Tuesday, October 27, 2009

भाग-३३

इस शेर को वह बार-बार गुनगुनाती थी , अपने अन्दर उतार लेना चाहती थी इन शब्दों के दर्द को। दीप्ति की समझ में यह नहीं आ रहा था की दुनिया इतनी बनावटी क्यों है। यहाँ लोग इतने स्वार्थी क्यों है। उसने इतना उतार चढाव देखा की सब कुछ खोखला नजर आने लगा था। मन का दर्द और भी बढ़ता जा रहा था, इस अकेलेपन को कम करने के लिए उसने किताब लिखनी शुरू करदी, उसने जीवन के प्रत्येक पहलू में काम आने वाले लेख लिखे थे, अब तक वह अपने ग्राहकों को जिन बातों को सिखाती आयी थी, उन्हीं शब्दों को उसे किताब की शक्ल देना था। उसने यही किया भी। अपना तमाम अनुभव उस किताब में लिख दिया दीप्ति ने। वह नियमित रूप से लिखने लगी। उसे इस काम में बहुत संतोष होता था। उसे अपने जीजा की बहुत याद सताती थी, उसके साथ किया प्रणय क्रीडा आंखों के सामने उभर आता था। जब वह जवान थी तो कितने ही लोग उसका दामन थामने के लिए तैयार थे।ये सब पुराने दिनों की बातें थीं। वह सोच ही रही थी की उसको ग्राहक के आने की सूचना मिली। यह एक युवा जोड़ा थी , इनकी शादी अभी-अभी हुई थी। उन्होंने पुछा-
- बेहतर सेक्स लाइफ कैसे जियें?
deepti- अच्छी सेक्स लाइफ के लिए आपका शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ रहना बहुत आवश्यक है, इसके लिए महत्वपूर्ण बैलेंस्ड डाइट, थोडी बहुत एक्सरसाइज भरपूर नींद और ज्यादा चाय,कॉफी,सिगरेट या शराब का सेवन न करना। सस्ती सेक्स किताबों, पोर्नोग्राफिक फिल्मों और समाचार पत्रों मे आए दिन कई विज्ञापनों मे विशेष अंग के आकार या लंबाई को बढा-चढाकर एवं कम लंबाई को एक समस्या के रूप में दिखाया जाता है जिससे युवावर्ग भ्रमित हो जाता है और तनावग्रस्त होकर उल्टे-सीघे उपाय करने लगता है ये सब गलत है छोटे आकार से ऑर्गेज्म में कोई फर्क नही पडता, क्योंकि योनि का केवल एक तिहाई भाग ही सेंसिटिव होता है अत: सही सेक्स पोजीशन में छोटा लिंग भी पूरी तरह चरमोत्कर्ष दे सकता है। सेक्स करते समय किसी और पुरूष की कल्पना उत्तेजित करती है और सेक्स का आंनद बढाती है अत: कल्पना करें,इसके लिए मन में किसी तरह का अपराघबोघ न आने दे. इसमें कोई बुराई नही है। यदि पति-पत्नी दोनों वर्किग है, व्यस्त है, रात को देर से आते है, तो उनकी सेक्स लाइफ न के बराबर होती है। ऎसे में बेहतर होता है कि सुबह उठकर फ्रेश मूड में सेक्स का आनंद उठाएं। कुछ सालों के बाद सेक्स लाइफ बोरिंग हो जाती है, इसलिए एक्सपेरिमेंट करते रहे, अलग-अलग पोजीशन ट्राई करें. कुछ ऎसा जो जिंदगी में रंग भर दे। सेक्स दोनों को शारीरिक ही नही मानसिक रूप से भी करीब लाता है यही जुडाव दांपत्य जीवन की नींव है. खुद का घ्यान रखना, संवरना, खूबसूरत दिखना जरूरी है। बढती उम्र के साथ-साथ सेक्स लाइफ को जीवंत रखना एक चुनौती है. इसके लिए फोरप्ले का समय बढाएं नए तरीके आजमाएं, अपने पुराने दिनों को याद करें, परंतु सेक्स करना बंद ना करें। यदि सेक्स की इच्छा है परंतु आप बहुत थके हुए व तनावग्रस्त महसूस कर रहे है तो डरावनी फिल्म या हॉरर शो देखें या 1 कप कॉफी पीएं, आपका दिल जोरों से घडकने लगेगा इससे शरीर में एड्रीनलीन की मात्रा बढ जाएगी, यही वह केमिकल है, जो सेक्सुअल एक्साइटमेंट (उत्तेजना)पैदा करता है।
उसकी बातों में दम था। वह युवा जोड़ा भी संतुष्ट हो गया। यही खासियत थी दीप्ति की।वह इन बातों को अक्सर बतलाती रहती थी।

