Sunday, September 7, 2008

भाग-१००

उनको यह भरोसा होने लगा था की अब वे भी अपने प्रेम की मंजिल तक पहुँचने में कामयाब हो सकती हैं... बस एक बार रास्ता बनाने में ही तःलीफ होती है... बाद में तो सब कुछ लीक पर ही चलकर ठीक-ठाक हो जाता है...इसी उम्मीद पर ये सारी दुनिया कायम है...आशा के आंसू vऐसे तोसब कुछ बयान कर रहे थे, लेकिन चंदा के मन के किसी कोने में यह डर भी बसा हुआ था की कहीं आशा के आंसू घडियाली तो नहीं... मालती बहुत पशोपेश में थी.... विनीत पास में खड़ा होकर यह सब नज़ारा देख रहा था... सहसा आशा के मुख से शब्द निकले-
-तू उधर खड़ा हुआ क्या देख रहा है? क्या तू अपनी माँ से आशीर्वाद नहीं लेगा ?
विनीत को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ ... वह जो सुन रहा था, उस पर सहज भरोसा करना कठिन था...वह तुंरत उसके क़दमों में झुक गया... आशा ने उसको भी अपने गले से लगा किया .... अब वह आशा और विनीत से ऐसे प्यार कर रही थी, मानो वे उसकी अपनीं संतान हो....आशा बोली-
- जाओ, तुम दोनों आजाद हो... सिर्फ़ तुम ही नहीं, मेरे कोठे का कोई भी कर्मचारी आज से स्वतंत्र है... वह अपनी मर्जी से कहीं भी आ-जा सकता है... अब मेरा किसी पर कोई क़र्ज़ नहीं है... कोई जोर नहीं है... अब तक मैंने तुम लोगों के साथ बहुत ज़ुल्म किए, अब मेरी आँखें खुल चुकी हैं ... इन प्यार के परिंदों ने मेरे दिल से नफरत की ज्वाला को पूरी तरह से शांत कर दिया है... मैं अपने अहम् को संतुष्ट करने के लिए नजाने कितने पाप करती रही... अब मैं इन पापों का प्रायश्चित करनाचाहती हूँ...आज मैं अपनी सारी चल -अचल संपत्ति अपनी ख़ास सहयोगी मालती को सौपती हूँ... तुम लोग यहाँ पर जितने भी कर्मचारी हो, उन सबको मैं आश्वस्त करना चाहती हूँ की किसी को भी निराश होने की जरूरत नहीं है... मैं मालती से कहूँगी की कोठे को तो तत्काल बंद कर दे लेकिन साथ ही लोगों के लिए भी कोई व्यवस्था कर दी जाए , ताकि ये लोग बेरोजगार न हो सकें... तुम लोगों को दुखी देखना मेरा मकसद नहीं है...
आशा ने ये बातें बेहद संजीदगी से कही थीं, इसके बावजूद ऐसा लगता था मानो किसी भी समय वह ये एलान न कर दे की वह तो महज़ मजाक कर रही है... तमाम वेश्याएं आँखें फाड़-फाड़ कर देख रहीं थीं... उसने पुछा-
-मैं आप लोगों से ये जानना चाहती हूँ की किसी को इस सम्बन्ध में कुछ कहना तो नहीं है ?
एक दलाल- अगर धंधा बंद कर दिया तो हम लोग खाएँगे क्या ? हमारे बच्चे भूखे मर जायेंगे... हमने दूसरे कोठे के लोगों से तुम्हारी खातिर बहुत पंगा लिया है, अब उन लोगों का नजरिया हमारे प्रति बहुत क्रूर हो जायेगा.... इस तरह हम जियेंगे कैसे ?
मालती- फ़िक्र मत करो, वो सब हमारी जिम्मेदारी होगी... अब तुम्हें पहले से ज्यादा पगार भी मिलेगा और कोई गलत् काम भी नहीं करना पड़ेगा...
आशा- सूना तुम लोगों ने ... तुम सब लोगों को नौकरी भी मिलेगी और बुरा काम भी नहीं करना होगा...
आशा की बातें सुनकर वहाबं पर उपस्थित सभी लोगो के चेहरे पर मुस्कान नाचने लगी ... सब लोग महसूस कर रहे थे ,जैसे की उनको खुली आंखों से सपना दिखाया जा रहा हो....विनीत कहने लगा-
-मुझे माफ़ कर दीजिये... आप तो सचमुच देवी हैं... जीती-जाग्तियो देवी....


