल करना है। उसकी हर बातका फायदा उठाना है, उसकी जोशो जवानी का आनंद लूटना है। जब तक यह सब नहीं हो जाता तब तक उसकी दुल्हन बनकर रहना है, तुमको ऐसा दिखाना पड़ेगा जैसे उससे मैं ही मोहब्बत करती हूँ । इतना प्यार उससे कभी कोई नहीं कर सकता।
रचना- हाँ, उसकी कोई चिंता नहीं, चारों तरफ़ ऐसा ही माहोल तैयार कर दूंगी। लेकिन क्या तुम अकेली ही मौज लेने का मन बना चुकी हो ? ऐसा कैसे हो सकता है ? हम क्या ऐसे ही रह जायेंगे ?
स्वीटी- अच्छा , अगर ऐसी बात है तो फ़िर चिंता करने की कोई बात नहीं है। तुम आराम से अपने काम को अंजाम दो। मैं तुम्हारा भी ख़याल रखूंगी, हर तरह से मदद की जायेगी।
रचना- देखो, ऐसा मत करना की फ़िर मुझे भूल जाओ।
स्वीटी- ऐसा कैसे हो सकता है। हम कभी भी कोई ग़लत वादा नहीं करते हैं। आज तक जो कहा है, कर दिखाया है।
रचना- मुझे भरोसा है तुम पर । एक दिन अपने उस नए दोस्त को मेरे साथ भेजो न , घूमने के लिए ।
स्वीटी- रवि की बात कर रही हो , क्या करोगी उसके साथ जाकर ? एक नंबर का चरसी है। पता चला की पी खाकर कुछ उल्टा सीधा कर डाला तो क्या करोगी ?
रचना- कुछ नहीं होगा स्वीटी, मेरे पास निरोध रहेगा। बहुत इच्छा हो रही है। एक दिन जब तुमने अपने बर्थडे पर पार्टी दी थी, उसी दिन तुमने एक एक दोस्त के साथ मेरा सम्बन्ध बनवाया था, बस उसी दिन से ये काया तरस रही है। एक बार और मन चाह रहा है।
स्वीटी- झूठी, तब से लेकर अब तक तुम कैसे चैन से रह सकती हो ?
रचना- नहीं , मैं सच कह रही हूँ। कसम खा सकती हूँ।
स्वीटी- उस दिन तो तुमने खूब आनंद लिया था। क्योंकि उस दिन तुमने भी पी राखी थी और उस दोस्त ने भी जमकर पी थी, मैंने भी तीन पैग व्हिस्की के ले रखे थे। मैंने महसूस किया की उस दिन तुम बहुत गर्म नजर आ रही थीं, तुम्हारा जोश देखते ही बनता था। उससे सम्बन्ध बनाने के बाद तुम्हारे चेहरे पर गजब की संतुष्टि के भाव थे , मैंने महसूस किया तुम बहुत खुश थीं।
रचना- हाँ, यार बहुत मजा आया था उस दिन। ऐसी एक पार्टी और रखो न। सब लोग मदहोश हो जाएँ, बर्थडे का बहाना हो जाए और मन की सब तकलीफें दूर हो जाएँ।
स्वीटी - ठीक है , चल तेरी ये परेशानी मेरी समझ में आ गयी है। अब मैं जल्दी ही इस समस्या का समाधान कर डालूंगी। ठीक है । अब तू अपने काम पर लज्जा मैं भी चलती हूँ।
रचना- अच्छा ठीक है। कोई बात नहीं। चलो चलते हैं, या फ़िर मूड बन रहा हो तो बोलो। एक -एक बीयर मार्के आते हैं।
स्वीटी आज रहने दे, फ़िर कभी।
- और जब अकेले कमरे में हम दोनों होंगे तो मन के अन्दर कितनी फुल्झादियाँ फूटेंगी। आह कितने सुख भरे क्षण होंगे, वह मुझे अपनी आगोश में भरकर प्यार करेगा। मेरे गालों का चुम्बन लेगा। फ़िर मैं कसमसाकर हटने का झूठा नाटक करुँगी। जब वह मुझे मनायेगा तो मैं एक बार में ही मान जाउंगी, उस समय मैं उससे खूब बातें करुँगी, खूब शिकायतें करुँगी। अच्छी -अच्छी चीजों की फरमाइश करुँगी। दिखावे के लिए शर्मौंगी भी। जब वह मेरे वक्षस्थल को चूमेगा टी या सहलाएगा तो मैं मचलने का दिखावा करुँगी, उसके हाथ भी हटाने की कोशिश करुँगी। और जब वह पूरी तरह रोमांस के मूड में आ जाएगा तो मैं तुंरत फिसल जाउंगी, उसका कहना मान लुंगी, उसके सीने से सटकरमैं उसकी धडकनों को गिनने का प्रयास करुँगी। आह वे कितने सुनहरे पल होंगे ।
रचना- हाँ, बहुत सुनहरे । और इसके बाद तुम उससे बातें करना भी छोड़ दोगी । उसके साथ बेवफाई करोगी ?