Monday, October 26, 2009

भाग-32

मगर दीप्ति ने किसीकी बात नहीं मानी , वह अपनी धुन की पक्की थी, अपनी ही धुन में मगन रही। अपने जीजा का प्यार पाने की आस में वह अब तक कुवारी ही रही। जबकि वह ख़ुद ही लोगों से कहती थी-
-विवाह के बाद आमतौर पर महिलाओ का रूप एकदम से खिल जाता है। आँखों में एक अलग सी चमक आ जाती है। संतुष्टिदायक सेक्स न केवल शारीरिक सुख से जुडा है, बल्कि इसका भावनात्मक पहलू भी अत्यंत महत्तवपूर्ण हैं। जब पुरूष एंव महिला का आपसी शारीरिक संसर्ग होता है,तो महिला में हारमोन का उत्पादन बढ जाता हैं। हारमोन की अघिकता महिलाओं को सेक्स में आक्रामक बनाती है,साथ ही उनमें आत्मविश्वास भी भर देती है। सेक्स संबंघो में तन के साथ-साथ मन का समर्पण भी जरूरी है। यदि पत्नी के दिल को पति की किसी बात से चोट पहुंची है, तो सेक्स के लिए उसका तनमन न तो पति को सहयोग दे पाएगा, न ही वह सहवास के दौरान उत्तेजना महसूस कर पाएगी। यही बात पत्नी पर भी लागू होती है। यदि पति किसी बात से तनावग्रस्त है तो इस से पति की यौन क्षमता पर भी नकारात्मक असर पडेगा। इस्ट्रोजन और टेस्टास्टेरान हारमोन दोनों महिला के अंग में चिकनाहट उत्पन्न करते हैं और सेक्स को चरम आनंद की ओर ले जाते हैं। यह चरम आनंद ही महिला को संतुष्ट एंव खूबसूरत होने का एहसास दिलाता है। यदि महिला के शरीर में इन हारमोन की कमी को जाती है, तो महिला के अंग मे रूखापन आ जाता है। इसके कारण उसे चरम आनंद की प्राप्ति नहीं हो पाती। स्वस्थ सेक्स का संबंघ मानसिक रूप से अघिक जुडा होता हैं। अगर आप सेक्स के दौरान मानसिक रूप से संतुष्ट हैं तो निश्चित रूप से आप के चेहरे पर रौनक एंव आत्मविश्वास आ जाता है। यदि सेक्स से पूर्व आप तन और मन दोनो से पूर्णत: समर्पित हैं तो आप को चरमसुख की प्राप्ति से कोई नहीं रोक सकता। एक संतुष्ट सेक्स दोनो पार्टनर के लिए संजीवनी बूटी की तरह काम करता है। एक संतुष्ट सेक्स ताजगी भरा एहसास, आत्मिक संतुष्टि एंव ऊर्जा प्रदान करता है, जो आपके सौंदर्य को कई गुना बढा देता है। सेक्स से पूर्व फोरप्ले एवं कल्पनाशीलता सेक्स को और भी उत्तेजक बनाता है। सेक्स में स्पर्श तथा नएनए आसन पति-पत्नी में प्यार व निकटता को बढाते हैं। एक संतुष्ट सेक्स संबंघो को मघुर बनाता है और तन एवं मन को खूबसूरत होने का एहसास दिलाता है। मिठास फोरप्ले की - सेक्स को सफल बनाने के लिए संसर्ग के दौरान अपने साथी के मुँह, होंठो गर्दन इत्यादि शारीरिक अंगो की तारीफ करनी चाहिए। यदि मन के भाव एंव नैनो की भाषा पढ कर पति संसर्ग करे तो महिला की नजर में यह पुरूष की मर्दानगी को बढाता हैं। महिलाओको सेक्स में आराम, सुकून एवं फोरप्ले द्वारा दी गई घीमी प्रक्रियाएं बहुत उत्तेजित करती हैं। इससे दोनो मिलकर सेक्स के चरमसुख को प्राप्त कर स्फूर्ति एवं खूबसूरती हासिल कर सकते हैं। सेक्स प्रकिया एक कुदरती आनंद - सेक्स एक ऎसी प्रकिया है, जो शारीरिक एवं मानसिक अभिव्यक्ति व्यक्त करने का कुदरती माघ्यम है। जिस व्यक्ति का मन-मस्तिष्क जितना स्वस्थ होगा, उसकी सेक्स अभिव्यक्ति भी उतनी ही आनंदमय होगी। तनाव व चिंता से मुक्त सेक्स से रोम-रोम पुलकित हो उठता है और तन-मन में नई स्फूर्ति एवं खूबसूरती का एहसास होता है।
लेकिन अपने मामले में वह फिसड्डी ही रही। दुर्भाग्य ने कभी उसका साथ नहीं छोडा।यह शेर उसके जीवन पर सही साबित हो रहा था-'जब दर्द की लहर उठती है, जिन्दगी भी सिहर उठती है'। यह अपनों की बख्शी टीस है, तभी तो शामो -सहर उठती है।