Saturday, September 6, 2008

भाग-99

यहाँ तक की भूखा मरना भी मंज़ूर है, लेकिन चंदा को इस नर्क में एक दिन भी नहीं रहने दूंगा...
आशा- यह तुम्हारा जोश है,भावुकता है .... जब ये सपने सचाई के धरातल से टकरायेंगे तो क्या होगा ? सब कुछ ख़त्म हो जायेगा... सारे ख्वाब और ख़याल बिखरकर मिटटी में मिल जायेंगे ....
विनीत-आप यकीन मानिए,ऐसा कुछ नहीं होगा... वो लोग दूसरे होते हैं जो वादेसे मुकर जाते हैं या फ़िर अपना स्वार्थ साधने के लिए प्यार का ढोंग रचते हैं...
चंदा- मैं भी विनीत की बातों से सहमत हूँ, आपने मुझे बेटी की तरह पाला, सहारा दिया, स्नेह दिया ... मैं उसके लिए आपको जीवन भर याद रखूंगी... आपको याद करती रहूंगी, आपका सम्मान करती रहूंगी ... लेकिन सम्मान का अर्थ यह भी ही नहीं की मैं आपकी बात मानकर अपने प्यार का गला घोंट देते हैं...दगा नहींहो सकती...
चंदा ने अपने दोनों हाथ जोड़कर यह बात इतने मार्मिक ढंग से कही की मालती और आशा के दिलों पर असर कर गयी ... उसके शब्दों में द्रढ़ता थी... लहजे में इज्जत और आंखों में सच्चाई ... मालती बोलने से हिचकिचा रही थी... बहुत ज्यादा जरूरत हुई तो थोड़ा बहुत बोल दिया करती थी... उसके दिलो-दिमाग में बहुत बड़ा तूफ़ान उठा हुआ था... वह हमेशा आशा के बारे में चिंतित रहती थी... आशा द्वारा कोठा छोड़ने की मंशा ने मालती को अन्दर ही अन्दर परेशान कर दिया था... काफी देर तक सब लोग चुप रहे... आखिरकार चंदा के सब्र का बाँध टूट गया... उसकी आंखों से गंगा -जमुना की धारा बहने लगी... वह पास में खड़ी आशा के गले से लिपट कर फ़ुट-फ़ुट कर रोने लगी... यह ऐसा द्रश्य था, जब कोई दुल्हन अपना पीहर छोड़कर सौराल के लिए विदा होती हैउर पास में खड़ी माँ या पिता से लिपटकर फ़ुट-फ़ुट कर रोने लगती है ... सब हैरान थे... इस द्रश्य को जो भी देखता वही हैरान हो जाता ... आशा नें चंदा को अपनी बांहों में ऐसे जकड लिया था, मानो उसको ज़रा भी ढीला छोड़ा तो वह उससे हमेशा के लिए जुदा हो जायेगी... इससे भी ज्यादा आशचर्य की बाटी तो ये थी की आशा की आंखों से भी आँसू निकल रहे थे... यानी की जिस आशा ने उम्र भर लोगों को खून के आँसू रुलाये थे , वही अब ख़ुद रो रही थी... उसके मन का सारा मेल धुल रहा था... कई बरसों से रूह में जो जहर इकट्ठा हो रहा था, वह अब धीरे-धीरे बह रहा था... आंसुओं की शक्ल में अब बुराइयां बह रही थीं... आशा का ह्रदय परिवर्तन हो चुका था... विनीत भी खुश होकर रोने लगा... उसकी समझ में नहीं आ रहा था की वह अपनी खुशी का इज़हार कैसे करे ... कुछ आशंकाएं जरूर थीं मगर साफ़ तौर पर इतना तो स्पष्ट हो ही गया था की आशा को उनके रिश्ते पर कोई एतराज नहीं है...यह ख़बर कोठे पर मौजूद सभी लोगों तक पहुच चुकी थी... सभी के दिलों में बजाब की हलचल थी... तरह-तरह की चर्चाएँ चल रहीं थीं... दलालों के मन में थोड़ा सा रोष जरूर था... यह कुछ दलालों को अपना अस्तित्व धोखे में नज़र आने लगा था... वे वेश्याएं बेहद खुश थीं जिनके मन में प्यार तो पल रहा था लेकिन डर के मारे वे ये बात किसी को बताती नहीं थीं... अब उन्हें उम्मीद की किरण नज़र आने लगी थी...