स्वीटी- नहीं रे पगली। इतनी जल्दी नहीं, उससे पहले तो बहुत कुछ करना है। उसके साथ रोमांस करना है, सेक्स करना है, जिन्दगी के असली पल आत्मसात करने हैं, असली सुख भोगने हैं।तुम तो पहले से ही ये सब अशुभ -अशुभ बोल रही हो। पहले उसका पूरा इस्तेमाल करना है। उसकी हर बातका फायदा उठाना है, उसकी जोशो जवानी का आनंद लूटना है। जब तक यह सब नहीं हो जाता तब तक उसकी दुल्हन बनकर रहना है, तुमको ऐसा दिखाना पड़ेगा जैसे उससे मैं ही मोहब्बत करती हूँ । इतना प्यार उससे कभी कोई नहीं कर सकता।
रचना- हाँ, उसकी कोई चिंता नहीं, चारों तरफ़ ऐसा ही माहोल तैयार कर दूंगी। लेकिन क्या तुम अकेली ही मौज लेने का मन बना चुकी हो ? ऐसा कैसे हो सकता है ? हम क्या ऐसे ही रह जायेंगे ?
स्वीटी- अच्छा , अगर ऐसी बात है तो फ़िर चिंता करने की कोई बात नहीं है। तुम आराम से अपने काम को अंजाम दो। मैं तुम्हारा भी ख़याल रखूंगी, हर तरह से मदद की जायेगी।
रचना- देखो, ऐसा मत करना की फ़िर मुझे भूल जाओ।
स्वीटी- ऐसा कैसे हो सकता है। हम कभी भी कोई ग़लत वादा नहीं करते हैं। आज तक जो कहा है, कर दिखाया है।
रचना- मुझे भरोसा है तुम पर । एक दिन अपने उस नए दोस्त को मेरे साथ भेजो न , घूमने के लिए ।
स्वीटी- रवि की बात कर रही हो , क्या करोगी उसके साथ जाकर ? एक नंबर का चरसी है। पता चला की पी खाकर कुछ उल्टा सीधा कर डाला तो क्या करोगी ?
रचना- कुछ नहीं होगा स्वीटी, मेरे पास निरोध रहेगा। बहुत इच्छा हो रही है। एक दिन जब तुमने अपने बर्थडे पर पार्टी दी थी, उसी दिन तुमने एक एक दोस्त के साथ मेरा सम्बन्ध बनवाया था, बस उसी दिन से ये काया तरस रही है। एक बार और मन चाह रहा है।
स्वीटी- झूठी, तब से लेकर अब तक तुम कैसे चैन से रह सकती हो ?