Sunday, October 25, 2009

भाग-31

दीप्ति दौलत और शौहरत के चक्कर में ऐसी फंसी की सुख चैन भी भूल गयी , उसे हरदम बस अपने ग्राहक ही ध्यान में रहने लगे। ग्राहकों की पसंद के हिसाब से भाषण तैयार करना। फ़िर जिस सब्जेक्ट पर उसने सवाल पूछे हैं, उनका अध्ययन करना। ठीक से जवाब देना। अखबार वालों से निरंतर संपर्क में रहना। टीवी रिपोर्टर्स को पिलाना -खिलाना, ये सब बातें उसे अपने आप से अलग करती जा रही थीं। कभी जब वह तन्हाई में होती तो अपने अतीत के पन्ने पलटकर देखती , तब उसे पता चलता की कितनी द्पूर निकल आई है वह। इतनी दूर की वहा से वापस लौटने की कोई छोटी सी पगडंडी भी नजर नहीं आती थी। उसकी बडी बहन खुश थी। उसके अपने बच्चे थे जो दीप्ति के सहयोग से बड़े-बड़े स्कूलों में पढ़ते थे, उसीके सहयोग से उसकी इतनी प्रोपर्टी बन गयी थी की वह बिना कुछ किए भी अच्छी खुश हाल जिन्दगी बसर कर सकती थी।

उसको अपने अच्छे दिन याद आते थे, उन दिनों उसके पास ज्यादा दौलत नहीं हुआ करती थी मगर खुशियाँ कदम चूमती थीं, कभी-कभी तो उसकी जेब मेंकोफी पीने तक के पैसे भी नहीं होते थे, इसके बावजूद वह खुश रहती थी। आज उसके पास में अथाह दौलत है, सभी सुख सुविधाएं हैं मगर शान्ति कहीं गुम हो गयी है, सुकून कहीं गायब है। हर समय मन में एक अजीब सा खौफ बना रहता था, वह कभी -कभी तन्हाई में ख़ुद से ही सवाल करती और फ़िर ख़ुद ही हसने लगती थी। उसके जीजा जब कई कई दिनों तक उसके यौवन का रस लूटते तो उसे स्वर्ग जैसा आभास होता था, मन प्रफुल्लित रहता था । यूँ कहने को तो उसके पास सब कुछ था मगर जब वह हिसाब किताब लगाती तो एहसास होता की उसकी झली तो खाली की खाली थी, जीवन में कोई स्थाईए रंग ही नहीं था। उसकी बहन के पास बच्चे थे जो दीप्ति की मदद से अच्छे स्कूलों में पढ़ते थे, दीप्ति की मदद से ही उसका जीजा आसपास के गावों का सबसे बड़ा जमींदार बन चुका था। अब उसे कमाने की भी कोई जरूरत नहीं रह गयी थी। मगर दीप्ति के पास सिर्फ़ शौहरत थी, और दौलत थी। लेकिन क्या सिर्फ़ इसीके सहारे जीवन जिया जा सकता है क्या ? उसे याद आने लगे वे दिन जब उसकी एक सहेली उसे समझाया करती थी-

- ये तुम ग़लत कर रही हो दीप्ति । इश्क की यह आग जिस दिन भड़केगी न , उस दिन तुम्हारा समूचा वजूद इसमें भस्म हो जाएगा । मर्दों का ज्यादा कुछ नहीं बिगड़ता है, उनसे कोई कुछ ज्यादा पूछताछ भी नहीं करता । सब लोग लास्ट में लड़की को ही दोष देते हैं, और फ़िर भुगतना हम लोगों को ही पड़ता है, मर्दों को नहीं। तुम्हारे जीजा तो मौज मस्ती लेकर अलग पड़ेंगे और फ़िर फंसेगी तू। तेरी बहन भी नफरत करने लगेगी तुझसे , क्या तू अपनी बहन का घर तोड़कर खुश रह सकेगी।

दीप्ति- मैं ऐसी नौबत ही नहीं आने दूंगी, दीदी का घर बरबाद करने से पहले मैं ख़ुद ही बरबाद हो जाउंगी।

सहेली- आख़िर बात तो वही हुई न। चाकू सेब पर गिरे या सेब चाकू पर , अंत में जो नुक्सान होता है वह सेब का ही होता है,। इसलिए कह्त्ति हूँ अभी से अपनी आँखें खोल ले। गाँव में भी सबको ख़बर लगती जा रही है। तू विदेश में क्या रहकेआयी है, गाँव के तौर तरीके ही भूल गयी है। यहाँ पर कोई भी खुश नहीं है तेरी रासलीला से। अगर यही सब चलता रहा तो एक दिन ऐसा आएगा की तू किसी और से शादी करने लायक भी नहीं रहेगी। सब चुगली कर देंगे तेरी, समझ रही है लैला।