भाग -८१


भाग -८१
लेकिन यह बात मैं तुमसे कह नहीं पाया था... मुझे इस बात का डर था की मेरी बात सुनकर तुम नाराज़ न हो जाओ ... अगर कोई और माहौल होता तो मैं इस तरह डर-डर के प्रस्ताब रखने के बजाय मैं बड़े रोमांटिक अंदाज़ में ये बात कहता ... मुझे बुरा मत समझना ... मन से लाचार हूँ...उसकी बातें सुनकर अलसाई हुई आशा के कान खड़े हो गए... उसे अचानक इस तरह के प्रस्ताब की आशा नहीं थी... उसकी आंखों से नींद गायब हो गयी... उस वक़्त वह बस इतना ही कह पायी थी-- ये आप क्या कह रहे हैं?मैं ..............?
सलीम -क्यों ?तुम क्यों नहीं? क्या परेशानी है ? अगर तुम अपने गर्भ में पल रहे शिशु के बारे में सोचती हो तो ये अच्छी बात है... मैं तुम्हारे हर निर्णय का स्वागत करूँगा...
आशा- मैं किसी से प्यार करती हूँ सलीम... उसको छोड़कर मैं किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में सपनों में भी नहीं सोच सकती... जब तक मैं जिउंगी , राजू की ही बनकर रहूंगी...
सलीम-ठीक है... मैं कहाँ इंकार करताहूं, मैं भी चाहता हूँ की आप अपने राजू से मोहब्बत करें... लेकिन sath ही यह भी मान लें की अब राजू इस दुनिया में नहीं हैं... अब सिर्फ़ राजू की यादों से ही प्यार किया जा सकता है... उनकी आत्मा का साथ ही प्राप्त किया जा सकता है... यह जीवन पहाड़ जैसा होता है... अकेले यह जिंदगी की गाड़ी की नहीं चलाई जा सकती... सफर बहुत काँटों भरा होता है... तनहाई का दर्द मुझसे बेहतर कौन जान पायेगा...यह ज़माना इतना सीधा नहीं है, जितना की आमतौर पर दिखाई देता है...
आशा- आप हैं ना... आप दुनिया जैसे नहीं हैं ना... जब आपने उन मवालियों को धमकाया था, मैं तभी जान गयी थी की आप सबसे अलग हैं... मगर.....
सलीम- मगर क्या आशा ?
आशा- अब तो तुम्हारे साथ जाने में भी हिचक सी हो रही है...
सलीम- मेरे साथ जाने में तकलीफ कैसी ? मैं तुम्हें कोई परेशानी नहीं होने दूंगा... जब भी तुम्हारे मन में मेरे प्रति प्यार का भाव उमड़ आए, तब मेरी बांहों में चली आना...