रचना- नहीं , मैं सच कह रही हूँ। कसम खा सकती हूँ।
स्वीटी- उस दिन तो तुमने खूब आनंद लिया था। क्योंकि उस दिन तुमने भी पी राखी थी और उस दोस्त ने भी जमकर पी थी, मैंने भी तीन पैग व्हिस्की के ले रखे थे। मैंने महसूस किया की उस दिन तुम बहुत गर्म नजर आ रही थीं, तुम्हारा जोश देखते ही बनता था। उससे सम्बन्ध बनाने के बाद तुम्हारे चेहरे पर गजब की संतुष्टि के भाव थे , मैंने महसूस किया तुम बहुत खुश थीं।
रचना- हाँ, यार बहुत मजा आया था उस दिन। ऐसी एक पार्टी और रखो न। सब लोग मदहोश हो जाएँ, बर्थडे का बहाना हो जाए और मन की सब तकलीफें दूर हो जाएँ।
स्वीटी - ठीक है , चल तेरी ये परेशानी मेरी समझ में आ गयी है। अब मैं जल्दी ही इस समस्या का समाधान कर डालूंगी। ठीक है । अब तू अपने काम पर लज्जा मैं भी चलती हूँ।
रचना- अच्छा ठीक है। कोई बात नहीं। चलो चलते हैं, या फ़िर मूड बन रहा हो तो बोलो। एक -एक बीयर मार्के आते हैं।
स्वीटी आज रहने दे, फ़िर कभी।
Monday, November 2, 2009
मोहब्बत , भाग -05
रचना- मेरी बहन, जब तुम ये सब जानती ही हो तो फ़िर क्यों उसके नाद में लगती हो। इग्नोर करो। सबसे बड़ा हथियार यही है। अगर कोई ज्यादा होशियार बनता है तो उस लड़के को सबक सिखाने का यही सबसे अच्छा हथियार है। कई बार हम लोग इसका इस्तेमाल भी कर चुके हैं।
स्वीटी- कहती तो ठीक हो मगर ऐसा करना अब मेरे सम्मान के खिलाफ लगता है। अब वह अपनी अकड़ दिखाए और मैं उसको अपनी जिद दिखाती हूँ, वह नहीं जानता की उसने किस्से पंगा लिया है। जाने अनजाने ही सही मगर उसने मेरी मोहब्बत का अपमान किया है, भले ही वह जानवरों और पक्षियों से प्रेम करता है मगर इंसानों की मोहब्बत से बिल्कुल अनजान होगा क्या ? हो ही नहीं सकता ।
रचना- हाँ, मुझे जिस बात का डर था आख़िर वाही होने जा रहा है।
स्वीटी- हाँ, वह इतनमा नादाँ भी नहीं की उसको हमारे प्यार की भनक न लगी हो, पूरा सांड का सांड हो रहा है और आजकल तो बच्चे भी ये सब कुछ जानते हैं। क्या मैं ग़लत कह रही हूँ ?
रचना - सच तो यही है की हम लोग को उलझना नहीं चाहिए मगर जब तुमने कोई निर्णय ले ही लिया है तो मैं तुम्हारे साथ ही हूँ और रहूंगी भी। मैं किसी और की तरफदारी तभी तक करती हूँ जब तक की वह हमारा दुश्मन नहीं होता। और जब एक बार यह तय हो गया की राज हमारा दुश्मन तो पक्का दुश्मन । बोलो अब क्या करना है ? जैसे कहोगी, मैं सैटिंग करने के लिए तैयार हूँ।
स्वीटी - शुक्रिया स्वीटी, मुझे तुमसे यही उम्मीद थी। तुम लोग मुझे इतना सपोर्ट करते हो । मैं समझा देती हूँ क्या करना है, उस्ससे दुश्मनी तो करनी है मगर एहसास ऐसा कराना है जैसे हमें उससे सबसे ज्यादा मोहब्बत है।
रचना- मैं समझी नहीं, ज़रा खुलकर बताओ तो बात बने।
स्वीटी- उससे मुझे प्यार करना है, उसके रात रात बितानी है।
रचना- हाय, वो तो मेरी भी इच्छा है, मगर पूरी कैसे होगी ?
