-तू उधर खड़ा हुआ क्या देख रहा है? क्या तू अपनी माँ से आशीर्वाद नहीं लेगा ?
विनीत को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ ... वह जो सुन रहा था, उस पर सहज भरोसा करना कठिन था...वह तुंरत उसके क़दमों में झुक गया... आशा ने उसको भी अपने गले से लगा किया .... अब वह आशा और विनीत से ऐसे प्यार कर रही थी, मानो वे उसकी अपनीं संतान हो....आशा बोली-
- जाओ, तुम दोनों आजाद हो... सिर्फ़ तुम ही नहीं, मेरे कोठे का कोई भी कर्मचारी आज से स्वतंत्र है... वह अपनी मर्जी से कहीं भी आ-जा सकता है... अब मेरा किसी पर कोई क़र्ज़ नहीं है... कोई जोर नहीं है... अब तक मैंने तुम लोगों के साथ बहुत ज़ुल्म किए, अब मेरी आँखें खुल चुकी हैं ... इन प्यार के परिंदों ने मेरे दिल से नफरत की ज्वाला को पूरी तरह से शांत कर दिया है... मैं अपने अहम् को संतुष्ट करने के लिए नजाने कितने पाप करती रही... अब मैं इन पापों का प्रायश्चित करनाचाहती हूँ...आज मैं अपनी सारी चल -अचल संपत्ति अपनी ख़ास सहयोगी मालती को सौपती हूँ... तुम लोग यहाँ पर जितने भी कर्मचारी हो, उन सबको मैं आश्वस्त करना चाहती हूँ की किसी को भी निराश होने की जरूरत नहीं है... मैं मालती से कहूँगी की कोठे को तो तत्काल बंद कर दे लेकिन साथ ही लोगों के लिए भी कोई व्यवस्था कर दी जाए , ताकि ये लोग बेरोजगार न हो सकें... तुम लोगों को दुखी देखना मेरा मकसद नहीं है...
आशा ने ये बातें बेहद संजीदगी से कही थीं, इसके बावजूद ऐसा लगता था मानो किसी भी समय वह ये एलान न कर दे की वह तो महज़ मजाक कर रही है... तमाम वेश्याएं आँखें फाड़-फाड़ कर देख रहीं थीं... उसने पुछा-
-मैं आप लोगों से ये जानना चाहती हूँ की किसी को इस सम्बन्ध में कुछ कहना तो नहीं है ?
एक दलाल- अगर धंधा बंद कर दिया तो हम लोग खाएँगे क्या ? हमारे बच्चे भूखे मर जायेंगे... हमने दूसरे कोठे के लोगों से तुम्हारी खातिर बहुत पंगा लिया है, अब उन लोगों का नजरिया हमारे प्रति बहुत क्रूर हो जायेगा.... इस तरह हम जियेंगे कैसे ?
मालती- फ़िक्र मत करो, वो सब हमारी जिम्मेदारी होगी... अब तुम्हें पहले से ज्यादा पगार भी मिलेगा और कोई गलत् काम भी नहीं करना पड़ेगा...
आशा- सूना तुम लोगों ने ... तुम सब लोगों को नौकरी भी मिलेगी और बुरा काम भी नहीं करना होगा...
आशा की बातें सुनकर वहाबं पर उपस्थित सभी लोगो के चेहरे पर मुस्कान नाचने लगी ... सब लोग महसूस कर रहे थे ,जैसे की उनको खुली आंखों से सपना दिखाया जा रहा हो....विनीत कहने लगा-
-मुझे माफ़ कर दीजिये... आप तो सचमुच देवी हैं... जीती-जाग्तियो देवी....