Friday, September 5, 2008

भाग -98

आशा- यकीन कैसे करूँ तुम पर ?
विनीत-मैं हर तरह से हाज़िर हूँ... मेरी जान हाज़िर है... मेरा सर कलम कर दीजिये , तब तो भरोसा हो जायेगा... मैं चंदा के सुंदर शरीर का ही कायल नहीं हूँ... मैं इसको मुख्यधारा में लाना चाहता हूँ.... मैं एक हमेशा के लिए बंद राह को खोलना चाहता हूँ... मेरी ख्वाहिश है की मेरे बाद वे लडकियां भी खुली हवा में साँस लेने का प्रयास करें,जिनको जबरन वैश्यावृत्ति के दल-दल में फंसाया गया है...
आशा- ओह, तो क्रान्ति करना चाहते हो ...
विनीत- जी नहीं... मैं तो बस प्यार करना चाहता हूँ... दुनिया को प्यार का संदेश देना चाहता हूँ... यह दिखा देना चाहता हूँ की प्यार का मतलब सिर्फ़ सेक्स करना या बच्चे पैदा करना ही नहीं... प्यार का अर्थ सिर्फ़ अपने लिए जीना भी नहीं है... दूसरों की स्वतंत्रता को खतरे में डालकर अपना उल्लू सीधा करना कभी प्यार नहीं हो सकता... यहाँ हम अपने सुख के लिए तो तमाम साधन जमा कर लेते है लेकिन दूसरों का बिल्कुल ख़याल नहीं रखते... यहाँ दौलत के बल पर गरीबों की इज्जत बेचीं-ख़रीदी जाती है... मात्र कुछ रुपयों की चमक दिखाकर गरीब घर की लड़कियों को दलाल खरीद कर ले जाते हैं... फ़िर उन्हें जीवन भर नर्क की यातना भुगतनी पड़ती हैं... अगर कोई लड़की वैश्यावृत्ति से छुटकारा पाना चाहे तो उसको मार दिया जाता है... उसको साजिश के तहत किसी बीमारी का शिकार करवा दिया जाता है... तो , ये है तुम्हारी घिनोनी दुनिया... चंदा और मैंने इसके ख़िलाफ़ लड़ने का फैसला किया है... आप जो चाहें करें, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता , क्योंकि हम लोग मानसिक रूप से ख़ुद को तैयार कर चुके हैं... अगर हम दो मरेंगे , कम से कम एक को तो मारेंगे...
आशा- अगर तुम्हें मारकर रेलवे लाइन पर फिकवा दया जाए और इसको दुर्घटना बता दिया जाए तो यह कहानी यहीं ख़त्म नहीं हो जायेगी...
विनीत- ये आपकी भूल है... इस तरह मेरी आवाज़ और भी बुलंद हो ... सत्य को थोडी देर के लिए छिपाया तो जा सकता है, लेकिन उसे हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता... जब यह ख़बर उजागर होगी की एक वैश्या और उसके प्रेमी को प्यार की सज़ा मौत दी गयी है तो जानते हो क्या होगा ? जिन वेश्याओं के दिल में किसी के लिया चाहत की भावना है वह अपने प्रेमी के साथ मिलकर बगाबत कर सकती है... मेरे जैसे युवक भी अपनी चहेती वेश्याओं को अपनाने के लिए आगे आ सकते हैं... अपने लोगों की यादों पर भी पहरा बिठा दिया है... फ़िर लोग आराम से सपने देख सकेंगे... अगर उनमें से कुछ लोग भी अपने मकसद में कामयाब हुए तो हमारा त्याग सफल हो सकता है... वैसे भी कभी किसी की मेहनत बेकार नहीं जाती... मेहनत का फल तो मिलता ही है...
आशा- अगर तुम लोगों को आजाद कर दिया जाए तो क्या करोगे ?
चंदा- आपका एहसान मानेंगे और इस शहर को छोड़कर हमेशा के लिए चले जायेंगे...
विनीत - हम मेहनत मजदूरी करके पेट भर लेंगे... कुछ बेचकर गुजारा कर लेंगे...