स्वीटी- वही राह बतला रही हूँ, मैं उससे प्रेम का नाटक करुँगी, तुम सब लोग उसको पल -पल मेरी दीवानगी की ख़बर दोगी , उसे यह यकीन दिलाओगी की मैं एक पल के लिए भी उससे दूर रहकर जी नहीं सकती।
रचना- तुम इस सबकी फ़िक्र मत करो। मैं ये सब कर लुंगी। अच्छी तरह से करुँगी। बाकी सहेलियों को भी इस काम पर लगा दिया जाएगा। राज को पता भी नहीं चलेगा की वह किस जाल में उलझ गया है। हम इस तरह की स्क्रिप्ट लिखेंगे की हर जगह पर उसे सिर्फ़ और सिर्फ़ स्वीटी ही नजर आएगी, मेरी जिम्मेदारी है। मेरी गारंटी है।
स्वीटी - शाबाश, और फ़िर हम लोग उसे ऐसी सजा देंगे की वह अपने पैदा होने पर भी अफ़सोस करने लगेगा।
रचना- वो कैसे मगर ? थोड़ा सा मुझे भी समझाओ ना ।
स्वीटी- जब वह दीवाना हो जाएगा , हर तरफ उसे मैं ही मैं दिखने लगूंगी तो तब तुम देखना असली तमाशा, जब वह मेरे बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकेगा तब उसका दिल तोदुंगी मैं। तब करुँगी अपने दोस्त से शादी ।
रचना -इसका मतलब बेवफाई करोगी तुम ?
स्वीटी- नहीं बाबा, बेवफाई का जिक्र तो तब आता है जब कभी वफ़ा की गयी हो। इस रिश्ते की नींव तो नफरत पर राखी गयी है , फर्क बस इतना है की इसकी शुरुआत राज ने की थी, ख़त्म इसे मैं करुँगी। उसने ही मुझसे प्रेम नहीं किया , मुझे कभी लिफ्ट नहीं दी, इससे मैंने अपने आपको बहुत अपमानित महसूस किया है । सचमुच बहुत अपमानित किया है उसने , मैं ऐसा मंजर देखना चाहती हूँ की वह मुझे बेवफा समझकर पागल जैसे हो जाए, जब उसे पता चले की मैं उसके साथ गद्दारी की है, उसे छोड़कर किसी और की हो गयी, प्रेम तो उससे किया और शादी किसी और से करली तो सोचो क्या बीतेगी उसके कवि मन पर, जब उसके सपने बिखरें तो मैं दुआ करती हूँ की वह बुरी तरह टूट जाए। उसको सारी दुनिया मतलबी लगने लगे, वह मुझे कोसता रहे, मेरे गम में पागल हो जाए राज। पागल जैसा नहीं , बल्कि पूरा पागल। आह , कितना मजा आएगा जब। मुझे जो खुशी मिलेगी उसे मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती। सचमुच।
रचना उसकी आवाज सुनकर ऐसे डर गयी जैसे किसी सांप ने उसको फन मार दिया हो। वह इतनी ज्यादा दहशत में थी कुछ बोल भी नहीं पाई और उसके गले लग गयी। उसका दिल जोर जोर से धक् धक् कर रहा था , रचना सोच रही थी थी खेल -खेल में ही उन लोगों ने किसी मासूम की जिन्दगी बरबाद करने का षड़यंत्र रच लिया था।
स्वीटी- कहती तो ठीक हो मगर ऐसा करना अब मेरे सम्मान के खिलाफ लगता है। अब वह अपनी अकड़ दिखाए और मैं उसको अपनी जिद दिखाती हूँ, वह नहीं जानता की उसने किस्से पंगा लिया है। जाने अनजाने ही सही मगर उसने मेरी मोहब्बत का अपमान किया है, भले ही वह जानवरों और पक्षियों से प्रेम करता है मगर इंसानों की मोहब्बत से बिल्कुल अनजान होगा क्या ? हो ही नहीं सकता ।
रचना- हाँ, मुझे जिस बात का डर था आख़िर वाही होने जा रहा है।
स्वीटी- हाँ, वह इतनमा नादाँ भी नहीं की उसको हमारे प्यार की भनक न लगी हो, पूरा सांड का सांड हो रहा है और आजकल तो बच्चे भी ये सब कुछ जानते हैं। क्या मैं ग़लत कह रही हूँ ?