दीप्ति -अभी से शादी कौन मूर्ख करता है, अभी तो समय है। आराम से की जायेगी, पहले कैरियर और साथ में मौज मस्ती , उसके बाद शादी, तब की तब सोचेंगे। चल मेरी फ़िक्र छोड़कर तू अपने बारे में सोच। तेरी कहीं सैटिंग हो पाई की नहीं।

सहेली- ठीक है दीप्ति, अगर ज्यादा कुछ कहूँगी तो बुरा लगेगा तुझे , सोचोगी की मैं जलकर कह रही हूँ।

दीप्ति- नहीं यार, इतनी बुरी भी नहीं हो तुम। मैं जानती हूँ तुम मेरी भलाई की बात करती हो मगर मैं क्या करुँ, मुझे अपने आप पर ही गुस्सा आ रहा है, मैं कंट्रोल नहीं कर पाती यार , जीजा की सूरत ही मेरे मन मन्दिर में बस गयी है, बस मुझे वही दिखाई देती है, उनके बिना मेरा जन्म अधूरा है। मैं पशोपेश में हूँ , शादी किस्से किस्से करुँगी, कैसे होगा ये सब, जीजा की यादें दिल से कैसे निकलेंगी , मगर कोई राह नहीं सूझती।

सहेली- तू अपनी पढाई पर ध्यान दे, बाकी सब भूल जा। मेरा कहना मान। यहाँ का माहौल तेरे लायक ही नहीं है। हमारा यह गाँव बहुत पिछडा है, यहाँ के विचार उससे भी ज्यादा पिछडे हुए हैं। तुझे कोई नहीं समझ पायेगा यहाँ।



Saturday, October 24, 2009

jeejaa jameendaar , भाग-30

दीप्ति सचमुच उस्ताद थी, उसके पास हर उम्र के लिहाज से मसाला मौजूद था। एक महिला अपने पति पर शक करती थी। दीप्ति ने उसे इस तरह समझाया -
-घर से बाहर लिफ्ट मिलते ही पुरूषों को फिसलते देर नहीं लगती पर वह फिसलन अपने साथ कुछ निशान भी छोड जाती है,जिस से तुमको को सजग हो जाना चाहिए,नही तो आपके परिवार के लिए इसके परिणाम गंभीर हो सकतें हैं। किसी भी स्त्री के पति को इश्क का रोग लग जाना कोई छोटीमोटी आम घटना नही हैं। इस रोग का गंभीर रूप उनके बीच तलाक का कारण बन सकता हैं। दूसरी स्त्री से प्रेम का चक्कर चलाने को उत्सुक पति का व्यवहार बदले बिना नही रह सकता। उसके उपर मानसिक व भावनात्मक दबाव ज्यादा रहता हैं। उसे कभी नए रोमांस की उत्तेजना , तो कभी पत्नी को छलने का अपराघ बोघ। वह इस अफेयर को छिपा कर रखना चाहता हैं। उसे अपनी बदनामी का डर रहता हैं। जरूरी है कि पत्नी अपने पति में आये इस बदलाव को तभी पहचाने जब उस के पति के कदम ताजाताजा भटकने आरंभ ही हुए हो, तो पत्नी उसे रोकने में सफल हो सकती है। इश्क की पतंग उडाने के चक्कर में पतिदेव का व्यवहार बदलेगा। कभी वह बेवजह बहुत प्रसन्न नजर आएंगे तो कभी तनावग्रस्त व चिडचिडे। प्रेमिका का व्यवहार आपके पति का मूड निर्घारित करता है। प्रेमिका की यादों मे खोए साहब पत्नी की बगल में होतें हुए भी कही दूर होतें है। पतिदेव घर पर