Saturday, July 26, 2008

भाग - ५८ , उसने ज़ज्बात का कत्ल कर दिया

- अच्छा, हाँ-हाँ ... उसे भी बताती हूँ... अब तो हमारी दर्द भरी दास्ताँ को तुमने भी मनोरंजन का साधन बना लिया है... तुम भी यही कहती हो की कहानी सुनाओ...उसने ज़ज्बात का कत्ल किया और लोगों को उसमें भी आनंद आने लगा... यह बड़ा अजीब संसार है... खैर, अब है तो है... क्या कर सकते हैं, सिवाय सुनाने के ... तो सुनो; राजू बड़ा परेशान दिखने लगा था... अब वह प्यार से मेरे बालों में उँगलियाँ फिरा रहा था... उसकी आँखें इस प्रकार सिकुडी हुई थीं मानो अतीत की यादों को कुरेदने की कोशिश कर रहा हो... उसने कुछ अटक-अटक कर कहा-
- मैं तुमसे हर बात सच कह रहा हूँ आशा ... कभी तुम्हें यह ना लगे की मैंने तुमसे कुछ छिपा लिया... मैं सुरभि के आकर्षण में ऐसे बंध गया थकी मुझे अपनी भी सुध-बुध नहीं रही... तब मैंने जाना की प्यार कोई किसी से करने की चीज नहीं है... यह तो हमारी अंतरात्मा में बसा हुआ होता है... सच्चा प्रेम हमेशा हमको अच्छी राह दिखाता है...अगर हम चाहें की किसी से मोहबात करलें तो ऐसा क्षणिक ही हो सकता है... जन्म जन्मान्तर का प्यार तो हमारे रग -रग में समाया हुआ होता है... अगर दिल से नफरत निकाल दी जाए तो फ़िर प्यार ही शेष रह जायेगा ... जब नफरत के लिए जगह ही नहीं बचेगी तो वह नफरत परोसेगा कैसे... यही प्यार का सार है... इसलिए कोशिश होनी चाहिए की दिलो-दिमाग में कहीं नफरत बचे ही नहीं...
मालती- वाह, वाह ... ऐसा कहा उसने...वाकई यह तो कमाल हो गया... शब्दों का भी जादूगर था वह...
-हाँ, वह था ... सब कुछ था राजू... मैं यंत्रवत उसकी बातें सुनती जा रही थी... उससे प्रभावित न होने का सवाल ही नहीं उठता था...उसकी जुबां से शहद टपक रहा था... मुझे अचानक ये एहसास हुआ की मैं राजू की गुलाम बनती जा रही थी... उसने mujh पर जबरदस्त प्रभाव छोड़ा था... जैसे कोई संत बोलता रहता है और भक्त सुनते रहते हैं... थोडी देर पहले जो राज काम वासना में जकडा हुआ था वह अब सुरभि की बात कहते-कहते बिल्कुल आध्यात्मिक हो चुका था...
मालती- तुमने इतना बर्दास्त कैसे कर लिया... गर्म कर देती...
- हारकर यही करना पडा...मैंने राजू के ऐसे अंगों को सहलाना शुरू कर दिया, जिनसे वह उत्तेजक हो सकता था... इसका तत्काल असर भी हुआ ... वह थोड़ा सा विचलित होने लगा... मुझे मज़ा आया ... मने आगे कहा-
- तुमने सुरभि के साथ असली सुख नहीं उठाया....
राजू- तुम किस सुख की बात कर रही हो ?
- उसी सुख की जो तुम मुझसे वसूल करना चाह रहे हो ...
राजू- यह देह सुख असली सुख नहीं है... सच्चा सुख तो यहाँ , देखो यहाँ सीने में बसा होता है...
-मेरा शरीर अकड़ रहा है... मुझे तुमने प्रेम रोग लगा दिया है... अब क्या करूँ,
मालती- तुम्हारी हालत पर राजू को तरस नहीं आया? हाँ आया ...उसने मेरे उभारों को जोर-जोर से सहलाना शुरू कर दिया...वह काफी देर तक उनका मर्दन करता रहा... मैं सुख में सराबोर होती रही... मेरी खुशी की कोई सीमा नहीं थी... जीवन में इतना आनंद कभी नहीं मिला था... उस दिन मुझे पता चला की दुनिया में कितने रंग बिखरे हुए है... सारा जहाँ रंगीन नज़र आ रहा था... मैं उसके होठो से अपने नर्म -नाज़ुक होठों को रगड़ने लगी.... इस घर्षण से मेरे बदन में ज्वाला सी दाहक उठी... मन में फुल्झादियाँ सी छूटने लगीं...राजू भी कामोत्तेजित हो चुका था ... उसकी गर्म साँसें मुझे और भी ज्यादा उत्तेजित कर रही थीं...सीने के बाद उसने मेरी जाँघों को निशाना बनाना शुरू कर दिया... मेरी चिकनी जांघें जब दर्द से दुखने लगीं तो मैंने शिकायती लहजे में कहा-
-इन पर ज्यादा जोर न डालो...इस तरह तो मेरा चलना -फिरना भी दूभर हो जाएगा...
राजू- प्यार की यह सुखद अनुभूति तुम्हें बहुत याद आएगी आशा... मुझे अब ना रोको....

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