रचना - सच तो यही है की हम लोग को उलझना नहीं चाहिए मगर जब तुमने कोई निर्णय ले ही लिया है तो मैं तुम्हारे साथ ही हूँ और रहूंगी भी। मैं किसी और की तरफदारी तभी तक करती हूँ जब तक की वह हमारा दुश्मन नहीं होता। और जब एक बार यह तय हो गया की राज हमारा दुश्मन तो पक्का दुश्मन । बोलो अब क्या करना है ? जैसे कहोगी, मैं सैटिंग करने के लिए तैयार हूँ।
स्वीटी - शुक्रिया स्वीटी, मुझे तुमसे यही उम्मीद थी। तुम लोग मुझे इतना सपोर्ट करते हो । मैं समझा देती हूँ क्या करना है, उस्ससे दुश्मनी तो करनी है मगर एहसास ऐसा कराना है जैसे हमें उससे सबसे ज्यादा मोहब्बत है।
रचना- मैं समझी नहीं, ज़रा खुलकर बताओ तो बात बने।
स्वीटी- उससे मुझे प्यार करना है, उसके रात रात बितानी है।
रचना- हाय, वो तो मेरी भी इच्छा है, मगर पूरी कैसे होगी ?
स्वीटी- वही राह बतला रही हूँ, मैं उससे प्रेम का नाटक करुँगी, तुम सब लोग उसको पल -पल मेरी दीवानगी की ख़बर दोगी , उसे यह यकीन दिलाओगी की मैं एक पल के लिए भी उससे दूर रहकर जी नहीं सकती।
रचना- तुम इस सबकी फ़िक्र मत करो। मैं ये सब कर लुंगी। अच्छी तरह से करुँगी। बाकी सहेलियों को भी इस काम पर लगा दिया जाएगा। राज को पता भी नहीं चलेगा की वह किस जाल में उलझ गया है। हम इस तरह की स्क्रिप्ट लिखेंगे की हर जगह पर उसे सिर्फ़ और सिर्फ़ स्वीटी ही नजर आएगी, मेरी जिम्मेदारी है। मेरी गारंटी है।
स्वीटी - शाबाश, और फ़िर हम लोग उसे ऐसी सजा देंगे की वह अपने पैदा होने पर भी अफ़सोस करने लगेगा।
रचना- वो कैसे मगर ? थोड़ा सा मुझे भी समझाओ ना ।
स्वीटी- जब वह दीवाना हो जाएगा , हर तरफ उसे मैं ही मैं दिखने लगूंगी तो तब तुम देखना असली तमाशा, जब वह मेरे बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकेगा तब उसका दिल तोदुंगी मैं। तब करुँगी अपने दोस्त से शादी ।
रचना -इसका मतलब बेवफाई करोगी तुम ?