देर से आने लगेंगे। किसी बिमार दोस्त को देखने जाने के मौके बढने लगेंगे। दोस्त भी ऎसा होगा जिस से बीवी की मुलाकात होने की उम्मीद न के बराबर हो। ओवरटाइम करने का जौश अचानक बढ जाएगा। आपके पति का वार्डरोब अब उनकी प्रेमिका की पसंद पर निर्भर होगा। नए रंग व नए स्टाइल में खुद को आकर्षक बनाने का प्रयास करेंगे। उनका ज्यादा वक्त शीशे के सामने बीतेगा। दाढी बडे घ्यान से बनने लगेगी। सेंट और डियो की खरीददारी में बढोतरी होगी। वजन, खास कर के तोंद कम करने के लिए घूमना व व्यायाम करना आपके पति की दिनचर्या में शामिल हो जाएगा। अपने डौले चेक करते हुए दिन में कई बार पत्नी उन्हे पकड सकती है। इश्क के शुरूआती दिनों में रोमांस की बैटरी प्रेमिका चार्ज करती है और इस का फायदा पत्नी को भी पहुंचता हैं। कहीं का जोश कहीं उतरता है। तब पत्नी इस भ्रम का शिकार हो जाती है कि उस के साहब उसे पहले से ज्यादा प्यार करने लगे है। घीरे घीरे प्रेमिका से तुलना कर के पतिदेव पत्नी से खीजने लगते है। तब रोमांस की जगह उदासीनता,चिढ व तानो का सामना करना पड सकता है। यौन संबंघो में पति की तरफ से अकारण बहुत ज्यादा बदलाव आ सकता है। प्रेमिका से मिलने की राह का कंाटा प्रतीत होने वाली पत्नी से पतिदेव के संबंघ घीरेघीरे अपनी सहजता व आत्मीयता खोने लगेंगे। पत्नी के मायके जाने की बात पर पति की आँखो में खुशी की चमक चंद पलो के लिए साफ देख सकते है। पति के व्यवहार व स्वभाव में छोटे बडे बहुत से बदलाव पत्नी नोट कर सकती है, जो उस के जीवन में प्रेमिका की मौजूदगी की तरफ इशारा करेगे। पति की आँखो में गहराई से झांकने पर यदि पत्नी को प्यार ,खुशी, संतोष व अपनेपन की जगह नाराजगी, चिढ, अपराघबोघ, नफरत व गुस्से जैसे भाव अकारण नजर आयें तो समझ लेना चाहिए कि दोनों दिलों के बीच दूरियां बढ गई हैं और इस के पीछे दूसरी औरत की मौजूदगी हो सकती है। गंभीर परिणाम - जब पति अपनी प्रेमिका की खातिर पत्नी से दूर होने का फैसला मन ही मन कर लेता है। तब इश्क का रोग गंभीर रूप ले लेता है। फिर पत्नी के साथ मानसिक व भावनात्मक स्तर पर कैसा भी संबंघ रखने में पति की दिलचस्पी नही होगी। वह तलाक लेने का इच्छुक बन जाता है। अब प्रेमिका के अस्तित्व को पत्नी की नजरों से छिपा कर रखने में पति की दिलचस्पी नही रहती। गुस्सा हमेशा उसकी नाक पर बना रहता है और आँखों से छोटी सी बात पर भी नफरत की चिनगारियां बरसने लगती है। पति अपनी पत्नी से छुटकारा पाने की घमकी खुलेआम देने लगता है। इसका एक ही ilaaj है -प्यार , प्यार और प्यार ।