Thursday, September 4, 2008

भाग-97

लेकिन मालती उनमें से नहीं थी... तभी तो आशा ने उस पर इतना बड़ा भरोसा किया था... वह आशा के साथ शुरू से ही थी... उसकी हर सफलता या असफलता की गवाह थी... उसकी ईमानदारी ने ही आशा
को अपना करीबी और अब उत्तराधिकारी बनाने के लिए विवश किया था...

उस रात वे दोनों वहीं पर सो गयी... उनमें से किसी ने कुछ नहीं कहा... नीद ने उन दोनों को अपनी आगोश में जकड लिया था... जब दिन काफी चढ़ आया तब जाकर उनकी नीद टूटी... एक जम्हाई लेकर आशा बोली-

-आज बहुत दिनों के बाद इतनी चैन की नीद आई है... अब जाकर पता चला की संतुष्टि भी कोई चीज होती है... मेरे चेहरे पर देखो, आज कितना सुकून नज़र आ रहा है...

मालती सचमुच उसके चेहरे की तरफ़ देखने लगी... अब सुकून कोई प्रदर्शन की चीज थोड़े ही होती है... उसको तो सिर्फ़ दिल से महसूस किया जा सकता है... इसके बाद उन दोनों के बीच कोई संवाद नहीं हुआ ... मालती नीबू -नमक डालकर डालकर दो गिलास पानी ले आई... एक गिलास उसने आशा को दे दिया और एक ख़ुद उसने पी लिया... मालती बेजुबान बनकर रह गयी थी... रात को शा ने उससे जो शब्द कहे थे,वे उसको अविश्वश्नीय लग रहे थे मगर कुछ कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी... आशा ने नाश्ते के आदेश के साथ-साथ चंदा और उसके आशिक विनीत को भी अपने पास लाने का आदेश दिया... चंदा डर रही थी... उसके डर का कारण आशा का क्रोध था... उसके गुस्से से वह अच्छी तरह से वाकिफ थी... आशा का जो काम दुश्मनी से नशीं होता था, उसे वह प्यार्र से कर लिया करती थी... धोखा देने को वह बुराई नहीं बल्कि एक बेहतरीन अदा समझती थी ... विनीत ने मजबूती के साथ उसका हाथ थाम रखा था... आशा ने पूछा-

-मैं चाहती हूँ की आप दोनों मेरे साथ नाश्ता करें ... आप लोगों को कोई आपत्ति तो नहीं ?

चंदा- हमारी भूख-प्यास मर चुकी हैअब कुछ भी इच्छा नहीं है... इतनी मेहरबानी कर दीजिये, हमको यहाँ से जाने दीजिये... या फ़िर हम दोनों की जान ले लीजिये...

उसकी ऊंची आवाज़ सुनकर मालती बीच में ही बोल पड़ी-

- आवाज़ थोडी कम कम रखो, क्या यहाँ का शिष्टाचार भी भूल गयी चंदा... अंजाम का डर नहीं है तुम्हें ?

आशा- बोलने दो इसको... कहो चंदा, जो कहना चाहती हो, खुलकर कहो...

विनीत- ये क्या कहेगी, मैं कहता हूँ... आप लोग हमको आजाद कर दीजिये वरना हम क़ानून का सहारा लेंगे...

आशा- उसकी जरुरत ही नही पड़ेगी ... मैं तुमको छोड़ने के लिए तैयार हूँ... लेकिन ये तो बताओ की इसका क्या करोगे तुम ? यह मेरे कोठे पर कई सालों से वैश्यावृत्ति कर रही है... दर्जनों बार यह गर्भपात करा चुकी है... पता नहीं यह कभी माँ बन भी पाएगी की नहीं ... इसके साथ कब तक रह सकते हो तुम ?

विनीत- मैं चंदा से मोहब्बत करता हूँ , इसके अलावा मुझे और कुछ नहीं चाहिए ... मैं अपनी आखिरी साँस तक चंदा के साथ रहना चाहता हूँ, इसके लिए चाहे मुझे कुछ भी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े... किसी भी हालत में क्यों न रहना पड़े...