स्वीटी- नहीं बाबा, बेवफाई का जिक्र तो तब आता है जब कभी वफ़ा की गयी हो। इस रिश्ते की नींव तो नफरत पर राखी गयी है , फर्क बस इतना है की इसकी शुरुआत राज ने की थी, ख़त्म इसे मैं करुँगी। उसने ही मुझसे प्रेम नहीं किया , मुझे कभी लिफ्ट नहीं दी, इससे मैंने अपने आपको बहुत अपमानित महसूस किया है । सचमुच बहुत अपमानित किया है उसने , मैं ऐसा मंजर देखना चाहती हूँ की वह मुझे बेवफा समझकर पागल जैसे हो जाए, जब उसे पता चले की मैं उसके साथ गद्दारी की है, उसे छोड़कर किसी और की हो गयी, प्रेम तो उससे किया और शादी किसी और से करली तो सोचो क्या बीतेगी उसके कवि मन पर, जब उसके सपने बिखरें तो मैं दुआ करती हूँ की वह बुरी तरह टूट जाए। उसको सारी दुनिया मतलबी लगने लगे, वह मुझे कोसता रहे, मेरे गम में पागल हो जाए राज। पागल जैसा नहीं , बल्कि पूरा पागल। आह , कितना मजा आएगा जब। मुझे जो खुशी मिलेगी उसे मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती। सचमुच।
रचना उसकी आवाज सुनकर ऐसे डर गयी जैसे किसी सांप ने उसको फन मार दिया हो। वह इतनी ज्यादा दहशत में थी कुछ बोल भी नहीं पाई और उसके गले लग गयी। उसका दिल जोर जोर से धक् धक् कर रहा था , रचना सोच रही थी थी खेल -खेल में ही उन लोगों ने किसी मासूम की जिन्दगी बरबाद करने का षड़यंत्र रच लिया था।
Sunday, November 1, 2009
मोहब्बत के मसीहा, भाग-4
रचना- ये वहम है हमारा तुम्हारा। जो सच है वह सामने है। जिसे हम मन ही मन चाहने लगते हैं, वह हर समय हमें अपने करीब महसूस होने लगता है। हमको एहसास होने लगता है जैसे की हम हमेशा से उसके थे और हमेशा ऐसे ही रहेंगे। हम लोगों को ये सब नहीं करना चाहिए। हम हमेशा सपने में नहीं खोये रह सकते। आख़िर सुबह होने पर आँखें खोलनी ही पड़ती हैं, हमें जादू की आदत नहीं डालनी चाहिए, सिर्फ़ चमत्कार की उम्मीद करना हमको निकम्मा बना देता है।
स्वीटी- तुम कितना अच्छा भाषण देती हो। काश कोई दूसरा अवसर होता तो मैं जरूर तुम्हें इन शब्दों के लिए पुरस्कृत करती मगर अब समय ऐसा नहीं है। मुझे किसी से प्यार है और उसे पाने की मेरी तमन्ना है। मैं वादा करती हूँ की जब तक राज को अपना नहीं बना लेती तब तक मुझे चैन नहीं आएगा।जितनी रातें उसने मेरी हराम की हैं मैं भी उसकी उतनी ही रातों को हराम कर डालूंगी। मैं उसे अपना दीवाना बना दूंगी। चाहे इसके लिए मुझे कुछ भी क्यों न करना पड़े। कुछ भी।
रचना उसकी आंखों से शोले बरसता हुआ देख रही थी। यह बहुत गंभीर स्थिति थी, वह समझ गयी की अब राज की खैर नहीं है। जिस तरीके से उसने अपनी बात कही थी उससे अनहोनी की दुर्गन्ध साफ़ आ रही थी, एक स्वीटी ही ऐसी थी जो की अपनी जिद पूरी करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती थी , और ऐसे जुनूनी लोग अपना अहित तो करते ही हैं, सामने वाले का भी बुरा कर डालते हैं। रचना किसी अहित की कल्पना से डरने लगी।
सुमन जब इन शब्दों को पढ़ रही थी तो उसकी आंखों में विस्मय के भाव थे। वह मोहब्बत के मसीहा राज की जिन्दगी पर आधारित पुस्तक तैयार कर रही थी, इसके लिए उसने अथक प्रयास भी किए थे, वह हर उस आदमी से मिली थी जो इस कहानी के चश्मदीद गवाह थे। उसने राज और स्वीटी से सम्बंधित ज्यादा से ज्यादा पत्र भी संकलित किए थे। कहा जा सकता है की वह सच की तह तक पहुचकर सच्ची दास्ताँ ही लिखना चाहती थी। उसके हाथ जो दस्तावेज लगते थे पहले वह उनका अध्ययन करती थी फ़िर से किताब में स्थान देती थी, वह ख़ुद भी इन बातों का ध्यान रखती थी की कहीं कोई बात ग़लत न लिख जाए।इस वक्त वह स्वीटी और रचना के बीच का संवाद पढ़ रही थी। आगे उसने पढा-
रचना भोली लड़की थी, वह साफ़ सुथरा और शांतिपूर्वक जीवन जीना व्यतीत करती थी लेकिन स्वीटी जैसी लाफ्देबाज दोस्तों के कारण वह अक्सर मुसीबत में फंस जाया करती थी। इस वक्त भी वह सोच रही थी की स्वीटी अगर कोई गड़बड़ करती है तो बेवजह उसका नाम भी बदनाम होगा जबकि वह अपनी सहेली स्वीटी को समझाने का हर सम्भव प्रयास कर रही थी। उसने लास्ट हथियार भी फेका-
-जो तेरा दोस्त है संजीव, क्या राज उससे से भी सुंदर लगता है ? सुना है वह भी तो बड़े घर का लड़का है।
स्वीटी- सिर्फ़ बड़े घर का नहीं , बहुत बड़े घर का है। उसका बाप आईए एस है। इतना ही नहीं , कितने ही मंत्री तो उनके घर ऐसे आते जाते हैं जैसे हम और तुम एक दूसरे के घर आते -जाते रहते हैं।
रचना- तो फ़िर क्या कमी है संजीव के अन्दर? उसे ही क्यों नहीं अपना लेतीं ?