Friday, October 23, 2009

जीजा जमींदार , भाग-29

दीप्ति के पास हर सवाल का जवाब था। सेक्स से लेकर शिक्षा तक वह हर मामले में प्रवीण थी। वह माँ नहीं थी, इसके बावजूद उसमे सभी गुन मौजूद थे। दीप्ति ने अपनी एक क्लायंट से कहा-
-जब आपका बच्चा इस दुनिया में अपने नन्हे कदम रखता है, तो उस समय वह सभी बातो से अनभिज्ञ होता हैं। कुछ समय बाद वह अपने ईर्द-गिर्द के माहौल को थोडा समझने लगता है। उस समय वह बोलनेमें सक्षम नही होता हैं। तब आप अपने शिशु को सांकेतिक भाषा से अवगत करा सकते हैं। लगभग सभी मातांए अपने शिशु से सांकेतिक भाषा में बात करने की कोशिश करती हैं जैसे- हाथ हिलाकर बॉय करना, फ्लाईग किस देना इत्यादि। लेकिन उन में से बहुत कम होती हैं जो अपने शिशु को सांकेतिक भाषा सिखाने का प्रयास करती हैं। जब तक आपका शिशु ठीक तरीके से बोलना नही सीख जाता तब तक आप सांकेतिक भाषा के माघ्यम से उसकी भावनाओ को ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकती हैं। हम आपको बता रहे हैं की किस तरह आप अपने शिशु को सांकेतिक भाषा सिखा सकती हैं। पहले स्वय सीखें- आपके शिशु को सांकेतिक भाषा सिखाने से पहले आपको भी इसका ज्ञान होना आवश्यक हैं। आप इसकी शुरूआत अपने शिशु की आघारभूत जरूरतों से कर सकती हैं जैसे- "मम्मी" , "पानी" , "बोतल" , "दूघ" इत्यादि। घ्यान रखे कि आपके घर में सभी लोग एक ही प्रकार के संकेतो का प्रयोग करें। जैसे-यदि आप "बोतल" के लिए किसी संकेत का प्रयोग करती हैं और आपके पतिदेव उसी शब्द के लिए किसी दूसरे संकेत का प्रयोग करेगें तो आपका शिशु उसे नही सीख पायेगा क्योकि वह अलग-अलग संकेतो से भ्रमित हो जायेगा और आपके सभी प्रयास व्यर्थ हो जायेंगे।अत: यह सुनिश्चित कर लें कि आपके घर में सभी लोग एक तरह के संकेतो का प्रयोग करें। छोटे स्तर से शुरूआत करें - प्रारंभिक स्तर पर आप बेसिक शब्दो के लिए ही संकेतो का प्रयोग करें। यदि आप सभी शब्दो के लिए संकेतो का उपयोग करेंगी तो आपका शिशु उसे समझनहीं पायेगा। अत: आप उसे घीरे-घीरे संकेतो से परिचित करायें। आप उसे प्रारंभिक स्तर पर ऎसे संकेत सिखाएं जो वह आसानी से सीख सके। छोटे-छोटे संकेतों को आपका शिशु आसानी से और जल्दी सीख पायेगा। इसलिए आप छोटे संकेतो से शुरूआत करें तो बेहतर होगा।इस तरह से आपके शिशु के लिए संकेत सीखना आसान हो जायेगा। जब आपका शिशु छोटे-छोटे संकेतों को सीख जाएं तो आप उसे थोडे कठिन संकेत सिखाना शुरू करें। इन संकेतो को आप अपनी दिनचर्या में शामिल करें और उसे अपनी आदत बनाएं। यदि आप इन संकेतो को अपने शिशु के साथ नियमित या रोजाना प्रयोग नही करेंगी तो आपका शिशु इन्हे नहीं सीख पायेगा। जैसे- आप जब भी अपने शिशु को दूघ दें,तो हमेशा उसको संकेत में समझाने की कोशिश करें। जब भी आप अपने शिशु से संकेतों में बात करें,तो आपकी नजरें उसकी आँखो की तरफ होनी चाहिए। इससे आपके बच्चो का घ्यान आप की तरफ रहेगा। जब आप ऎसा रोजाना करेंगी तो आपका शिशु जल्द ही आपके संकेतो और कार्यकलापो को समझने लग जायेगा। नये संकेतो को जोडे- आपको प्रत्येक 2-3 सप्ताह में उसे नये संकेतो से अवगत कराना चाहिए। आपका शिशु 2-3 सप्ताह में उन संकेतो को सीख जायेगा। एक शिशु को थोडे संकेत सीखने में इतना वक्त तो लग ही जाता है। इसके बाद घीरे-घीरे आप उसे ऎब्सट्रेक्ट संकेतो से अवगत करायें। जैसे- उसके हाथ में कोई भी वस्तु देकर उससे वापस मांगे या उसे खडा होने के लिए संकेत में कहे इत्यादि।आप अपने शिशु को खेल-खेल में भी बहुत से संकेत सिखा सकती हैं। जैसे आप उससे रूठने का,गुस्सा होने का या डरने का अभिनय कर सकती हैं। आप अपने चेहरे के भावों से उसे काफी सिखा सकती हैं। आप अपने शिशु को चित्रो के माघ्यम से भी सांकेतिक भाषा सिखा सकती हैं। चित्र रंगीन और आकर्षक होने चाहिए, जिससे कि आपका शिशु उसकी तरफ आकर्षित हो सके। जैसे किसी "पार्क" का चित्र या किसी "कार्टून" का चित्र जिसमें अलग अलग भाव हो। इस माघ्यम से भी आपका शिशु जल्दी सीख पायेगा।