आशा- इसके रूप के दीवाने हो तुम ... जब दिल भर जायेगा तो ठोकर मारकर चले जाओगे...

विनीत- मैं अपनी जान दे सकता हूँ, मगर कभी धोखा नहीं दूंगा...


Tuesday, September 2, 2008

भाग-96

किसीने आपके कान तो नहीं भर दिए ?













आशा- ऐसी कोई बात नहीं है... दरअसल मैं आज मजाक के मूड में नहीं हूँ... यहाँ तक की मैं व्यंग्य भी नहीं कर रही... आज मैं इंतकाम के मूड में भी नहीं हूँ ... मेरा यकीन मानो...
मालती- तो फ़िर ? तबियत ठीक नहीं है ? मैं तो पहले ही डॉक्टर बुलाने के लिए कह रही थी...
आशा- मुझे इलाज की जरुरत तो है, लेकिन इस काम को डॉक्टर नहीं कर सकता...
मालती-आज इन पहेलियों को बुझाने का सबब जान सकती हूँ...
आशा- जो भी मैं कहती हूँ, उसे ध्यान से सुनती जाओ, साथ ही उस पर अमल भी करती जाओ ... मैं बिल्कुल फिट हूँ... अपने होशो-हवाश में यह कह रही हूँ की मैं इस कोठे की बागडोर अब तुम्हारे हाथों में सौपना चाहती हूँ... अपनी सारी दौलत तुम्हारे नाम करना चाहती हूँ... इस दुनिया से अब मेरा मोहभंग हो गया है...
मालती- अगर यह बात सच भी है तो इसके लिए आपने मेरा नाम ही क्यों चुना है ?
आशा- क्योंकि इस साम्राज्य को खड़ा करने में मुझे आपका बहुत बड़ा योगदान मिला... मैं अकेली इतना सब नहीं कर पाती ... मैं समझतीं हूँ की तुम मेरी सबसे करीबी और वफादार हो...
मालती- चलिए, ये तो हुआ वारिस बनाने का कारण ... अब लगे हाथों इस वैराग्य का कारण भी बता दीजिये...
आशा- बस, अब और नहीं... इस कारवाँ को अब मैं आगे नहीं बढाना चाहती... इससे कभी किसी का भला नहीं हुआ... इस काम से सिवाय नुक्सान के किसी का फायदा नहीं... हमने इस वैश्यावृत्ति से पीढियां की पीढियां बरबाद कर डाली... कितने लोगों के घर उजडे, कितनों को बीमारियाँ लग गयी और कितने लोग ऊपर चले गए... खुशियों और संतुष्टि के आवरण में लपेटकर हमने न जाने कितने ही परिवारों को हमेशा-हमेशा के लिए गम भेंट कर डाले... अब इस सिलसिले को रोकना होगा...विध्वंस बहुत हो गया , अब कुछ नव निर्माण की बात करनी होगी...
मालती उसकी बातों को ऐसे सुन रही थी जैसे दुनिया के सबसे बड़े अजूबे को देख रही हो... हैरत के मारे उसके नेत्र फटे जा रहे थे... एक टॉप की वैश्या के मुख से साधुओं जैसे पवित्र शब्द निकल रहे थे... मालती कभी सोच भी नहीं सकती थी की किसी का ह्रदय परिवर्तन इस तरह भी हो सकता है ... उसने अंगुलिमाल डाकू की कहानी सुन राखी थी... जिस तरह उसका ह्रदय परिवर्तन हुआ था, वैसे ही आशा का हो रहा था... मालती बहुत पहले से यह सपना देखा करती थी की वह भी आशा की तरह एक दिन कोठे की मालकिन बने ... उसके कोठे की पूरे हिन्दुस्तान में धूम मचे... उसकी रोजाना हजारों, ल्लाखों में कमाई हो... अपने इस ख्वाब को पूरा करने के लिए उसने बेईमानी का रास्ता कभी नहीं चुना था... वह आशा की हमेशा वफादार बनी रही... आशा ख़ुद ही अपनी करोरों की संपत्ति उसे सौपना चाहती थी... इतनी आनंद दायक बात ने भी ना जाने क्यों उसको ज्यादा सुख नहीं दिया... उसके स्थान पर अगर कोई और होती तो फूली नहीं समाती..