स्वीटी- वो सब बातें अलग हैं यार, तुम बहुत डरपोक किस्म की और दबूपन की बातें कर रही हो।
रचना- तो ठीक है, अगर किसीके ख़िलाफ़ साजिस रचना और उसको तकलीफ देना ही तुम्हारी नजर में बहादुरी है तो ठीक है जाओ, करो जो करना है। मुझे कोई तकलीफ नहीं है। लेकिन मुझे दूर रखो इस झमेले से।
स्वीटी- नाराज हो गईं ? अरे मैं तुम पर कोई कमेन्ट थोड़े ही कर रही हूँ।
रचना- कबसे समझा रही हूँ मगर तुम समझने का नाम ही नहीं ले रही हो। उलटा मुझ पर इस तरहसे व्यंग्य कर रही हो जैसे की मैं ही राज हूँ, वो राज जो रातों को तुम्हें सपने में दिखाई देता है और सुबह होते ही परेशान करने मुझे आ जाती हो।
स्वीटी- तो फ़िर कहाँ जाऊं , राज के कंधे से सर लगाकर तो अपना दुखडा रो नहीं सकती न। वह तो है ही ऐसा बेदर्द की उसके सामने तो कोई अपना दर्द भी नैन कह सकता।
रचना- ऐसा भी मत कहो यार, न्यूज पेपर में उसके बारे में आता है की वह पशु पक्षियों से भी बहुत प्रेम करता है। उनकी खूब मदद करता है। सेवा भी करता है।
स्वीटी - मुझे लगता है की वह पशु पक्षियों से भी नहीं, से ही प्यार करता है, और उनसे ही करने लायक भी है। इंसान से नहीं।
स्वीटी- तुम कितना अच्छा भाषण देती हो। काश कोई दूसरा अवसर होता तो मैं जरूर तुम्हें इन शब्दों के लिए पुरस्कृत करती मगर अब समय ऐसा नहीं है। मुझे किसी से प्यार है और उसे पाने की मेरी तमन्ना है। मैं वादा करती हूँ की जब तक राज को अपना नहीं बना लेती तब तक मुझे चैन नहीं आएगा।जितनी रातें उसने मेरी हराम की हैं मैं भी उसकी उतनी ही रातों को हराम कर डालूंगी। मैं उसे अपना दीवाना बना दूंगी। चाहे इसके लिए मुझे कुछ भी क्यों न करना पड़े। कुछ भी।
रचना उसकी आंखों से शोले बरसता हुआ देख रही थी। यह बहुत गंभीर स्थिति थी, वह समझ गयी की अब राज की खैर नहीं है। जिस तरीके से उसने अपनी बात कही थी उससे अनहोनी की दुर्गन्ध साफ़ आ रही थी, एक स्वीटी ही ऐसी थी जो की अपनी जिद पूरी करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती थी , और ऐसे जुनूनी लोग अपना अहित तो करते ही हैं, सामने वाले का भी बुरा कर डालते हैं। रचना किसी अहित की कल्पना से डरने लगी।