Thursday, October 22, 2009

भाग-28

दीप्ति के पास धन दौलत की कोई कमी नहीं थी, सिर्फ़ एक सच्चा प्यार ही नहीं था, ऐसा प्यार जिसे वह अपना कह सके। इसी बात की टीसउसको परेशान करती रहती थी। अपने ग्राहकों के बीच प्यार बांटकर वह अपने दुखों को कुछ कम कर लिया करती थी। वह अपने ग्राहकों को ऐसी -ऐसी tips देती थी जो उनके जीवन के लिए काफ़ी faaydemand साबित होती थी। एक graahak से उसने कहा-
-पुरातनकाल से सेक्स जीवन का महत्तवपूर्ण हिस्सा रहा है। सेक्स जीवन की सांस के साथ उस समय से जुड जाता जब व्यक्ति बचपन से युवा उम्र में प्रवेश करता है। यही वह समय है जब व्यक्ति को इस विषय पर सही जानकारी मिलनी चाहिए। सेक्स के बारे में लोगों में अनेक भ्रांतियां बनी हुई हैं। अगर सही ढंग से चिकित्सीय सलाह दी जाए तो सेक्स रोगों में कमी आ सकती है। परिवर्तन और सेक्स: हाई टेक्नोलोजी के चलते न सिर्फ इंटरनेट और मोबाइलका इस्तेमाल बढा है, बल्कि लोग पहले से ज्यादा एकदूसरे से चैटिंग के जरिए अपने दोस्त विदेशों तक में बना रहे है। इन सब के पीछे उन के दिल में छिपी यौन कामना ही है। लेकिन उन के बेसिक ज्ञान का स्तर लगभग शून्य होता है। जिस की वजह से युवाओं का एक बडा वर्ग घीरे-घीरे मानसिक अवसाद का शिकार होता जा रहा है। पिछले कुछ सालों में मानसिक चिकित्सकों के पास सेक्स के मामलों में काफी वृद्घि हुई है। आश्चर्यजनक बात यह है कि लोगों में ही नहीं बल्कि कई डाक्टरों में भी यह भ्रांति है कि जिस पुरूष के अंग का साइज बडा होगा और जिस महिला के ब्रेस्ट बडे होंगे उन्ही के साथ अच्छा सेक्स मिलेगा। यह बात पूरी तरह से गलत है, क्योंकि पुरूष के अंग का टौप ही संवेदनशील होता है और महिलाओं में अंग का बाहरी 1 इंच का हिस्सा ही संवेदनशील होता है। सारी क्रियाएं इसी पर निर्भर होती है। साइज का कोई महत्तव नहीं है। बाजार में मिलने वाली सेक्सवर्घक दवाएं, स्प्रे, इत्यादि किसी प्रकार का इफेक्ट नहीं करतीं और जब इफेक्ट नहीं करती हैं तो साइड इफेक्ट भी नहीं होता। स्वपदोष, घातु, हस्तमैथुन आदि प्रकियाएं स्वाभाविक है, कोई रोग नहीं हैं। दौरा, हिस्टीरिया, डिप्रेशन आदि बीमारियों के लिए सेक्स एक उचित इलाज है। कई बार ऎसा देखा गया है कि यदि महिलाएं सेक्स क्रिया में संतुष्ट नहीं हैं तो अवसाद में घिर जाती हैं। पुरूषों में 68 वर्ष की उम्र तक सेक्स क्रिया में कोई कमी नहीं आती। यदि पति-पत्नी निरंतर क्रिया करते रहे हों तो पुरूषों में प्रोस्टेट कैंसर होने की संभावना बिलकुल कम हो जाती है। कुछ लोगों का मानना है कि शराब सेक्स पावर बढाती है जबकि नशा ब्रेन सेक्स सेंटर को प्रभावित करता है और आप किसी लायक नहीं रह जाते। व्यक्ति का फैमिली डॉक्टर यदि सेक्स विशेषज्ञ है तो मरीज को कोई परेशानी नहीं होगी परन्तु ऎसा नहीं होने पर मरीज को दरदर भटकना पडेगा। इसी तरह महिलाओं में गर्भ के दौरान, महावारी के दौरान तथा मीनोपाज के बाद सेक्स प्रकिया क्या होनी चाहिए, उस समय शरीर किस तरह सक्रिय होता है, ये सभी जानकारियां यदि मरीज को डॉक्टर्स से आसानी से मिलती रहे तो नीमहकीमों की दुकानें लगभग बंद हो जाएंगी और लोगों में सेक्स के प्रति भ्रांतियों में कमी आयेगी। कम उम्र में सेक्स के अनुभव का प्रयास युवाओं को मानसिक अवसाद की ओर ले जाता है। इससे उन में शीघ्रपतन की समस्या सामने आने लगती है। ऎसी बीमारीयों का इलाज जागरूकता व शिक्षा से ही संभव है। सेक्स लाइफ का एक पार्ट है। आज कई लोग पर्याप्त काउंसलिंग के अभाव में स्वयं को इस लिहाज से समाप्त करते जा रहे है। विशेष् डाक्टर्स को तरजीह दी जाए। आज का युवा वर्ग मानसिक अवसाद में आकर यौन समस्याओं का शिकार हो रहा है। इन में सेक्सुअल प्रौब्लम का मुख्य कारण दूसरी बिमारियां होती है जैसे-उच्चा रक्तचाप, आरामदायक जीवन व्यतीत करना, घ्रूमपान करना आदि। सेक्स की बेसिक जानकारी की आवश्यकता विवाह के उपरांत या जोडे में होने पर होती है। उस समय सामने आने वाली समस्याओं के लिए डाक्टर और एक्सपर्ट जरूरी हैं। स्कूल स्तर पर केवल सुरक्षा और सावघानियों से अवगत कराया जाए तो बेहतर होगा। शहरों में माता-पिता के पास समय का अभाव होता है। अत: कहीं न कहीं हमारी परवरिश भी बच्चों को भटकाने के लिए जिम्मेदार है।