Monday, September 1, 2008

भाग-95

तुम अब कह रहे हो, मैं तो पहले ही कह रही थी... मैंने बस एक बार ही मज़ा लिया है, वह भी कंडोम के साथ ...

सलीम- फ़िर कोई टेंसन नहीं है... अब मैं निश्चिंत हूँ...
सलीम और बिजली एक दूसरे में समाने का प्रयत्न करने लगे... जब दो जिस्म आपस में टकराते हैं तो एक अजीब माहोल तैयार हो जाता है... बिजली को आनंद आ रहा था... सलीम की उम्र वैसे तो ढलने वाली थी, लेकिन वह इस खेल का पक्का खिलाड़ी था... वह अपने अनुभव के आधार पर बिजली को हर सम्भव सुख देने का प्रयास कर रहा था...जब वे दोनों एक दूसरे में पूरी तरह समाहित हो गए तो उन्हें असीम सुख मिला... सलीम फूला नहीं समा रहा था... वह एक कमसिन लड़की के साथ सम्बन्ध बनाने को गर्व की बात समझ रहा था... उसको क्या पता था की जिस खूबसूरत लड़की से उसने आनंद लिया था,वह उसके काल का सबब बन चुकी थी... बिजली उसको ऐड्स की सौगात सौंप चुकी थी... यह था आशा का इंतकाम... इतने पर भी वह चुप नहीं बैठी थी... उसने बिजली से पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवा दी... पुलिस वाले उसको जानते थे... बिजली के साथ बलात्कार की पुष्टि हो गयी ... सलीम अपना इलाज भी नहीं करवा पाया था... जेल में ही उसकी दर्दनाक मौत हो गयी... जिस सलीम ने उसको वैश्यावृत्ति के दल-दल में धकेला था, उस सलीम का उसने इस तरह दर्दनाक अंत कर दिया था... आज उसे सारी बातें रह-रह कर याद आ रही थीं... मालती उसको यूँ देख रही थी, जैसे किसी रहस्मयी औरत को देख रही हो... वह उसके कन्धों को झकझोर कर बोली-
-कहाँ खो गई हैं आप? मैं बार-बार पीने के लिए मना कर रही थी ... मुझे पता था की आज कुछ अनहोनी होने वाली है... ऑफ़ , लगता है डॉक्टर बुलाना पड़ेगा...
आशा- परेशान मत हो मालती... मुझे कुछ नहीं हुआ है... ये ठीक है की मैंने आज बहुत शराब पी ली है, लेकिन तुम तो जानती हो की दुनिया की किसी भी शराब में इतना असर नहीं की मुझे बहका सके...
मालती- अरे वाह... आप तो पूरी तरह से ठीक हैं...
आशा- हाँ मालती ... मैं बिल्कुल ठीक हूँ... अत्तीत में चली गयी थी...
मालती- अच्छा... अब मेरे लिए क्या आदेश है ?
आशा- तुम बार -बार अफ़सोस ज़ाहिर करती थी ना , की तुम भी मेरी तरह कोठा मालकिन नहीं बन पाई...
सलीम- हाँ , तो ? अब उसको दोहराने का क्या मतलब है ?
आशा- मैं चाहती हूँ की तुम अपना वो सपना पूरा करो...
मालती- सपना पूरा, मगर कैसे ? यह कैसे सम्भव है ?
आशा- दुनिया में क्या नहीं हो सकता... हर सपना पूरा होने के लिए ही होता है...
मालती- मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूँ...
आशा- मैं चाहती हूँ की मेरी जगह अब तुम इस कोठे की मालकिन बन जाओ...
मालती- ये क्या गज़ब कर रही हैं आप ? क्या आपको मेरी निष्ठां पर कोई संदेह है ?