सुमन जब इन शब्दों को पढ़ रही थी तो उसकी आंखों में विस्मय के भाव थे। वह मोहब्बत के मसीहा राज की जिन्दगी पर आधारित पुस्तक तैयार कर रही थी, इसके लिए उसने अथक प्रयास भी किए थे, वह हर उस आदमी से मिली थी जो इस कहानी के चश्मदीद गवाह थे। उसने राज और स्वीटी से सम्बंधित ज्यादा से ज्यादा पत्र भी संकलित किए थे। कहा जा सकता है की वह सच की तह तक पहुचकर सच्ची दास्ताँ ही लिखना चाहती थी। उसके हाथ जो दस्तावेज लगते थे पहले वह उनका अध्ययन करती थी फ़िर से किताब में स्थान देती थी, वह ख़ुद भी इन बातों का ध्यान रखती थी की कहीं कोई बात ग़लत न लिख जाए।इस वक्त वह स्वीटी और रचना के बीच का संवाद पढ़ रही थी। आगे उसने पढा-
रचना भोली लड़की थी, वह साफ़ सुथरा और शांतिपूर्वक जीवन जीना व्यतीत करती थी लेकिन स्वीटी जैसी लाफ्देबाज दोस्तों के कारण वह अक्सर मुसीबत में फंस जाया करती थी। इस वक्त भी वह सोच रही थी की स्वीटी अगर कोई गड़बड़ करती है तो बेवजह उसका नाम भी बदनाम होगा जबकि वह अपनी सहेली स्वीटी को समझाने का हर सम्भव प्रयास कर रही थी। उसने लास्ट हथियार भी फेका-
-जो तेरा दोस्त है संजीव, क्या राज उससे से भी सुंदर लगता है ? सुना है वह भी तो बड़े घर का लड़का है।
स्वीटी- सिर्फ़ बड़े घर का नहीं , बहुत बड़े घर का है। उसका बाप आईए एस है। इतना ही नहीं , कितने ही मंत्री तो उनके घर ऐसे आते जाते हैं जैसे हम और तुम एक दूसरे के घर आते -जाते रहते हैं।
रचना- तो फ़िर क्या कमी है संजीव के अन्दर? उसे ही क्यों नहीं अपना लेतीं ?
स्वीटी- वो सब बातें अलग हैं यार, तुम बहुत डरपोक किस्म की और दबूपन की बातें कर रही हो।
रचना- तो ठीक है, अगर किसीके ख़िलाफ़ साजिस रचना और उसको तकलीफ देना ही तुम्हारी नजर में बहादुरी है तो ठीक है जाओ, करो जो करना है। मुझे कोई तकलीफ नहीं है। लेकिन मुझे दूर रखो इस झमेले से।
स्वीटी- नाराज हो गईं ? अरे मैं तुम पर कोई कमेन्ट थोड़े ही कर रही हूँ।
रचना- कबसे समझा रही हूँ मगर तुम समझने का नाम ही नहीं ले रही हो। उलटा मुझ पर इस तरहसे व्यंग्य कर रही हो जैसे की मैं ही राज हूँ, वो राज जो रातों को तुम्हें सपने में दिखाई देता है और सुबह होते ही परेशान करने मुझे आ जाती हो।
स्वीटी- तो फ़िर कहाँ जाऊं , राज के कंधे से सर लगाकर तो अपना दुखडा रो नहीं सकती न। वह तो है ही ऐसा बेदर्द की उसके सामने तो कोई अपना दर्द भी नैन कह सकता।
रचना- ऐसा भी मत कहो यार, न्यूज पेपर में उसके बारे में आता है की वह पशु पक्षियों से भी बहुत प्रेम करता है। उनकी खूब मदद करता है। सेवा भी करता है।
स्वीटी - मुझे लगता है की वह पशु पक्षियों से भी नहीं, से ही प्यार करता है, और उनसे ही करने लायक भी है। इंसान से नहीं।
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