Tuesday, October 20, 2009

भाग-26

दीप्ति ने जब उस ग्राहक को संतुष्ट कर दिया तो उसके चेहरे पर खुशी के भाव उभरे । वह ऐसे दौर से गुजर रही थी जहाँ उसके लिए पैसा नहीं, दूसरे लोगों की संतुष्टि ही महत्वपूर्ण थी। एक ग्राहक ने उससे सवाल किया-
-सेक्स के लिए सबसे बड़ी समस्या क्या है ?
दीप्ति - आज के युग में यदि उस बडी समस्या का जिक्र किया जाए जिससे विश्व के हर देश का मानव जूझ रहा है तो यकीनन वह होगा ""तनाव"" फिर चाहे वह देश विकसित हो या विकासशील। ऎसा लगता है मानों ईश्वर के बाद यही सर्वव्याप्त है। घन है तब भी, नहीं है तब भी, विवाह हुआ तब भी, नहीं हुआ तब भी, संतान है तब भी, नहीं है तब भी, बहुत कुछ है तो न खोने का तनाव, कुछ नहीं है तो पाने का तनाव। मन में प्रश्न यह उठता है कि क्या तनाव का physical existence है या यह एक छाया की तरह पूरी मानव जाति को निगलता जा रहा है। भले ही यह सवाल वैज्ञानिकों को तंग कर रहा हो कि डायनासोर इस पृथ्वी से कैसे लुप्त हुए परंतु मानव जाति का कभी अंत हुआ तो उसका कारण तनाव ही होगा। यदि तनाव को परिभाषित करने का प्रयास करें तो जो चित्र उभरता है वह यह है कि जब मनुष्य अपने आस-पास के माहौल से तारतम्य नहीं बैठा पाता तब तनावग्रस्त होता है। तनाव से लडने के वैदिक उपाय , तनाव की जन्मस्थली हमारा मन है और मन का संबंघ "चद्रमा" से है। जन्मपत्रिका में जब चंद्रमा पर पापग्रहो का प्रभाव होता है तभी मन की शक्ति प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती है। ऎसी स्थिति में व्यक्ति परिस्थितियों से घबरा जाता है, जो नहीं है, उसकी भी कल्पना करके खुद को ही प्रताडित करता है। ऎसी स्थिति में चंद्र दर्शन अत्यंत लाभदायक सिद्ध होता है। चन्द्रोदय के पश्चात् कुछ समय के लिए एकांत में बैठकर चंद्रमा को देखना चाहिए और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि उनकी जिन रश्मियों के अभाव से मन व्याकुल है, वे उन रश्मियों की पूति करें और हमारे मन को मजबूती और स्थिरता प्रदान करें। ऎसा नियमित रूप से कुछ समय करने से बहुत लाभ मिलता है। सूर्य नमस्तनाव पर विजय पाने के लिए दूसरा आवश्यक तत्व है - "आत्म-विश्वास"। आत्मा के कारक सूर्य ही वह आत्मविश्वास दे सकते हैं जिससे व्यक्ति को यह यकीन हो कि वह हर परिस्थिति का सामना कर सकता है। एकमात्र इस विश्वास से ही तनाव रूपी महादानव का समूल अंत संभव है। जन्मपत्रिका में सूर्य कमजोर होने से व्यक्ति का आत्म-विश्वास डगमगा जाता है, हीन-भावना उसे घेर लेती है और घीरे-घीरे वह तनावग्रस्त हो जाता है। सूर्य के संपूर्ण फलों को प्राप्त करने के लिए सूर्य नमस्कार सर्वाघिक कारगर उपाय है। एक से सवा माह के भीतर ही अपेक्षित परिणाम प्राप्त हो जाते हैं। यदि लंबे समय तक सूर्य नमस्कार नियमित किया जाए तो एक सुदृढ व्यक्तित्व प्राप्त किया जा सकता है। सूर्य रोजगार, सरकार, निरोग आदि के नैसर्गिक कारक हैं। सूर्य नमस्कार से इन क्षेत्रों में भी अच्छे परिणाम मिलते हैं। एक ओर जीवन की समस्याओं से जूझने की शक्ति बढती है तो दूसरी ओर समस्याओं की तीव्रता में कमी आती है। गायत्री मंत्र का संबंघ सूर्य से है। यदि नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जाप किया जाए तो चित्त को बल प्राप्त होता है और व्यक्ति कठिन समय मे विचलित नहीं होता। भारतीय परिवारों में बच्चों को गायत्री मंत्र तब ही सिखा दिया जाता है जब वह उसका मतलब भी नहीं समझते। कहने का तात्पर्य है कि मजबूत व्यक्तित्व के निर्माण मे गायत्री मंत्र अत्यन्त लाभदायक होता है। गायत्री मंत्र आत्मा की शुद्धि करता है, व्यक्ति में निष्पक्ष रूप से स्वयं का मूल्यांकन (Self Analysis) की क्षमता आती है, ये वो गुण हैं जो किसी भी समस्या से लडने की और परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने की ताकत देते हैं। रत्न: जन्म के समय सभी ग्रह अपनी रश्मियां देते हैं। पूर्व जन्म के कर्मो के आघार पर जिस ग्रह की रश्मि हमें कम प्राप्त होती हैं, उस ग्रह से संबंघित कारकत्व प्रतिकूल रूप से प्रभावित हो जाते हैं। लग्नेश का संबंघ आत्मविश्वास और व्यक्तित्व से है इसलिए लग्नेश का रत्न अत्यघिक लाभदायक होता है। इस प्रकार वैदिक उपायों को अपनाकर तनाव रूपी महादानव का सामना कर सकते हैं।