Monday, July 28, 2008

भाग -६०

मैं प्यार की खातिर जी नहीं पाई तो मर तो सकती हूँ...
राजू-अच्छा , ठीक है... अगर तुम इसी जिद पर अडीहो तो मैं अभी और इसी वक़्त तुम्हें अपने साथ ले जाने के लिए तैयार हूँ... इससे पहले मेरी कुछ बात सुन सकती हो ?
सुरभि- यह छोड़कर कुछ भी कहो , मुझे मंज़ूर है... सिर्फ़ यही नहीं मानूंगी...
राजू- जब यह ख़बर उडेगी की तुम मेरे साथ भाग गयी हो तो तुम्हें जन्म देने वाले माँ -बाप पर क्या गुजरेगी? वे बेचारे तो जी ते जी मर जायेंगे... समाज उन्हें चैन से रहने देगा क्या ?जो समाज के ठेकेदार हमारे मिलने पर भी इतनी हाय तौबा मची जा रही है तो भाग जाने पर क्या होगा ?भागना समाधान नहीं है... हमको इन सभी परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए ... यदि हमारा प्यार सच्चा है तो जीत भी हामीको मिलेगी... सिर्फ़ थोड़े से सब्र की जरुरत है... मुझे बहाने बनाने की कोई जरुरत नहीं है... अगर मेरे मन में पाप होता तो हम इतनी दूर तक साथ-साथ नहीं चलते...
सुरभि- तुम बात को समझने की कोशिश नहीं कर रहे... अब पानी सर से ऊपर तक जा चुका है... मैं कुछ अलग ही फील कर रही हूँ... मुझे उल्टियाँ आ रहीं हैं... शायद मैं ... शायद ... कुछ गड़बड़ हो चुकी है...
राजू- ये क्या कह रही हो ?
सुरभि- शायद ... मैं माँ बनने वाली हूँ ... यह भेद बहुत जल्दी खुल जाएगा... सब कुछ तबाह हो जाएगा...
राजू- मैं कुछ पैसों का इंतजाम करलूं ,फ़िर कहीं चल देते हैं... जैसे इश्वर रखेगा, वैसे रहेंगे॥
सुरभि-मेरे पास सब इंतजाम है... मैं घर को अलविदा कहकर आ चुकी हूँ...
मालती-कमाल है ... इतनी जिद्दी थी सुरभि ?राजू ने उसकी बात मान ली थी क्या ?
आशा- मुझे उसने जो बताया , मैं तुमको वही बता रही हूँ... उसने कहा की सुरभि की बात मानकर राजू उसे लेकर गों से भाग गया... गों के लोगों को भनक लगती, उससे पहले ही वे दोनों कोल्कता पहुच चुके थे... वहां पर राजू ने एक गैरेज में गाड़ी धोने का कम कर लिया और सुरभि एक सेठ के यहाँ झाडू -पोंछा करने लगी...उन दोनों की प्रेम कहानी जैसे-तैसे आगे बढ़ ही रही थी की उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा...
मालती- दुःख भरा मोड़?
आशा- हाँ यार, तुम सिगरेट सुलगाओ ... सुरभि का संदेह सही निकला था... वह सचमुच गर्भवती थी...
मालती- किसी और से या ?
आशा-किसी और से क्यों होती? उसके पेट में राजू का गर्भ ही पल रहा था... उन दोनों के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन चुके थे... सुरभि बेहद सुंदर थी... कहा जाता है की गरीब की पत्नी को सब भाभी कहना चाहते हैं... सुरभि के यौवन पर भी कई लोगों की कुद्रष्टि लगी हुई थी... उन सबमें सुरभि के यौवन रस को लूटने की जो सबसे ज्यादा इच्छा रखता था, वह था सुरभि का सेठ... जहाँ पर वह बतौर नौकरानी काम करती थी... व्योम दा नामक अधेड़ सेठ सुरभि की अदाओं का जबरदस्त दीवाना था... जब सुरभि झाडू लगाती तो वह उसके शरीर को छिप-छिपकर देखता रहता था... जब वह नीचे झुकती तो उसकी गोलियां सीने से मुक्त होने का प्रयास करती प्रतीत होती थीं... व्योम ने एक दिन अकेले में सुरभि का जिस्म हासिल करने की अपनी आरजू प्रकट की... भोली सुरभि को यह सुनकर बड़ी हैरानी हुई... जिस को वह अपने पिता जैसा samajhtee थी









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